श्रीगणेश के प्रमुख आठ अवतार

श्रीगणेश के प्रमुख आठ अवतार  

श्रीगणेश के प्रमुख आठ अवतार मद्गल पुराण में कहा गया है कि विघ्नविनाशन गणेश के अनेक अवतार हैं। उनका वर्णन सौ वर्षों में भी संभव नहीं है। उनमें कुछ मुख्य हैं। उन मुख्य अवतारों में भी ब्रह्मधारक आठ मुख्य अवतार हैं। उन आठ अवतारों की अत्यंत संक्षिप्त कथा इस प्रकार है- वक्रतुंड कठोर तप किया। उसके तपश्चरण से संतुष्ट होकर भगवान शंकर ने अपनी सहधर्मिणी पार्वती और गणों के साथ उसे दर्शन देकर उसे वर प्रदान किया- ‘तुम्हें किसी से भय नहीं रहेगा।’ फिर क्या था, वर-प्राप्त मत्सरासुर ने अपनी विशाल वाहिनी के साथ पृथ्वी के नरेशों पर आक्रमण कर पृथ्वी और पाताल को अपने अधिकार में लेकर देवलोक पर चढ़ाई कर दी। वरुण, कुबेर और यम आदि देवता पराजित हो गये। फिर उसने अमरावती को घेर लिया। सुरेंद्र भी पराक्रमी असुर के सम्मुख टिक नहीं सके। मत्सरासुर स्वर्ग का अधिपति हुआ। असुरों से त्रस्त ब्रह्मा और विष्णु आदि देवता कैलास पहुंचे। उन्होंने भगवान शंकर से दैत्यों के उपद्रव का वृत्तांत सुनाया। भगवान शंकर ने असुर की निन्दा की। यह समाचार जब मत्सर को प्राप्त हुआ तो वह अत्यंत कुपित होकर कैलस पर जा चढ़ा। त्रिपुरारि ने मत्सरासुर से युद्ध किया, किंतु उस त्रैलोक्यविजयी दैत्य ने भवानीपति को भी पाश में बांध लिया। वह कैलास का स्वामी बनकर वहीं रहने लगा। मत्सरासुर कैलास और वैकुंठ के शासन का भार अपने पुत्रों को देकर स्वयं वैभव-संपन्न मत्सरावास में रहने लगा। उस निष्ठुर असुर का शासन अत्यंत क्रूर था। अनीति और अत्याचार का तांडव होने लगा। दुःखी देवता मत्सरासुर के विनाश का उपाय सोचने के लिये एकत्र हुए। कोई मार्ग न देखकर वे अत्यंत चिन्तित हो रहे थे। उसी समय वहां भगवान् दत्ता त्रेय आ पहुंचे। उन्होंने देवताओं को वक्रतुण्ड के एकाक्षरी मंत्र (गं) का उपदेश देकर उन्हें अनुष्ठान करने के लिये प्रेरित किया। समस्त देवताओं के साथ भगवान पशुपति वक्रतुंड के ध्यान के साथ एकाक्षरी मंत्र का जप करने लगे। उनकी आराधना से संतुष्ट होकर सद्यः फलदाता वक्रतुंड प्रकट हुए। उन्होंने कहा - ‘आपलोग निश्ंिचत हो जाएं। मैं मत्सरासुर का गर्व नष्ट कर दूंगा।’ वक्रतुंड के स्मरणमात्र से गणों की असंख्य सशस्त्र सेना एकत्र हो गयी। वे मत्सरासुर की राजधानी पहुंचे। शत्रु द्वार पर आ गये- यह समाचार पाकर अमर्ष से भरे हुए असुर युद्ध के लिये निकल पड़े। किंतु जब उन्होंने असंख्य गणों की विशाल सेना के साथ महाकाय वक्रतुंड को देखा तो वे अत्यंत भयभीत होकर कांपने लगे। ‘पराक्रमी शत्रु से युद्ध उचित नहीं।’ लौटकर असुरों ने मत्सरासुर से कहा। इस पर त्रैलोक्यविजयी असुर अत्यंत कुपित हुआ। वह स्वयं आक्रमणकारी शत्रु को मिटा देने के लिये समर-भूमि में उपस्थित हुआ। उसके आते ही अत्यंत भयानक युद्ध छिड़ गया। पांच दिनों तक वह युद्ध चलता रहा, किंतु किसी पक्ष की विजय नहीं हो सकी। मत्सरासुर के दो पुत्र थे, सुंदरप्रिय और विषयप्रिय। उन दोनों ने समर-भूमि में पार्वती-बल्लभ को मूच्र्छित किया ही था कि वक्रतुंड के दो गणों ने उन्हें मार डाला। मत्सर छटपटा उठा। पुत्र-वध से व्याकुल मत्सरासुर ने वक्रतुंड का अत्यंत तिरस्कार किया। ‘दुष्ट असुर ! यदि तुझे प्राण प्रिय है तो मेरी शरण आ जा, अन्यथा निश्चय ही मारा जाएगा।’ वक्रतुंड ने कहा। पुत्र-वध से आहत भयाक्रांत मत्सरासुर भयानकतम वक्रतुंड को देखकर विनयपूर्वक उनकी स्तुति करने लगा। उसकी प्रार्थना से संतुष्ट होकर दयामय वक्रतुण्ड ने उसे अपनी भक्ति प्रदान कर दी। प्रलय के अनन्तर सृष्टि-निर्माण में अनेक व्यवधान उत्पन्न होने पर लोक-पितामहने षडक्षरी मंत्र (‘वक्रतुण् डाय हुम्’) का जप करते हुए गणेश को संतुष्ट करने के लिये कठोर तप करना प्रारंभ किया। उनके तपश्चरण से प्रसन्न होकर वक्रतुंड प्रकट हुए और विधाता को अभीष्ट वर प्राप्त हुआ। तदनन्तर वे सृष्टिकार्य में समर्थ हो गये। एकदंत महर्षि च्यवन ने मद की सृष्टि की। मदने महर्षिके चरणों में प्रणाम किया और उनकी अनुमति से वह पाताल में शुक्राचार्य के पास पहुंचा। अपना परिचय देते हुए उसने कहा- ‘‘प्रभो ! मैं आपके भाई महर्षि च्यवन का पुत्र हूं; इस प्रकार आपका भी पुत्र हुआ। मेरा नाम ‘मद’ है। आप कृपापूर्वक मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं ब्रह्मांड का महान् राज्य चाहता हूं। आप मेरी इच्छा पूरी कर दें। शुक्राचार्य ने संतुष्ट होकर मद को शिष्य बनाना स्वीकार कर लिया। और उसे एकाक्षरी विधान से ‘ह्रीं’ शक्तिमंत्र दे दिया। अरण्य में तप करने चला गया। निराहार तपश्चरण सहस्रों वर्ष व्यतीत होने पर उसका अस्थिमात्र-अवशिष्ट शरीर वल्मीकावृत हो गया। उसके चारों ओर वृक्ष उग गए; लताएं फैल गई। असुर के सहस्र वर्षों तक कठोर तप से संतुष्ट सिंहवाहिनी भगवती प्रकट हुई। आदिशक्ति ने उसे सावधान किया तो असुर जगज्जननी के चरणों में गिर पड़ा। उसकी स्तुति से प्रसन्न होकर माता ने उसे इच्छानुसार वर प्रदान किया-‘तुम नीरोग रहोगे और तुम्हें ब्रह्मांड का निष्कंटक अचल राज्य प्राप्त होगा। परमेश्वरी अंतर्धान हो गयीं। मद प्रसन्न मन से घर लौटा। उसने अपने सुंदर नगर को और भी भव्य एवं सुखद बनवाया। तदनंतर उसने प्रसादासुर की कन्या सालसा से विवाह किया। अत्यंत शक्ति-संपन्न मदासुर ने पहले संपूर्ण धरती पर अपना साम्राज्य स्थापित किया। फिर उसने स्वर्ग पर चढ़ाई की। इंद्रादिक देव पराजित हो गये। मदासुर स्वर्ग का शासक हुआ। उस असुर ने शूलपाणि त्रिनेत्र को भी पराजित कर दिया। त्रैलोक्य उसके अधीन हो गया। सर्वत्र असुरों का क्रूरतम शासन चलने लगा। सर्वत्र हाहाकार मच गया। चिंतित देवगण सनत्कुमार के समीप पहुंचे। उन्होंने अपनी व्यथा-कथा सुनाते हुए असुर -विनाश एवं धर्म स्थापना का उपाय पूछा। सनत्कुमार ने कहा- ‘देवगण ! आप श्रद्धा-भक्तिपूर्वक एकदन्त की उपासना करें। वे संतुष्ट होकर अवतीर्ण होंगे और निश्चय ही आपलोगों का मनोरथ पूर्ण होगा।’ सनत्कुमार ने उन्हें एकाक्षरी मंत्र का उपदेश कर एकदन्त ध्यान इस प्रकार बताया- एकदन्तं चतुर्बाहुं गजवक्त्रं महोदरम्। सिद्धिबुद्धिसमायुक्तं मूषकारूढमेव च।। नाभिशेषं सपाशं वै परशुं कमलं शुभम्। अभयं दधतं चैव प्रसन्नवदनाम्बुजम्।। भक्तेभ्यो वरदं नित्यमभक्तानां निषूदनम्। ‘गणेशजी के एक दांत और चार भुजाएं हैं। उनका मुख हाथी के समान है। वे लंबोदर हैं। उनके साथ सिद्धि और बुद्धि भी हैं। वे मूषकपर आरूढ़ हैं। उनकी नाभि में शेषनाग हैं। वे अपने हाथों में पश, परशु, सुंदर कमल और अभय मुद्रा धारण करते हैं। उनका मुखारविंद प्रसन्नता से खिला हुआ है। वे भक्तों के लिए सदा वरदायक और अभक्तों के विनाशक हैं (मैं उनका ध्यान करता हूं)।’ महर्षि के उपदेशानुसार देवगण एकदंत को संतुष्ट करने के लिए उनकी उपासना करने लगे। उन्हें तप करते हुए सौ वर्ष बीत गए, तब मूषकवाहन एकदंत ने देवताओं से कहा- वरं वृणुत।’ देवताओं ने निवेदन किया- ‘प्रभो ! मदासुर के शासन में देवगण स्थानभ्रष्ट और मुनिगण कर्मभ्रष्ट हो गये हैं। आप हमारा विघ्न नष्टकर हमें अपनी भक्ति प्रदान करें। ‘तथास्तु।’ एकदंत ने कह दिया। उधर देवर्षि ने मदासुर के समीप जाकर सूचना दी- ‘ब्राह्मणों ने कठोर तप के द्वारा एकदन्त को प्रसन्न कर लिया। एकदन्त ने प्रकट होकर उनकी इच्छापूर्ति का वरदान दे दिया है। अब वे तुम्हारा प्राण-हरण करना ही चाहते हैं।’ मद अत्यंत कुपित हुआ। वह अपनी विशाल सेना के साथ एकदंत से युद्ध करने चला। मार्ग में एकदंत प्रकट हो गये। ‘यह मूषकारूढ भयानक नर-नाग कौन है?’ भयक्रांत असुर कोलाहल करने लगे। दैत्य डर गये थे। मदासुर ने अपने दूत से कहा- ‘तुम जाकर पूछो, वह विकट नर-नाग कौन है?’ दूत ने एकदंत के समीप जाकर उनके चरणों में प्रणाम कर पूछा- मैं त्रैलोक्याधिपति मदासुर का दूत हूं। मेरे स्वामी आपकी अद्भुत मूर्ति देखकर अत्यंत विस्मित हो गए हैं वे जानना चाहते हैं कि आप कौन हैं, कहां से आ रहे हैं और आपका क्या कार्य है? आप उनका संशय निवारण करें।’ एकदंत ने हंसते हुए कहा- ‘मैं स्वानन्दवासी हूं और अभी स्वानंद से ही यहां मदासुर का वध कर देवताओं को सुख प्रदान करने के लिए आया हूं। तुम अपने स्वामी से कह दो कि वह यदि जीवित रहना चाहता है तो देवतादिकों का द्वेष छोड़कर मेरी शरण में आ जाय, अन्यथा मैं उसका वध अवश्य करूंगा।’ दूतने जब एकदंत का संदेश मदासुर को दिया तो उसे नारदजी की बात स्मरण हो आयी। उसने एकदंत के करकमलों में अमित तेजस्वी परशु और पाश देखा। इतने पर भी महाक्रूर असुर मद युद्ध के लिये प्रस्तुत हो गया। ‘आह ! मदासुर ने अपने धनुष की प्रत्यंचा पर वाण रखा ही था कि तीव्र परशु उसके वक्ष में प्रविष्ट हो गया। असुर पृथ्वी पर गिरा और मुच्छित हो गया। कुछ ही देर बाद सचेत होने पर उसने परशु उठाकर देखना चाहा, पर वह दिव्य अस्त्र उसके हाथ में छूटकर एकदन्त के कर-कमलों में लौट गया।’ आश्चर्यचकित मदासुर ने कुछ देर विचार किया। उसने समझ लिया-‘ये सर्वात्मा, सर्वसमर्थ परमात्मा हैं।’ बस, वह अपना आसुरी- भाव छोड़ दौड़कर प्रभु के चरणों में लेट गया और हाथ जोड़कर स्तुति करते हुए उसने कहा- ‘प्रभो ! आज मुझे आपका दुर्लभ दर्शन प्राप्त हो गया, यह मेरा परम सौभाग्य है। मैं आपकी शरण हूं। आप मुझे क्षमा कर अपनी दृढ़ भक्ति प्रदान करें। ‘जहां दैवी सम्पदा से पूर्ण मेरी पूजा- आराधना हो, वहां तुम मत जाना।’ कहते हुए प्रसन्न एकदन्त ने उससे कहा-‘इसके विपरीत आसुरी-भाव के कर्मों का फल तुम भक्षण करते रहना।’ महोदर प्राचीन काल में तारक नामक अत्यंत दारुण असुर हुआ। वह ब्रह्मा के वरदान से त्रैलोक्य का स्वामी हो गया। उसके शासन काल में देवता और मुनि अत्यंत पीड़ित थे। वे वनों में रहकर अत्यंत कष्ट सहते अपना जीवन व्यतीत करते थे। देवताओं और ऋषियों ने बहुत समय तक शिव और शिवा का ध्यान किया। भगवान् आशुतोष समाधिस्थ थे। इस कारण देवता और मुनियों ने माता पार्वती की शरण ग्रहण की। माता पार्वती अत्यंत रूपवती युवती भीलनी के रूप में शिव के आश्रम में गयीं। से सुगन्धित पुष्पों का चयन करती हुई मोह उत्पन्न कर रही थीं। वे सुगन्धित पुष्पों का चयन करती हुई मोह उत्पन्न कर रही थीं। त्रिनयन की समाधि टूटी। उन्होंने बलात् आकृष्ट करने वाली लावण्यवती को ध्यानपूर्वक देखा ही था कि भीलनी अदृश्य हो गयी। तब शिव के द्व ारा अत्यंत उग्र महान् पुरुष मोह उत्पन्न हुआ। वह अत्यंत सुंदर और मानी था। ध्यान से पार्वती की लीला समझ भगवान् शंकर ने कुपित होकर कामदेव के शरीर को दग्ध कर दिया। शापमुक्त होने के लिए कामदेव ने महोदर की उपासना की। महोदर प्रकट हो गये। प्रसन्न महोदर बोले- ‘मैं शिव के शाप को तो अन्यथा नहीं कर सकता, किंतु तुम्हारे रहने के लिये तुम्हें अन्य देह दे रहा हूं।’ ऐसा कहकर उन्होंने कामदेव को अमरता का वरदान दे दिया। बाद में कामदेव श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न के रूप में प्रकट हुए। गजानन एक बार धनाधिपति कुबेर कैलास पहुंचे। वहां उन्होंने शिवा-शिव का दर्शन किया। अमित सौंदर्यशालिनी परम सती शिवा कुबेर को अपनी ओर लुब्ध-दृष्टि से निहारते देख अत्यंत क्रुद्ध हो गयीं। जगजननी की कोप-दृष्टि से भयभीत कुबेर से लोभासुर उत्पन्न हुआ। यह अत्यंत पराक्रमी और प्रतापी था। लोभाशुर ने दैत्यगुरु शुक्राचार्य के पास जाकर उनके चरणों में प्रणाम किया। आचार्य ने उसे पंचाक्षरी मंत्र (नमः शिवाय) की दीक्षा देकर तप करने के लिये प्रेरणा दी। इस प्रकार दीर्धकाल तक अखंड तप किया उसका शरीर वल्मीक से आवृत हो गया। दिव्य सहस्र वर्षतक तप करने के अनन्तर करुणामय शिव उसके समक्ष प्रकट हुए। और उसे अभीष्ट वर प्रदान करते हुए सबसे निर्भय कर दिया। सर्वथा निर्भय लोभासुर ने प्रमुख दैत्यों को एकत्र कर और पृथ्वी पर अपना एकच्छत्र राज्य स्थापित कर लिया। श्रीविष्णु भी उसके सम्मुख टिक नहीं सकेः पराजित हो गये। ‘विष्णु तथा अन्य देवताओं के रक्षक महादेव हैं- यह सोचकर लोभासुर ने अपना दूत शिव के पास भेजा। दूतने उनसे कहा- ‘आप परम पराक्रमी लोभासुर से युद्ध कीजिए या कैलास उनके लिए रिक्त कर दीजिए।’ भगवान शंकर को उसे अपना दिया हुआ वर स्मरण हो आया और वे कैलास त्यागकर सुदूर अरण्य में चले गए। लोभासुर के हर्ष की सीमा न रही। उसके शासन में समस्त धर्म-कर्म समाप्त हो गये; पापों का नग्न तांडव होने लगा एवं ब्राह्मण और ऋषि-मुनि यातना सहने लगे। देवगण आदि देव गजमुख की आराधना करने लगे। इससे संतुष्ट होकर मूषकारूढ़ गजानन प्रकट हुए। उन्होंने देवताओं को निश्ंिचत करते हुए कहा- ‘मैं लोभासुर को पराजित कर दूंगा।’ तदनंतर गजानन ने शिव को लोभासुर के समीप भेजा। वहां शिव ने असुर से स्पष्ट शब्दों में कहा- तुम गजमुख की शरण ग्रहण कर शांतिपूर्ण जीवन व्यतीत करो, अन्यथा युद्ध के लिए उद्यत हो जाओ।’ इसके अनंतर शिवने लोभासुर को गजमुख-माहात्म्य सुनाया। उसके गुरु शुक्राचार्य ने भी उसे गजानन की शरण लेना कल्याणकर बतलाया। लोभासुर ने गणेश-तत्व को समझ लिया। फिर तो वह परमप्रभु के चरणों की वंदना करने लगा लंबोदर शिव के क्रोध से उनके शुक्र का स्खलन हो गया और उसी से क्रोधासुर की उत्पŸाी हुई। शुक्राचार्य ने उक्त क्रोधासुर का संस्कार कर उसे प्रत्येक रीति से योग्य बनाया फिर उन्होंने शंबर की अत्यंत लावण्यवती पुत्री रीति के साथ उसका विवाह करा दिया। अत्यंत प्रसन्न होकर आचार्य-चरणों में प्रणाम कर हाथ जोड़े असुर ने निवेदन किया।- ‘मैं आपकी आज्ञा प्राप्त कर ब्रह्मांड-विजय करना चाहता हूं, अतएव आप मुझे यश प्रदान करने वाला मंत्र देने की कृपा कीजिये।’ दैत्यों के हितचिंतक शुक्राचार्य ने उसे सविधि सूर्य-मंत्र (घृणि सूर्य आदित्य ओम्) प्रदान किया। क्रोधासुर ने गुरु के चरणों में प्रणाम किया और वह अरण्य में चला गया। वहां वह एक पैर पर खड़ा होकर उक्त सूर्य-मंत्र का जप करने लगा। उसकी दृष्टि ऊपर उठी हुई थी। असुर के दिव्य सहस्र वर्षाें तक तप करने के अनंतर भगवान सूर्य देव प्रसन्न होकर प्रकट हुए और बोले- ‘वरं वृणु।’ क्रोधासुर अत्यन्त प्रसन्न हुआ। उसने तिमिरारिके चरणों में प्रणाम कर विनयपूर्वक वर की याचना की- कि मेरी मृत्यु न हो। मैं संपूर्ण ब्रह्मांड पर विजय प्राप्त कर लूं। आप मुझे चराचर का राज्य प्रदान कीजिए, आरोग्य दीजिए। मैं अद्वितीय सिद्ध होऊं।’ क्रोधासुर के भयोत्पादक वचन सुन अत्यंत विस्मित सूर्यदेव ने उसे वर दे दिया- ‘तुम्हारा अभीष्ट सफल होगा।’ क्रोधासुर अत्यन्त प्रसन्न होकर लौटा। कुछ दिनों बाद उसने अपनी ब्रह्मांड- विजय की यात्रा प्रारंभ की। उसने सहज ही पृथ्वी पर अधिकार कर लिया। फिर वह अमरावती पर दौड़ा। उसके डर से देवगण भागे। इससे स्वर्ग असुर के अधीन हो गया। इसी प्रकार वैकुंठ और कैलास पर भी उस महादैत्य का राज्य स्थापित हुआ। अंततः क्रोधासुर ने अपना दूत भगवान सूर्य देव के पास भेजा। सूर्य देव वर प्रदान कर चुके थे, अतएव दुखी हृदय से उन्होंने सूर्य लोक त्याग दिया। वहां क्रोधासुर का शासन होने लगा। अत्यंत दुखी देवताओं और ऋषियों ने गणेश की आराधना की। इससे संतुष्ट होकर लंबोदर प्रकट हुए। उन्होंने कहा- ‘देवताओ और ऋषियों! मैं क्रोधासुर का अहंकार चूर्णकर उसे नष्ट कर दूंगा। आप लोग निश्चिंत हो जाएं।’ आकाशवाणी से यह संवाद क्रोधासुर ने भी सुना। वह भयाक्रांत हो मूच्र्छित हो गया। चेतना लौटने पर उसके वीर सैनिकों ने उसे समझाया- ‘संपूण्र् ा ब्रह्मांड हमारे अधीन है। आप आज्ञा प्रदान करें, हम किसी भी शत्रु का नाश करने में समर्थ और प्रतिक्षण प्रस्तुत हैं।’ अपने वीर सैनिकों के वचन सुन क्रोधासुर अत्यंत प्रसन्न हुआ। वह अपनी अजेय सेना के साथ समरांगण में पहंुचा। वहां उसने मूषकारुढ़ गजमुख, त्रिनयन, लम्बोदर को देखा। उनकी नाभि में शेष लिपटे हुए थे। लम्बोदर के इस विचित्र स्वरूप को देखकर क्रोधासुर अत्यंत कुपित हुआ। भीषण संग्राम होने लगा। लम्बोदर के साथ देवगण भी असुरों का सर्वनाश करने लगे। उसने लम्बोदर को सम्मुख देखकर कहा- ‘मूर्ख लम्बोदर! तू ब्रह्मांड-विजयी शूर के सम्मुख युद्ध करना चाहता है। तेरी बुद्धि मारी गई है। तू शीघ्र ही मेरी शरण आ जा, अन्यथा मैं तेरा लम्बा उदर एक ही शर से फोड़ दूंगा। भगवान लम्बोदर ने उŸार दिया- ‘अरे दैत्य! तू व्यर्थ क्यों बकता है? मैं तुझ-जैसे खल का वध करने के लिए ही यहां आया हूं। तूने सूर्य के वर के प्रभाव से बड़ा अधर्म किया। पर तेरे अत्यंत पाप से वे सारे शुभ कर्म निष्फल हो गए। अब मैं तेरा और तेरे अधर्मों का नाश कर धर्म की स्थापना करुंगा। अतएव यदि तुम जीवित रहना चाहते हो तो मेरी शरण में आ जाओ। शुक्राचार्य मुझे जानते हैं। तुम तो समझाने पर भी मेरे तत्व को नहीं समझ सकते। न तो मैं दैत्यों के वध का अभिलाषी हूं और न देवताओं का ही वध मुझे प्रिय है। अपने-अपने धर्म में लगे हुए सब लोगों का मैं पालन करता हूं, इसमें संशय नहीं है।’’ क्रोधासुर की शंकाओं का समाधान होते ही वह प्रभु के चरणों में गिर पड़ा। विकट क्षीराब्धिशायी विष्णु जब जलंधर-पत्नी वृंदा के समीप पहुंचे, उस समय उनके शुक्र से अत्यंत तेजवी कामासुर की उत्पŸिा हुई। उसने दैत्यगुरु शुक्राचार्य के यहां जाकर उनके चरणों में श्रद्धापूर्वक प्रणाम किया। दैत्य- शुभाकांक्षी मंत्र की दीक्षा दे दी। उसने वन में देवाधिदेव महादेव को संतुष्ट करने के लिए अन्न, जल और फलादि का सर्वथा परित्याग कर दिव्य सहस्र सर्वों तक कठोरतम तप किया। उस तप से प्रसन्न आशुतोष ने प्रकट होकर उससे वर मांगने के लिए कहा। कामासुर ने कहा आप मुझे अपने चरणों की भक्ति और ब्रह्मांड का राज्य प्रदान कीजिए में बलवान, निर्भय एवं मृत्युजयी होऊं।’ करुणामय शिव ने कहा- ‘यद्यपि तुमने अत्यंत दुर्लभ और देव-दुखद वर की याचना की है, तथापि तुम्हारे कठोर तप से संतुष्ट होकर मैं तुम्हारी कामना पूरी करता हूं।’ कामासुर ने अपने गुरु शुक्राचार्य के समीप जाकर उनके चरणों में प्रणाम किया और फिर उन्हें शिव-दर्शन एवं उनके द्वारा वर-प्राप्ति का वृŸाांत कर सुनाया। उसी समय शुक्राचार्य ने उसे दैत्यराज के पद पर प्रतिष्ठित कर दिया। समस्त दैत्यों ने उसके अधीन रहना स्वीकार किया। वर प्राप्त कामासुर ने कुछ ही समय में त्रैलोक्य पर अधिकार प्राप्त कर लिया। उसने समस्त धर्म-कर्मों को नष्ट कर दिया। विपŸिा से त्राण पाने के लिए समस्त देवता एकत्र हुए। उसी समय वहां योगिराज मुद्गल ऋषि पधारे। देवताओं ने अध्र्य-पाद्य आदि से उनकी आदरपूर्वक पूजा की। और पूछा- हमें कामासुर के विनाश का मार्ग बताइए। मुनिवर मुद्गल ने कहा- ‘आप लोग सिद्ध क्षेत्र मयूरेश में जाकर तप करें। वहां आप लोगों के तप से संतुष्ट होकर स्वयं भगवान गणेश प्रकट होंगे और आप के संकटों का निवारण करेंगे। शिवादि देवता पावनतम मयूरेश-क्षेत्र में पहुंचे। वहां उन्होंने श्रद्धा एवं विधिपूर्वक गणेश की पूजा की। भक्तवत्सल मयूर-वाहन गणेश ने प्रकट होकर कहा- ‘मैं कामासुर का वध कर समस्त देवताओं और मुनियों को निरापद करुंगा।’ मयूरेश ने कहा। आकाशवाणी से यह घोषणा सुनकर कामासुर मूच्र्छित हो गया। कुछ देर बाद विचार-विमर्श कर उसके वीर असुरों ने देवताओं और मुनियों पर आक्रमण कर दिया। देवता और मुनि परम प्रभु मयूरेश को पुकारने लगे। पाश-अंकुशधारी मयूर-वाहन महाविकट गजानन प्रकट हुए। उन्होंने भयानक गर्जना की। ‘मैं कामासुर को नष्ट करुंगा।’ मयूर-वाहन ने कहा और देव-सैनिकों के साथ रहकर युद्धार्थ प्रस्तुत हो गए। अपने प्रबलतम सैनिकों के साथ कामासुर भी पहुंचा। क्रुद्ध होकर कामासुर बोला। उसने प्रभु से कहा- ‘मूर्ख! मैंने त्रैलोक्य को वश में कर दिया है। तेरे वीर देवगण मूच्र्छित पड़े हैं। यदि तू प्राण-रक्षा चाहता है तो यहां से भाग जा।’ हंसते हुए मयूर-वाहन विकट ने उŸार दिया- ‘असुर! तूने शिव-वर के प्रभाव से बड़ा अधर्म किया है। मैं सृष्टि स्थिति-संहारकर्ता एवं जन्म-मृत्युरहित हूं। तू मुझे किस प्रकार मार सकता है? अपने गुरु शुक्राचार्य के उपदेश का स्मरण करके मेरे स्वरूप को समझ। यदि तू जीवित रहना चाहता है तो मेरी शरण आ जा। अन्यथा तेरा संपूर्ण गर्व खर्व होकर रहेगा और तू निश्चय ही मारा जाएगा।’ मयुर-वाहन की वाणी सुनते ही कामासुर अत्यंत कुपित हुआ। उसने अपनी भयानक गदा मयूर-वाहन पर फेंकी, किंतु वह गदा प्रभुवर विकटका स्पर्श न कर पृथ्वी पर गिर पड़ी, यह देख दैत्यराज कामासुर सहसा मूच्र्छित होकर गिर पड़ा। कुछ देर बाद सचेत होने पर उसने अपने अंग-प्रत्यंग में भयानक पीड़ा और अकल्पित अशक्ति का अनुभव किया। कामासुर ने अत्यंत आश्चर्य से अपने मन में सोचा- ‘इस अदभुत देव ने शस्त्र के बिना ही मेरी ऐसी दुर्दशा कर दी और जब शस्त्र का स्पर्श करेगा, तब क्या होगा? युद्ध में तो यह निश्चय ही मुझे मार डालेगा। यह सोच उसने प्रभु विकट से उनके संबंध में अनेक प्रश्न किए और उसका समाधान होते ही वह दयामय मयूर-वाहन विकट की शरण में गया। मूषकध्वर्ज ने उसे अपनी भक्ति प्रदान की। विघ्नराज एक बार की बात है। विवाहोपरांत हिमगिरिनंदिनी अपनी सखियों के साथ बात करती हुई हंस पड़ीं। उनसे हास्य से अत्यंत मनोहर पर्वत-तुल्य एक महान पुरुष उत्पन्न हुआ। उसे देखकर अत्यंत चकित शिवप्रिया ने पूछा- ‘तुम कौन हो, कहां से आए हो और क्या चाहते हो?’ उक्त पुरुष ने अत्यंत विनयपूर्वक उŸार दिया- ‘माता! मैं अभी-अभी आपके हास्य से उत्पन्न हुआ आपका पुत्र हूं। आप आज्ञा प्रदान करें, मैं उसका अवश्य पालन करूंगा।’ माता पार्वती बोलीं- ‘मैं अपने प्राण् ानाथ से मान किए बैठी थी, उस मान की स्थिति में तुमने जन्म लिया है। अतएव मानपरायण तुम्हारा नाम मम (ममता) होगा। तुम जाकर गणेश का स्मरण करो। उनके स्मरण से तुम्हें सब कुछ प्राप्त हो जाएगा।’ माता पार्वती ने ममता को गणेश का षड़क्षर (वक्रतुंडाय हुम्) मंत्र प्रदान कर दिया? ममता ने अत्यंत भक्तिपूर्वक माता के चरणों में प्रणाम किया और फिर वन में तप करने चला गया। वहां उसकी शम्बरासुर से भंेट हुई। पार्वती-पुत्र मम ने उससे पूछा- ‘आप कौन हैं तथा यहां कैसे पधारे हैं?’ शम्बर ने उŸार दिया- ‘महाभाग! मैं तुम्हें विद्या-दान करने आया हूं। उस विद्या से तुम निसंदेह सामथ्र्यशाली हो जाओगे।’ इतना कहकर शम्बर ने ममता को नाना प्रकार की आसुरी विद्याएं सिखा दीं। उन विद्याओं के अभ्यास से ममता कामरुप हो गया। विविध प्रकार की शक्तियों को प्राप्त कर वह बड़ा प्रसन्न हुआ। तब उसने शम्बर के चरणों में प्रणाम कर हाथ जोड़े अत्यंत विनीत स्वर में कहा- ‘महाभाग! आपने मुझ पर अद्भुत कृपा की है। अब मैं आपका शिष्य हूं। आज्ञा प्रदान कीजिए, मैं क्या करुं?। शम्बर ने ममता को समझाया- ‘अब तुम महान शक्ति की प्राप्ति के लिए विघ्नराज की उपासना करो। उनके प्रसन्न होकर प्रकट होने पर उनसे सम्पूर्ण ब्रह्मांड का राज्य और अमरता के वर के अतिरिक्त अन्य कुछ मत मांगना। वर प्राप्त कर तुम मेरे पास चले आना।’ इतना कहकर शम्बर प्रसत्रतापूर्वक अपने घर चला गया और मम वहीं बेठकर कठोर तप करने लगा। वह केवल वायु पर निर्भर रहकर गजमुख का ध्यान एवं उनके मंत्र का जप कर रहा था। इस प्रकार उसे तप करते हुए दिव्य सहस्र वर्ष बीत गए। प्रसन्न होकर गणनाथ प्रकट हुए। उन्होंने ममता से कहा- ‘मैं तुम्हारे कठोर तप से अत्यंत प्रसन्न हूं। तुम इच्छानुसार वर मांग लो।’ परम प्रभु गजानन की वाणी सुनकर ममता के नेत्र खुले और जब उसने विघ्नेश्वर गजवक्त्र का दर्शन किया तो आनंद-विभोर हो गया। उसने विघ्नराज के चरणों में प्रणाम कर अत्यंत भक्तिपूर्वक उनकी पूजा की और फिर गदद कंठ से स्तुति करने लगा। अंत में वर-याचना करते हुए उसने कहा- ‘वरदाता प्रभो! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो कृपया पूर्वक मुझे ब्रह्मांड का राज्य प्रदान करें, युद्ध में मेरे सम्मुख कभी विघ्न उपस्थित न हों। मैं शंकर आदि से भी सदा अजेय रहूं। विघ्नराज बोले- ‘दैत्येन्द्रनायक! तुमने दुस्साध्य वर की याचना की है, किंतु तुम्हारे तप से संतुष्ट होकर मैं तुम्हारी कामना पूरी करूंगा।’ वर-प्राप्त ममतासुर ने प्रसन्नतापूर्वक शम्बर के घर जाकरसारा वृŸाांत सुनाया। उसने उससे अपनी रूपवती पुत्री मोहिनी का विवाह कर दिया। एक दिन ममासुर ने शुक्राचार्य से ब्रह्मांड विजय की इच्छा व्यक्त की। दैत्यगुरु ने कहा- ‘राजन्! तुम दिग्वजय तो करो, किंतु विघ्नेश्वर का विरोध कभी मत करना। स्मरण रखना, विघ्नराज के अनुग्रह से ही तुम्हें यह शक्ति एवं वैभव की प्राप्ति हुई है। उसने अपने वीर पुत्रों एवं परम पराक्रमी सैनिकों के द्वारा पृथ्वी और पाताल पर अधिकार कर लिया। फिर उसने स्वर्ग पर आक्रमण किया। वज्रायुध के साथ भयानक संग्राम हुआ। रक्त की सरिता प्रवाहित हो चली, किंतु वर-प्राप्त असुर के सामने देवगण टिक न सके। स्वर्ग ममासुर के अधीन हो गया। ममासुर ने समर क्षेत्र में विष्णु और शिव पर विजय प्राप्त कर ली। संपूर्ण ब्रह्मांड पर उस महासुर का निरंकुश शासन व्याप्त हो गया। देवगण बंदी-गृह में पड़े। सर्वत्र अनीति और अनाचार का साम्राज्य छा गया। ममासुर के कारागार में पीड़ित देवता एक होकर अपनी मुक्ति का उपाय सोचने लगे। लक्ष्मीपति विष्णु ने कहा- ‘हम सभी मिलकर विघ्नेश्वर की आराधना करें। समस्त देवताओं ने मंत्र-स्नानकर विघ्नेश्वर की मानसिक पूजा की। फिर वे एकाक्षरी-विधान से भक्तिपूर्वक उनका स्मरण करने लगे। एक वर्ष व्यतीत होने पर भाद्र-शुक्ल चतुर्थी के मध्याह्न में शेष-वाहन विघ्नराज प्रकट हुए। संतुष्ट गणनाथ देवताओं को अभीष्ट वर प्रदान कर अदृश्य हो गए। उसी समय फिर देवर्षि ने वहां पहुंच असुर से कहा- ‘‘मुझे विघ्नराज ने भेजा है। व े सवातर्् मा, सवर्स मथर्, धमर्- पालक एवं अधर्म के शत्रु हैं। उन्हीं के वर से तुम शक्तिमान हुए हो। अब तुम्हारे अपकर्मों से देवगण बंदी गृह में यातना पा रहे हैं। अतएव विघ्नेश्वर ने आज्ञा दी है कि तुम इस अधर्म और अनाचार को समाप्त कर तुरंत मेरी शरण आ जाओ, अन्यथा तुम्हारा सर्वनाश निश्चित है।’’ लेकिन मदोमŸा ममासुर पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। वह युद्ध के लिए प्रस्तुत हो गया। महर्षि नारद से यह संवाद पाकर परम प्रभु गणेश ने कहा- ‘मैं ममासुर का दर्प दलन करुंगा।’ ममासुर अपने दोनों पुत्रों एवं अजेय वाहिनी के साथ पृथ्वी को कम्पित करता हुआ युद्ध के लिए नगर के बाहर निकला। मŸा एवं निरंकुश दानव मम की दुष्टता देखकर विघ्नराज कुपित हुए। उन्होंने अपना कमल असुर सैन्य के बीच छोड़ दिया। उक्त पझ-गंध से समस्त असुर सर्वथा अशक्त एवं मूच्र्छित हो गए। ममासुर आधे पहर तक मूच्र्छित रहा। सचेत होने पर उसने अपने समीप कमल देखा तो कांपने लगा। वह विघ्नराज के चरणों पर गिर पड़ा। धूम्रवर्ण एक बार लोक-पितामह ने सहस्रांशु को कर्मराज्य के अधिपति के पर सविधि अभिषिक्त किया। राज्य-पद प्राप्तकर सूर्यदेव के मन में अहंकार उदय हो गया। वे सोचने लगे- ‘कर्म के प्रभाव से पितामह सृष्टि-रचना करते हैं, कर्म से ही विष्ण् ाु जगत का पालन करते हैं, कर्म के द्वारा शिव संहार करते हैं और कर्मों के ही फलस्वरूप शक्ति जगत की पालिका और पोषिका हैं। निसंदेह संपूर्ण जगत कर्माधीन ही है और मैं उन कर्माें का संचालक देवता हूं। सभी मेरे अधीन हैं।’ यह सोचते ही उन्हें छींक आ गयी और उससे एक महाबलवान् महाकाय, विशालाक्ष सुंदर पुरुष उत्पन्न हुआ। वह सर्वांग-सुंदर पुरुष विद्वान् शुक्राचार्य के समीप पहुंचा। शुक्राचार्य ने उसका परिचय पूछा। उक्त पुरुष ने विनीत स्वर में उŸार दिया- ‘प्रभो! मैं सूर्य देव की छींक से उत्पन्न उनका पुत्र हूं! मैं धरती पर सर्वथा अनाथ हूं। मैं आपके अधीन रहना चाहता हूं। और आपकी प्रत्येक आज्ञा का पालन करूंगा। उस मनोरम पुरुष के वचन सुन शुक्राचार्य कुछ देर के लिए ध्यानावस्थित हुए। फिर उन्होंने कहा- ‘तुम्हारा जन्म सूर्य के अहं-भाव से हुआ है, इस कारण तुम्हारा नाम ‘अहम’ होगा। तुम तपश्चरण के द्व ारा भक्ति अर्जित करो। ‘अहम’ वन में जाकर उपवास करता हुआ गणेश के ध्यान के साथ गुरुप्रदŸा मंत्र का जप करते। दृढ़ निश्चय के साथ तप करता रहा। इस प्रकार कठोर तप करते हुए उसे दिव्य सहस्र वर्ष व्यतीत हो गए। उसके समक्ष भक्तवत्सल मूषक-वाहन, त्रिनेत्र, गजवक्त्र, एकदन्त, शूपकर्ण, पाशादिसे सुभोभित चतुर्भुज महोदर प्रकट हुए। और कहा- ‘मैं तुम्हारे तप और स्तवन से प्रसन्न हूं। तुम इच्छित वर मांग लो।’ अहम् ने हाथ जोड़कर निवेदन किया- प्रभो! आप मुझे अपनी भक्ति दीजिए। मेरी सभी कामनाएं पूर्ण हो जाएं। आप मुझे आरोग्य, विजय, अमोघास्त्र और संपूण्र् ा ब्रह्मांड का राज्य प्रदान करें। माया-विकार से मेरी मृत्यु न हो।’ ‘तथास्तु!’ कहकर गणनाथ अंतर्धान हो गए। उस समय हर्षोंत्फुल्ल असुरों ने वाद्यादि के साथ अद्भुत महोत्सव मनाया। विषय-प्रिय नामक सुंदर नगर निर्मित हुआ। अहम वहां असुरों के साथ निवास करने लगा। कुछ समय बाद एक दिन अहम के श्वशुर प्रमादासुर की प्रेरणा से गुरु शुक्राचार्य का आशीर्वाद लेकर ब्रह्मांड विजय को निकल पड़ा। पृथ्वी पर अधिकार कर उसने पाताल पर आक्रमण किया। परम प्रतापी अहंतासुर से भयभीत शेष ने उसे कर देना स्वीकार कर लिया। फिर उस असुर ने स्वर्ग पर आक्रमण किया। स्वयं विष्णु रणभूमि में उपस्थित हुए, किंतु वर-प्राप्त असुर के अमोघास्त्र से उन्हें भी पराजित होना पड़ा। सर्वत्र अहंकारासुर का आधिपत्य हो गया। दुरात्मा असुरों ने देवताओं को अतिशय पीड़ित करने के लिए पर्वतों और अरण्यों को नष्ट करना प्रारम्भ कर दिया। अहम् ने देवालयों से गणेशादि की प्रतिमाएं फेंकवा दीं अैर उनके स्थान पर अपनी मूर्ति स्थापित करायी। उनके पूजक भी अहम के अन्यतम श्रद्धालु असुर नियुक्त हुए। इस प्रकार सभी घरों में आसुरी कर्मोंे की प्रवृŸिा एवं अहंतासुर की उपासना होने लगी।



गणपति विशेषांक   जनवरी 2007

भारतीय संस्कृति में भगवान गणेश का व्यक्तित्व अपने आप में अनूठा है. हाथी के मस्तक वाले, मूषक को अपना वाहन बनाने वाले गणेश प्रथम पूज्य क्यों हैं? उनकी आराधना के बिना कार्य निर्विध्न संपन्न होने में संदेह क्यों रहता है? कैसे हुआ

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