जब हम किसी के प्रणय संबंधों को ज्योतिषीय दृष्टिकोण से देखते हैं तो प्रथमतः पंचम भाव पर विचार करते हैं। इस भाव में उदर गर्भ एवं मस्तिष्क गर्भ होते हैं जिनसे शिशु के जन्म, विचार एवं भविष्य की योजनाओं का विचार किया जाता है। ये जन्म एक सूत्री होंगे या बहुसूत्री यह ग्रहों की स्थिति पर निर्भर करता है। वराहमिहिर कृत जातकाध्याय के अनुसार- पंच सप्तैकादशे यदा च द्रुतोष्णशाः। महोद्वेलनं जातो भवन्ति बहु वितृष्णदाः।। अर्थात पंचम, सप्तम, एकादश भाव में यदि द्रुत (तीव्रगामी) एवं उष्ण ग्रह होते हों, तो जातक के प्रणय-विवाह संबंधों में उद्वेलन होता है और ये ग्रह बहु वितृष्णादायक होते हैं। द्रुतगामी चंद्र, मंगल एवं शुक्र उष्ण ग्रह हैं। इस प्रकार पंचम, सप्तम एवं एकादश भावों में ग्रहों की स्थिति या दृष्टि एक अथवा बहुसंबंध का सृजन करती है। यदि 5, 7 एवं 11 का योग करें (5$7$11 = 23 = 2$3 = 5) तो पुनः एक योग 5 ही आता है। इस प्रकार पंचम गर्भ स्थान ही बहुसंबंधों का मुख्य विचारकेंद्र है। इसकी पुष्टि हेतु एक उदाहरण पर विचार करते हैं: सर्वविदित है कि राजकुमारी डायना उपरोक्त ग्रह स्थिति से प्रेरित होकर बहुसंबंधों के दुश्चक्र में इस तरह फंसी थीं कि उन्होंने राजमहल का सुख भी त्याग दिया था। दूसरा उदाहरण अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बिलक्ंिल्टन का है। लग्न कुंडली में सप्तम भाव पर शुक्र की ओर पंचमाश कुंडली में पंचम भाव पर मंगल की पूर्ण चतुर्थ दृष्टि, सप्तमांश में चंद्र की पंचम स्थिति और उस पर मंगल की पूर्ण दृष्टि बहुसंबंधों का कारण बनी। इस प्रकार वाराहमिहिर का कथन शब्दशः फलित हुआ। निष्कर्षतः चंद्र, मंगल, शुक्र की पंचम, सप्तम एवं एकादश भाव में स्थिति बहुसंबंधों एवं बहुविवाह का कारण होती है।


प्रेम और विवाह विशेषांक  जनवरी 2007

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