दीपावली - एक पंचपर्व

दीपावली - एक पंचपर्व  

वैभव ऐश्वर्य की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी का समाराधन पर्व दीपावली - एक पंचपर्व शशि शेखर शुक्ल लक्ष्मी की विस्तृत आराधना का विशिष्ट पर्व है दीपावली। यदि देखा जाय तो भारत में यही एक मात्र सार्वदेशिक पर्व है उसके मनाने के कारण चाहे प्रत्येक क्षेत्र के लिए कुछ अलग प्रकार के रहे हों, परंतु इस विशिष्ट पर्व के साथ आने वाले त्योहार कुछ निश्चित क्षेत्रों तक सीमित हो सकते हैं। इन सभी के बारे में विशिष्ट जानकारी प्राप्त करने के लिए आप इस लेख का गहन अध्ययन कर सकते हैं। पाश्चात्य विद्वानों का कथन है कि जिन देशों में एवं जातियों में जितने अधिक उत्सव मनायें जाते हैं, वे देश तथा जातियां उतने ही समृद्ध एवं उन्नत समझे जाते हैं। इस कथन की कसौटी पर यदि भारत को देखा जाय तो विदित होगा कि विश्व में भारत एक सर्वाधिक जीवन्त राष्ट्र है। भारतीय पंचाग में ऐसी तिथि निराली ही होगी जो किसी पर्व, व्रत, उत्सव अथवा त्यौहार से सम्बद्ध न हो। भारत में मनाये जाने वाले पर्व या त्योहार दो प्रकार के हैं। कुछ सार्वदेशिक हैं तथा कुछ एकदेशीय या क्षेत्रीय। होली, दीपावली, दशहरा, रक्षाबन्धन, श्रीराम नवमी, श्री कृष्ण जन्माष्टमी एवं शिवरात्री सार्वदेशिक पर्व हैं जबकि गणेश चतुर्थी (महाराष्ट्र), नागपंचमी (बंगाल), हरियाली तीज (राजस्थान), वैशाखी (पंजाब) आदि व्यापक होते हुये भी मान्यता की दृष्टि से एकदेशीय अथवा क्षेत्रीय। मार्कण्डेय पुराणान्तर्गत श्री दुर्गासप्तशती में इन तीन रात्रियों का उल्लेख दारूण रात्रियों के रूप में हुआ है - 1. कालरात्रि 2. महारात्रि 3. मोहरात्रि। कालरात्रि से अभिप्रेत है होली, (हुताशनी), महारात्रि से शिवरात्रि तथा मोहरात्रि से अभिप्रेत है दीपावली। दूसरे जितने भी पर्व, उत्सव, व्रत अथवा त्योहार हैं। वे सभी दिन के धवल प्रकाश में ही समारोह पूर्वक मनाये जाते हैं। केवल दीपावली तथा शिवरात्रि एवं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी ऐसे पर्व हंै जो रात्रि में मनाये जाते हैं। होली, दीपावली एवं शिवरात्रि को दारूण बताया गया है एवं इन रात्रियों में रात्रि जागरण का विधान किया गया है। रात्रि-जागरण के साथ-साथ उपवास पूर्वक देवार्चन को प्रशस्त बताया गया है। देवार्चन के लिये स्पष्ट रूप से कहा गया है कि - ‘देवो भूत्वा देव यजेत्’ देव कैसे बना जाय? इसका समाधानात्मक उत्तर श्रीमद्भगवदगीता में इस प्रकार दिया गया है - ‘विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः।’ (2/59) अर्थात व्यक्ति जब विषयों का त्याग कर उपवास करता है, तब वह विषय- वासना से मुक्त होकर देवतुल्य हो जाता है। अनुभव बताता है कि विषय-वासना अथवा कलुषित भावनाओं से मुक्त होकर चित्तवृत्तियों को आत्मा अथवा सद्गुणों में सन्निविष्ट करने की पे्ररणा उपवास काल में विशेषतः होती है। यही कारण है कि उपवासपूर्वक देवार्चन को हमारे यहां प्रशस्त माना गया है। पर्वो की श्रृंखला में यूं तो सभी पर्वोत्सवों, त्योहारों का अपना-अपना महत्व है। परन्तु वर्ण विधान से श्रावणी को ब्राह्मणों का, विजयादशमी (दशहरा) को क्षत्रियों का, दीपावली को वैश्यवर्ग का एवं होली को अन्त्यजों (शूद्रों) का त्यौहार माना जाता है। पूर्वकाल में वस्तुस्थिति जो भी रही हो। परंतु आज ये चारों पर्व हिन्दूमात्र के पर्व हैं। इनमें सबसे गरिमापूर्ण त्योहार है ‘दीपावली’। जहां अन्य त्योहार केवल एक-एक दिन मनाये जाते हैं, वहीं दीपावली पर्व कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी से कार्तिक शुक्ल द्वितीया तक सतत पांच दिन तक मनाया जाता है। इस पर्व को निःसंकोच धर्माश्रित राष्ट्रीय पर्व कहा जा सकता है। धनतेरस दीपोत्सव का प्रारम्भ कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी अर्थात् धनतेरस से होता है। इस दिन एक ओर वैद्यसमुदाय भगवान धन्वन्तरि का पूजन कर राष्ट्र के लिये नित्य स्वास्थ्य, समृद्धि की याचना करता है, वहीं दूसरी ओर सामान्य गृहस्थ यमराज के निमित्त तेल के दीपक जलाकर अपने-अपने घर के मुख्य द्वार पर रखते हंै और तमसो मां ज्योतिर्गमय को चरितार्थ करते हैं। पुराणों के अनुसार कार्तिक माह यमुना स्नान एवं दीपदान द्वारा विशेष फलदायी प्रतिपादित हुआ है। धनतेरस के दिन यमुना स्नान करके, यमराज और धन्वन्तरि का पूजन-दर्शन कर यमराज के निमित्त दीपदान करना चाहिये। इस दिन यदि उपवास रखा जा सके तो अत्युत्तम है। संध्या के समय दीपदान करना चाहिये। धनतेरस के सम्बन्ध में एक कथा है - एक बार यमराज ने अपने दूतों से पूछा कि तुम लोग अनन्त काल से जीवों के प्राणहरण का दुखद कार्य करते आ रहे हो, क्या कभी यह कार्य करते समय तुम्हारे मन में दया आयी और विचार आया कि इस प्राणी के प्राण न लिये जायें ? यदि ऐसी स्थिति कभी आयी हो तो मुझे बताओ। यह सुनकर एक यमदूत ने बताया - ‘प्रभो। हंस नामक एक प्रतापी राजा था। एक बार वह आखेट के लिये वन में गया और मार्ग भटककर दूसरे राजा हेमराज के राज्य में जा निकला। श्रम-क्लेश तथा भूख प्यास से व्याकुल राजा हंस का हेमराज ने बहुत आदर, सम्मान कर स्वागत किया। उसी दिन राजा हेमराज को पुत्र प्राप्ति हुई थी। अतः राजा हंस के आगमन को पुत्र प्राप्ति का निमित्त-कारण मानकर उसने आग्रहपूर्वक राजा हंस को कुछ दिनों के लिये अपने यहां रोक लिया। छठी के दिन समारोहपूर्वक राजपुत्र का जन्मोत्सव मनाया जा रहा था। किसी भविष्यवेत्ता ने बताया कि विवाह के चार दिन बाद बालक की मृत्यु हो जायेगी। यह सुनते ही सारा राज्य शोकसागर मंे डूब गया। राजा हंस को जब यह दुःखदायी समाचार मिला तो उन्होंने राजा हेमराज को आश्वस्त करते हुये कहा-आप पूर्णतः निश्चित रहें। मैं राजकुमार की प्राणरक्षा करूगा। अपने वचन की रक्षा के लिये राजा हंस ने यमुना तट पर एक गिरिगह्वर में दुर्ग का निर्माण कराकर उसमें गूढ़रूप से राजकुमार के रहने की व्यवस्था कर दी। वहीं रहते हुये राजकुमार युवा हुये। राजा हेमराज के अपने मित्र राजा हंस की प्रेरणा से उसका विवाह एक अनुपम सुन्दरी कन्या से कर दिया। वह युगल साक्षात् काम और रति का अवतार प्रतीत होता था। राजा हंस अपने मित्र-पुत्र की प्राणरक्षा के लिये इस दुखद दृश्य को देखकर हम स्वयं रोने लगे। परन्तु करते क्या ? परवश थे। हम उस कार्य से विरत हो नहीं सकते थे। यमराज इस घटना को सुनकर कुछ देर चुप रहे, फिर बोले-‘तुम्हारी इस कारुणिक कथा से मैं स्वयं विचलित हो गया हूँ। पर करुं क्या, विधि के विधान की रक्षा के लिये ही हमें और तुम्हें यह अप्रिय कार्य सौंपा गया है।’ दूत ने यह सुनकर पूछा, ‘स्वामिन् ! क्या ऐसा कोई उपाय नहीं है जिससे इस प्रकार की दुःखद अकाल मृत्यु से प्राणियों को मुक्ति मिल सके।’ दूत का कथन सुनकर यमराज ने उपर्युक्त विधि से धनतेरस के पूजन और दीपदान की चर्चा करते हुये कहा-इसके करने से मनुष्य को कभी अकाल मृत्यु का सामना नहीं करना पड़ेगा। यही नहीं, जिस घर में यह पूजन-विधान किया जायगा। उस घर में भी कोई अकाल मृत्यु नहीं होगी। तभी से धनतेरस के दिन यमराज के निमित्त दीपदान की प्रथा चली आ रही है। दीपदान करते समय इस मंत्र को पढ़ना चाहिये - मृत्युना पाशहस्तेन कालेन भार्यया सह त्रयोदश्यां दीपदानात् सूर्यजः प्रीयतामिति।।’’ (पदम पुराण उत्तर खण्ड 122/5) दूसरी कथा देव-दानवों द्वारा समुद्र मन्थन से अमृत-कलश लिये प्रकट होने वाले धन्वन्तरि से सम्बद्ध है जिन्होंने यमभाग पाने के लिये भगवान नारायण से याचना की थी। तत्पश्चात् भगवान् नारायण ने कहा-यमभाग जिन्हें मिला था मिल चुका। अब कुछ नहीं हो सकता। तुम देवपुत्र हो, तुम्हें दूसरे जन्म में जीवन की सार्थकता प्राप्त होगी। तुम्हारे द्वारा आयुर्वेद का प्रचार-प्रसार होगा एवं तुम उसी शरीर से देवत्व विविध उपाय कर रहे थे। परन्तु आपके विधान को अन्यथा करने की शक्ति उनमें नहीं थी। विवाह के चैथे ही दिन हमें उसके प्राणहरण का अप्रिय कार्य करना पड़ा। प्रभो! जब हम उसके प्राण लेकर चले उस समय का दृश्य मैं कभी नहीं भूला, विवाह के मांगलिक समारोह में लीन राजसमाज में जैसे हमने आग लगा दी। प्राप्त करोगे। भगवान् धन्वन्तरि का प्राकट्य धनतेरस के दिन हुआ था अतः धनतेरस को उनकी जयन्ती के रूप में मनाया जाता है तथा उनकी पूजा कर रोग विमुक्त स्वस्थ-जीवन की याचना की जाती है। नरक चतुर्दशी दीपोत्सव-पर्व का दूसरा दिन नरक चतुर्दशी अथवा रूपचैदस के रूप में मनाया जाता है। इसे छोटी दीपावली भी कहा जाता है। नरक प्राप्त न हो तथा पापों की निवृत्ति हो, इस उद्देश्य से प्रदोषकाल में चार बत्तियों वाला दीपक जलाना चाहिये। दीपदान के समय निम्नलिखित मंत्र का उच्चारण करना चाहिये। ‘दत्तो दीपश्चतुर्दश्यां नरकप्रीतये मया। चतुर्वर्तिसमायुक्तः सर्वपापानुत्तये।।’ पुराणों के अनुसार आज ही के दिन भगवान् श्रीकृष्ण ने नरकासुर का वध करके जगत को भयमुक्त किया था। इस विजय की स्मृति में यह पर्व मनाया जाता है। शास्त्रानुसार धनतेरस, नरकचतुर्दशी, एवं दीपावली का सम्बन्ध विशेषतः यमराज से जुड़ा है। तीनों दिन उनके निमित्त दीपदान किया जाता है। नरक चतुर्दशी मनाने की विधि - इस दिन सूर्योदय से पहले उठकर शौचादि से निवृत्त हो तेल मालिश कर स्नान करना चाहिये, कहीं-कहीं हल में लगी हुई मिट्टी, अपामार्ग, भटकटैया, एवं तुम्बी को मस्तक पर लगाकर घुमाकर स्नान करने की परिपाटी भी है। स्नान के पश्चात यमराज के निमित्त तर्पण और जलांजलि देनी चाहिये। जो मनुष्य इस दिन सूर्याेदय के पश्चात स्नान करते हैं अथवा सायंकाल यमराज के निमित्त दीपदान नहीं करते, उनके शुभ कर्मों का नाश होता है। दीपोत्सव पर्व का तीसरा दिन दीपावली के नाम से जाना जाता है। भारतवर्ष में मनाये जाने वाले सभी त्योहारों में इस उत्सव पर्व का अपना महत्व है। इस पर्व के साथ हमारा युग-युग का इतिहास इस प्रकार जुड़ा हुआ है कि चाहकर भी हम उन सब तथ्यों को विस्मृत नहीं कर सकते जो इतिहास पुराणादि पुरातन के माध्यम से हम सबतक पहुंचे हैं। स्कन्द पुराण, पद्म पुराण तथा भविष्य पुराण में इसकी विभिन्न मान्यतायें उपलब्ध होती हैं। कहीं महाराज पृथुद्वारा पृथ्वी-दोहन कर राष्ट्र को धन-धान्यादि से समृद्ध बना देने के उपलक्ष्य में दीपोत्सव मनाये जाने का उल्लेख मिलता है, तो कहीं आज के दिन समुद्र - मन्थन से भगवती पराम्बा लक्ष्मी देवी जी के प्राकट्य की प्रसन्नता में जनमानस के उल्लास का दीपोत्सव रूप में प्रकटित होना वर्णित है। कहीं कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को भगवान श्री कृष्ण द्वारा नरकासुर का वध कर उसके बन्दीग्रह से 16 हजार राज कन्याओं का उद्वार करने पर। दूसरे अर्थात अमावस्या के दिन भगवान श्री कृष्ण का अभिनन्दन करने के लिये सज्जित दीपमाला के रूप में। तथा कहीं (महाभारत आदि पर्व में) पाण्डवों के सकुशल वनवास से लौटने पर प्रजाजनों द्वारा उनके अभिनन्दनार्थ दीपमाला से उनका स्वागत करने के प्रसंग से इस पर्व का सम्बन्ध जोड़ा गया है। कहीं श्री राम के विजयोपलक्ष्य में अयोध्या में उनके स्वागतार्थ प्रज्जवलित दीपमाला से प्रकृत दीपावली का संबंध स्थापित किया गया है। कहीं सम्राट विक्रमादित्य के विजयोपलक्ष्य में जनमानस द्वारा चक्रवर्ती सम्राट का दीपमालिका प्रज्जवलित कर उनका अभिनन्दन करने का उल्लेख है। सनत्कुमार संहिता में वामन रूपधारी भगवान विष्णु ने कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी से अमावस्या तक के तीन दिनों में दैत्यराज बलि से संपूर्ण लोक लेकर उसे पाताल जाने पर विवश किया था। सर्वस्व ले लेने पर भगवान वामन ने बलि से इच्छित वर मांगने को कहा तो बलि ने लोक कल्याण के लिये यह वर मांगा - प्रभो ! आपने मुझसे तीन दिन में तीनों लोक ग्रहण किये हैं। अतः मैं चाहता हूँ कि उपर्युक्त तीन दिनों में जो प्राणी मृत्यु के देवता यमराज के उद्देश्य से दीपदान करे, उसे यम की यातना न भोगनी पडे़। एवं गृह (लक्ष्मी से) विहीन न हो। श्रीमननारायण ने राजा बलि के कथनानुसार ही स्वीकृति दी। तभी से यम के निमित्त दीपदान करने की परम्परा पड़ी। तीसरा दिन इस पर्व का मुख्य दिन होता है क्योंकि इसी दिन भगवती पराशक्ति लक्ष्मी जी की आरती दीपमालिका द्वारा की जाती है। दीपोत्सव का सामाजिक एवं धार्मिक दोनों दृष्टियों से अप्रतिम महत्व है। सामाजिक दृष्टि से इस पर्व का महत्व इसलिये है कि दीपावली आगमन के पर्याप्त समय पूर्व से ही गृहों (घरों) में गृह द्वार की स्वच्छता पर ध्यान दिया जाता है। घर का कूड़ा-करकट साफ कर एवं टूट-फूट सुधरवाकर घर की दीवारों पर सफेदी तथा दरवाजों पर रंग-रोगन किया जाता है जिससे न केवल उनकी आयु बढ़ जाती है अपितु आकर्षण भी बढ़ जाता है, वर्षाकालीन अस्वच्छता का परिमार्जन भी हो जाता है। स्वच्छ एवं सुन्दर वातावरण शरीर और मस्तिष्क को नवचेतना तथा स्फूर्ति प्रदान करता है। दीपोत्सव के दिन धनकुबेरों के घरों से लेकर श्रमिकों की झोपड़ियों तक में दीपावली का प्रकाश किसी न किसी रूप में अपनी प्रभा विकीर्ण करता हुआ अवश्य दृष्टिगोचर होता है। सभी वर्ण अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार इस पर्व की आगवानी करते हंै और अपनी-अपनी स्थिति तथा मर्यादा के अनुसार इसके सर्वव्यापी आनन्द में हिस्सा लेते हैं। इसके साथ ही इस पर्व का सर्वाधिक आकर्षक पहलू यह है कि इस दिन निर्धन एवं संपन्न दोनों ही पुरुषार्थ से प्रसन्न होने वाली पराम्बा भगवती पराशक्ति लक्ष्मी की समाराधना कर के उनकी कृपा प्राप्त की आशा करते हैं। दीपोत्सव चिरकाल से ही वर्ण, वर्ग एवं आश्रम की मर्यादा का अतिक्रमण कर सबको समान रूप से आनन्द वितरण करता चला आ रहा है। यद्यपि होली और विजयादशमी के समान इसमें आमोद-प्रमोद के विभिन्न साधन एकत्र नहीं हो पाते। तथापि यह कहा जा सकता है कि दीपोत्सव जागरूकता और कर्मठता का जो संुदर संदेश देता है वह अन्य व्रतों एवं पर्वों की अपेक्षा कही अधिक उपादेय है। दीपोत्सव पर्व पर धन की प्रभूत प्राप्ति के लिये धन की अधिष्ठात्री धनदा भगवती लक्ष्मी की समारोहपूर्वक प्रार्थना के साथ षोडशोपचार पूजा की जाती है तथा उनका आवाह्न किया जाता है (श्री सूक्त के मंत्रो से)। अर्थात जिन भगवती लक्ष्मी का स्वरूप मन एवं वाणी द्वारा न जान पाने के कारण अवर्णनीय है जो निज मन्दहास्य से सबको आह्लादित करने वाली हैं, हिरण्यादि उपयोगी पदार्थों द्वारा जो चारो ओर से आवृत है जो स्नेह तथा आर्द्र हृदय वाली हैं। उन तेजोमयी पूर्णकामा, भक्तों का मनोरथ पूर्ण करने वाली, कमल पर विराजमान कमलाके समान वर्णवाली भगवती लक्ष्मी का मैं आवाहन करता हूँ। आर्ष ग्रन्थों के अनुसार जो व्यक्ति दीपोत्सव में रात्रि जागरण कर भगवती लक्ष्मी का शास्त्रीय विधि से पूजन करता है, उसके गृह में लक्ष्मी का निवास होता है। एवं जो आलस्य एवं निंद्रा के वशीभूत हो भगवती धनदा के पूजन से विमुख रहता है, उसके घर से लक्ष्मी रूठकर चली जाती है। यहां जागरण से अभिप्रेत अपने उत्कृष्ट पुरुषार्थ पर अवलम्बित रहना अथवा पुरुषार्थरत रहना और पुरुषार्थी को लक्ष्मी की प्राप्ति होना आवश्यक अनिवार्य है, क्योंकि कहा गया है - ‘उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः’ इस प्रकार दीपोत्सव का भारतीय पर्वो में महत्वपूर्ण स्थान है। आबाल वृद्ध महीनों पूर्व से इसके आगमन की उत्सुकतापूर्वक प्रतीक्षा करते हैं। और जब यह दीपोत्सव आता है तब सोल्लास उसकी आगवानी करते हैं। दीपोत्सव मनाने की शास्त्रीय विधि दीपोत्सव के दिन मन और विचारों को पवित्र कर उत्साह एवं उल्लास से परिपूर्ण हो भगवती धनदा के समाराधनार्थ प्रस्तुत होना चाहिये। प्रातः ब्रह्म मूहूर्त में उठकर दैनिक कृत्यों से निवृत्त हो पितृगण तथा देवताओं का पूजन करना चाहिये। सम्भव हो तो दूध, दही एवं घृत द्वारा पितरों का पार्वण श्राद्ध करना चाहिये। यदि यह संभव न हो तो दिन भर उपवास कर गोधूलि वेला में अथवा वृष, सिंह वृश्चिक आदि स्थिर लग्न में (प्रशस्त वृष एवं सिंह ही है) श्री गणेश, कलश, षोडशमातृका एवं नवग्रह पूजनपूर्वक भगवती लक्ष्मी का षोडशोपचार पूजन करना चाहिये। इसके अनन्तर महाकाली का दवात रूप में, महासरस्वती का कलम-बही आदि के रूप में तथा कुबेर का तुला के रूप में सविधि पूजन करना चाहिये। इसी समय दीपपूजन कर यमराज तथा पितृगणों के निमित्त संकल्प सहित दीपदान करना चाहिये। तत्पश्चात् घर-द्वार, बगीचे, स्नानागार, चैराहा आदि स्थानों पर एवं नदियों पर तैलपूर्ण प्रज्वलित दीप रखने चाहिये। पावन-पूजन स्थलों (तुलसी चैरा, मन्दिर आदि) में घी के दीपक जलाने चाहिये। भगवती लक्ष्मी की पूजा पवित्र वेदी की रचना कर तथा उस पर रक्ताभ अष्टदल कमल पर लक्ष्मी की मूर्ति स्थापित करके करनी चाहिये। जिनके घर में पृथक-पृथक पूजन कक्ष हों, उन्हें उस कक्ष को चित्र-विचित्र वस्त्रों, पत्र-पुष्पादि से सुसज्जित कर वहां पूर्ण श्रद्धा तथा शक्ति के अनुसार एकत्रित पूजन-सामग्री से पराम्बा लक्ष्मी की पूजा करनी चाहिये। पूजन के अनन्तर प्रदक्षिणा कर भगवती को पुष्पांजलि समर्पित करनी चाहिये। आधी रात के बाद घर की स्त्रियां सूप आदि बजाकर अलक्ष्मी (दरिद्रता) का निस्सारण करती हंै। यह विश्वास किया जाता है कि दीपोत्सव की रात्रि में विष्णु प्रिया लक्ष्मी सद्गृहस्थों के घरों में विचरण कर यह देखती हैं कि हमारे निवास योग्य घर कौन-कौन से हैं एवं जहां-जहां उन्हें अपने निवास की अनुकूलता दिखायी पड़ती है वहीं रम जाती हैं। अतःएव मानव को आज के दिन अपना घर ऐसा बनाना चाहिये जो भगवती लक्ष्मी के मनोनुकूल हो और वहां पहुंचकर वे अन्यत्र जाने का विचार भी अपने मन में न लायें। भगवती लक्ष्मी को कौन -कौन सी वस्तुयें प्रिय हैं अथवा अप्रिय हंै इसका विवेचन अतीव कुशलता से महाभारतादि ग्रन्थों में किया गया है। महाभारत में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि घर की स्वच्छता, सुन्दरता और शोभा तो भगवती लक्ष्मी के निवास की प्राथमिक आवश्यकता हैं ही। साथ ही उन्हें ये सब अपेक्षित हंै। जैसा कि देवी रुक्मिणी के यह पूछने पर कि हे देविः ! आप किन-किन स्थानों पर रहती हैं, तथा किन-किन पर कृपाकर उन्हें अनुगृहीत करती हंै? स्वयं लक्ष्मी जी बताती हैं - ‘वसामि नित्यं सुभगे प्रगल्भे दक्षे नरे कर्मणि वर्तमाने। अक्रोधने देवपरे कृतज्ञे जितेन्द्रिये नित्यमुदीर्णसत्वे।। स्वधर्मशीलेषु च धर्मवित्सु वृद्धोपसेवानिरते च दान्ते। कृतात्मनि क्षान्तिपरे समर्थे क्षान्तासु दान्तासु तथाबलासु।। वसामि नारीषु पतिव्रतासु कल्याणशीलासु विभूषितासु।। (महा0, दान-धर्म पर्व। 11/6/10/14) इसी प्रकार एक बार महालक्ष्मी ने भक्त प्रह्लाद को बताया कि तेज, धर्म, सत्य, व्रत, बल एवं शील आदि मानवीय गुणों में मेरा निवास रहता है। इन गुणों में शील एवं चारित्रय मुझे सर्वाधिक प्रिय है। मै ! शीलवान् पुरुषों का वरण करती हूँ। (महा0 शान्ति0 124) ऐसे ही एक बार लक्ष्मी ने राजा बलि का परित्याग कर दिया था। इसका कारण देवराज इन्द्र को बताते हुये लक्ष्मी जी ने कहा - सत्य, दान, व्रत, तपस्या, पराक्रम एवं धर्म जहां वास करते हैं, वही मेरा निवास रहता है। (महा0, शान्ति0 225) अर्थात मैं उन पुरुषों के घरों में सतत् निवास करती हूं जो सौभाग्यशाली, निर्भीक, सच्चरित्र तथा कर्तव्यपरायण हैं। जो अक्रोधी, भक्त, कृतज्ञ, जितेन्द्रिय तथा सत्वसंपन्न होते हैं और स्वभावतः निज धर्म, कर्तव्य तथा सदाचरण में सतर्कतापूर्वक निरत रहते हैं। इसी प्रकार उन स्त्रियों के घर प्रिय हैं जो क्षमाशील, जितेन्द्रिय, सत्य पर विश्वास रखने वाली होती हैं तथा जिन्हें देखकर सबका चित्त प्रसन्न हो जाता है, जो शीलवती, सौभाग्यवती, गुणवती, पतिपरायणा, सबका मंगल चाहने वाली तथा सद्गुण संपन्न होती हंै। भगवती लक्ष्मी किन व्यक्तियों के घरों को छोड़कर चली जाती है। इस विषय में वे स्वयं देवी रुक्मिणी से कहती है - जो पुरुष अकर्मण्य, नास्तिक, वर्णसंकर, कृतध्न, दुराचारी, क्रूर, चोर तथा गुरुजनों के दोष देखने वाला हो, उसके भीतर मैं निवास नहीं करती हूं। जिनमें तेज, बल, सत्त्व एवं गौरव की मात्रा बहुत थोड़ी है, जो जहां-तहां हर बात में खिन्न हो उठते हैं, जो मन में दूसरा भाव रखते हैं। और ऊपर से कुछ और ही दिखते हैं ऐसे मनुष्यों में मैं निवास नहीं करती हूं। इसी प्रकार उन स्त्रियों के घर भी मुझे प्रिय नहीं। जो अपने गृहस्थी के सामानों की चिन्ता नहीं करतीं, बिना सोचे-विचारे काम करतीं हैं, पति के प्रतिकूल बोलती हैं, व पराये घर में अनुराग रखतीं हैं, निर्लज्ज, पापकर्म में रुचि रखने वाली अपवित्र, चटोरी, अधीर, झगड़ालू तथा सदा सोने वाली हैं। ऐसी स्त्रियों के घर को छोड़कर मैं चली जाती हूं। उपर्युक्त गुणों का अभाव होने पर अथवा दुर्गुणों की विद्यमानता होने पर भले ही कितनी भी सावधानी से लक्ष्मी-पूजन किया जाय, भगवती लक्ष्मी का निवास उनके गृह में नहीं हो सकता। दीपोत्सव की एक कथा इस प्रकार भी है कि - एक बार मुनियों ने सनत्कुमार जी से पूछा - भगवन ! दीपोत्सव लक्ष्मी-पूजन का पर्व है। फिर लक्ष्मी पूजा के साथ अन्यान्य देवी-देवताओं की पूजा का महत्व क्यों प्रतिपादित किया गया है। सनत्कुमार जी ने बताया - ‘राजा बलि का प्रताप जब समस्त भवनों में फैल गया और उसने सभी देवताओं को बन्दी बना लिया था, उसके कारागार में लक्ष्मी सहित सभी देवी-देवता बंद थे। कार्तिक कृष्ण्पक्ष की अमावस्या को वामन रूपी भगवान विष्णु ने जब बलि को बांध लिया और सब देवी-देवता उसके कारागार से मुक्त हुये, तब सबने क्षीरसागर में जाकर शयन किया था। इसलिये दीपोत्सव के दिन लक्ष्मी के साथ उन सब देवताओं का पूजन कर उन सबके शयन का अपने घर में उत्तम प्रबन्ध करना चाहिये। जिससे वे लक्ष्मी के साथ वहीं निवास करे तथा कहीं और न जायं। नयी शैय्या, नया बिस्तर, कमल आदि से सुसज्जित कर लक्ष्मी को शयन कराना चाहिये। जो इस विधि से लक्ष्मी-पूजन करते हैं, लक्ष्मी उनके यहां स्थिरभाव से निवास करती हैं। गोवर्धन एवं अन्नकूट इस पर्व का चैथा दिन कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को मनाया जाने वाला गोवर्धन नामक पर्व है। इस दिन पवित्र होकर प्रातःकाल गोवर्धन तथा गोपेश भगवान श्रीकृष्ण का पूजन करना चाहिये। गौओं एवं बैलों को वस्त्राभूषणों तथा मालाओं से सजाना चाहिये। गोवर्धन की पूजा के समय यह बोलना चाहिये। ‘‘गोवर्धन धराधार गोकुलत्राणकारक। विष्णुवाहकृतोच्छ्राय गवां कोटिप्रदो भव।। पृथ्वी को धारण करने वाले गोवर्धन। आप गोकुल के रक्षक हैं। भगवान श्री कृष्ण ने आपको अपनी भुजाओं पर उठाया था। आप मुझे करोड़ो गौएं प्रदान करें।’ दूसरी बात यह है कि इस समय तक शरत्कालीन उपज परिपक्व होकर घरों में आ जाती है। भण्डार परिपूर्ण हो जाते हैं। अतः निश्ंिचत होकर लोग नयी उपज के अनाजों से विभिन्न प्रकार के पदार्थ बनाकर श्रीमन् नारायण को समर्पित करते हैं। गव्य पदार्थों को भी इस उत्सव में सजा-संवारकर निवेदित किया जाता है। गोमय का गोवर्धन (पर्वत) बना उसकी पूजा होती है। शारदीय उपज से जो धान्य प्राप्त होते हैं, उनसे छप्पन प्रकार के भोग बनाकर श्री मन् नारायण को समर्पित किये जाते हैं। भाईदूज दीपोत्सव का समापन दिवस है कार्तिक शुक्ल द्वितीया, जिसे भैय्या दूज कहा जाता हैं। शास्त्रों के अनुसार भैयादूज अथवा यम-द्वितीया को मृत्यु के देवता यमराज का पूजन किया जाता है। इस दिन बहनें भाई को अपने घर आमन्त्रित कर अथवा सायं उनके घर जाकर उन्हें तिलक करती हैं और भोजन कराती हैं। ब्रजमण्डल में इस दिन बहनें भाई के साथ यमुना स्नान करती हैं जिसका विशेष महत्त्व बताया गया है। भाई के कल्याण और वृद्धि की इच्छा से बहनें इस दिन कुछ अन्य मांगलिक विधान भी करती हैं। यमुना तट पर भाई-बहन का समवेत भोजन कल्याणकारी माना जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार इस दिन भगवान यमराज अपनी बहन यमुना से मिलने जाते हैं। उन्हीं का अनुकरण करते हुये भारतीय भ्रातृ परम्परा अपनी बहनों से मिलती है और उनका यथेष्ट सम्मान पूजनादि कर उनसे आशीर्वाद रूप तिलक प्राप्त कर कृतकृत्य होती हैं। बहनों को इस दिन नित्य कृत्य से निवृत्त हो अपने भाई के दीर्घ जीवन, कल्याण एवं उत्कर्ष हेतु तथा स्वयं के सौभाग्य के लिये अक्षत (चावल) कुंकुमादि से अष्टदल कमल बनाकर इस व्रत का संकल्प कर मृत्यु के देवता यमराज की विधिपूर्वक पूजा करनी चाहिये। इसके पश्चात यमभगिनी यमुना, चित्रगुप्त और यमदूतों की पूजा करनी चाहिये। तदन्तर भाई को तिलक लगाकर भोजन कराना चाहिये। इस विधि के सम्पन्न होने तक दोनों को व्रती रहना चाहिये। इस पर्व के सम्बन्ध में पौराणिक कथा इस प्रकार मिलती है। सूर्य की संज्ञा से दो संतानें थीं। पुत्र यमराज तथा पुत्री यमुना। संज्ञा सूर्य का तेज सहन न कर पाने के कारण अपनी छाया-मूर्ति का निर्माण कर उसे ही अपने पुत्र-पुत्री को सौंपकर वहां से चली गयी। छाया को यम और यमुना से किसी प्रकार का लगाव न था। किन्तु यम और यमुना मंे बहुत प्रेम था। यमुना अपने भाई यमराज के यहां प्रायः जाती और उनके सुख-दुख की बातें पूछा करतीं। यमुना यमराज को अपने घर पर आने के लिये कहतीं। किन्तु व्यस्तता तथा दायित्वबोझ के कारण वे उसके घर न जा पाते थे। एक बार कार्तिक शुक्ल द्वितीया को यमराज अपनी बहन यमुना के घर अचानक जा पहुंचे। बहन यमुना ने अपने सहोदर भाई का बड़ा आदर सत्कार किया। विविध व्यंजन बनाकर उन्हें भोजन कराया तथा भाल पर तिलक लगाया। यमराज अपनी बहन द्वारा किये गये सत्कार से बहुत प्रसन्न हुये और उन्होंने यमुना को विविध भेंट समर्पित की। जब वे वहां से चलने लगे, तब उन्हांेने यमुना से कोई भी मनोवांछित वर मांगने का अनुरोध किया। यमुना ने उनके आग्रह को देखकर कहा-भैया! यदि आप मुझे वर देना ही चाहते हैं तो यही वर दीजिये कि आज के दिन प्रतिवर्ष आप मेरे यहां आया करेंगे और मेरा आतिथ्य स्वीकार किया करेंगे। इसी प्रकार जो भाई अपनी बहन के घर जाकर उसका आतिथ्य स्वीकार करे तथा उसे भेंट दें, उसकी सब अभिलाषाएं आप पूर्ण किया करें एवं उसे आपका भय न हो। यमुना की प्रार्थना को यमराज ने स्वीकार कर लिया। तभी से बहन-भाई का यह त्यौहार मनाया जाने लगा। वस्तुतः इस त्यौहार का मुख्य उद्देश्य है भाई-बहन के मध्य सौमनस्य और सद्भावना का पावन प्रवाह अनवरत प्रवाहित रखना तथा एक दूसरे के प्रति निष्कपट प्रेम को प्रोत्साहित करना, तथा समष्टि रूप में स्वास्थ्यसम्पद, रूपसम्पद, धनसम्पद्, शग्यसम्पद्, श्क्तिसम्पद् तथा उल्लास और आनन्द को परिवर्धित करन। इस प्रकार ‘दीपोत्सव-पर्व’ का धार्मिक, सामाजिक एवं राष्ट्रीय महत्त्व अनुपम है और यही इसे पर्वराज बना देता है।



दीपावली विशेषांक   अकतूबर 2011

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