श्रीगणेश के प्रमुख स्थल एवं उनका महत्व

श्रीगणेश के प्रमुख स्थल एवं उनका महत्व  

श्रीगणेश के प्रमुख स्थल एवं उनका महत्व प्रश्न: गणपति के मुख्य स्थल कौन-कौन से हैं? उनका ऐतिहासिक महत्व एवं पूजा-विधान क्या है? पंचदेवों मे से एक, पार्वती-शिव के आत्मज, समस्त देवी-देवताओं में सर्वाग्रपूज्य और सनातन हिंदू धर्म-शास्त्रों एवं हिंदुओं के जन-जीवन में अत्यधिक परिव्याप्त भगवान श्री गणेश के सभी तीर्थ-स्थलों, मूर्तियों और क्षेत्रों आदि का पूर्ण विवरण प्रस्तुत करना असंभव है। प्रायः समस्त श्री शक्ति-शिव मंदिरों में श्री गणेश के मंगल विग्रह प्रतिष्ठित है। अन्य देव स्थलों में भी भगवान श्री गणेश रक्षणार्थ विद्यमान हैं। कुछ स्थलों का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है। महाराष्ट्र प्रदेश के गणपति मुंबई के सिद्धि विनायक: मुंबई में भगवान गणपति के अनेक मंदिर हैं, और उनमें से दो बहुत पुराने हैं- प्रभादेवी का ‘सिद्धि विनायक मंदिर’ और मूल जी जेठा कापड़ मार्केट का सिद्धि विनायक मंदिर। कहते हैं कि एक बार कापड़ मार्केट में इतना भीषण अग्निकांड हुआ था कि आसपास की गलियों की दुकानें व मकान आदि जलकर खाख हो गए थे। किंतु आश्चर्य यह कि 25-30 कदम की दूरी पर स्थित सिद्धि विनायक मंदिर और उसके अंदर उपस्थित पुजारी तक आग फटक नहीं पाई जबकि भयंकर हादसे में अग्नि ज्वालाएं दूर-दूर तक फैल गई थीं। दूसरी आश्चर्यजनक बात यह थी कि अंदर के गणपति चैक तथा उसकी दुकानों का बाल भी बांका नहीं हो सका। सतारा के ढोल्या गणपति: सतारा के समस्त मांगलिक कार्य ढोल्या गणपति को अक्षत चढ़ाने के उपरांत ही आरंभ होते हैं। मंदिर अति प्राचीन है एवं मूर्ति स्वयंभू और वृहदाकार है। नासिक के मोदकेश्वर: नासिक के इस गणेश मंदिर की प्रतिमा के मोदकाकार होने की वजह से ये ‘मोदकेश्वर’ नाम से प्रसिद्ध हैं। यह मंदिर हिगल्याका गणपति मंदिर कहलाता है जिसकी गणना छप्पन विनायकों में होती है। यह ‘कामवरद महोत्कट क्षेत्र’ है। थेऊर के चिंतामणि: अष्ट-गणपति का यह क्षेत्र थेऊर पूना जिले में पूना से 25 कि.मी. की दूरी पर है। यहां के भगवान गणपति चिंतामणि कहलाते हैं जिनकी स्थापना उनके परम शिरोमणि भक्त मोरया गोसावी ने की थी। चिंतामणि गणेश की प्रतिमा आसनस्थ मुद्रा स्वरूप है। सूंड बायीं ओर एवं पूर्वमुखी है। थेऊर के वन में मोरया गोसावी की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर व्याघ्र रूप में भगवान गणेश ने उन्हें दर्शन दिए थे। व्याघ्र के प्रतीक के रूप में यहां पर एक शिला-खंड है। चिंचवड़ के ‘मंगलमूर्ति’: महाराष्ट्र प्रांत के पूना जिले से करीब 15 कि.मी. दूरस्थ इस जाग्रत देव-स्थान पर गणेश जी ‘मंगलमूर्ति’ के नाम से विख्यात हैं। राजणगांव के महागणपति: अष्ट-विनायक का यह क्षेत्र राजणगांव पूना जिले में पूना से लगभग 55 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। यहां के भगवान गणपति का श्री विग्रह ‘महागणपति’ के नाम से विख्यात है। इस पूर्वाभिमुख मंदिर में जो मूर्ति स्थित है उसके नीचे बने तहखाने में असली छोटी प्रतिमा मुगल आक्रमणकारियों के भय से रक्षार्थ छिपाकर रख दी गई थी। इस विग्रह का नाम ‘महोत्कट’ है। मंदिर की संरचना इस प्रकार की है कि उŸारायण व दक्षिणायन के मध्यकाल में भुवन भास्कर भगवान सूर्य देव की रश्मियां भगवान गणपति की मूर्ति पर अवश्यमेव पड़ती है। मोरगांव के मयूरेश्वर: यह अष्ट विनायक क्षेत्र महाराष्ट्र प्रांत में ही है। यहां के देवता हैं भगवान मयूरेश्वर। पूना जिले से लगभग सŸार किलोमीटर की दूरी पर मोरगांव क्षेत्र में गणेश भक्त शिरोमणि मोरया गोसावी ने 14वीं सदी में आकर सिद्धि प्रदाता भगवान मयूरेश्वर की साधना अनन्योपासक बनकर की। यहां पर गजानन देवता के समक्ष बड़ा मूषक विराजमान है। यह मूषक पैर से मोदक धारण किए हुए है। आंतरिक चैगान के अष्टकोणों में मुद्गल पुराणोक्त भगवान गणपति की अष्ट मूर्तियां हैं। मूर्ति के दायें बायें गणेश जी की ऋद्धि-सिद्धि पत्नियों की धातु की बनी मूर्तियां हैं। प्रतिमा के सामने मूषक और मयूर वाहन विराजमान हैं। लेह्याद्रि के गिरिजात्म: यह अष्ट विनायक क्षेत्र पूना से लगभग 100 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। समीपवर्ती क्षेत्र में बौद्ध गुफाएं भी हैं। लेह्याद्रि का यह स्थल पर्वत की खुदाई करके बनाया गया है। गणेश पुराणोक्त यह तीर्थ ‘गिरिजात्मज’ के नाम से मशहूर है। ओझर के विघ्नेश्वर: अष्ट विनायक का यह क्षेत्र बड़ा ही रमणीक है। यह स्थान लेह्याद्रि के समीप ही है। यहां के भगवान गणेश विघ्नेश्वर कहलाते हैं। मंदिर बहुत ही भव्य एवं सुंदर है। प्रतिमा बायीं सूंड वाली है। इनकी बहुत प्रतिष्ठा है। महड़ के वरद विनायक: यह क्षेत्र कुलाबा जिले में है। भगवान गणपति का यह तीर्थ स्थल महड़ महाराष्ट्र के अष्ट विनायकों में बहुत विख्यात है। ऐसी मान्यता है कि श्री वरद विनायक के मंदिर की स्थापना हजारों वर्ष पूर्व ऋग्वेदीय मंत्र द्रष्टा एवं ‘गणानां त्वा गणपति ग्वं हवामहे’ ऋचा को गणपति की उपासना आराधना करके सिद्ध करने वाले वेद विख्यात एवं गाणपत्य संप्रदाय के आद्यप्रवर्तक गृत्समद ऋषि ने की थी। पाली के बल्लालेश्वर: यह सिद्ध क्षेत्र भी महाराष्ट्र प्रांत के कुलाबा जिले में पाली नामक स्थान में है। यहां के भगवान गणेश का नाम बल्लालेश्वर है। यह एक पुरातन गणपति तीर्थ स्थल है। अरुणोदय होते ही सूर्य भगवान की किरणें सभा मंडप से गुजरती हुई बल्लालेश्वर गणपति की प्रतिमा पर पड़ती हैं जो इस मंदिर की अद्भुत वास्तु संरचना का द्योतक है। इस मंदिर के पृष्ठ भाग की तरफ स्वयंभू श्री ढुंढिविनायक जी का मंदिर है। चिंतामणि गणेश (कलम्ब): इस स्थान का प्राचीन नाम ‘कदम्बपुर’ था। यह चिंतामणि क्षेत्र है। कहते हैं कि गौतम ऋषि के श्राप से त्राण पाने के लिए इस स्थान पर देवराज इंद्र ने श्री चिंतामणि गणेश की स्थापना कर उनकी पूजा आराधना की थी, इसलिए ये भगवान चिंतामणि गणेश कहलाते हैं। सिद्धटेक (बोरीवली-मुुंबई): बोरीवली स्थित भगवान गणपति के इस प्रमुख तीर्थ-स्थान का प्रचीन नाम ‘सिद्ध ाश्रम’ है जो अब सिद्धटेक के नाम से जाना जाता है। कहते हैं कि सर्वप्रथम जगत के पालनहार श्री हरि विष्णु भगवान जी ने अपने कानों के मैल से उत्पन्न मधु कैटभ नामक राक्षसों का वध करने के लिए यहां पर गणेश प्रतिमा की स्थापना कर उनकी पूजा की थी। तदुपरांत विष्णु द्वारा स्थापित इस गणेश मूर्ति की पूजा वेद व्यास जी ने इसलिए की थी कि उनके द्वारा किया जाने वाला वेदों के विभाजन का कार्य बिना किसी विघ्न बाधा के संपन्न हो जाए। सिद्ध गणपति स्थल है परंतु शीघ्र मनोकामना पूर्ति करने के कारण प्रसिद्ध हो चुका है। पुण्य सलिला मां नर्मदा के पावन तट पर ग्वारीघाट में रेलवे फाटक के पास 10 सितंबर 2002 के दिन भगवान गणपति के दिव्य विग्रह की स्थापना की गई है। मनोकामना शीघ्र पूर्ण करने वाले ‘श्री सिद्ध गणेश’ भगवान चतुर्भुजी रूप में कमलासन पर विराजमान हैं, उनका दिव्य विग्रह अनुपम है। सूंड दायीं ओर मुड़ी हुई है। यह श्री सिद्ध गणेश मंदिर जनाकर्षण का केंद्र है। ‘जेहि सुमिरत सिधि होय, गणनायक करि वर वदन। करहु अनुग्रह सोई, बुद्धि राशि शुभ गुण सदन।। की उद्घोषणा के साथ भक्तगण श्रीफल के सहित अपनी लिखित अर्जी भगवान श्री सिद्ध गणेश जी के चरणों में प्रस्तुत करते हैं। अर्जी रजिस्टर में दर्ज कर ली जाती है। और रजिस्ट्रेशन नंबर का छोटा सा लिखित कार्ड अर्जी लगाने वाले को दे दिया जाता है ताकि मनोकामना पूरी होने पर कष्टों से मुक्ति मिल जाने पर अपनी अर्जी का श्रीफल निकलवाया जा सके। अल्पावधि में ही भगवान श्री सिद्ध गणेश जी ने अपने हजारों शरणागतों की मनोकामनाएं पूर्ण की हैं। उज्जैन के बड़े गणेश जी: महाकाल के एक ओर भगवान गणपति, दूसरी और तीसरी ओर क्रमशः शिव पार्वती और कार्तिकेय स्वामी विराजमान हैं। मंदिर के समीप भगवान गणपति का मंदिर है जिसमें गणेश जी की एक आधुनिक मूर्ति है जो बहुत बड़ी व सुंदर है। यहां विभिन्न स्थानों पर षट विनायक मंदिर भी हैं। इन्दौर के विशाल गणपति: इन्दौर में भगवान गजानन की एक विशाल मूर्ति है। यह मूर्ति तैलीय रंगों से रंगी होने के कारण बहुत सुहावनी लगती है। इस मूर्ति की ऊँचाई बारह फुट है। ओंकारेश्वर के पंचमुख गणेश: द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक ज्योतिर्लिंग मध्य प्रदेश के उज्जैन जिले के महाकाल हैं तो दूसरे ओंकारेश्वर लिंग हैं। मंदिर के अहाते में ही भगवान गणपति का एक मंदिर है। मंदिर में पंचमुखी प्रथमेश्वर की प्रतिमा है। ग्वालियर के विविध गणेश: ग्वालियर में भगवान गणेश के विविध मंदिर हैं जिनमें से कई प्रतिमाएं सिंदूर से सुशोभित हैं। ग्वालियर के चावड़ी बाजार मंदिर में स्थित गणेश प्रतिमा बहुत बड़ी है। कर्नाटक के कुछ गणपति क्षेत्र कुरुडमडे: कुरुडमडे के मंदिर की श्री सुब्रह्मण्यम की प्रतिमा हरे संगमरमर की है। मंदिर विजय नगर शासन काल का है। मंदिर के गर्भगृह में महागणपति की मूर्ति है। यह हरे रंग के संगमरमर की बनी हुई है। इडगुंजी: यहां पर द्विभुजाधारी पंचखाद्यप्रिय भगवान महागणपति जी की मूर्ति है जो नागालंकार विभूषित है। मंगलूर: मंगलूर के गणेश भगवान ‘शरऊ गणपति’ जाग्रत देवता के रूप में कर्नाटक व केरल में प्रसिद्ध हैं। कहा जाता है कि इनकी स्थापना किसी तांत्रिक ने की थी। गणेश चतुर्थी यहां पर बड़े हर्षोल्लास के साथ और इस अवसर पर एक हजार नारियल फोड़े जाते हैं। कोक्कड: कर्नाटक के कोक्कड ग्राम में भगवान गणेश की मूर्ति किसी मंदिर में नहीं है। कहते हैं कि भगवान गणेश ने स्वप्न में आकर मंदिर बनाने की मनाही कर दी थी। यहां पर एक मैदान में झाड़ के नीचे गणेश जी प्रतिष्ठित हैं। आंध्र प्रदेश रेजंतल: भगवान गणपति का यह मंदिर पर्वत की गोद में बसा है। लगभग साढ़े तीन सौ वर्ष पूर्व पौष मास की शुक्ल चतुर्थी विनायक चतुर्थी के दिन किसी भक्त ने पूजन के बिना किसी उद्धेश्य के जय सिद्धि विनायक कहते हुए अपना हाथ जमीन पर दे मारा, तत्क्षण भगवान सिद्ध विनायक की मूर्ति उस स्थान पर प्रकट हो गई। बाद में उसी भक्त ने विधि विधान के साथ उस मूर्ति की पूजा की तभी से रेतंजल के सिद्ध विनायक महागणपति की बहुत ज्यादा मान्यता है। मदुरै के महागणपति इस स्थान के बारे में लगभग 825 वर्ष पूर्व की एक घटना का उल्लेख मिलता है। कहते हैं कि यहां पर किसी हरिजन महिला की दरांती मैदान में घास काटते वक्त किसी वस्तु से टकराई और वहां से खून की धार बहने लगी। लोगों ने जमीन खोदकर मूर्ति को बाहर निकाला तो भगवान गणेश की मूर्ति निकली जिसमें से रक्त निकल रहा था। तत्काल उसी जगह गर्भगृह बना दिया गया, भगवान की पूजा शुरू हो गई। भुवनेश्वर उड़ीसा के गणपति भुवनेश्वर के लगभग सभी शैव मंदिरों में भगवान शंकर या शिवलिंग के समीप गणेश जी की मूर्तियां हैं, किसी के साथ मूषक है तो कोई मूषक रहित है। किन्हीं के हाथों में कन्दमूल व मोदक हैं और किन्हीं के हाथों में मूलकंद-मोदक के साथ कुठार-अक्षमाला भी हैं। भुवनेश्वर के लिंगराज मंदिर में प्रवेश करने के पूर्व ही भगवान गणपति की विशाल प्रतिमा के दर्शन हो जाते हैं। इस भव्य विग्रह की ऊँचाई दस फुट है। यह मूर्ति स्थापत्य कला की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है। यह अनुमानतः ग्यारहवीं सदी की है। कटक के महाविनायक: उड़ीसा के कटक जिले में भगवान विनायक का एक बहुत बड़ा शानदार मंदिर है। यह एक प्रमुख गणपति तीर्थ है जो महाविनायक क्षेत्र के नाम से विख्यात है। श्री जगन्नाथपुरी जगन्नाथपुरी में सिद्ध विनायक के भव्य मंदिर में गणेश जी की एक बहुत मनोरम आठ फुट ऊंची मूर्ति है। पुरी के उŸार में सिद्ध हनुमान मंदिर में आद्य शंकराचार्य द्वारा प्रतिष्ठित पंच विनायक की भव्य प्रतिमा है जिसके पांच मस्तक हैं। ब्रह्मा जी ने जिन गणपति का पूजन करके जगन्नाथ जी महाराज के दर्शन किए थे, कहते हैं वही प्रतिमा जगन्नाथ मंदिर के कल्पवृक्ष के नीचे वाले मंदिर में विराजित है। गुजरात के गणेश स्थल सोमनाथ: द्वादश ज्योतिर्लिंगों में एक सोमनाथ के प्रसिद्ध प्राचाीन मंदिर के परिसर में अहिल्याबाई द्वारा निर्मित गणेश जी का एक मंदिर है। बड़ौदा: बड़ौदा में सावरकर गणेश मंदिर और श्री ढुंढिराज गणेश मंदिर शिल्प कला की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण हैं। प्रसिद्ध नीलकंठेश्वर गणपति मंदिर की मूर्ति कलापूर्ण है। इस मंदिर की विशेषता यह है कि पश्चिम की ओर जाते हुए सूर्य की रश्मियां गणेश मूर्ति पर पड़ती रहती हैं। खंभात: यहां ब्राह्मणवाड़ा में श्री गणेश जी का स्वतंत्र मंदिर है, जहां श्री गणेश जी की मनुष्य के कद की भव्य प्रतिमा विराजित है। इसके चार हाथों में चार फण वाले सर्प हैं और शरीर पर सर्प का ही यज्ञोपवीत भी है। यह मूर्ति बहुत प्राचीन है। धांगध्रा: यहां की सात फुट ऊंची एकदंत मूर्ति एक अखंड पत्थर में उत्कीर्ण है। मंदिर जोगसर तालाब के एक किनारे पर है। दूसरे किनारे पर अन्य मंदिर भी हैं। गोरज: यहां के सिद्धि विनायक की मूर्ति चतुर्भुज है। यह मंदिर एक शमी वृक्ष के नीचे अवस्थित है। गोवा के प्रमुख गणपति स्थल खांडोले: यहां के गणेश ‘खाडोल्यचा-गणपति’ कहलाते हैं। यहां का गणपति-मंदिर छोटा किंतु सुंदर है। यह पहाड़ के नीचे नारियल के झुरमुट में है, जिससे इनकी नैसर्गिक शोभा अप्रतिम है। बांदिवडे़: यहां की श्री गोपाल-गणपति की मूर्ति जंगल में मिली थी। इसकी ऊंचाई एक फुट है। द्रविड़ प्रदेश के मुख्य गणपति स्थल द्रविड़ प्रदेश तमिलनाडु में श्री गणेश जी देवता के रूप में सर्व साधारण के चिŸा को बहुत आकर्षित करते हैं। नदियों के तट पर, पीपल वृक्ष के नीचे तथा कंटकाकीर्ण उदेयरम् वृक्ष की छाया में बिना किसी प्रकार के आवरण के खुली जगह में छोटी-छोटी वेदिकाओं के ऊपर उनकी पूजा-अर्चना होती है। कोई भी धनी या गरीब आदमी सच्ची श्रद्धा-भक्ति से उनके लिए कहीं भी मंदिर बनवा देता है। इस प्रकार भक्तों के हृदय में श्रीगणपति ने एक विशिष्ट स्थान बना लिया है। यहां श्री गणेश को विनयागर, विनायकर और पिल्लयर के नाम से पुकारा जाता है। मुख्य गणपति मंदिर इस प्रकार हैं। परमक्कुडि: परमक्कुडि के समीप एक कांटेदार वृक्ष के नीचे गणपति अपने भाई स्कंद के साथ आसीन हैं। नव-दंपति अपने वैवाहिक जीवन की सफलता के लिए यहां आकर गणेश जी से प्रार्थना करते हैं और वे उसे पूर्ण भी करते हैं। तिरुच्चेंट्टांगुडि: मायावरम-कराइकुडि लाइन पर मायावरम से 15 मील दूर नन्निलम के पास यह स्थान है। यहां का विनायक मंदिर विख्यात है। यहां भगवान विनायक गजवदन न होकर नरवक्त्र (मनुष्य के मुख) रूप में ही विराजमान हैं। कहा जाता है कि गजमुखासुर का वध इन्हीं विनायक के द्वारा हुआ था। तिरुनारैयूर: चिदम्बरम् के समीप तिरुनारैयूर में श्री गणेश जी का विशेष मंदिर है। इस मंदिर की गणेश मूर्ति को तमिल में ‘पोल्लेपिचिआयुर’ के नाम से पुकारते हैं। यहां की गणेश मूर्ति एक शुभ मुहूर्त में पाताललोक से स्वयं प्रकट हुई थी। बालक नंबि इन्हीं विघ्नेश्वर का शिष्य बना था। स्वयं भगवान गणेश ने नंबि की भक्ति भावना से प्रसन्न होकर उसके प्रसाद (भोग) को साक्षात ग्रहण किया और उस पर असीम अनुकंपा की। तभी से उसका नाम नंबियांडार नंबि पड़ा। भगवान गणेश की कृपा से बालक नंबि ने, जो कि बाल्यकाल में एकदम निरक्षर था, अपने देव-गुरु से सभी विषयों की शिक्षा ग्रहण की और एक महान भक्त तथा संस्कृत और तमिल साहित्य का प्रकांड विद्वान बना। शिव भक्तों की महिमा पर उसने एक काव्य रचना की है। कोट्टाइयूर: कराइकुडि के समीप एक विशेष विनायक हैं, जिनकी बड़ी अभ्यर्थना होती है। यहां सरोवर के निकट एक छायाकार कुंड है। इस सरोवर के पश्चिम में एक खुला चबूतरा है, जिसके चारों ओर न तो कोई दीवार है और न ही ऊपर कोई आच्छादन है। कोई भी भक्त बिना जात-पांत के भेदभाव के, बिना किसी की सहायता के सरोवर से जल लेकर देवता के अभिषेक के लिए इस देवस्थान में जा सकता है। तिरुप्पंरपयम: यह स्थान कुंभकोणम से 6 मील दूर है। यहां एक सरोवर के किनारे दक्षिणमूर्ति गणपति का मंदिर है। कहा जाता है कि इन्होंने जगत की प्रलय से रक्षा की थी। तिरुवलम चुलि: यह क्षेत्र इक्कीस प्रधान गणपति क्षेत्रों में एक है। चोल देश में कुंभकोणम् के पास एक शिवालय है। यह स्थान तिरुवलम चुलि कहलाता है। पद्द्रुचेरी (पांडिचेरी): पांडिचेरी के समुद्र-तट पर श्री गणेश जी का मंदिर है। यह मंदिर विदेशियों ने बनवाया था। कहा जाता है कि जब इन विनायक की पूजा के लिए भक्तजनों की संख्या बढ़ने लगी, तब विदेशी शासकों ने इस मूर्ति को समुद्र में फिकवा दिया। परंतु दूसरे ही दिन ईश्वरीय चमत्कार से यह मूर्ति अपने स्थान पर स्वतः विराजित हो गई। इसे देखकर आश्चर्यचकित विदेशी शासकों ने यहां भक्तिपूर्वक मंदिर का निर्माण करवाया। त्रिचिनापल्ली: त्रिशीर्षगिरि (आधुनिक तिरुचिरापल्ली) की पहाड़ी पर तीन शिखर हैं, जिनमें सबसे ऊंची पहाड़ी पर गणपति विराजमान हैं। इन्हें यहां उचिप्पिल्लैयार के नाम से पुकारते हैं। इस सर्वोच्च देवता का दर्शन करने के लिए बड़े परिश्रम और कठिनाई से पूजा करने वाले ऊपर पहाड़ी पर चढ़ते हैं। राजस्थान के श्री गणेश क्षेत्र रायपुर (पाली): यहां गणेश जी का एक प्राचीन मंदिर है। हजारों भक्त यहां दर्शनार्थ आते हैं। मंदिर के सामने एक गणेश तालाब है। यहां प्रतिवर्ष भाद्र शुक्ल चैथ को गणेश जी की जयंती धूमधाम से मनायी जाती है। जयपुर: यहां की मोती डंूगरी की मूर्ति दर्शनीय है। यहां की पुरानी राजधानी आमेर के मंदिरों में स्थित गणपति की मूर्तियां दर्शनीय हैं। गलता-तीर्थ के शिव मंदिरों में भी गणपति मूर्तियां देखने योग्य हैं। यहां के विघ्नेश्वर मंदिर में एक अत्यंत प्रसिद्ध गणेश प्रतिमा है। सिद्धगणेश: सवाई माधोपुर स्टेशन से 5 मील दूर एक पर्वत शिखर पर सिद्ध गणेश का मंदिर है। कहा जाता है कि ये गणेश मेवाड़ के इतिहास प्रसिद्ध राणा हम्मीर के आराध्यदेव थे। रणथंभौर: सवाई माधोपुर स्टेशन से दक्षिण पूर्व दिशा में श्रृंखलाओं से घिरा भारतीय इतिहास में सुप्रसिद्ध वीर हम्मीर रणथंभौर दुर्ग पर्वत के ऊपर बना हुआ है, जहां सिद्धिदाता भगवान गणेश का सुप्रसिद्ध मंदिर एवं तीर्थ है। मुसलमानों के बहुत दिनों तक अधिकार में रहने के कारण प्राचीन मंदिर तो नष्ट कर दिया गया, पर भगवान गजानन के श्री विग्रह की केवल सूंड मात्र ही पूर्णरूप से अक्षुण्ण है। दोनों ओर ऋद्धि-सिद्धि की मनोरम प्रतिमाएं हाथों में चंवर लिए शोभित हंै। यह स्थान गणपति का सिद्ध पीठ है। श्रीकेशवराय पाटण (खड़े गणेश जी): यह स्थान कोटा जंक्शन से 5 मील दूर है। यहां चंबल नंदी में विष्णु तीर्थ है। उसके तट पर भगवान श्रीकेशव राय की चतुर्भुज मूर्ति का मुख्य पीठ स्थित है। मुख्य मंदिर के चारों ओर कई देवताओं के मंदिर हंै, जिनमें से एक गणेश जी का भी है। उदयपुर: घाटेश्वर मंदिर के बाहर तोरण सदृश्य दो खंभों पर गणेश जी एवं नारद जी के मंदिर हैं। ये मंदिर मेवाड़ की उत्कृष्ट शिल्पकृति के नमूने हैं। चिŸाौड़गढ़: गणेशपोल के प्रत्येक द्वार पर अंकित मंगलदाता गजानन की कई मूर्तियां मन मोह लेती हैं। शहर में गणेश घाटी की गणेश मूर्तियां एवं किले के दरवाजे पर अंकित मूर्तियां भी दर्शनीय हैं। शिव मंदिरों में श्री गणपति की छोटी मूर्तियां देखने योग्य हैं। गोगुन्दा (उदयपुर): यहां 2 मील की दूरी पर श्री गणेश जी का विग्रह स्थित है। यह मंदिर बड़ा ही सुंदर है। जालौर: जालौर दुर्ग की मकराने के पत्थर की बनी गणपति की मूर्तियां सुंदर एवं दर्शनीय हैं। पंजाब, हिमाचल प्रदेश व कश्मीर के गणेश स्थल पटियाला (पंजाब): पटियाला के श्री नैनादेवीजी, श्री गौरीदेवीजी, श्री सत्यनारायण जी आदि के मंदिरों में श्री गणेश की सुंदर मूर्तियां प्रतिष्ठित हैं। बैजनाथ (कांगडा): बैजनाथ के षड्भुज गणेश यहां के प्रसिद्ध शिव मंदिर में अवस्थित हैं। गणेशबल (कश्मीर): यहां गणेश जी के रूप में पूजित एक विशाल स्वयंभु शिला है। गणेश घाटी: यहां प्रसिद्ध स्वयंभु गणेश मूर्ति चट्टानाकार हैं, जिसमें उनकी सूंड लटकी दिखाई देती है। उŸारांचल और उŸार प्रदेश के गणेश-स्थल गणेश्वरी टीला (टिहरी गढ़वाल): इस क्षेत्र में एक गणेश्वरी शिला है। यह लाल रंग की है और इसका आकार हाथी जैसा है। केदारनाथ: केदारनाथ मंदिर के मुख्य द्वार पर श्री गणेश विराजित हैं। पहले इनकी अग्रपूजा होती है, पश्चात भ. क्तजन मंदिर के अंदर प्रवेश करते हैं। गणेश गुफा: बदरीनाथ से 2 मील दूर भाणा ग्राम के निकट व्यास गुफा के समीप ही गणेश गुफा है। आदिबदरी: यह प्रतिमा काले पाषाण की है तथा कला की दृष्टि से उत्कृष्ट है। यहां मंदिर में श्री गणेश विग्रह स्थापित है। हरिद्वार: यहां गणेश घाट है, जहां श्री गणेश की विशाल मूर्ति है। वृंदावन: यहां श्री गोटा-गणेश का मंदिर है तथा श्रीकात्यायनी मंदिर का श्री सिद्धगणेश का श्री विग्रह दर्शनीय है। प्रयाग: प्रयाग को ओंकार गणेश क्षेत्र कहा जाता है। यहां जगह-जगह पर अनेक गणेश मूर्तियां स्थापित हैं, किंतु महामना मालवीय नगर और झंझरिया पुल की विशाल मूर्तियां अपने ढंग की निराली हैं। वाराणसी: काशी के सफलप्रद श्री ढुंढिराज गणेश अन्नपूण्र् ाा मंदिर के पश्चिम गली के दाऐं मोड़ पर विराजमान हैं। गोरखपुर: यहां के प्रसिद्ध मंदिरों में श्री गणेश भगवान का नव प्रतिष्ठित विग्रह दर्शनीय है। बिहार प्रांत के गणेश स्थल बिहारशरीफ: यहां के बड़े मंदिर में अन्य देवताओं के साथ श्री गणेश जी की संगमरमर की बनी हुई एक आकर्षक प्रतिमा है। यहां का दूसरा मंदिर चंदियाह-गण् ोशजी का है। मांझा: यहां हथुआ रेलवे स्टेशन से 3 मील दूर श्री गणेश जी का एक स्वतंत्र मंदिर है। बड़का गांव: सीवान से 3 मील दूर अवस्थित इस गांव में श्री गणेश जी का स्वतंत्र मंदिर है। बडरम: सीवान से लगभग दो मील दूर दक्षिण-पूर्व के कोने पर श्री गणेश जी के विशाल एवं प्राचीन मंदिर के भग्नावशेष हैं। यहां काले पत्थर से गणेश जी की एक विशाल निर्मित प्राचीन मूर्ति है। राजनगर: यह दरभंगा-जयनगर लाइन पर पड़ता है। यहां गणेश जी का अत्यंत भव्य एवं विशाल मंदिर है। बंगाल और आसाम के गणेश स्थल बडनगर (बंगाल): अजीमगंज स्टेशन के पास इस गांव में अनेक देवालय हैं, जिनमें अष्टभुज गणेश का भी एक श्रेष्ठ मंदिर है। गोहाटी (असम): प्रसिद्ध कामाक्षीदेवी के मंदिर में श्री गणेश जी का एक सुंदर विग्रह है। इक्कीस प्रधान गणपति क्षेत्र मोरेश्वर, प्रयाग, काशी, कलम्ब, अदोष, पाली, पारिनेर (धर्म ग्रंथों में इस मंगलमूर्ति क्षेत्र को नर्मदा के किनारे बताया गया है, किंतु इस स्थान का ठीक से पता नहीं है), मंडा-मसले, राक्षस भुवन, थेऊर, सिद्धटेक, राजनगांव, विजयपुर (ग्रंथों में यह स्थान तैलंगदेश में बतलाया गया है, परंतु इस स्थान का निश्चित पता मालूम नहीं है) कश्यपाश्रम (यह क्षेत्र शास्त्रवर्णित है, पर निश्चित स्थान अज्ञात है) जलेशपुर (यह स्थान भी अज्ञात है) लेह्याद्रि, बेरोल, पùलय, नामलगांव, राजूर और कुंभकोणम्। श्री गणेश पूजा श्री गणेश पांच उदाŸा तत्वों के मिश्रित स्वरूप हैं। ये पांच तत्व इस प्रकार हैं: आनंद मंगल, सौर्य साहस, कृषि, वाणिज्य व्यवसाय, बुद्धि। गणेश जी की गणना पंचदेवों में भी होती है। हमारे समस्त कार्यों में शास्त्रीय प्रमाणों के अनुसार पंचदेवों की आराधना विश्व विख्यात है। ज्योतिष के अनुसार जल तत्व राशि वाले लोग अगर श्री गणेश की उपासना करें तो सिद्धि शीघ्र प्राप्त होगी। श्री गणेश की विशेष पूजा: गणपति भगवान की उपासना भी अन्य देवताओं की उपासना के समान ही यथाशक्ति पंचोपचार, दशोपचार, षोडशोपचार अथवा राजोपचार से करनी चाहिए। गणेश अथर्वशीर्ष के अनुसार: रक्तगंधानुलिप्तांगं रक्तपुपैः सुपूजितम्। श्री गणेश को, लाल रंग के वस्त्र लाल रंग के पुष्प और चंदन विशेष प्रिय हैं। अतः श्री गणेश पूजन में विशेषकर लाल रंग का ही प्रयोग करना चाहिए। श्री गणेश को 21 की संख्या प्रिय है इसलिए उनके 21 नामों से विशेष पूजा अर्चना की जाती है। यहां उनके ये 21 नाम और हर नाम के साथ अर्पित की जाने वाली वस्तु का विवरण प्रस्तुत है। नाम वस्तु ¬ सुमुखाय नमः शमी पत्र ¬ गणाधीशाय नमः भंृगराज ¬ उमापुत्राय नमः विल्वपत्र ¬ गजमुखाय नमः दूर्वादल ¬ लम्बोदराय नमः बेर का पत्र ¬ हर पुत्राय नमः धतूरे का पत्र ¬ शूर्पकर्णाय नमः तुलसी का पत्र ¬ वक्रतुण्डाय नमः सेम का पत्र ¬ गुहाग्रजाय नमः अपामार्ग ¬ एकदन्ताय नमः भटकटैया ¬ हेरम्बाय नमः सिंदूर वृक्ष अथवा सिंदूर चूर्ण ¬ चतुर्होत्रे नमः तेज पत्र ¬ सर्वेश्वराय नमः अगस्त का पत्र ¬ विकटाय नमः कनेर का पत्र ¬ हेमतुण्डाय नमः कदली (केला) का पत्र ¬ विनायकाय नमः अर्क (आक) पत्र ¬ कपिलाय नमः अर्जुन पत्र ¬ वटवे नमः देवरारु का पत्र ¬ भालचंद्राय नमः महुए का पत्र ¬ सुराग्रजाय नमः गान्धारी वृक्ष का पत्र ¬ सिद्धि विनायकाय नमः केतकी का पत्र विशेष: ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार गणपति भगवान के पूजन हेतु तुलसी पत्र अर्पित करना पूर्णतः वर्जित है। लेकिन नारद पुराण के अनुसार गणपति जी के शूर्पकण्र् ा एवं गजवक्त्र स्वरूप को तुलसी पत्र अर्पित करने का विधान पूर्णतः युक्ति संगत माना गया है। श्री गणेश के व्रत: एक मान्यता के अनुसार श्री गणेश जी का सर्वप्रथम प्राकट्य जगज्जननी माता पार्वती के यहां माघ कृष्ण चतुर्थी को हुआ था। सर्वदेवमयः साक्षात् सर्वमंगल दायकः। माघकृष्ण चतुथ्र्यां तु प्रादुर्भूतो गणाधिपः।। (शिव धर्म) गणेश जी के चतुर्थी तिथि को जन्म लेने के काण उनके आराधक इस तिथि के आने पर उनका विशिष्ट पूजन-अर्चन, आराधना एवं व्रत करते हैं। प्रत्येक माह की कृष्ण चतुर्थी को गणेश चतुर्थी एवं शुक्ल चतुर्थी को विनायक चतुर्थी कहते हैं। इसके अतिरिक्त प्रत्येक मास की चतुर्थी के अपने विशेष नाम भी हैं। स्कन्द पुराण के अनुसार श्री कृष्ण युधिष्ठिर संवाद में भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी की बड़ी महिमा बताई गई है। इस चतुर्थी तिथि को श्री गणेश जी का जन्म बताया गया है। इस दिन की उपासना से गणपति भगवान अपने उपासकों के संपूर्ण कार्यों को पूर्ण करते हैं। श्री गणेश के विशेष व्रत वट गणेश व्रत: इस व्रत में वट वृक्ष के नीचे बैठ कर पूजा की जाती है। यह उŸाम व्रत कार्तिक शुक्ल चतुर्थी से माघ शुक्ल चतुर्थी तक किया जाता है। तिल चतुर्थी: यह उŸाम व्रत माघ शुक्ल चतुर्थी को किया जाता है। इस व्रत में मात्र तिल के मोदकों (लड्डुओं) का भोग लगता है। इक्कीस दिन का गणपति व्रत: यह व्रत का श्रावण कृष्ण चतुर्थी से श्रावण शुक्ल दशमी तक किया जाता है। इस व्रत में 21 दिन तक श्री गणेश का पूजन होता है। इस व्रत के पूजन में 21 अघ्र्य, 21 प्रदक्षिणा 21 प्रकार के पुष्प फल, 21 दूब और 21 लड्डू (मोदक) श्री गणेश को अर्पित किए जाते हैं। श्री गणेश को दूर्वा अवश्य चढ़ानी चाहिए। जल तत्व से उत्पन्न होने वाले रोगों से बचाव में गणेश उपासना विशेष लाभ पहुंचाती है। राहु के दोषों की शांति के लिए श्री गणेश का पूजन अर्चन करना चाहिए क्योंकि राहु ज्योतिष के अनुसार किसी भी कार्य में बाधा उत्पन्न करता है और बुद्धि को भ्रमित करता है। वहीं श्री गणेश किसी भी कार्य को निर्विघ्नता से पूर्ण कराते हैं एवं बुद्धि को विचलित नहीं होने देते। इसलिए राहु के दोषों के शमन के लिए श्री गणेश का पूजन अवश्य करना चाहिए।



गणपति विशेषांक   जनवरी 2007

भारतीय संस्कृति में भगवान गणेश का व्यक्तित्व अपने आप में अनूठा है. हाथी के मस्तक वाले, मूषक को अपना वाहन बनाने वाले गणेश प्रथम पूज्य क्यों हैं? उनकी आराधना के बिना कार्य निर्विध्न संपन्न होने में संदेह क्यों रहता है? कैसे हुआ

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