विवाह में मुहूर्त का महत्व

विवाह में मुहूर्त का महत्व  

ज्योतिषीय दृष्टिकोण से कुंडली मिलानी चाहिए या नहीं। ऐसे कुछ प्रश्न आज हमारे सामने हैं जिन्हें लेकर हम तथा समाज दुखी है ऐसा क्यों? आइए कारण ढूंढ़ते हैं। कुंडली मिलान करने के पश्चात शादी की तारीख पक्की की जाती है। एक तो ज्यादातर शादी की तारीख हम अपनी मर्जी से तय करना चाहते हैं यह गलत परंपरा है जो दिन तारीख शुभ हो और शादी का समय अर्थात लामा फेरे का समय हो उसे ही चुनना चाहिए। अधिकतर देखा गया है पंडित जी दिन तारीख व शादी फेरों का समय निश्चित कर देते हैं और सामने वाला जातक भी शादी मुहूर्त से संतुष्ट हो घर आ कर तैयारियां करनी शुरु कर देते हैं। शादी का दिन आ जाता है और दुल्हा दुल्हन ब्युटी पार्लर के यहां जा कर सजने संवरने बैठ जाते हैं और उन्हें यह ध्यान नहीं रहता कि माता-पिता ने शादी मुहूर्त में समय फिक्स कर दखा है हमें वहां समय पर उपस्थित रहना चाहिए। बच्चे हमेशा देरी करते हैं और शादी मुहूर्त निका जाता है अशुभ समय में फेरे डालते हैं और अरिष्ट उत्पन्न हो जाता है यह पहली गलती है। शादी होने के बाद घर से डोली विदा होने का भी मुहूर्त होता है उसका पालन तो बिल्कुल नहीं होता। चलिए मान लेते हैं यह संभव नहीं है क्योंकि परिस्थिति दूसरों के हाथ में हाती है। प्रत्येक लड़की वाला चाहता है कि जल्दी से जल्दी लड़की विदा हो और इस कार्य को समाप्त किया जाए। परंतु लड़की का प्रथम बार अपने पति के घर में गृह प्रवेश तो हमारे हाथ में है। गृह प्रवेश हमेशा प्रातःकाल या सांयकाल तारों की छाया में होता है। ब्रह्म मुहूर्त या गोधुली बेला का समय इस कार्य के लिए उŸाम होता है। इसलिए इस नियम का पालन किया जा सकता है। यदि लड़की की डोली दिन में आती है तो उन्हें कहीं रास्ते में धर्म स्थान या अपने नजदीकी के घर पर परिवार के इस्ट मित्रों के साथ कुछ घंटों के लिए ठहराया जा सकता है। परंतु ऐसा नहीं होता है और किसी भी टाइम पर वधु के साथ गृह प्रवेश कर लेते हैं और अरिष्ट पैदा कर लेते हैं यह दूसरी गलती हुई। जब शादी का समय आ जाता है और एक सप्ताह पहले ही शादी की रस्म अदा करना शुरू हो जाता है। हम शादी से पहले अपने घर में अपने मित्रों को देवताओं को अपने इष्ट देव को आमंत्रित करते हैं। यहां तक कि सबसे पहला शादी का निमंत्रण गणेश जी, माता वैष्णो देवी या जिसमें हमारी श्रद्धा है उसे डालते हैं और घर में आकर शादी में शामिल होने तथा विवाह कार्य को अच्छी तरह से पूरा होने के लिए प्रार्थना करते हैं। परंतु जब शादी हो जाती है और नव वधु घर में आ जाती है उस समय भी हमें अपने देवताओं के पास एक रात गुजारनी पड़ती है। माता बेटा-बहू को अपने पास देवताओं के सामने जमीन पर सुलाती है और प्रार्थना करती है - हे देवताओं, दोनों बच्चे आपकी शरण में हैं आप घर में मौजूद हैं इन्हें ऐसा आशीर्वाद दो कि इनकी जोड़ी हमेशा सुखी रहे। और प्रातः काल फिर देवताओं को विधि पूर्वक हमें विदा करते हैं और शुभ वार वेला मुहूर्त में दोनों बच्चों को मिलने देते हैं। इस नियम का कौन कितना पालन करता है। यह हमारी तीसरी सबसे बड़ी गलती हुई। हमने देवताओं को बुलाया जरूर परंतु उन्हें आदर पूर्वक विदा नहीं किया। शादी के बाद हम भूल जाते हैं कि हमने देवताओं को भी बुलाया था उन्हें आदर सहित वापस अपने अपने लोक को भेजना है। यह सबसे बड़ी गलती होती है। देवता हमें शाप देकर जाते हैं और शादी के कुछ दिन बाद ही आपस में झगड़ा शुरू हो जाता है। इसमें कसूर किसका है? आजकल एक सबसे बड़ी गलती हम करते हैं कि मुहूर्त ही नहीं देखते। अपनी मर्जी से सुविधानुसार शादी कर लेते हैं। वे प्रेम विवाह की वजह हो या अन्य कारण परंतु जब समय ठीक देखा मित्रों के साथ किसी मंदिर में या होटल में शादी कर लेते हैं। यह सबसे बड़ी गलती करते हैं। यदि मुहूर्त की जरूरत ही नहीं हेै तो हमारे ऋषियों ने शास्त्रों का निमार्ण क्यों किया। वेद में प्रत्येक हिंदू धर्म को मानने वाले की श्रद्धा है। हम उनका सम्मान करते हैं परंतु यदि हम सब कुछ अपनी मर्जी से करेंगे तो धर्म वेद का अपमान होगा और हमें अरिष्ट से गुजरना पड़ेगा। हमें अपने रीति-रिवाज, धर्म, माता-पिता की कुर परंपरा का सम्मान करनाचाहिए हम यदि अपनी मर्जी से कभी भी शादी करेंगे तो सबसे पहले माता-पिता का शाप का सामना करता पड़ेगा। यदि माता-पिता किसी कारण इजाजत भी देते हैं तो शास्त्रों के अपमान का सामना करना पड़ेगा। अपने मित्रों के शाप का सामना करना पड़ेगा। इस तरह हमने सबसे बड़ी पांचवी गलती और दाम्पत्य सुख से हाथ धोना पड़ा। अब आप खुद सोचिए यदि हमारे बच्चों में आपस में नहीं बनती है या परिवार के साथ नव दंपŸिा पुत्र वधु की नहीं बनती है तो हमने अपने पूर्वजों के द्वारा दिए गए रीति रिवाजों का कितना पालन किया। हम अपने रीति रिवाजों का पूरा पालन नहीं करते हैं इसीलिए हमें तलाक या अन्य कष्ट का सामना करना पड़ता है।


प्रेम और विवाह विशेषांक  जनवरी 2007

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