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कस्पल कंुडली में कस्पल लिंकेज/योग किस प्रकार स्थापित होते हैं? पाठकों अब एक उदाहरण कंुडली की सहायता से हम यहाँ समझने का प्रयत्न करेंगे कि कस्पल कुंडली में कस्पल इन्टरलिंक या कस्पल योग किस प्रकार स्थापित होते हैं? उदाहरण कुंडली संख्या 1, एक ऐसे जातक की है जिसका जन्म 07 नवम्बर 1980 को मध्य रात्रि 02.15.48 बजे दिल्ली के रेखांश/अक्षांश 77.14 पूर्व/28.34 उत्तर पर हुआ है। इस कुंडली का बर्थ टाईम रेक्टिफिकेशन (जन्म समय का शुद्धिकरण) कर दिया गया है। जब इस पुरूष जातक का जन्म हुआ उस समय सिंह लग्न 23 डिग्री 6 मिनट और 24 सेकेण्ड पर उदय हो रहा था और इसके लग्न को सूर्य-शुक्र-शनि-चन्द्र ग्रह को रूल (लग्न के सहशासक ग्रह) कर रहे थे यानि कि लग्न का राशि स्वामी सूर्य, लग्न का स्टार लाॅर्ड शुक्र, लग्न का सब लाॅर्ड शनि और सब सब लाॅर्ड चन्द्र है। इसी लग्न के अनुसार बाकी बची 11 कस्पल पोजीशन्स की भी स्थापना हो गई है इसी प्रकार बाकी बची 11 कस्पल पोजीशन्स को भी चार ग्रह को रूल (सह शासक) कर रहे हंै जिस प्रकार चार ग्रहों सूर्य-शुक्र-शनि-चन्द्र ने लग्न को को रूल किया है। इसको आमतौर पर बोलने की भाषा भी बहुत सरल है। अगर आप सातवीं कस्पल पोजीशन को रूलिंग ग्रह को जानना चाहें तो आप सीधे तौर पर कह सकते हैं शनि-गुरु-शनि-चन्द्र, 7वें कस्प के रूलिंग (सह शासक ग्रह) प्लेनैट हैं। इसी प्रकार 10वें कस्प के रूलिंग ग्रह होंगे शुक्र-चन्द्र-शुक्र-बुध। जैसा कि हम पहले भी बता चुके हैं कि अगर हमें लग्न भाव का संकेत/ प्रोमिस पढ़ना है तो हमें लग्न के सब सब लाॅर्ड का अध्ययन करना पड़ेगा, अगर हमंे 10वें कस्प/भाव का प्रोमिस पढ़ना है तो हमें 10वें भाव के सब सब लाॅर्ड का अध्ययन करना होगा। वह विशिष्ट सब सब लाॅर्ड स्टार, सब और सब सब लेवल के अतिरिक्त पोजीशनल स्टेटस लेवल पर किस प्रकार लिंकेज स्थापित करता है उसी स्थापित लिंकेज के अनुसार ही जातक को फल मिलना है। प्रस्तुत उदाहरण कुंडली में अगर हमें सूर्य ग्रह का प्रोमिस पढ़ना है तो हम इस प्रकार लिखेंगे सूर्य गुरु-गुरु-शुक्र सूर्य को हमने ग्रहों की स्थिति वाले चार्ट में देखा, हमने देखा सूर्य, गुरु के नक्षत्र (विशाखा), गुरु के ही सब (उप) में और शुक्र के सब सब (उप उप) में है। ऊपर आपको बताया गया है कि हर एक ग्रह अपने नक्षत्र स्वामी ग्रह का फल प्रदान करता है तो यहाँ सूर्य को गुरु के माध्यम से फल देना है परन्तु इस उदाहरण कुंडली में स्वयं सूर्य का भी पोजीशनल स्टेटस है। इस प्रकार सूर्य अपना और अपने नक्षत्र स्वामी गुरु का स्टार लेवल पर फल देने में सक्षम हो जाता है। अब हमंे नीचे कस्पल पोजीशन चार्ट में यह देखना है कि गुरु 1 से लेकर 12वीं कस्पल पोजीशन्स में से किन-किन कस्पल पोजीशन्स में या कस्प में प्रकट हो रहा है। इसे हम स्टेलर स्टेटस लेवल बोलते हैं। अब आपको यह सुनिश्चित करना है कि गुरु कहाँ बैठा है (भाव चार्ट में) और कौन-कौन से कस्प में मौजूद है। गुरु तीसरी कस्पल पोजीशन में स्टार लाॅर्ड और सब लाॅर्ड के रूप में प्रकट हो रहा है। गुरु 5वीं क. पो में राशि स्वामी के रूप में 6ठी क. पो. में सब सब लाॅर्ड के रूप में 7वीं क. पो में स्टार लाॅर्ड के रूप में, 8 वीं क.पो में राशि स्वामी के रूप में, 9 वीं क. पो में सब लाॅर्ड के रूप में, 11वीं कपो. में स्टार लाॅर्ड के रूप में,12वीं क. पो. में सब सब लाॅर्ड के रूप में प्रकट होने के अलावा गुरु लग्न भाव में बैठा भी है। इस प्रकार सूर्य इस कुंडली में गुरु के माध्यम से (स्टैलर लेवल पर) पहले, तीसरे, पाँचवें, छठे, सातवें, आठवें, नवंे, ग्याहरवें और बारहवंे भावों के फल देने में सक्षम हो जाता है यानि कि सूर्य, इन्वोल्वमेंट लेवल पर गुरु के माध्यम से ऊपर लिखित भावों का सिगनिफिकेटर बन गया है। अब इस केस में सूर्य को भी पोजीशनल स्टेटस मिला हुआ है। अगर किसी ग्रह को पोजीशनल स्टेटस मिल जाता है तो उस विशिष्ट ग्रह को भी बिल्कुल उसी प्रकार से 1 से लेकर 12वीं कस्पल पोजोशन्स में देखें जिस प्रकार आपने गुरु को देखा था तथा सूर्य किस भाव में बैठा वह भी पढ़ना है। सूर्य पहले कस्प में राशि स्वामी के रूप में प्रकट होने के अलावा किसी भी क. पो में प्रकट नहीं हो रहा, सूर्य तीसरे भाव में बैठा है इसलिये सूर्य स्वयं पहले और तीसरे भाव के फल देने में सक्षम है। सूर्यह्न गुरु-गुरु-शुक्र, सूर्य, गुरु ग्रह के स्टार में गुरु के ही सब और शुक्र के सब सब में है तथा हमने देखा सूर्य का इस उदाहरण कंुडली में पोजीशनल स्टेटस है तथा सूर्य स्वयं पहली कस्पल पेाजीशन और तीसरे भाव में बैठने से पहले और तीसरे भाव का फल प्रदान करेगा। अब सूर्य ने स्टेलर यानि कि स्टार लेवल यानि कि इन्वोल्वमेंट लेवल पर गुरु के माध्यम से पहले, तीसरे, 5वें, 6ठे, 7वें, 8वें, 9वंे, 11वें और 12वें भावों/कस्पों के फल प्रदान करेगा। इस प्रकार सूर्य की दशा (दशा, भुक्ति, अन्तरा, सूक्ष्म, प्राण दशा) में इस जातक को ऊपर लिखित भावों के फल मिलने है उफपर लिखित भावों के फल हाँ में होंगे या न में, पोजीटिव होंगे या नेगेटिव यह बतलायेगा ग्रह का सब लाॅर्ड और अन्तिम पुष्टिकरण या फाईनल कनफरमेशन करेगा ग्रह का सब सब लाॅर्ड। इस केस में सूर्य का सब लाॅर्ड गुरु ही है और सब सब लाॅर्ड शुक्र। अब एक जरूरी सूत्र को समझंे। जहाँ हमने कहा कि किसी भी ग्रह का सब लाॅर्ड कमिटमेंट करता है तथा सब सब लाॅर्ड फाईनल कनफरमेशन करेगा। कस्पल ज्योतिष का यह एक सुवर्णिम सिद्धांत है कि स्टार लेवल यानि कि (1) इन्वोल्वड हुए भाव से सब लाॅर्ड (कमिटमेंट) की पोजीशन अगर 1, 3, 5, 9, 11 वीं पोजीशन्स हैं तो यह फेवरेबल (ंिअवनतंइसमद्ध पोजीशन है (2) इन्वोल्वड हुए भाव से सब लाॅर्ड (कमिटमेंट) की पोजीशन अगर 4, 7, 8, 12 वीं पोजीशन है तो यह अनफेवरेबल ;नदंिअवनतंइसमद्ध पोजीशन है तथा (3) इन्वोल्वड हुए भाव से सब लाॅर्ड (कमिटमेंट) की पोजीशन अगर 2, 6, 10वीं पोजीशन है तो यह न्यूट्रल ;छमनजतंसद्ध पोजीशन कहलाती है। आईये अब इसे विस्तार से समझें। हमने ऊपर कहा कि इन्वोल्वड हुए भाव से 1, 3, 5, 9, 11वीं पोजीशन, फेवरेबल (अनुकूल) पोजीशन है तात्पर्य यह पोजीशन, सम्बद्ध हुए भाव की सिगनिफिकेशनस (अभिप्राय/शक्ति) में वृद्धि करेगी। मान लीजिये अगर स्टार लेवल पर छठा भाव इन्वोल्व हुआ और सब लेवल यानि कि कमिटमेंट लेवल पर ग्रह 8वें कस्प में प्रकट हो जाय तो यह 6ठे भाव की सिगनिफिकेशन में वृद्धि करेगा क्योंकि 6ठे भाव से 8वें भाव की पोजीशन तीसरी है। अगर हम 6ठे भाव को बीमारी का लें तो उस विशिष्ट ग्रह की दशा में उस जातक की बीमारी और बढ़ने वाली है क्योंकि 6ठे से 8वां भाव गुणात्मक भाव भी है और दोनों बीमारी के भाव भी हैं यानि कि उस जातक की साधारण बीमारी सर्जरी या सीरियस बीमारी में बदलने वाली है इसी विचार को एक और उदाहरण से देखिये। मान लीजिये स्टार लेवल यानि की इन्वोल्वमेंट लेवल पर 7वें भाव की इन्वोल्वमेंट हो गई और सब लेवल यानि कमिटमेंट लेवल पर 5वें और 11वें भाव/कस्प से प्रतिबद्ध ता (कम्मिटमैंट) हो जाती है तो इसका तात्पर्य यह है कि 7वें भाव की सिगनिफिकेशन में वृद्धि हो गई है क्योंकि सातवें भाव से 5वें भाव की पोजीशन 11वीं है और 7वें भाव से 11वें भाव की पोजीशन 5वीं है। तात्पर्य इस विशिष्ट ग्रह की दशा में जातक का विवाह बड़े ही प्रेम पूर्वक ढंग से सम्पन्न हो जायेगा बिना किसी रूकावट के क्योंकि 7वें भाव से ये दोनों भाव 5वाँ और 11वाँ फेवरेबल (सहायक) पोजीशन पर है तथा 7वें (विवाह भाव) के लिये 5वाँ और 11वाँ भाव प्रासंगिक ;त्मसअमदजद्ध भाव भी है। अगर कहीं 7वें भाव की इन्वोल्वमेंट होने और 6ठे भाव से कमिटमेंट होने पर 7वें भाव के फल विवाह के लिये नेगेटिव हो जायेंगे। तात्पर्य इस दशा में जातक का सबंध विच्छेद हो जायेगा। अगर ग्रह का सब सब लाॅर्ड भी फाईनल कनफरमेशन 6ठे भाव में प्रकट होकर दे तो। और कहीं 7वें भाव से इन्वोल्वमेंट होकर 7वें भाव से 2री, 6ठी या 10वीं पोजीशन्स पर सब लाॅर्ड यानि कमिटमेंट और फाईनल कनफरमेशन लेवल पर ग्रह प्रकट हो जाय तो वह न्यूट्रल माना जायेगा क्योंकि 2री, 6ठी और 10वीं पोजीशन्स इन्वोल्वड हुए भाव से न्यूट्रल पोजीशन्स हैं। यह इवेंट को होने देगी बिना किसी बाधा के। लेकिन ये लिंकेज सपोर्ट भी ज्यादा नहीं करेगी।

रत्न विशेषांक  जुलाई 2016

भूत, वर्तमान एवं भविष्य जानने की मनुष्य की उत्कण्ठा ने लोगों को सृष्टि के प्रारम्भ से ही आंदोलित किया है। जन्मकुण्डली के विश्लेषण के समय ज्योतिर्विद विभिन्न ग्रहों की स्थिति का आकलन करते हैं तथा वर्तमान दशा एवं गोचर के आधार पर यह निष्कर्ष निकालने का प्रयास करते हैं कि वर्तमान समय में कौन सा ग्रह ऐसा है जो अपने अशुभत्व के कारण सफलता में बाधाएं एवं समस्याएं उत्पन्न कर रहा है। ग्रहों के अशुभत्व के शमन के लिए तीन प्रकार की पद्धतियां- तंत्र, मंत्र एवं यंत्र विद्यमान हैं। प्रथम दो पद्धतियां आमजनों को थोड़ी मुश्किल प्रतीत होती हैं अतः वर्तमान समय में तीसरी पद्धति ही थोड़ी अधिक प्रचलित है। इसी तीसरी पद्धति के अन्तर्गत विभिन्न ग्रहों के रत्नों को धारण करना है। ये रत्न धारण करने के पश्चात् आश्चर्यजनक परिणाम देते हैं तथा मनुष्य को सुख, शान्ति एवं समृद्धि से ओत-प्रोत करते हैं। फ्यूचर समाचार के वर्तमान अंक में रत्नों से सम्बन्धित अनेक उत्कृष्ट एवं उल्लेखनीय आलेखों को सम्मिलित किया गया है जो रत्न से सम्बन्धित विभिन्न आयामों पर प्रकाश डालते हैं।

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