विद्याप्रदायिनी: मां सरस्वती

विद्याप्रदायिनी: मां सरस्वती  

मां सरस्वती मन, बुद्धि और ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी हैं। यह आदि शक्ति जगदंबा त्रिगुणात्मक रूपों में हैं। ज्ञान विद्या का स्वरूप है। विद्या तो वह है, जो धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चारांे पुरूषार्थों को सिद्ध कर दे। ज्ञान-बुद्धि ही जीवन को उध्र्वगति दे सकता है। ज्ञान की महिमा को सर्वाेच्च रूप में स्वीकार किया गया है। विद्याप्रदायिनी मां सरस्वती हंसवाहिनी, चार भुजावाली, वीणा-वादिनी व श्वेत वस्त्रावृत्ता हैं। संगीत, कला व ललित कलाओं की अधिष्ठात्री देवी भी मां सरस्वती ही हैं। इन्हें महा सरस्वती भी कहते हैं। वे शशि की भांति धौला व कुंद, पुष्प के समान उज्ज्वल हैं। इनके करों में वीणा, पुस्तक एवं माला हैं तथा हस्त वरमुद्रा मंे है। वे श्वेत ‘पद्मासना’ हैं। इनकी स्तुति ब्रह्मा, विष्णु, महेश, देवराज इंद्र भी सदैव करते हैं। इनका वाहन हंस है जिसपर मां सरस्वती की कृपा हो जाय, उसे विद्वान बनते देर नहीं लगती। मां सरस्वती का विशेष उत्सव माघ की शुक्ल पंचमी है, जो बसंत पंचमी के रूप में मनाया जाता है। इस वर्ष यह पर्व 24 जनवरी 2015 को पड़ रही है। आवश्यकतानुसार वे ब्रह्मा, विष्णु, महेश, महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती के रूप में अवतरित होती हैं। ‘‘रौद्ररूपा शक्ति महाकाली दुष्टांे का संहार करती हैं। ‘महा लक्ष्मी’ जो सत्य प्रधान हैं, के रूप में वे सृष्टि का पालन करती हैं, उसी प्रकार मां सरस्वती के रूप में वे जगतोत्पत्ति व ज्ञान का कार्य करती हैं। मां सरस्वती सत्गुण संपन्न हैं, वे विभिन्न नामों से भी जानी जाती हैं। जैसे शारदा, वाचा, बागीश्वरी ब्रह्मी, वाग्देवी, भारती, महावाणी, प्रज्ञा, सवित्री, वीणा-वादिनी, पुस्तक धारिणी, वीणापाणि आदि। ऋग्वेदानुसार वे सौम्य गुणों को प्रदान करने वाली, रूद्र, वसु व आदित्य आदि सभी देवों की रक्षिका हैं। इन्हें प्रसन्न कर लेने पर मनुष्य जगत के समस्त सुखों को भोगता है। इनकी कृपा से मनुष्य ज्ञानी, विज्ञानी, मेधावी, महर्षि व बह्मर्षि हो जाता है। वे सर्वत्र व्याप्त हैं। बसंत पंचमी को इनका जन्म-दिवस मनाया जाता है। मां सरस्वती की उत्पत्ति को लेकर अनेक पौराणिक कथाएं हैं। कहा गया है कि वे बसंत पंचमी के दिन ब्रह्मा के मानस से उत्पन्न हुई थीं तथा कुछ लोगों की मान्यता है कि उनका प्रादुर्भाव श्रीकृष्ण के कंठ से हुआ है। एक अन्य पौराणिक कथा है कि भगवान विष्णु जी के आदेशानुसार ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की, किंतु वहां चारों ओर सूना वातावरण था, समस्त वातावरण में भय और उदासीनता ही उदासीनता चारों ओर व्याप्त थी। अतएव ब्रह्माजी ने उदासीनता और मलीनता को समाप्त करने के लिए अपने कमंडल से जल छिड़का फलतः वहां वृक्षों से एक देवी शक्ति का प्रादुर्भाव हुआ। ये दोनों हाथों से वीणा बजा रही थीं तथा एक हाथ में वेद तथा दूसरे हाथ में स्फटिक की माला थी। देवी ने वीणा बजाकर विश्व की उदासीनता दूर की तथा विश्व के समस्त प्राणियों को वाणी प्रदान की। इस प्रकार उन्हें सरस्वती के नाम से संबोधित किया गया। एक अन्य कथानुसार ईश्वर की इच्छानुसार आद्य-शक्ति ने अपने को पांच भागों में विभाजित किया। पद्म सावित्री, दुर्गा, सरस्वती व राधा जो भगवान श्रीकृष्ण के विभिन्न अंगों से प्रकट हुईं। उनके कंठ से जो देवीशक्ति प्रकट हुई थी मां सरस्वती कहलाईं। आधुनिक स्पर्धा के इस युग में प्रत्येक माता-पिता अपनी संतान के बारे में श्रेष्ठ, योग्य, ज्ञानवान तथा विद्या में लगनशील हो ऐसी कामना रखते हैं और यह तभी संभव है कि जब मां सरस्वती स्वयं शक्तियों सहित कृपा की वर्षा करें। मां सरस्वती का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए बसंत पंचमी के पावन अवसर पर उनकी आराधना-साधना से वाक्पटुता, वाणी कोमल, सौभाग्य एवं दीर्घायु प्राप्त होती है। साधना विधि: इस साधना को स्त्री-पुरूष व बच्चे कर सकते हैं। नियम संयम का पालन कर माघ शुक्ल पंचमी के दिन प्रातः उठकर नित्य-क्रिया से निवृत्त होकर स्नानादि कर पीत वस्त्र धारण करने के उपरांत पूजा कक्ष में पीले आसन पर बैठ जायंे। सरस्वती जी का चित्र व अन्य कोई विग्रह तथा ताम्र पत्र पर निर्मित प्राण-प्रतिष्ठित सरस्वती यंत्र को स्टील की प्लेट पर स्वास्तिक अथवा अष्ट-दल बनाकर पीले पुष्प का आसन बना कर स्थापित करें। अब विधिपूर्वक संकल्प करके, न्यास, ध्यान आदि करने के पश्चात यंत्र को अष्ट-गंध का तिलक कर, चंदन, अक्षत, रोली, पुष्प, धूप-दीप से पूजन करें। किसी वस्तु के अभाव में अक्षत चढ़ा दें। गाय के घी का दीपक साधना काल तक प्रज्ज्वलित रहना चाहिए। तदोपरांत स्फटिक की माला से निम्न मंत्र की पांच माला (5 ग् 108 बार) जाप करें। मंत्र: ‘‘ऊँ ऐं सरस्वत्यै नमः’’ इसके बाद भगवती से ‘क्षमस्व परमेश्वरी’ यह कहकर क्षमा प्रार्थना करें। जप के उपरांत यंत्र को पूजा स्थल पर रख दें तथा बाद में नित्य प्रतिदिन एक माला मंत्र का जाप कर मां सरस्वती का पूजन करें, मां का आशीर्वाद अवश्य ही प्राप्त होगा। मां के चित्र अथवा यंत्र के सम्मुख विद्यार्थी अपनी लेखनी व पुस्तक अवश्य रखें क्योंकि इनमें मां सरस्वती का वास होता है। वसंत पंचमी के अतिरिक्त इस साधना को शुक्ल पक्ष की किसी भी पंचमी अथवा गुरुवार के दिन से प्रारंभ किया जा सकता है। ‘‘या कुन्देन्दु तुषार हार धवला या शुभ वस्त्रावृत्ता। या वीणा वर दण्ड मण्डित करा या श्वेत पद्मासना।। या ब्रह्माच्युत शङ्करा प्रभृर्तिमिर्देथे सदावन्दिता। सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेष जाङ्यापहा।।

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