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आज हम बात कर रहे हैं, ट्रैजडी क्वीन कही जाने वाली अभिनेत्री मीना कुमारी की। उनका वास्तविक नाम था महजबीं। उनका बचपन अत्यंत अभावग्रस्त था। दूसरी कन्या संतान होने के कारण उनके पिता को उनसे नफरत थी। मां की ममता के कारण उनको उनके पिता घर वापस लाए अन्यथा जन्म होते ही वे मीना कुमारी को अनाथालय की सीढ़ियों पर छोड़ गए थे। यही लड़की आगे चलकर बाल कलाकार की भूमिका करते-करते फिल्मों की नायिका बन गई और अपनी अदाकारी से सभी को अचंभित कर दिया। महजबीं के कमाए सिक्कों की ढेर माता-पिता को एक खोली से निकालकर बंगले में ले आई जिसका नाम पिता के नाम पर रखा गया इकबाल मैन्सन। सिक्कों की खनक माता-पिता की आवाज में भी प्यार बनकर सुनाई देने लगी। उन्हें उर्दू सिखाने उस्ताद घर पर आने लगे। उस समय अधिकतर पौराणिक फिल्में बनती थी, इसलिए उनका नाम महजबीं से बदलकर मीना कर दिया गया। नाम की तासीर इंसान पर असर करती है ये मीना कुमारी ने साबित कर दिया। अपने आखिरी समय में उन्होंने खुद को शराब में डुबो दिया। उन्हें लगता था कि उनकी तकलीफों की दवा सिर्फ और सिर्फ शराब है। साहब, बीबी और गुलाम फिल्म का न जाओ सैयां ........ गाना उनकी रील लाइफ के साथ ही उनकी रियल लाइफ का भी सत्य था। आइए जानते हैं आंसुओं से भरी आंखों वाली मीना कुमारी की जिंदगी को ग्रहों के आईने से-- मीना कुमारी की कुंडली है तुला लग्न की। लग्नेश राहु के नक्षत्र और राहु के ही उपनक्षत्र में नवमस्थ है। नवम भाव में शुक्र मारकेश मंगल से युत होकर बैठे हैं। मंगल जो कि द्वितीय और सप्तम दो मारक भावों के स्वामी हैं स्वयं के नक्षत्र और लग्नेश के उपनक्षत्र में विराजमान हैं। शायद लग्न और मारकेश का जन्म से बना घनिष्ठ संबंध हो जिसके प्रभाववश मीना कुमारी के पिता उन्हें जन्म लेते ही अनाथालय की सीढ़ियों पर छोड़ गए थे। कहा जाता है कि जब वे दोबारा उन्हें लेने पहुंचे तो उस छोटी सी बच्ची के शरीर पर ढेरों चीटियां चिपकी हुई थीं। मारकेश सदैव मृत्यु नहीं देते बल्कि मृत्यु तुल्य कष्ट भी प्रदान करते हैं। उनकी जन्म के समय बृहस्पति की दशा चल रही थी जो कि लगभग 1 वर्ष 9 माह शेष थी। बृहस्पति षष्ठेश है और एकादश भाव जो कि षष्ठ से षष्ठ है, में व्ययेश बुध के साथ विराजमान हैं। चूंकि लग्नेश शुक्र अष्टमेश भी हैं राहु के नक्षत्र में हैं। राहु, शनि की कुंभ राशि में पंचमस्थ होकर लग्न, पंचम, नवम, एकादश व लग्नेश को पूर्ण दृष्टि बल प्रदान कर रहे हैं। तुला लग्न में शनि योग कारक होते हैं और राहु ने शनि की राशि में बैठकर पूर्ण योगकारी प्रभाव धारण कर रखा है। यही कारण था कि मीना कुमारी मौत के मुंह में जाने से बच गई क्योंकि फिल्मी दुनिया को एक चमकता हुआ सितारा जो मिलने वाला था। मीना कुमारी को जीवन के प्रारंभ में ही योगकारक ग्रह शनि की दशा प्राप्त हुई। शनि चतुर्थ भाव में, सूर्य के नक्षत्र और शुक्र के उपनक्षत्र में बैठे हैं। शनि मकर राशिस्थ राजयोग भी बना रहे हैं। कर्मेश चंद्रमा, लाभेश सूर्य और दशम भाव पर शनि की पूर्ण दृष्टि है। शनि में शनि व बुध की दशाएं विशेष फलप्रद नहीं रहीं, किंतु केतु की अंतर्दशा में शुभफल प्राप्त हुए। केतु लाभ भाव में शुक्र के नक्षत्र व बुध के उपनक्षत्र में भाग्येश व व्ययेश बुध तथा तृतीयेश व षष्ठेश बृहस्पति से युत होकर बैठे हैं। नवांश लग्न में वृश्चिक लग्न में केतु सूर्य जो कि नवांश व दशमांश के कर्मेश हैं और लग्नकुंडली के लाभेश हंै के साथ ही लग्नेश (नवांश) मंगल से युत होकर बैठे हैं। लग्नेश शुक्र हैं और शनि तथा केतु के नक्षत्रेश व उप नक्षत्रेश भी शुक्र हैं। शुक्र भोगविलास, सुखसंपन्नता के कारक ग्रह हैं। सिनेमा पर भी शुक्र का अधिकार है। मीना कुमारी के माता-पिता फिल्मों में छोटा-छोटा काम किया करते थे, उनकी बड़ी बहन भी बाल कलाकार थी। शुक्र के प्रभाववश उन्हें भी बाल कलाकार के रूप में फिल्मों में काम मिलने लगा। धीरे-धीरे युवा होने पर उन्हें फिल्मों में लीड रोल भी मिलने लगे। कुटुम्ब के स्वामी हैं मंगल जो कि शुक्र के साथ नवम भाव में बैठे हैं। शुक्र का कुटुम्ब भाव से षडाष्टक योग बना हुआ है। उन्हें अपने परिवार में कभी प्रेम प्राप्त नहीं हुआ। चतुर्थ भाव माता, भूमि, भवन वाहन, सुख का भाव बलवान है। शनि का शश महापुरूष योग बना है। माता की जिद्द के कारण ही वे सही सलामत घर वापस आ पाई थीं। सिनेमा में मिली सफलता के कारण ही मीना कुमारी को सुख संपन्नता की कोई कमी नहीं थी। नौकर, वाहन, बंगला सब कुछ उन्हें प्राप्त हुआ। पाकीजा और बैजू बावरा उनकी अत्यंत सफल फिल्म थी। साहब, बीवी और गुलाम तो जैसे उनके जीवन का ही आईना थी। नवम भाव पितृ कारक व भाग्य कारक होता है। नवमेश बुध जहां भाग्यवर्धक हैं वहीं व्ययेश भी हैं। भाग्येश होकर बुध लाभ भाव में षष्ठेश व तृतीयेश बृहस्पति के साथ-साथ केतु से भी युत हैं। शनि के बाद बुध की महादशा प्रारंभ हुई जिसके कारण उनके धन-ऐश्वर्य में खूब वृद्धि हुई। नवम भाव पिता का भाव है। पितृ कारक सूर्य दशम भाव में बैठे हैं दशमेश चंद्रमा के साथ। मीना कुमारी के पिता चूंकि सिनेमा में छोटे-मोटे काम किया करते थे इसी कारण उन्होंने प्रयास किया कि मीना कुमारी को भी कुछ काम मिल जाए। भाग्येश बुध के प्रभाववश मीना कुमारी का काम चल निकला। बुध को द्वादशेश अर्थात व्यय भाव का फल भी करना था। इसी कारण मीना कुमारी द्वारा अर्जित धन-संपदा आदि सभी कुछ उनके पिता की निगरानी में ही रहता था। बुध लाभ भाव में केतु के नक्षत्र और बृहस्पति के उपनक्षत्र में केतु व बृहस्पति से युत होकर ही बैठे हैं। लग्नेश शुक्र और धनेश मंगल दोनों ही भाग्य भाव में युत होकर बैठै हंै यह स्थिति आर्थिक लाभ प्रदाता है। किंतु मंगल द्वितीयेश व सप्तमेश होकर दो मारक भावों के स्वामी हैं। लग्नेश से युत होकर लग्न पर मारकत्व प्रभाव देने वाले हैं। द्वितीय भाव मारक भाव के साथ ही स्वाद का भाव भी है। लग्नेश शुक्र मंगल से युत है और राहु की पूर्ण दृष्टि के प्रभाव में है। शुक्र भोग कारक है, मंगल भोग को बढ़ावा देते हैं और राहु उचित अनुचित का अंतर मिटा देते हैं। शुक्र, मंगल और राहु के इसी प्रभाववश मीना कुमारी को शराब का आदी बना दिया था। उन्होंने रूहानी दर्द को कम करने के लिए जिस्मानी तकलीफ को बेहतर समझा। ये जानते हुए भी कि शराब उनकी दुश्मन है वे खुद को उससे दूर न कर सकीं। मीना कुमारी को परिवार में मां के अलावा तो किसी से प्रेम मिला नहीं। इस दर्द को तो उन्होंने बचपन से झेला था। उन्होंने अपने परिवार के खिलाफ जाकर कमाल अमरोही से प्रेम विवाह किया था। इसमें भी उन्हें असफलता मिली। अंततः दोनों अलग हो गए। लग्नेश शुक्र, राहु के ही नक्षत्र और उपनक्षत्र में हैं। राहु पंचमस्थ हैं। पंचमेश शनि सूर्य के नक्षत्र व शुक्र के उपनक्षत्र में है और लग्नेश शुक्र से षडाष्टक योग बनाकर बैठे हैं चतुर्थ भाव में। सप्तमेश मंगल लग्नेश शुक्र से युत है और स्वनक्षत्र तथा शुक्र के ही उपनक्षत्र मंे हैं। इस प्रकार लग्न, पंचम व सप्तम का घनिष्ठ संबंध प्रेम विवाह का तो द्योतक है किंतु पंचमेश अपने से व्यय अर्थात चतुर्थ भाव में बैठे हैं, लग्नेश सप्तमेश पर राहु की दृष्टि है शनि का पूर्ण प्रभाव राहु लिए हुए है। शुक्र व मंगल लग्नेश व सप्तमेश होने के साथ ही मारक प्रभाव भी लिए हुए हैं। शुक्र व मंगल लग्नेश व सप्तमेश होने के साथ ही मारक प्रभाव भी लिए हुए हैं। लग्न के व्ययेश बुध व सप्तम के व्ययेश बृहस्पति दोनों ही लाभ भाव में बैठकर पंचम को पीड़ित कर रहे हैं। बृहस्पति जो कि सप्तम के व्ययेश हंै सप्तम पर पूर्ण दृष्टि डाल रहे हैं। यही कारण है कि प्रेम विवाह के प्रबल योग से प्रेम विवाह तो हो गया किंतु व्ययेश (बु.) (बृ.) के अशुभ प्रभाववश वैवाहिक जीवन अधिक समय तक न चला और जब तक चला भी तो कहलपूर्ण रहा। पंचम भाव पर अशुभ प्रभाव के कारण जहां उन्हें प्रेम में असफलता मिली वहीं संतान सुख से भी वे वंचित रहीं। दो बार गर्भवती होने के बाद भी उन्हें संतान सुख नहीं मिला, उनका दोनों बार गर्भपात हो गया। शनि के बाद चली बुध की महादशा। बुध केतु के नक्षत्र और बृहस्पति के उपनक्षत्र में होकर दोनों से ही युत है और लाभ भावस्थ है। बुध भाग्येश व व्ययेश हैं। बुध पर योगकारी राहु की पूर्ण दृष्टि पड़ रही है। लाभेश सूर्य बैठे हैं अपने से द्वादश कर्म भाव में। मीना कुमारी को दौलत, शोहरत, पैसा रूतबा खूब मिला। मीना कुमारी को एक फिल्म के एक लाख रूपया मेहनताना मिलता था। यह उस वक्त की किसी भी नायिका को दी जाने वाली सर्वाधिक धन राशि थी। किंतु व्ययेश बुध, षष्ठेश बृहस्पति व अष्टम से अष्टमेश अर्थात् तृतीयेश बृहस्पति ने केतु से युत होकर लाभ भाव को अत्यंत अशुभ प्रभाव दिया। शराब ने मीना कुमारी को इतनी शारीरिक क्षति पहुंचाई थी कि अस्पताल ही उनका घर बन गया था। बुध के बाद प्रारंभ हुई केतु की महादशा। केतु बैठे हैं लग्नेश व मारकेश शुक्र के नक्षत्र और व्ययेश व भाग्येश बुध के उपनक्षत्र में। मीना कुमारी की मृत्यु हुई 31 मार्च 1972 को। उस समय दशा चल रही थी केतु/सूर्य/शुक्र की। केतु एकादशस्थ हैं, सूर्य एकादशेश हैं। एकादश भाव छठे से छठा भाव है जो कि रोग की प्रबलता दर्शाता है। शुक्र लग्नेश के साथ ही अष्टमेश भी है। गोचर में शुक्र मारकेश मंगल व शनि से युत होकर अष्टमस्थ वृष राशि में थे। केतु कर्क राशिस्थ होकर षष्ठस्थ सूर्य व व्ययेश बुध पर दृष्टि डाल रहे थे। चंद्रमा लग्नस्थ होकर मारक भाव को देख रहे थे। बृहस्पति धनु राशि में तृतीयस्थ थे। तृतीय भाव अष्टम से अष्टम है। यहां से बृहस्पति की पूर्ण दृष्टि सप्तम मारक भाव में पड़ रही थी। साथ ही एकादश भाव पर भी बृहस्पति की दृष्टि थी। इस गोचरीय संयोजन के प्रभाववश उन्हें अपने जीवन की तमाम समस्याओं से हमेशा के लिए मुक्ति प्राप्त हुई।

रत्न विशेषांक  जुलाई 2016

भूत, वर्तमान एवं भविष्य जानने की मनुष्य की उत्कण्ठा ने लोगों को सृष्टि के प्रारम्भ से ही आंदोलित किया है। जन्मकुण्डली के विश्लेषण के समय ज्योतिर्विद विभिन्न ग्रहों की स्थिति का आकलन करते हैं तथा वर्तमान दशा एवं गोचर के आधार पर यह निष्कर्ष निकालने का प्रयास करते हैं कि वर्तमान समय में कौन सा ग्रह ऐसा है जो अपने अशुभत्व के कारण सफलता में बाधाएं एवं समस्याएं उत्पन्न कर रहा है। ग्रहों के अशुभत्व के शमन के लिए तीन प्रकार की पद्धतियां- तंत्र, मंत्र एवं यंत्र विद्यमान हैं। प्रथम दो पद्धतियां आमजनों को थोड़ी मुश्किल प्रतीत होती हैं अतः वर्तमान समय में तीसरी पद्धति ही थोड़ी अधिक प्रचलित है। इसी तीसरी पद्धति के अन्तर्गत विभिन्न ग्रहों के रत्नों को धारण करना है। ये रत्न धारण करने के पश्चात् आश्चर्यजनक परिणाम देते हैं तथा मनुष्य को सुख, शान्ति एवं समृद्धि से ओत-प्रोत करते हैं। फ्यूचर समाचार के वर्तमान अंक में रत्नों से सम्बन्धित अनेक उत्कृष्ट एवं उल्लेखनीय आलेखों को सम्मिलित किया गया है जो रत्न से सम्बन्धित विभिन्न आयामों पर प्रकाश डालते हैं।

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