क्या है दीपक और दीपोत्सव का रहस्य

क्या है दीपक और दीपोत्सव का रहस्य  

व्यूस : 7704 | अकतूबर 2011
क्या है दीपक और दीपोत्सव का रहस्य? डाॅ. भगवान सहाय श्रीवास्तव अमावस्या के घनघोर अंधकार के परिप्रेक्ष्य में दीपक शब्द अपने आप में प्रकाश पंुज का प्रतीक है, और दीपमाला उस प्रकाश पुंज के घनीभूत होने का उत्सव। आइये जानते हैं दीपक शब्द की व्युत्पत्ति क्या है और दीप माला के दीपोत्सव नामक इस पर्व के मनाने के पीछे की क्या दार्शनिक और पौराणिक महत्ता और इतिहास है। आवरण कथा दीपक का प्रकाश भगवत प्रकाश होने के कारण जीव, माया और ब्रह्म तीनों ही इस महोत्सव में पूजे जाते हैं। अतः यह दीपोत्सव भगवान विष्णु का गृहस्थ रूप है। यदि गणेश जी का पूजन न किया जाए तो लक्ष्मी जी भी नहीं टिकेंगी। अतः दोनों का पूजन आवश्यक है। इस महोत्सव का ‘पर्वकाल’ धनत्रयोदशी (धनतेरस) से प्रारंभ हो जाता है। इन तीनों दिनों में सूर्यास्त के उपरांत ‘प्रदोषकाल’ में दीपदान अवश्य करना चाहिए। धनतेरस को सायंकाल घर के प्रवेश द्वार के बाहर यमराज के निमिŸा दक्षिण दिशा की ओर मुख करके दीपदान करने से अकाल मृत्यु का भय दूर होता है। प्रकाश की उपासना सूर्य, अग्ेिन और दीपक के रूप में सदा होती रही है। सूर्य भी प्राणियों को जन्म देने के लिए, उन्हें प्रकाश प्रदान करने के लिए भगवान के दक्षिण नेत्र से प्रकट हुआ। उसने अपने तेज का आधान अग्नि में किया और वह तेज अग्नि से दीपक को मिला। दीपक शब्द की व्युत्पŸिा दीप-दीप्तौ नामक धातु से हैं, जिसका अर्थ है चमकना, जलना, ज्योतिर्मय होना, प्रकाशित होना। इसके अतिरिक्त और भी अनेक अर्थ हैं। प्रत्येक संप्रदाय और मजहब में दीपक का महŸव स्वीकारा गया है। लंका विजयोपरांत भी अयोध्या में घी के दीपक जलाये गये थे। इस प्रकार सभी धर्मों की प्रार्थना व उपासनाएं जुड़ी हैं। कार्तिक मास की अमावस्या घनघोर अंधकार से व्याप्त रहती है जिसमें बाधाओं-विघ्नों का आना संभव है। ये विघ्न आधिदैहिक, आधिभौतिक, आधिदैविक हैं। ये विघ्न जीवात्मा को पीड़ित करते हैं। अतः विघ्न विनाशक स्वरूप गणेश की आवश्यकता हुई। पृथ्वी, अग्नि, जल, वायु, आकाश इन पांच तत्वों से दीपक की दिव्यता प्रकाशित हुई है और ये ही पांचतत्व सृष्टि के उपादान-कारण भी हैं। इनमें प्रकाश होने से ही आत्मतेज की अनुभूति होती है। तेल से भरे हुए इन दीपकों के प्रकाश से तेल (स्नेह) की गंध से विषैले कीटाणुओं का नाश होता है, वातावरण में शुद्धता व पवित्रता उत्पन्न होती है तथा चमक-दमक से स्फूर्ति और प्रसन्नता मिलती है। सभी के लिए इन दीपकों का अर्चन, वंदन और पूजन करने की छूट है। दीपावली का यह महोत्सव एक नवीन जीवंतता का भी श्रीगणेश करता है। पुराणों के अनुसार कथा यह है कि वामनावतार में बलि के द्वारा संपूर्ण पृथ्वी के दान से संतुष्ट होकर भगवान विष्णु ने उन्हें यह वरदान दिया था कि कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी से अमावस्या तक तीनों दिन पृथ्वी पर यमराज की प्रसन्नता के उद्देश्य से दीपदान करने वाले को यमराज की यातना नहीं भोगनी पड़ेगी तथा इन तीनों दिन दीपावली का दीपोत्सव करने वाले के घर को भगवती लक्ष्मी कभी नहीं त्यागेंगी। दीपक शब्द की व्युत्पŸिा दीप-दीप्तौ नामक धातु से हैं, जिसका अर्थ है चमकना, जलना, ज्योतिर्मय होना, प्रकाशित होना। इसके अतिरिक्त और भी अनेक अर्थ हैं। निर्धनता दूर करने के लिए गृहस्थियों को अपने पूजागृह में धनतेरस की शाम से दीपावली की रात तक अखंड दीपक जलाना चाहिए। धनतेरस से भैया दूज तक घर में अखंड दीपक पांचों दिन प्रज्वलित रखने से पांचों तत्व संतुलित हो जाते हैं जिससे वास्तु दोष समाप्त हो जाते हैं जिसका प्रभाव पूरे वर्ष रहता है। दीपावली वस्तुतः दीपोत्सव का पर्व है, जो भगवान विष्णु का गृहस्थ रूप है। मंत्र: ‘घृतवर्Ÿिा समायुक्तं महोतेजो महोज्वलम्। दीपं दास्यामि देवेशि’ सुप्रीतो भव सर्वदा।।’ यह मंत्र दीपक के लिए है। प्रकाश का यह तेज पंुज तो सर्व विघ्नों का नाश करने वाला गणेश ही है। गणेश शब्द में ‘ग’ शब्द का अर्थ ‘ज्ञान’, ’ण’ शब्द का अर्थ है, निर्वाण, इन दोनों शब्दों के साथ ईश को जोड़ने पर गणेश शब्द बना है। गणेश जी का एक रूप एकदंत भी है जिसमें एक शब्द बलवाचक है। दंत शब्द का अर्थ विघ्न विनाशक है। इस प्रकार गणेश जी के अनेक नाम प्रसिद्ध हैं। वेद के ‘गणानांत्वा नमो गणेभ्यों’ इस मंत्र से आदिदेव के रूप में सृष्टि में अनंत गणेशों की स्थापना हुई है। अनंत वैगणेशा: इस मंत्र के आधार पर अनंत गणेश उपासनीय बने। विघ्नकर्ता, विघ्नहर्ता गणेश के दोनों ही रूप हैं। गणेश जी वेदव्यास के 18 पुराणों के लेखक भी हैं। व्यापार के बही खातों या लेखा-जोखा की विधि ही आत्मा है जो लेखनी द्वारा ही संभव है। पुराणों में एक कथा है। सिद्धि से शुभ और बुद्धि से लाभ नाम के दो पुत्र हैं। ये दोनों पुत्र व्यापार में स्थायित्व लाते हैं। इसीलिए व्यापार का श्रीगणेश गणेश पूजन से ही आरंभ होता है। लक्ष्मी के बारह गुण हैं लं से पृथ्वी, हं से आकाश, यं से वायु रां से अमृत का रूप है। इन स्वरूपांे के साथ-साथ लक्ष्मी का स्वरूप इस प्रकार है, हिरण्यवर्णा हरिणी सुवर्ण रजतवृजाम्। चंद्रां हिरणमयीं लक्ष्मीं जातवेदों म आवहं।। गणेश जी भगवान विष्णु जी का ही स्वरूप हैं और विष्णु जी की पत्नी का नाम है लक्ष्मी। लक्ष्मी जी के दो स्वरूप हैं, श्रीश्चते लक्ष्मींश्च पत्नयां’ इत्यादि मंत्रों में ‘श्रीं’ और ‘लक्ष्मी’ दो नाम मिलते हैं। ‘श्री’ का संबंध हाथियों और कमलों से है, लक्ष्मी का संबंध उलूक से है। हाथी ही गणेश का स्वरूप है जो ‘श्री’ की सेवा में रहता है। गणेश जी के सिर पर मोरपंख लगा हुआ है, जो भगवान कृष्ण का मुख्य चिह्न है लक्ष्मी और गणेश का संबंध वास्तव में माता और पुत्र का है। चूंकि माता लक्ष्मी निर्बाध रूप से अपने बेटे के मोह में रहती हैं इसीलिए दोनों की पूजा एक साथ होती है। दीपावली महालक्ष्मी पूजा का महापर्व है, इसलिए देवी के आवाहन, स्थापना एवं पूजन को शास्त्रोक्त मुहूर्त में किये जाने पर अत्यंत शुभफल प्राप्त होता है। निर्धनता दूर करने के लिए गृहस्थियों को अपने पूजागृह में धनतेरस की शाम से दीपावली की रात तक अखंड दीपक जलाना चाहिए। धनतेरस से भैया दूज तक घर में अखंड दीपक पांचों दिन प्रज्वलित रखने से पांचों तत्व संतुलित हो जाते हैं जिससे वास्तु दोष समाप्त हो जाते हैं जिसका प्रभाव पूरे वर्ष रहता है। निर्धनता दूर करने के लिए गृहस्थियों को अपने पूजागृह में धनतेरस की शाम से दीपावली की रात तक अखंड दीपक जलाना चाहिए। धनतेरस से भैया दूज तक घर में अखंड दीपक पांचों दिन प्रज्वलित रखने से पांचों तत्व संतुलित हो जाते हैं जिससे वास्तु दोष समाप्त हो जाते हैं जिसका प्रभाव पूरे वर्ष रहता है।

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दीपावली विशेषांक   अकतूबर 2011

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