दीपावली पर्व श्रंखला

दीपावली पर्व श्रंखला  

व्यूस : 6367 | अकतूबर 2011
दीपावली पर्व श्रंखला अक्तूबर का महीना आते ही जैसे पर्वों का मौसम आ जाता है। चारो ओर वातावरण खुशनुमा और सुगंधित होने के साथ हृदय उल्लास से भरने लगता है। इस महीने में पंच पर्व दीपावली के अलावा नवरात्र, महाअष्टमी, महानवमी, दशहरा, शरदपूर्णिमा, करवाचैथ, अहोई अष्टमी जैसे महत्वपूर्ण त्योहार आते हैं। प्रत्येक पर्व को मनाने के पीछे उसका कारण व महात्म्य अलग-अलग है तथा विधि भी भिन्न-भिन्न हैं। इन त्योहारों को मनाने के साथ-साथ आम व्यक्ति अपने जीवन के कष्टों को दूर कर सकता है तथा अपनी मनोकामना पूर्ति हेतु भगवान से प्रार्थना व स्तुति भी कर पाता है। ये पर्व वर्ष में एक बार ही आते हैं, ऐसे में हमें इस अवसर का लाभ उठाने से नहीं चूकना चाहिए। नवरात्र, महाअष्टमी व महानवमी: ये पर्व मां दुर्गा की शक्ति के प्रतीक हैं। जिन जातकों को ऊर्जा का अभाव महसूस होता हो, अंजाना डर हमेशा दिल में समाया रहता हो, स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता हो, किसी औद्योगिक प्रतिष्ठान में दुर्घटना आदि होती रहती हो, घर में क्लेश व बीमारी बनी रहती हो तो इन दिनों में पूजा करने से जातक को इन सभी कष्टों से मुक्ति प्राप्त होती है तथा जातक अपने आपको अधिक ऊर्जावान व शक्ति-सामथ्र्य से परिपूर्ण अनुभव करता है तथा स्वस्थ व दुर्घटनाओं से मुक्ति प्राप्त करता है। इन दिनों में दुर्गा सप्तशती के पाठ का विशेष महात्म्य है। इसके अतिरिक्त आप अपने घर में कोई भी धार्मिक, सामाजिक या सांस्कारिक कार्य जैसे गृह प्रवेश, भूमि पूजन, विवाह, सगाई, रोकना आदि बिना किसी विशेष मुहूत्र्त के संपादित कर सकते हैं, क्योंकि इन दिनों में सभी दिन दोष मुक्त पाये जाते हैं। दशहरा: दशहरे का पर्व बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। जिन जातकों का कोर्ट-कचहरी में मुकदमा चल रहा हो, किसी से वाद-विवाद चल रहा हो या आपसी मनमुटाव चल रहा हो तो इस दिन ऐसे जातकों को विशेष पूर्जा-अर्चना किसी योग्य पंडित से करवानी चाहिए, ऐसा करने से वे लोग कोर्ट-कचहरी आदि में विजय श्री को प्राप्त करते हैं तथा आपसी मनमुटाव व वाद-विवाद समाप्त होकर सौहार्द्रपूर्ण वातावरण बनता है। शरद पूर्णिमा: आश्विन पूर्णिमा को यह त्योहार मनाया जाता है। इस दिन का चंद्रमा सबसे अधिक प्रकाशमान होता है। जिन जातकों का चंद्रमा निर्बल हो तथा लग्नेश हो या चंद्रमा शुभ भाव का स्वामी हो तथा मन में अवसाद की भावना रहती हो, माता का स्वास्थ्य ठीक न रहता हो, माता से संबंध ठीक न हों या माता के सुख से किसी प्रकार वंचित हो तो शरद पूर्णिमा की रात को चांद की रोशनी में दूध-चावल की खीर बनाकर खुले में ढककर रखें और दो-एक घंटे बाद रात्रि में ही उसको खायें तो चंद्रमा बली होकर चंद्रमा के शुभ फलों की प्राप्ति होती है। करवा चैथ: यह त्योहार वैसे तो पूरे भारत में मनाया जाता है, परंतु उत्तर भारत में यह बहुत अधिक उत्साह व शौक से विवाहित स्त्रियों द्वारा मनाया जाता है। यह पर्व उन जातकों के लिये बहुत अधिक महत्वपूर्ण है, जिनके वैवाहिक संबंध ठीक नहीं है या जिनके जीवन साथी का स्वास्थ्य ठीक न रहता हो। यदि ऐसी स्त्रियां इस पर्व पर विधि-विधान से उपवास करके पूजा-अर्चना व कामना करती हैं तो पति-पत्नी के संबंधों में निश्चित रूप से मधुरता बढ़ेगी तथा आपसी सामंजस्य बढ़ेगा तथा उनके वैवाहिक जीवन से कष्ट दूर होकर खुशहाली आयेगी। अहोई अष्टमी: यह पर्व दीपावली के आरंभ होने की सूचना देता है। यह पर्व विशेष तौर पर माताओं द्वारा अपने पुत्र संतान की लंबी आयु व स्वास्थ्य कामना के लिये किया जाता है। जिन जातकों की संतान को शारीरिक कष्ट हो, स्वास्थ्य ठीक न रहता हो, बार-बार बीमार पड़ते हों या किसी भी कारण माता-पिता को अपने संतान की ओर से स्वास्थ्य व आयु की दृष्टि से चिंता बनी रहती हो, इस पर्व पर संतान की माता द्वारा समुचित व्रत व पूजा आदि का विशेष लाभ प्राप्त होता है तथा संतान स्वस्थ होकर दीर्घायु को प्राप्त करती हैं। धन तेरस: पंच पर्व दीपावली का यह प्रथम पर्व है। इस दिन यम के लिए दीपदान करना चाहिए, घर के मुख्य द्वार पर दीपक जलाने से घर के सदस्यों को अकाल मृत्यु का सामना नहीं करना पड़ता है। ऐसा माना जाता है कि यदि इस दिन कोई नयी वस्तु खरीदी जाये तो वर्ष भर वैसी ही शुभ वस्तुएं प्राप्त होती रहती हैं। इस दिन सोना, चांदी या कोई भी अन्य धातु का खरीदना शुभ माना जाता है। विशेष तौर पर बर्तनों की खरीददारी की जाती है। सामान्यतः सभी अपनी-अपनी शक्ति व सामथ्र्य अनुसार खरीदारी करते हैं। इस दिन किसी भी व्यक्ति को धन उधार नहीं देना चाहिए, ऐसा करने से घर में वर्ष भर धन-दौलत का अभाव रहता है। जिन जातकों को धन का अभाव हो वे इस दिन चांदी के गणेश लक्ष्मी या चांदी का सिक्का अवश्य खरीदें तथा दीपावली के दिन उनकी पूजा करें तो वर्ष भर धन दौलत से पूरिपूर्ण होता है। नरक चतुर्दशी: यह त्योहार छोटी दीपावली के नाम से जाना जाता है। प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व उठकर लौकी को सिर पर से घुमाने के बाद स्नान करने से जातक रूप और सौंदर्य प्राप्त करता है तथा नरकगामी होने से मुक्ति प्राप्त होती है। इस दिन स्नान आदि के पश्चात घर में श्रीयंत्र की स्थापना करें। यंत्र को गंगाजल व पंचामृत के छींटे लगाकर शुद्ध करके लकड़ी के पट्टे पर लाल या पीला कपड़ा बिछाकर स्थापित करें। धूप, दीप, अगरबत्ती जलायें तथा कमलगट्टे की माला पर ‘ऊँ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं श्री महालक्ष्म्यै नमः’’ का एक माला मंत्र जाप करें और बड़ी दीपावली के दिन प्रातः पुनः ऐसा करके दीपावली की मुख्य पूजा में सम्मिलित कर प्रतिदिन उक्त मंत्र के साथ पूजन करें तो घर में धन-दौलत की कमी कभी नहीं रहेगी तथा लक्ष्मीजी की कृपा हमेशा बनी रहती है। दीपावली: रात्रि के समय स्थिर लग्न में अथवा प्रदोष काल में दीपावली पूजन विशेष लाभकारी माना जाता है। सुबह के समय दुकानदार नये खाते खोलते हैं। उनकी पूजा करते हैं। दिन में घर में साफ-सफाई व सजाने का कार्य किया जाता है। शाम को सूर्यास्त के पश्चात मंदिर में जाकर दीप जलायें तथा हनुमान जी को प्रसाद चढ़ायें तथा घर लौटकर घर के बाहर व अंदर दीप, मोमबत्ती व बिजली से रोशनी करते हुये गणेश-लक्ष्मी जी का पूजन करें तथा पूजन के पश्चात घर के बाहर आतिशबाजी के द्वारा हर्षोल्लास प्रदर्शित करते हुये श्री लक्ष्मी जी का स्वागत करें। इस दिन श्री सूक्त, लक्ष्मी सूक्त, लक्ष्मी स्तोत्र, कनकधारा स्तोत्र व पुरूष सूक्त आदि के पाठ का विशेष महत्त्व है। इस दिन मध्य रात्रि में स्थिर लग्न में ये पाठ करने से लक्ष्मी जी विशेष रूप से प्रसन्न होती हैं तथा तांत्रिक लोग मंत्र सिद्धि व तांत्रिक शक्ति की प्राप्ति इसी समय करते हैं। गोवर्धन पूजा / विश्वकर्मा पूजन: दिन के समय पंचमेल खिचड़ी का विशेष भोजन तैयार करके लोगों को भोज करायें। उसी भोजन को प्रसाद के रूप में ग्रहण करें। इससे अन्नपूर्णा देवी प्रसन्न होती हैं तथा जातक के घर वर्ष भर अन्न व धन-धान्य से परिपूर्ण रहता है। जिन जातकों के घर अन्न के भंडार खाली रहते हों तथा घर में हर समय किसी न किसी चीज का अभाव बना रहता हो उन्हें इस दिन अन्नपूर्णा देवी का पूजन विशेष विधि-विधान से करना चाहिए तथा गरीब लोगों को भोजन दान करना चाहिए। इससे उनके घर वर्ष भर किसी भी चीज की कमी नहीं रहेगी तथा भंडार हमेशा भरे रहेंगे। औद्योगिक प्रतिष्ठान और फैक्ट्री मजदूर वर्ग इसे विश्वकर्मा पूजा के रूप में मनाते हैं। वे लोग इस दिन अपनी मशीनरी व औजारों की विशेष रूप से पूजा करते हैं तथा अपना कार्य स्थगित रखते हैं। ऐसा करने से वर्ष भर बिना किसी अप्रिय घटना घटे उनका कार्य सुचारू रूप से चलता है तथा वे अपने कार्यों मंे सफलता प्राप्त करते हुये धन से परिपूर्ण होते हैं। भैय्या दूज/ यम द्वितीया: यह पर्व बहनों द्वारा भाइयों की दीर्घायु कामना हेतु मनाया जाता है। इस दिन दीपावली का पंचपर्व पूर्ण हो जाता है। भाई-बहनों के बीच संबंध ठीक न होने या भाइयों का स्वास्थ्य ठीक न रहने या सहयोग प्राप्त न होने की स्थिति में भाइयों को बहिन के हाथ का बना स्वादिष्ट भोजन अवश्य करना चाहिये और बहिन से तिलक लगवाना चाहये। इससे बहनों की शुभकामनाओं से पारस्परिक प्रेम वृद्धि के साथ ही भाई के स्वास्थ्य में सुधार अवश्य होता है तथा उसे दीर्घायु प्राप्त होती है।

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