भारत के सभी प्रधानमंत्रियों की कुण्डलियां

भारत के सभी प्रधानमंत्रियों की कुण्डलियां  

जब कुंडली में योगकारक या किसी अन्य शक्तिशाली ग्रह की दशा/ अंतर्दशा चल रही हो तो प्रबल राजयोग की कुंडली वाला जातक सत्ता का सुख प्राप्त करता है। कुंडली में लग्नेश, पंचमेश व भाग्येश की दशा या लग्न, पंचम या नवम भावों में स्थित ग्रहों की दशा तो अनुकूल होती ही है साथ ही दशम भाव या दशमेश अथवा सप्तम भाव या सप्तमेश की दशा या इनसे संबंध रखने वाले ग्रहों की दशा भी श्रेष्ठ मानी जाती है। जब गुरु व शनि का संयुक्त गोचरीय प्रभाव श्रेष्ठ ग्रह की दशा/अंतर्दशा में दशम, सप्तम, पंचम या नवम भाव अथवा इन भावों के स्वामी व दशानाथ को प्रभावित करता है तो भी सत्ता प्राप्ति का योग बनता है लेकिन यह तथ्य अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है कि श्रेष्ठ गोचर का लाभ श्रेष्ठ कुंडलियों वाले जातकों को ही प्राप्त हो पाता है। श्रेष्ठतम कुंडलियों वाले जातकों की कुंडली में पंचम व नवम भाव या इनके स्वामी अथवा कारकों पर गुरु व शनि का संयुक्त गोचरीय प्रभाव (डबल भारत के सभी प्रधानमंत्रियों की कुंडलियां (सत्ता प्राप्ति के समय का गोचर- एक अध्ययन) यशकरन शर्माकरियर परिचर्चा ूूूण्निजनतमचवपदजपदकपंण्बवउ 48। फ्यूचर समाचार। दिसंबर 2014 ूूूण्निजनतमेंउंबींतण्बवउ ट्रांजिट इफेक्टद्ध इनके पूर्वजन्मार्जित पुण्यों को जगाने का कार्य करता है जिसके परिणामस्वरूप इन्हें उच्च पद की प्राप्ति हो जाती है। जवाहर लाल नेहरू की कुंडली में 15 अगस्त सन् 1947 में सत्ता प्राप्ति के समय चंद्रमा में शुक्र की दशा चल रही थी। गोचर के शनि की दृष्टि जन्मकुंडली के पंचमेश पर पड़ रही थी तथा गुरु का गोचर पंचमेश अधिष्ठित राशि के स्वामी पर हो रहा था। शनि व गुरु का संयुक्त गोचरीय प्रभाव दशम भाव पर पड़ रहा था। गुलजारी लाल नंदा की कुंडली में सत्ता प्राप्ति के समय 27 मई 1964 को गुरु में मंगल की दशा चल रही थी। भाग्येश गुरु की दशम भाव पर दृष्टि है तथा अंतर्दशा स्वामी मंगल भी लग्नेश होकर लग्नस्थ है। इसलिए दोनों दशाएं शुभ थीं। गुरु व शनि का संयुक्त गोचरीय प्रभाव पंचम भाव पर पड़ रहा था। ये केवल 13 दिन तक प्रधानमंत्री के पद पर रहे। दूसरी बार 11 जनवरी 66 को ये फिर से 13 दिन के लिए प्रधानमंत्री बने और उस समय भी नवम व दशम भाव को प्रभावित करने वाले ग्रहों की दशा चल रही थी। लाल बहादुर शास्त्री: शास्त्री जी की कुंडली में 9 जून 1964 को सत्ता प्राप्ति के समय स्वगृही द्वितीयेश श िकी महादशा में गुरु की अंतर्दशा चल रही थी जो लग्नेश होकर पंचमस्थ है अर्थात् दशा व अंतर्दशा दोनों ही शुभ हैं। दशानाथ शनि चंद्र कुंडली का पंचमेश है। शनि व गुरु का संयुक्त गोचरीय प्रभाव पंचम भाव पर हो रहा था। इंदिरा गांधी: 24 जनवरी 1966 को सत्ता प्राप्ति के समय इनकी गुरु में शुक्र की दशा चल रही थी। गुरु व शनि का संयुक्त गोचरीय प्रभाव पंचम भाव को प्रभावित कर रहा था। 14 जनवरी 1980 को जब ये दूसरी बार प्रधानमंत्री बनीं तो गोचर का शनि पंचम भाव पर दृष्टि डाल रहा था तथा गोचर का गुरु पंचमेश पर चल रहा था। मोरारजी देसााई: 24 मार्च 1977 को सत्ता प्राप्ति के समय इनकी लग्नेश की दशा में केतु की अंतर्दशा चल रही थी। पंचमेश पर गुरु व शनि का संयुक्त गोचरीय प्रभाव हो रहा था। इसके अतिरिक्त यह गोचरीय प्रभाव जनता व राजगद्दी के सुख के कारक चतुर्थ भाव पर हो रहा था। चरण सिंह: 28 जुलाई 1979 में सत्ता प्राप्ति के समय इनकी दशमेश बुध में शनि की दशा चल रही थी। बुध दशमेश होकर राजयोग कारक ग्रहों से संयुक्त है। स्वगृही शनि भी महाभाग्यशाली योग का निर्माण कर रहा है। गोचर में उच्च राशि के गुरु की अंतर्दशानाथ पर दृष्टि पड़ रही थी तथा शनि नवम भाव को प्रभावित कर रहा था। दशानाथ शनि चंद्रमा से पंचमेश है तथा गोचर के गुरु की दृष्टि चंद्रमा से पंचम भाव पर पड़ रही थी। राजीव गांधी: श्री राजीव गांधी की जन्मपत्री में अक्तूबर 1984 को सत्ता प्राप्ति के समय पंचम व नवम इन दोनों भावों पर शनि व गुरु का संयुक्त गोचरीय प्रभाव आ रहा था। विश्वनाथ प्रताप सिंह: 2 दिसंबर 1989 को प्रधानमंत्री बनने के समय चंद्रमा से पंचम व नवम भाव में गुरु व शनि का संयुक्त गोचरीय प्रभाव था। पी. वी. नरसिम्हा राव: इनकी जन्मपत्री में 21 जून 1991 को सत्ता प्राप्ति के समय पंचम व सप्तम भाव पर शनि व गुरु का संयुक्त गोचरीय प्रभाव था। महादशा दशम भाव में बैठे ग्रह की चल रही थी। अटल बिहारी वाजपेयी: 16 मई 1996 को 13 दिन के लिए प्रधानमंत्री बने। दशम भाव में बैठे राहु में केतु की दशा में छठे भाव में स्थित मंगल के ऊपर शनि का अशुभ गोचर होने के कारण अधिक दिनांे तक सत्तारूढ़ नहीं रह सके परंतु 19 मार्च 1998 को 13 महीने के लिए प्रधानमंत्री बनने के समय राहु में शुक्र की दशा व गुरु का गोचर पंचम भाव में हो रहा था लेकिन शनि का गोचर फिर भी मंगल पर ही चल रहा था। अक्तूबर 1999 में ये फिर से सत्तारूढ़ हुए और इस समय राहु में सूर्य की दशा थी। शनि व गुरु का संयुक्त गोचरीय प्रभाव पंचमेश व सप्तम भाव पर हो रहा था। एच. डी. देवगौड़ा: की कुंडली में 1 जून 1996 को सत्तारूढ़ होने के समय शनि का गोचर नवम भाव में गुरु की राशि में हो रहा था। गुरु व शनि दोनों का गोचर पंचम भाव के कारक गुरु की राशियों में हो रहा था तथा गुरु का गोचरीय प्रभाव नवमेश गुरु तथा दशम भाव पर हो रहा था। चंद्रशेखर के प्रधानमंत्री बनने के समय 10 नवंबर 1990 को नवम भाव पर शनि का गोचर हो रहा था तथा नवमेश गुरु उच्चराशिस्थ था। इंद्र कुमार गुजराल: प्रधानमंत्री बनने के समय 21 अप्रैल 1997 को इनकी पंचम व नवम भाव को प्रभावित करने वाले गुरु व राहु की दशा अंतर्दशा चल रही थी तथा गोचरीय गुरु व शनि का सप्तम व नवम भाव में स्थान परिवर्तन योग बन रहा था। मनमोहन सिंह: 22 मई 2004 को सत्तारूढ़ होने के समय इनकी कुंडली में राहु में शनि की दशा तथा शनि व गुरु का संयुक्त गोचरीय प्रभाव नवम भाव में हो रहा था। 2009 में पुनः प्रधानमंत्री बनने के समय भी शनि व गुरु का संयुक्त गोचरीय प्रभाव नवम भाव पर हो रहा था। नरेंद्र मोदी: नवमेश की महादशा में दशम भाव पर दृष्टि डालने वाले गुरु की अंतर्दशा चल रही थी जो गोचर में उच्चाभिलाषी होकर नवम भाव में प्रवेश करने वाला था तथा शनि का गोचरीय प्रभाव नवम भाव पर पड़ रहा था। निष्कर्ष: इन सभी कुंडलियों के विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि इनमें से अधिकतर कुंडलियों में पंचम व नवम भाव तथा इनके स्वामी या कारकों पर गुरु व शनि के गोचरीय प्रभाव ने इनके पुण्य व भाग्य को जगाने में जैसे पुश बटन का कार्य किया। ऐसा गोचर उच्च पद की प्राप्ति के लिए उत्तम माना जाता है। कुंडली में नवम भाव तो भाग्योदय का कारक होता ही है। लेकिन पंचम भाव भी भाग्योदय करने में उतना ही महत्वपूर्ण योगदान देता है क्योंकि भावात् भावम् के सिद्धांत के अनुसार पंचम भाव नवम से नवम होता है अर्थात् हमारे भाग्य का भी भाग्य पंचम भाव पर निर्भर करता है। इसलिए यह केवल बुद्धि, विद्या व संतान का ही कारक नहीं है अपितु इसी भाव से पूर्व जन्म के अर्जित पुण्य के बारे में भी जानकारी मिलती है। जैमिनी ज्योतिष के अनुसार यही कारण है कि पंचम भाव को राजयोग कारक माना जाता है तथा जीवन में आशातीत सफलता के लिए इस भाव का सशक्त एवं समृद्ध होना अपेक्षित है।


वास्तु विशेषांक  दिसम्बर 2014

फ्यूचर समाचार के वास्तु विषेषांक में अनेक रोचक व ज्ञानवर्धक लेख जैसे भवन और वास्तु, वास्तु शास्त्र का वैदिक स्वरूप, वास्तु शास्त्र के मूलभूत तत्व, वास्तु शास्त्र व दाम्पत्य जीवन, उद्योग धन्धे क्यों बन्द हो जाते हैं?, फ्लैट/प्लाॅट खरीदने हेतु वास्तु तथ्य, अनुभूत प्रयोग एवं सूत्र, वास्तु सम्मत सीढ़ियां भी देती हैं सफलता, घर में क्या न करें?, विभिन्न दिषाओं में रसोईघर, वास्तुदोष समाधान, वास्तु संबंधी कहावतें, वास्तु दोष दूर करने के सरल उपाय, पंचतत्व का महत्व तथा स्वास्थ्य संबंधी वास्तु टिप्स। इसके अतिरिक्त वास्तु पर हुए एक शोध कार्य पर लिखा गया सम्पादकीय, करियर परिचर्चा, सुखी दाम्पत्य जीवन का आधार: शादी के सात वचन, सत्य कथा, हैल्थ कैप्सूल, पावन स्थल में बांसवाड़ा का प्राचीन मां त्रिपुरासुन्दरी मन्दिर, ज्योतिष व महिलाएं तथा ग्रह स्थिति एवं व्यापार, पंचपक्षी के रहस्य, मंत्र व तंत्र साधना का स्वरूप, कर्णबेधन संस्कार, गृह सज्जा एवं वास्तु फेंगसुई आदि लेखों को समायोजित किया गया है।स्थायी स्तम्भ विचार गोष्ठी के अन्तर्गत ‘पिरामिड का वास्तु में प्रयोग’ विषय पर विभिन्न विद्वानों के विचारों को प्रस्तुत किया गया है। आषा है फ्यूचर समाचार के पाठकों को यह विषेषांक विषेष पसंद आयेगा।

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