त्रिस्कंध ज्योतिष का संहिता प्रकरण

त्रिस्कंध ज्योतिष का संहिता प्रकरण  

ब्राह्म, दैव, मानव, पित्र्य, सौर, सावन, चान्द्र, नाक्षत्र तथा बार्हस्पत्य-ये नौ मान होते हैं। (109)। इस लोक में इन नौ मानों में से पांच के ही द्वारा व्यवहार होता है। किंतु उन नौ मानों का व्यवहार के अनुसार पृथक-पृथक कार्य बताया जाएगा। ‘110’ सौर मान से ग्रहों की सब प्रकार की गति (भगणादि) जाननी चाहिए। वर्षा का समय तथा स्त्री के प्रसव का समय सावन मान से ही ग्रहण किया जाता है। ‘111’ वर्षों के भीतर का मान घटी आदि नाक्षत्र मान से लिया जाता है। यज्ञोपवीत, मुंडन, तिथि एवं वर्षेश का निर्णय तथा पर्व, उपवास आदि का निश्चय चान्द्र मान से किया जाता है। बार्हस्पत्य मान से प्रभवादि संवत्सर का स्वरूप ग्रहण किया जाता है। ‘112-113’ उन-उन मानों के अनुसार बारह महीनों का उनका अपना-अपना विभिन्न वर्ष होता है। बृहस्पति की अपनी मध्यम गति से प्रभाव आदि नाम वाले साठ संवत्सर होते हैं। ‘114’ प्रभव, विभव, शुक्ल, प्रमोद, प्रजापति, अंगिरा, श्रीमुख, भाव, युवा, धाता, ईश्वर, बहुधान्य, प्रमाथी, विक्रम, वृष, चित्रभानु, सुभानु, तारण, पार्थिव, व्यय, सर्वजित, सर्वधारी, विरोधी, विकृत, खर, नंदन, विजय, जय, मन्मथ, दुर्मुख, हेमलंब, विलंब, विकारी, शर्वरी, प्लव, शुभकृत, शोभन, क्रोधी विश्वावसु, पराभव, प्लवंग, कीलक, सौम्य, समान, विरोधकृत, परिभावी, प्रमादी, आनंद, राक्षस, अनल, पिंगल, कालयुक्त, सिद्धार्थ, रौद्र, दुर्मति, दुन्दुभि, अधिरोद्गारी, रक्ताक्ष, क्रोधन तथा क्षय-ये साठ संवत्सर जानने चाहिए। ये सभी अपने नाम के अनुरूप फल देने वाले हैं। पांच वर्षों का एक युग होता है। इस तरह साठ संवत्सरों में बारह युग होते हैं। ‘115-121’ उन युगों के स्वामी क्रमशः इस प्रकार जानने चाहिए- विष्णु, बृहस्पति, इन्द्र, लोहित, त्वष्टा, अहिर्बुध्न्य, पितर, विश्वेदेव, चंद्रमा, इन्द्राग्नि, भग। इसी प्रकार एक युग के भीतर जो पांच वर्ष होते हैं, उनके स्वामी क्रमशः अग्नि, सूर्य, चंद्रमा, ब्रह्मा और शिव हैं। ‘121-123’ संवत्सर के राजा, मंत्री तथा धान्येश रूप ग्रहों के बलाबल का विचार करके तथा उनकी तात्कालिक स्थिति को भी भली-भांति जानकर संवत्सर का फल समझना चाहिए। ‘124‘ मकरादि छः राशियों में छः मास तक सूर्य के भोग से सौम्यायन (उत्तरायण) होता है। वह देवताओं का दिन और कर्कादि छः राशियों में छः मास तक सूर्य के भोग से दक्षिणायन होता है, वह देवताओं की रात्रि है। ‘125’ गृह प्रवेश, विवाह, प्रतिष्ठा तथा यज्ञोपवीत आदि शुभ कर्म माघ आदि उत्तरायण के मासों में करने चाहिए। ‘126’ दक्षिणायन में उक्त कार्य गर्हित (त्याज्य) माना गया है, अत्यंत आवश्यकता होने पर उस समय पूजा आदि यत्न करने से शुभ होता है।’ माघ से दो-दो मासों की शिशिरादि छः ऋतुएं होती हैं। ‘127’ ’ ‘मार्गशीर्षमपीच्छन्ति विवाहे केऽपि कोविदाः।’ मकर से दो-दो राशियों में सूर्य भोग के अनुसार क्रमशः शिशिर, वसंत और ग्रीष्म-ये तीन ऋतुएं उत्तरायण में होती है, और कर्क से दो-दो राशियों सूर्य भोग के अनुसार क्रमशः वर्षा, शरद और हेमंत- ये तीन ऋतुएं दक्षिणायन में होती हैं ‘128’ शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से अमावस्या तक चान्द्रमास होता है। सूर्य की एक संक्रांति से दूसरी संक्रांति तक ‘सौर मास’ (सूर्य का राशि में प्रवेश) होता है, तीस दिनों का एक ‘सावन मास ’होता है और चंद्रमा द्वारा सब नक्षत्रों के उपभाग में जितने दिन लगते हैं उतने अर्थात् 27 दिनों का एक ‘नाक्षत्र मास’ होता है। ‘129’ मधु, माधव, शुक्र, शुचि, नभः, नभस्य, इष, उर्ज, सहाः, सहस्य, तप और तपस्य - ये चैत्रादि बारह मासों की संज्ञाएं हैं। जिस मास की पौर्णमासी जिस नक्षत्र से युक्त हो, उस नक्षत्र के नाम से ही उस मास का नामकरण होता है। (जैसे- जिस मास की पूर्णिमा चित्रा नक्षत्र से युक्त होती है, उस मास का नाम ‘चैत्र’ होता है और वह पौर्णमासी भी उसी नाम से विख्यात होती है, जैसे- चैत्र, वैशाख आदि। प्रत्येक मास के दो पक्ष क्रमशः वे पक्ष और पितृ पक्ष हैं, अन्य विद्वान उन्हें शुक्ल एवं कृष्ण पक्ष कहते हैं। ‘130-132’ वे दोनों पक्ष शुभाशुभ कार्यों में सदा उपयुक्त माने जाते हैं। ब्रह्मा, अग्नि, विरंचि, विष्णु, गौरी, गणेश, यम, सर्प, चंद्रमा, कार्तिकेय, सूर्य, इन्द्र, महेन्द्र, वासव, नाग, दुर्गा, दण्डधर, शिव, विष्णु, हरि, रवि, काम, शंकर, कलाधर, यम, चंद्रमा (विष्णु, काम और शिव)- ये सब शुक्ल प्रतिपदा से लेकर क्रमशः उनतीस, तिथियों के स्वामी होते हैं। अमावस्या नामक तिथि के स्वामी पितर माने गए हैं। तिथियों की नन्दादि पांच संज्ञा: प्रतिपदा आदि तिथियों की क्रमशः नंदा, भद्रा, जया, रिक्ता और पूर्णा- ये पांच संज्ञाएं मानी गयी हैं। पंद्रह तिथियों इनकी तीन आवृति करके इनका प्रथम ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। शुक्ल पक्ष में प्रथम आवृति (1, 2, 3, 4, 5) ये तिथियां अधम, द्वितीय आवृति की (6, 7, 8, 9, 10) ये तिथियां मध्यम और तृतीय आवृति की (11, 12, 13, 14, 15) ये तिथियां शुभ होती हैं। इसी प्रकार कृष्ण पक्ष की प्रथम आवति की नन्दादि तिथियां इष्ट (शुभ), द्वितीय आवृति की मध्यम और तृतीय आवृति की अनिष्टप्रद (अधम) होती है। दोनों पक्षों की 8, 12, 6, 4, 9, 14 से तिथियां पक्षरंध्र कही गयी है। इन्हें अत्यंत रूक्ष कहा गया है। इनमें क्रमशः आरंभ की 4, 14, 8, 9, 25 और 5 घड़ियां सब शुभ कार्यों में त्याग देने योग्य हैं। अमावस्या और नवमी को छोड़कर अन्य सब विषम तिथियां (3, 5, 7, 1, 13) सब कार्यों में प्रशस्त हैं। शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा मध्यम है परंतु कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा शुभ हैं। युगादि तिथियां: कार्तिक शुक्ल पक्ष की नवमी सतयुग की आदि तिथि है, वैशाख शुक्ल पक्ष की पुण्यमयी तृतीया त्रेतायुग प्रारंभ तिथि है। माघ की अमावस्या द्वापर युग की प्रारंभ तिथि तथा भाद्रपद कृष्ण त्रयोदशी कलियुग की प्रारंभ तिथियां हैं। (ये सब तिथियां अति पुण्य देने वाली कही गयी है।) मन्वादि तिथियां: कार्तिक शुक्ल द्वादशी, आश्विन शुक्ल नवमी, चैत्र शुक्ल तृतीया, भाद्रपद शुक्ल तृतीया, पौष शुक्ल एकादशी, आषाढ़ शुक्ल दशमी, माघ शुक्ल सप्तमी, भाद्रपद कृष्ण अष्टमी, श्रावणी अमावस्या, फाल्गुनी पूर्णिमा, आषाढ़ी पूर्णिमा, कार्तिकी पूर्णिमा, ज्येष्ठ की पूर्णिमा और चैत्र की पूर्णिमा ये चैदह मन्वादि तिथियां हैं ये सब तिथियां मनुष्यों के लिए पितृ कर्म (श्राद्ध) में अत्यंत पुण्य देने वाली है। 149-151 (नारद पुराण से) विभिन्न शक संवत श्री विक्रम संवत् 2068 श्री रामानन्दाद्व 613-14 राष्ट्रीयशाकः - 1933 श्री बुद्ध संवत 2554-55 भारत स्वातंत्रा संवत् 64-65 श्री हरिदासाद्व वृन्दावने 532-33 श्री वल्लभाब्द-533-34 श्री फसली बंगाली 1417-18 श्री रामानुजाब्द 995-96 श्री कृष्ण संवत् 5237-38 श्री निम्बार्काब्द 5107-08 श्री महावीर जैन संवत् 2537-38 श्री रामचरणाब्द 292-93 श्री जैन राजेन्द्र गुरु संवत् 104-05 श्रीखर तरगच्छश्रीसंघ संवत् 988 श्रीखालसा सिक्खपंथ 311-12 पारसी शहंशाही 1380-81 श्री कबीराब्द वर्ष 613-14 हिजरी मुस्लिम सन 1432-33 मलयालम वर्ष 1686-87 श्री ईस्वी सन् 2011-12 गोल और सायन-निरयण: इसी प्रकार गोल भी दो हैं, उत्तर गोल (पृथ्वी का उत्तरी ध्रुव) तथा दक्षिण गोल (पृथ्वी का दक्षिणी ध्रुव)। 21 मार्च को सूर्य सायन मेष राशि में आता है और 22 सिंतबर तक सायन कन्या राशि में रहता है। इस समय सूर्य उत्तर गोल (उत्तरी ध्रुव) में होता है और बाकी के समय में दक्षिण गोल में सायन व निरयण ज्योतिष सिद्धांत की दो पद्धतियां हैं। सायन पद्धति में राशि चक्र को चलायमान मानते हैं और निरयण में स्थिर। सायन मत को पाश्चात्य लोग अधिक मानते हैं और निरयण मत को भारतीय ज्योतिष में अधिक महत्व दिया जाता है। सायन मत में सौर (सूर्य) वर्ष 21 मार्च से तथा निरयण मत में 13 अप्रैल से आरंभ होता है। इस कारण पाश्चात्य सौर मास 21-22 मार्च से आरंभ और भारतीय संक्रांति 13-14 अप्रैल के आस-पास मानी जाती है। वर्षमान: सौर (सूर्य) वर्ष 365 दिन 15 घड़ी (घटी) 30 पल का होता है। चांद्र वर्ष: 354 दिन, 30 घड़ी, 00 पल का होता है। तिथियां चंद्र की गति से तथा दिनांक (तारीख) सूर्य की गति से 28, 29, 30 व 31 दिन का एक मास (अंग्रेजी) पाश्चात्य पद्धति से माना जाता है। तिथियां (प्रतिपदा से अमावस्या/ पूर्णिमा) चंद्र के 27 नक्षत्रों में भ्रमणकाल से होती है। सावन वर्ष: 330 दिन, 00 घड़ी, 00 पल का होता है। नाक्षत्र वर्ष: 324 दिन, 00 घड़ी, 00 पल का होता है। वर्ष प्रमाण: यों तो कई प्रकार के सन् संवत हैं (जो पहले पढ़ चुके हैं) परंतु निम्न ही अधिक प्रचलित हैं- शाके संवत्: शालिवाहन (राजा) ने शकों पर विजय प्राप्त की, उस समय से शक संवत प्रारंभ हुआ। यह ईस्वी सन् से 78 वर्ष कम है। विक्रम संवत्: विक्रमादित्य ने विदेशियों को भारत से भगाया था, उस समय से यह संवत् प्रारंभ हुआ। इस्वी सन् में 57 जोड़ने से विक्रम संवत होता है। ईस्वी सन्: ईसामसीह के जन्म समय से शुरू हुआ। हिजरी सन्: पैगम्बर मोहम्मद साहब के हिजरत के समय चला। इस्वी सन् में से 583 घटाने से हिजरी सन् निकल आता है। फसली सन्: हिजरी सन् में से 10 घटाएं। बंगला सन्: फसली सन् से 1 वर्ष कम है।


ज्योतिष, मेदिनीय ज्योतिष व रमल विशेषांक  अकतूबर 2011

रिसर्च जर्नल आॅफ एस्ट्राॅलाजी नामक ज्योतिष पत्रिका के इस अंक में ज्योतिष, रमल व मेदिनीय ज्योतिष आदि महत्वपूर्ण विषयों पर शोध उन्मुख आलेख शामिल किये गए हैं।

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