तलाक एवं पुनर्विवाह: एक विश्लेषण

तलाक एवं पुनर्विवाह: एक विश्लेषण  

ज्योतिषशास्त्र में बृहस्पति एवं शुक्र को श्रेष्ठ शुभ फलदायक माना गया है। मानसागरी ग्रंथ के अनुसार बृहस्पति या शुक्र केंद्र या त्रिकोण में हो, तो सभी अरिष्टों का नाश हो जाता है। दाम्पत्य जीवन को सुखमय बनाने में भी बृहस्पति एवं शुक्र का सप्तम भाव सप्तमेश पर शुभ प्रभाव महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। स्त्री की जन्म कुंडली में बृहस्पति (पुरुष ग्रह) पति सुख का कारक तथा पुरुष की कुंडली में शुक्र (स्त्री ग्रह) पत्नी सुख का कारक होता है। यदि सप्तम भाव, सप्तमेश एवं पति-पत्नी के कारक ग्रहों (शुक्र एवं बृहस्पति) की कुंडली में शुभ स्थिति हो, तो सुखमय दाम्पत्य जीवन का संकेत देती है। सप्तम भाव, सप्तमेश एवं कारक ग्रहों का पापी ग्रहों से युति या दृष्टि संबंध निश्चित तौर पर दाम्पत्य जीवन में कटुता को जन्म देने वाला होता है। सूर्य, शनि, मंगल एवं राहु (पापी ग्रह) दाम्पत्य जीवन में अलगाव लाने का प्रभाव रखते हैं क्योंकि पापी ग्रहों को पृथकता कारक ग्रह माना गया है। यदि सप्तम भाव इन पापी ग्रहों से पीड़ित अथवा पाप प्रभाव में हो, तो वैवाहिक जीवन कष्टदायक एवं दुखमय होता है। बृहस्पति के बारे में एक मान्यता है कि वह जिस भाव में स्थित होता है, उस भाव का भला नहीं करता (स्थान हानि करोतिजीवः)। अतः बृहस्पति पति सुख का कारक होकर यदि सप्तम भाव में स्थित हो, तो उस फल की हानि करेगा अर्थात् जातका के पति सुख में कमी रहेगी। शुक्र की भी सप्तम भाव में स्थिति अच्छी नहीं मानी गई है। जातक पारिजात ग्रंथ के अनुसार ‘शुक्रे मन्मथराशिगे बलवति स्त्रीणाम् बहूनां पतिः’ अर्थात सप्तम भाव में बलवान शुक्र होने पर जातक के कई पत्नियां होती हैं। सप्तम भाव के दोनों ओर पापकर्तरी योग (पापी ग्रह) होने पर वैवाहिक जीवन कष्टमय होता है। कभी-कभी एक दूसरे के प्रति क्रूर व्यवहार के कारण तलाक की स्थिति बन जाती है। तलाक संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य उदाहरण के रूप में यहां प्रस्तुत हैं। (1) कुंडली 1 में द्वितीय भाव स्थित सप्तमेश बृहस्पति राहु से पीड़ित होकर गुरु चाण्डाल योग बना रहा है। (2) सप्तम भाव पर मंगल की पाप दृष्टि है। (3) मंगल तृतीय एवं अष्टमेश होकर चतुर्थ भाव में बैठकर गृहसुख में कमी ला रहा है। (4) शुक्र पर शनि की तृतीय दृष्टि है। इस प्रकार सप्तम भाव, सप्तमेेश तथा कारक शुक्र तीनों के पाप प्रभाव में होने के कारण जातक के पारिवारिक जीवन में हमेशा तनाव रहा और इस समय स्थित तलाक की है। कुंडली 2 में बुध व शुक्र की युति सातवें भाव में नीच के सूर्य के साथ है और शुक्र अस्त है तथा दशमेश शनि से दृष्ट है। बुध छठे भाव का स्वामी है जो रोग तथा शत्रु का भाव है। बुध तथा शुक्र अत्यंत नजदीक अंशों पर होने से ग्रह युद्ध की स्थिति में हैं। बृहस्पति पति का कारक है जो शनि तथा केतु के साथ एवं राहु से दृष्ट है। इस कुंडली में भी सप्तम भाव, सप्तमेश तथा कारक बृहस्पति तीनों पीड़ित हैं। अतः जातका को शुक्र की महादशा में राहु के अंतर आने पर पति से तलाक लेना पड़ा तथा शुक्र की दशा एवं शनि की अंतर्दशा में दूसरी शादी हुई। वर्तमान समय में पति-पत्नी के साथ-साथ रहते हुए भी दोनों के बीच रोज लड़ाई-झगड़े की स्थिति बनी रहती है। इस जन्मांक में अष्टमेश मंगल की द्वितीय और तृतीय भाव पर दृष्टि भी दाम्पत्य सुख में कमी की द्योतक है। कंुडली 3 में सप्तम भाव पर राहु की दृष्टि है। शुक्र तृतीयेश होकर तृतीय भाव में राहु से पीड़ित है। द्वितीय भाव में स्थित मंगल तथा बृहस्पति अस्त हैं। भाग्येश तथा चतुर्थेश अस्त हैं। चतुर्थ भाव में शत्रुक्षेत्री सप्तमेश तथा षष्ठेश शनि नीचस्थ चंद्र के साथ स्थित हैं। सप्तम से अष्टम भाव में द्विस्वभाव राशि में स्थित मंगल पत्नी विछोह योग बना रहा है। इस कुंडली में सप्तम भाव, सप्तमेश तथा कारक तीनों पीड़ित हैं, अतः बुध की महादशा एवं राहु की अंतर्दशा में पत्नी की मृत्यु हो गई तथा शनि की अंतर्दशा आने पर दूसरी शादी हुई। उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि भाव, भावेश तथा कारक तीनों के पीड़ित होने पर उस भाव का फल दूषित हो जाता है। सप्तम भाव में यही स्थिति दाम्पत्य सुख में कमी तथा तलाक या पुनर्विवाह की स्थिति उत्पन्न करती है। पुनर्विवाह के योग: ज्योतिषशास्त्र के अनुसार दूसरे विवाह को देखने के लिए सप्तम, नवम तथा सप्तम से छठे अर्थात द्वादश भावों पर विशेष विचार करना चाहिए। Û यदि लग्न, सप्तम स्थान और चंद्र लग्न द्विस्वभाव राशि में हों, तो जातक के दो विवाह होते हैं। Û इसी प्रकार लग्नेश, सप्तमेश तथा शुक्र द्विस्वभाव राशि में हों, तो जातक के दो विवाह होते हैं। Û यदि सप्तम और अष्टम में पापी ग्रह हों और मंगल द्वादश स्थान में हो, तो जातक के दो विवाह होते हैं। Û सप्तम स्थान का कारक यदि पापी ग्रह से युत अथवा नीच नवांश अथवा शत्रु नवांश अथवा अष्टमेश के नवांश में हो, तो भी जातक के दो विवाह होते हैं। Û यदि सप्तमेश और एकादशेश साथ हों अथवा एक दूसरे पर दृष्टि रखते हों, तो जातक के कई विवाह होते हैं। प्रेम संबंध के योग: प्रेम संबंध पंचम भाव से देखा जाता है। Û लग्नेश एवं पंचमेश का संबंध (चतुर्विध) प्रेम संबंध का द्योतक होता है। Û पंचमेश तथा सप्तमेश की एकादश भाव में युति भी प्रेम संबंध को बढ़ावा देती है। Û पंचमेश भाव में शुभकर्तरी तथा सप्तम भाव का पापी प्रभाव में होना एवं लग्नेश की पंचम भाव पर दृष्टि यह सारी ग्रह स्थिति प्रेम संबंध को बढ़ावा देती है। ु


प्रेम और विवाह विशेषांक  जनवरी 2007

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