श्रद्धा और शक्ति का धाम श्री गर्जिया मंदिर

श्रद्धा और शक्ति का धाम श्री गर्जिया मंदिर  

श्रद्धा और शक्ति का धाम श्री गर्जिया मंदिर पं. डाॅ. सोमेश के. शर्मा व पं. डाॅ. पुनीत शर्मा एक तरफ हरियाली में आच्छादित मन को ठंडक देती विशाल वृक्षों की पंक्तियों से युक्त जंगल, तो दूसरी तरफ बहती कोसी नदी और उसके पीछे नजर आती पर्वतों की विशाल चोटियां, किसी को भी मंत्रमुग्ध कर देने में सक्षम हैं। इसी कोसी नदी के मध्य, एक विशाल टीले पर स्थित है-मां गिरिजा का अदभुत शक्ति संपन्न मंदिर ‘श्री मां गर्जिया’। कहा जाता है कि ‘विश्वासं हि फलदायक’ और यह अक्षरशः सत्य है। यह श्रद्धा ही है, जो सच्ची हो तो भक्त को भगवान के दर्शन हो जाते हैं। ऋषि मुनियों और भक्तों की श्रद्धा के वशीभूत ही भारत की पवित्र भूमि पर अनेक देवी देवताओं ने विभिन्न रूपों में अवतार लिया। देव भूमि उत्तरांचल के नैनीताल जनपद की गर्जिया की देवी उन्हीं में से एक हैं। यह धाम विश्वविख्यात कार्बेट नेशनल पार्क, रामनगर से मात्र 10 कि. मी. की दूरी पर गर्जिया ग्राम में स्थित है। एक तरफ हरियाली से आच्छादित मन को ठंडक देती विशाल वृक्षों की कतारों से भरे जंगल तो दूसरी तरफ बहती कोसी नदी और उसके पीछे नजर आती पर्वतों की विशाल चोटियां किसी को भी मंत्रमुग्ध कर देने में सक्षम हैं। और इसी कोसी नदी के मध्य एक विशाल टीले पर स्थित है मां गिरिजा का अदभुत शक्ति संपन्न मंदिर जिसे श्री मां गर्जिया मंदिर कहते हैं। यह टीला जो कि किसी पर्वत से अलग होकर बह कर आए हुए हिस्से जैसा लगता है, यहां पर काफी समय से स्थित है। इस मंदिर के दोनों ओर जल की धाराएं बहती हैं और कभी-कभी तो इस नदी में बाढ़ की स्थिति भी उत्पन्न हो जाती है। परंतु इसे इस पवित्र स्थल की महिमा ही कहेंगे कि इस शिला खंड तथा इस पर बने मंदिर का उफनती जल तरंगें भी कुछ न बिगाड़ पाईं। गार्जिया माता मंदिर के नाम से प्रख्यात यह मंदिर यों तो बहुत प्राचीन है परंतु इसे सर्वप्रथम पं. रामकृष्ण पांडे जी, जो बर्मा फौज में कार्यरत थे, ने सन 1932 में ढूंढा था। तब यह स्थल बहुत दुर्गम और अगम्य था एवं यहां भयानक जीव जंतुओं का वास था। पं. पूर्ण चंद पांडे, जो वर्तमान में यहां के पुजारी एवं कर्ताधर्ता हैं, बताते हैं कि इस स्थान पर अक्सर शेर, चीते, भालू आदि के दर्शन होते थे जिसके कारण यहां रोज पूजा करना भी एक दुष्कर कार्य था। पर मां की शक्ति के वशीभूत होकर क्या जीव क्या प्रकृति सभी ने मानो अपने स्वभाव को भी बदल दिया। और उसके बाद तो यहां के चमत्कारों व चमत्कारिक प्रभाव के किस्से फैलते गये और देखते ही देखते स्थानीय निवासियों के अतिरिक्त दूर-दूर से श्रद्धालुओं का आना जाना शुरू हो गया। गर्जिया गिरिजा शब्द का अपभ्रंश है। यहां पर मां का यही शृंगार युक्त मोहिनी रूप विराजमान है। मां के चमत्कारों और मन्नतें पूरी होने की गवाह हैं मंदिर के टीले पर उगी हुई घास पर लगी अनगिनत गांठें जिन्हें श्रद्धालु अपनी इच्छापूर्ति हेतु मंदिर में दर्शन करके लगाते हैं। और जब मां इच्छा पूरी कर देती हंै तो वापस आ कर मां की विधिवत पूजा करके प्रसाद आदि चढ़ाकर गांठ खोलते हैं। मंदिर के पुजारी पं. पूर्णचंद्र पांडे जी, जो 14 वर्ष की अवस्था से ही यहां पूजा अर्चना करते आ रहे हैं, बताते हैं कि प्रारंभ में यहां न तो टीले की चोटी पर स्थित मंदिर तक जाने के लिए सीढ़ियां थीं न ही नदी को पार करने की व्यवस्था। परंतु धीरे-धीरे पर्यटकों व स्थानीय निवासियों के सहयोग से मंदिर को सुधारा, सजाया व संवारा गया। वर्तमान में मां के अष्टभुजी शांत स्वरूप विग्रह का दर्शन होता है। इसके साथ-साथ श्री गणेश जी, हनुमान जी, भैरों बाबा व सरस्वती मां के छोटे-छोटे विग्रह भी विराजमान हैं। मंदिर के प्रांगण में ही विशाल यज्ञशाला, धर्मशाला, भंडार गृह आदि का निर्माण कराया गया है। यों तो इस स्थल पर श्रद्धालुओं का हर समय तांता लगा रहता है परंतु हर वर्ष नवरात्र, गंगा स्नान आदि अवसरों पर तो यहां हजारों श्रद्धालु जुटते हैं और भंडारे करते हैं। मां की विलक्षण शक्ति का प्रत्यक्ष आभास मंदिर के प्रांगण में प्रवेश करते ही होने लगता है। मां बड़ी दयालु, और अनन्य कृपालु है। उनसे जिसने जो भी मांगा वही पाया है। इसका प्रमाण यहां आने वाले विदेशियों और सामान्य लोगों तथा बड़ी-बड़ी हस्तियों यथा नारायण दत्त तिवारी, चै. चरण सिंह, के. पी. एस गिल, विवेक ओबराॅय, लारा दत्ता, ईशा देओल, अजय देवगन, जाॅन अब्राहम आदि का श्रद्धा से दर्शन करने आना है। इस स्थान का ऐतिहासक महत्व भी है। यहां मध्यकाल में दसवीं ग्यारहवीं शताब्दी के कत्यूरी राजवंश काल की भगवान श्री लक्ष्मी नारायण जी की प्रतिमा भी स्थापित है जो आज भी बिल्कुल नई लगती है। साथ ही कोसी (कौशिकी) नदी के किनारे स्थित गर्जिया ग्राम में विराटनगर नामक प्राचीन शहर व सभ्यता के अवशेष भी पाए गए हैं। कुला मिलाकर ऐतिहासिक, धार्मिक तथा रोमांचक पर्यटन की दृष्टि से यह स्थल लोगांे को एक अद्धभुत अनुभूति प्रदान करता है।



गणपति विशेषांक   जनवरी 2007

भारतीय संस्कृति में भगवान गणेश का व्यक्तित्व अपने आप में अनूठा है. हाथी के मस्तक वाले, मूषक को अपना वाहन बनाने वाले गणेश प्रथम पूज्य क्यों हैं? उनकी आराधना के बिना कार्य निर्विध्न संपन्न होने में संदेह क्यों रहता है? कैसे हुआ

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