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टैरो का इतिहास एवं परिचय

टैरो का इतिहास एवं परिचय  

टैरो का उद्गम सही रूप में तो किसी को भी पता नहीं है। यद्यपि आमतौर पर यही माना जाता है कि इनका उद्गम स्थान प्राचीन इजिप्ट है। लगभग 13वीं शताब्दी में इनका अध्ययन-मनन शुरू हुआ। ऐसा भी माना जाता है कि इनका प्रचार व प्रसार जिप्सियों द्वारा भी हुआ था व जिप्सियों (खानाबदोश) द्वारा ही यह यूरोप में पहुंचा जहां इन पर काफी कार्य हुआ। टैरो का शुरूआती प्रयोग इटली के प्रचलित एक प्राचीन खेल ‘टारोच्ची’ के लिए होता था। टारोच्ची एक प्रकार से आधुनिक ताश के खेल ब्रिज का मिलता-जुलता रूप है। ‘टारोच्ची’ अभी भी दुनिया के कतिपय हिस्सों में खेला जाता है यद्यपि उन कार्डों की मौजूदा संख्या व बनावट टैरो कार्डों से काफी भिन्न है। एक जमाने में इटली के रजवाड़ों में टारोच्ची एक लोकप्रिय खेल था। आज के प्रचलित कई टैरो कार्डों का स्वरूप उनसे मिलता-जुलता है। ऐसा भी माना जाता है कि 1781 में पेरिस के एक राज मिस्त्री इन्टोइनी कोर्ट दी गेवेलियन ने टैरो कार्ड्स की रहस्यमयता या गूढ़ता का ताना-बाना बुना था। उसने टैरो कार्ड्स से जुड़ी हुई कई कहानियां प्रचलित की थीं। ऐसी मान्यता है कि मेजर आरकाना के कार्ड तो कबाला से लिए गए हैं। टैरो कार्ड्स की लोकप्रियता में एलिफास लेवी, ओसवाल्ड वर्थ, पापूस इत्यादि का भी काफी हाथ रहा। फ्रांस से इन कार्डों की लोकप्रियता इंग्लैंड पहुंची। एस. एल. मैथर्स, ए. ई. वेट तथा ए. काले का नाम इस संदर्भ में उल्लेखनीय है। इन लोगों के समय यूरोप में इन कार्डों का प्रयोग और महत्ता काफी बढ़ गई। इन लोगों का आदर्श रूप से विचार था कि इन कार्डों का भविष्य कथन में प्रयोग करने के साथ-साथ कई शाश्वत अनुभव प्राप्त किए जा सकते हैं। हालांकि भूतकाल, वर्तमान काल व भविष्य कथन में इन कार्डों की उपयोगिता व लोकप्रियता आज तक कायम है और निरंतर बढ़ रही है। सबसे पहले प्रचलित टैरो कार्ड्स 15वीं शताब्दी में कोलीओनी परिवार के द्वारा विकसित किया गया जो कि बारगामो, इटली के थे। उसके बाद वी. पी. ग्रीमोड ने मारसीलस टैरो डेक बनाया जो कि पश्चिमी देशों में बहुत प्रसिद्ध है। इन सबमें से सबसे ज्यादा राइडर वेट के टैरो कार्ड्स प्रचलित हंै जो कि 1910 में ए. ईवेट ने पामेला कोलमन के साथ मिलकर बनाए थे। वेट एक जादू की सोसाइटी की मानी हुई हस्ती थे। इनके टैरो डेक गूढ़ रहस्यों से भरपूर हैं व इन्हीं की सहायता से दुनिया के अलग-अलग कोनों में टैरो डेक की डिजाइनिंग की जाती है। ऐसा मानना है कि टैरो कार्ड्स केवल पश्चिमी देशों की ही पद्धति है, परंतु ऐसा नहीं है, हमारे भारत वर्ष में भी ये पद्ध ति बहुत प्राचीन समय से चली आ रही है। परंतु उस पद्धति या विद्या को हम किसी और नाम से जानते हैं- वह है तोते के द्वारा भविष्य कथन। आज के वैज्ञानिक युग में यह विद्या भारत वर्ष में लगभग लुप्त होती जा रही है, केवल कुछ ही लोग इस विद्या को जानते हैं। दोनों ही पद्धतियों में भविष्य कथन बताने का तरीका एक जैसा होता है। इनके द्वारा एक अनुभवी व ज्ञानी रीडर, पूछने वाले व्यक्ति के चेतन, अवचेतन मन की गहराइयों तक पहुंच जाता है व अपनी विद्या के द्वारा उनका मार्गदर्शन करता है जिसमें कि पूछने वाले व्यक्ति को आने वाले समय के बारे में बताया जाता है तथा आत्मचिंतन के बारे में भी बताया जाता है व आने वाले समय को किस तरह इस्तेमाल करना है, जिससे कि वह एक मुश्किल दौर में भी आसानी से निकल जाए। यह सब टैरो कार्ड्स पर अंकित चित्रों व नंबर को देख कर करते हैं। टैरो कार्ड्स व्यक्ति को जीवन के प्रति प्रोत्साहित करता है, रास्ते व जीने की राह दिखाता है और जीवन को एक नए ढंग से देखने, परखने व आजमाने का तरीका सिखाता है। यह एक बहुत ही बढ़िया तरीका है जिसमें आप आत्मचिंतन कर जीवन को एक बहुत ही अच्छे व बढ़िया तरीके से जीना सीखते हैं। टैरो कार्ड्स न केवल आपको नई शक्ति व ऊर्जा देते हैं, जिससे कि आप अपने में अच्छा बदलाव ला सकते हैं बल्कि आपकी इन्ट्यूशन शक्ति को भी बढ़ा देती है, जिसे हम आज्ञा चक्र का खुलना भी कह सकते हैं। टैरो कार्ड्स व्यक्ति को जीवन में रिश्तों, करियर व अपने आपको खुश रखना सीखा देता है। टैरो कार्ड्स का ज्ञान व्यक्ति को आध्यात्मिक और अलौकिक जगत से भी अवगत करवाता है। आने वाले अगले विशेषांक में हम आपको टैरो के बारे में और कई तरह की रूचिकर व अनुभवी जानकारियां देते रहेंगे व इस विद्या व ज्ञान से मानव जगत के जीवन में एक अच्छा बदलाव लाने की कोशिश करेंगे।

नववर्ष विशेषांक  जनवरी 2015

फ्यूचर समाचार पत्रिका के नववर्ष विशेषांक में नववर्ष की भविष्यवाणियों में आपकी राशि तथा भारत व विश्व के आर्थिक, राजनैतिक व प्राकृतिक हालात के अतिरिक्त 2015 में भारत की अर्थव्यवश्था, शेयर बाजार, संतान भविष्य आदि शामिल हैं। इसके साथ ही आपकी राशि-आपका खानपान, ज्योतिष और महिलाएं, जनवरी माह के व्रत-त्यौहार, क्यों मानते हैं मकर सक्रांति?...

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