प्रश्न: भगवान् को प्रसाद क्यों चढ़ावें? उत्तर: भगवान स्वयं आदेश देते हैं- यत्करोषि यदश्नासि, यज्जुहोषि ददासि यत्। यत्तपस्यसि कौन्तेय, तत्कुरुष्व मदर्पण् ाम्।। -गीता, अध्याय 9/श्लोक 28 -हे मनुष्य ! पत्र, पुष्प, फल, जल और जो कुछ तू खाता है, जो हवन करता है, जो दान देता है और जो तप करता है, वह सब प्रथमतः मुझे अर्पण कर। तदनुसार प्रत्येक भगवद्भक्त भगवान की आज्ञा पालन करने के लिए भगवान को भोग लगाता है। परमात्मा की कृपा से जो कुछ अन्न-जल हमें प्राप्त होता है, उसे प्रभु का प्रसाद मानकर, प्रभु को अर्पित करना, कृतज्ञता ज्ञापन के साथ-साथ मानवीय सद्गुण है। एक पिता के दो पुत्र थे- एक चुन्नू, एक अन्नू। घर में कोई ऐसा प्रसंग आया- दोनों ने अति आग्रह करके हाथ-खर्च के लिये पिता से कुछ पैसे प्राप्त किये। चुन्नू मेले में गया और उस पैसे से कुछ पकौड़ियां खरीद कर अकेले खा गया। अन्नू भी मेले में गया, वहां उसने कुछ रेवड़ियां खरीदीं तो पिता की शिक्षा का स्मरण आ गया कि - कोई वस्तु अकेले नहीं खानी चाहिए। वह दौड़ा-दौड़ा घर आया और मित्र-मंडली में बैठे पिता के सामने रेवड़ियां रखकर नम्रता से बोला-पिताजी! पहले आप ले लीजिए। बालक की इस चेष्टा पर पिता ने रेवड़ी को छुआ तक नहीं, परंतु बालक की आज्ञा-पालन की प्रवृत्ति पर वे फूले नहीं समाये। मित्र-मंडली ने भी प्रशंसा की तथा उसे पुरस्कार और पैसे दिये। सायंकाल चुन्नू को उसके अकेले खाने की आदत पर डांट पड़ी और पुनः उसे कभी फालतू पैसा नहीं दिया गया। चुन्नू और अन्नू और कोई नहीं परमात्मा के दो पुत्र हैं- एक नास्तिक दूसरा आस्तिक। दोनों ही पिता से रो-रो कर चार पैसे मांगते हैं। नास्तिक पुत्र चुन्नू की तरह ईश्वरप्रदत्त पदार्थों को स्वयं अकेला खा जाता है परंतु आस्तिक पुत्र अन्नू वेदशास्त्रों की आज्ञा स्मरण करके प्रथम देव, पितर, अतिथियों को अर्पण करने के पश्चात् उसका प्रसाद स्वयं ग्रहण करता है। श्रीमन्नारायण प्रसन्न होकर उन्हें अधिकाधिक ऋद्धि-सिद्धि प्रदान करते हैं। भगवान को भोग लगाकर, उनके प्रसाद के रूप में स्वीकार किया गया अन्न दिव्य होता है। भगवान को प्रसाद चढ़ाना आस्तिकता का प्रमुख लक्षण है। प्रश्न: क्या भगवान खाते हैं? उत्तर: श्रीमद्भगवद्गीता में स्वयं भगवान कहते हैं- पत्रं पुष्पं फलं तायं यो में भक्त्या प्रयच्छति। तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः।। -गीता, अध्याय 9/श्लोक 26 -अर्थात् जो कोई भक्त मेरे लिये प्रेम से पत्र, पुष्प, फल जल आदि अर्पण करता है, उस शुद्ध बुद्धि निष्काम प्रेमी भक्त का प्रेमपूर्वक अर्पण किया हुआ वह पुष्पादि मैं सगुण रूप से प्रकट होकर प्रीति सहित खाता हूं। ‘भावनावाद सिद्धांत’ के अनुसार शास्त्रविश्वासी भक्त तो ऐसा ही समझते हैं कि वे अवश्य खाते हैं क्योंकि धन्ना जाट, नामदेव, विदुर, सुदामा, शबरी, द्रौपदी, रन्तिदेव, करमाबाई के यहां भोजन किया, यहां तक कि मीरा ने जब भोग लगाया तो भगवान ने विष भी पीया। भक्त की भावना दृढ़ हो तो एक बार नहीं भगवान हजार बार खाते हैं।


वास्तु विशेषांक  दिसम्बर 2014

फ्यूचर समाचार के वास्तु विषेषांक में अनेक रोचक व ज्ञानवर्धक लेख जैसे भवन और वास्तु, वास्तु शास्त्र का वैदिक स्वरूप, वास्तु शास्त्र के मूलभूत तत्व, वास्तु शास्त्र व दाम्पत्य जीवन, उद्योग धन्धे क्यों बन्द हो जाते हैं?, फ्लैट/प्लाॅट खरीदने हेतु वास्तु तथ्य, अनुभूत प्रयोग एवं सूत्र, वास्तु सम्मत सीढ़ियां भी देती हैं सफलता, घर में क्या न करें?, विभिन्न दिषाओं में रसोईघर, वास्तुदोष समाधान, वास्तु संबंधी कहावतें, वास्तु दोष दूर करने के सरल उपाय, पंचतत्व का महत्व तथा स्वास्थ्य संबंधी वास्तु टिप्स। इसके अतिरिक्त वास्तु पर हुए एक शोध कार्य पर लिखा गया सम्पादकीय, करियर परिचर्चा, सुखी दाम्पत्य जीवन का आधार: शादी के सात वचन, सत्य कथा, हैल्थ कैप्सूल, पावन स्थल में बांसवाड़ा का प्राचीन मां त्रिपुरासुन्दरी मन्दिर, ज्योतिष व महिलाएं तथा ग्रह स्थिति एवं व्यापार, पंचपक्षी के रहस्य, मंत्र व तंत्र साधना का स्वरूप, कर्णबेधन संस्कार, गृह सज्जा एवं वास्तु फेंगसुई आदि लेखों को समायोजित किया गया है।स्थायी स्तम्भ विचार गोष्ठी के अन्तर्गत ‘पिरामिड का वास्तु में प्रयोग’ विषय पर विभिन्न विद्वानों के विचारों को प्रस्तुत किया गया है। आषा है फ्यूचर समाचार के पाठकों को यह विषेषांक विषेष पसंद आयेगा।

सब्सक्राइब

अपने विचार व्यक्त करें

blog comments powered by Disqus
.