लग्नानुसार रत्न चयन

लग्नानुसार रत्न चयन  

भारतीय ज्योतिषशास्त्र के फलित स्कन्ध के विकास के मूल आधार के रूप में महर्षि पराशर के सिद्ध ान्त के योगदान को एकमत से स्वीकार किया गया है। फलित ज्योतिषशास्त्र के प्रत्येक महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त के विषय में महर्षि पराशर के विचारों को विश्वसनीय मार्गदर्शक माना जाता है। रत्न धारण के सन्दर्भ में भी महर्षि पराशर ने अपने विचारों से परवर्ती दैवज्ञों तथा सामान्य जनमानस के प्रति अपने सिद्धान्त का अत्यन्त करुणापूर्वक प्रकटीकरण किया है। रत्नधारण के लग्न विषयक सिद्धान्त की महर्षि ने अपने ग्रन्थ ‘बृहत्पाराशरहोराशास्त्र’ में स्थापना की है। इन्होंने प्रत्येक लग्न में उत्पन्न जातकों के लिए योगकारक ग्रहों का निर्धारण किया है तथा इन्हीं योगकारक ग्रहों की सबलता तथा निर्बलता के आधार पर जातक को उसके जीवन में प्राप्त होने वाले सुख-दुख विषयक फलादेश को भी प्रस्तुत किया है। महर्षि पराशर के अनुसार मेषादि द्वादश लग्नों में उत्पन्न जातक के लिए कौन से ग्रह योगकारक हैं तथा उन्हें कौन सा रत्न धारण करना चाहिए और कौन सा रत्न धारण नहीं करना चाहिए इस सिद्धान्त को इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है: मेष लग्न मेष लग्न में उत्पन्न जातक के लिए शनि, बुध और शुक्र ये तीन ग्रह पाप फलदायक होते हैं। सूर्य, मंगल और गुरु शुभ फलदायक होते हैं। शुक्र मुख्य रूप से मारक होता है। इस प्रकार इस लग्न में जन्म लेने वाले जातकों को मूँगा, माणिक्य और पुखराज धारण करना चाहिए। हीरा, पन्ना तथा नीलम रत्न ऐसे जातकों के लिए अशुभ फल देने वाले हैं। वृष लग्न इस लग्न में उत्पन्न जातक के लिए शनि और सूर्य शुभ फलदायक, बुध अल्प शुभ फलप्रद तथा शनि राजयोगकारक होते हैं। गुरु, शुक्र तथा चन्द्रमा वृष लग्न वाले जातक के लिए अशुभ होंगे तथा गुरु, शुक्र और मंगल मारक होते हैं। अतः इस लग्न के जातकों के लिए नीलम, माणिक्य तथा पन्ना शुभ फलोत्पादक होंगे जबकि पुखराज, हीरा, मोती तथा मूँगा अशुभ फल देने वाले होंगे। मिथुन लग्न मिथुन लग्न में जन्म लेने वाले जातक के लिए एकमात्र शुक्र शुभ फल देने वाला होता है। मंगल, गुरु तथा सूर्य पापफलदायी होते हैं जबकि चन्द्रमा मुख्य मारक होता है। अतः इस लग्न के जातक हेतु हीरा धारण करना अत्यन्त शुभफलप्रद होता है। परन्तु मोती, मूँगा, पुखराज और माणिक्य धारण करना अशुभ है। कर्क लग्न इस लग्न में मंगल, बृहस्पति तथा चन्द्रमा शुभफलप्रद होते हैं। मंगल विशेष रूप से पूर्णयोग कारक होता है। शुक्र तथा बुध पापफलदायक होते हैं, जबकि शनि पूर्ण मारक होता है। इस लग्न में सूर्य की प्रवृत्ति साहचर्य से फल देने की होती है। अतः इस लग्न के जातकों के लिए मूँगा, पुखराज व मोती शुभ हैं, जबकि माणिक्य धारण के सन्दर्भ में विशेष परामर्श की आवश्यकता होती है। ये जातक नीलम, हीरा व पन्ना नहीं पहनें तो उचित रहेगा। सिंह लग्न इस लग्न के जातकों के लिए मंगल, बृहस्पति तथा सूर्य विशेष शुभ फलदायक होते हैं। चन्द्रमा साहचर्य से शुभ फल देता है। बुध, शुक्र और शनि पाप फलद होते हैं और इसमें भी शनि मारक होता है। इस प्रकार सिंह लग्न में उत्पन्न जातकों के लिए मूँगा, पुखराज तथा माणिक्य धारण करना प्रशस्त है, जबकि पन्ना, हीरा और नीलम धारण करना निषिद्ध है। कन्या लग्न कन्या लग्न में जन्म लेने वाले जातकों के लिए बुध और शुक्र अत्यन्त शुभफलप्रद तथा योगकारक होते हैं। मंगल, बृहस्पति तथा चन्द्रमा पाप फल उत्पन्न करने वाले होते हैं। इस लग्न के लिए शुक्र मारक भी है तथा सूर्य साहचर्य से फल देता है। अतः कन्या लग्न के जातकों के लिए पन्ना व हीरा धारण करना शुभ है, जबकि मूँगा, पुखराज व मोती अशुभ फल देने वाला होता है। तुला लग्न इस लग्न में चन्द्रमा, बुध और शनि शुभ फलदायक होते हैं साथ ही चन्द्रमा व बुध में राजयोग प्रदान करने का भी सामथ्र्य होता है। गुरु, सूर्य और मंगल पाप फलदायक होते हैं। मंगल व गुरु मारक होते हैं तथा शुक्र सम स्वभाव का होता है। अतः इस लग्न के जातकों के लिए मोती, पन्ना व नीलम अत्यन्त शुभ होंगे तथा पुखराज, मूँगा व माणिक्य अनिष्टकारक हो सकते हैं। वृश्चिक लग्न इस लग्न में उत्पन्न जातक के लिए गुरु और चन्द्रमा शुभफल देने वाले जबकि सूर्य व चन्द्रमा योगकारक होते हैं। शुक्र, बुध और शनि पाप फल प्रदान करते हैं तथा मंगल सम होता है। इस तरह वृश्चिक लग्न के जातक पुखराज, मोती व माणिक्य धारण कर सकते हैं। हीरा, पन्ना और नीलम धारण करना अशुभ प्रभाव देने वाला हो सकता है। धनु लग्न धनु लग्न में समुत्पन्न जातकों के लिए मंगल और सूर्य शुभ फल देने वाले होते हैं तथा सूर्य व बुध योगकारक होते हैं। शनि मारक होता है तथा शुक्र में मारक लक्षण होते हैं। अतः धनु लग्न के जातक मूँगा, माणिक्य व पन्ना धारण कर शुभफल की प्राप्ति कर सकते हैं जबकि हीरा व नीलम धारण करना अशुभ फल उत्पन्न कर सकता है। मकर लग्न मकर लग्न में उत्पन्न जातकों के लिए शुक्र व बुध शुभ फल देने वाले होते हैं। मंगल, बृहस्पति व चन्द्रमा पाप फल देते हैं सूर्य सम फल देने वाला होता है। इस लग्न में शनि लग्नेश होते हैं अतः स्वयं मारक नहीं होते अपितु मंगल आदि पाप ग्रह मारक प्रभाव उत्पन्न करने वाले होते हैं। अतएव इस लग्न के जातकों के लिए हीरा व पन्ना अत्यन्त शुभफलद सिद्ध हो सकता है। इस लग्न में मूँगा, पुखराज व मोती अशुभ प्रभाव उत्पन्न कर सकते हैं। अतः इन रत्नों को धारण करना निषिद्ध है। कुम्भ लग्न इस लग्न में समुत्पन्न जातकों के लिए शुक्र व शनि शुभफलदायक होते हैं तथा शुक्र विशेष रूप से राजयोगकारक होता है। गुरु, सूर्य व मंगल मारक प्रभाव से युक्त होते हैं तथा बुध मध्यम फलदायक होता है। स्पष्ट है कि शुक्र रत्न हीरा व शनि का रत्न नीलम इस लग्न के जातकों के लिए शुभ है जबकि पुखराज, माणिक्य व मूँगा अत्यन्त अशुभ रत्न सिद्ध हो सकते हैं। मीन लग्न मीन लग्न के जातकों की जन्म पत्रिका के अनुसार मंगल, चन्द्रमा व गुरु शुभफलद होते हैं। इनमें से भी मंगल व गुरु विशेष रूप से अत्यन्त योग कारक होते हैं। शनि, शुक्र, सूर्य व बुध इस लग्न के जातकों के लिए अशुभ प्रभावोत्पादक होते हैं। शनि व बुध मारक होते हैं। इसलिए मीन लग्न के जातकों के लिए मूँगा, मोती व पुखराज धारण करने योग्य रत्न हैं। जबकि शनि रत्न नीलम, शुक्र रत्न हीरा, सूर्य रत्न माणिक्य व बुध रत्न पन्ना का परित्याग करना चाहिए। महर्षि पराशर ने अपनी रचना बृहत्पराशरहोराशास्त्रम् के योगकारकाध्याय में इस सन्दर्भ में अत्यन्त विस्तार से चर्चा की है। योगकारक अर्थात् अत्यन्त शुभफलद व राजसुख प्रदान करने वालो ग्रहों के निर्धारण के सन्दर्भ में महर्षि पराशर के ये सिद्धान्त स्वर्णिम सूत्र के रूप में सिद्ध होते हैं।


रत्न विशेषांक  जुलाई 2016

भूत, वर्तमान एवं भविष्य जानने की मनुष्य की उत्कण्ठा ने लोगों को सृष्टि के प्रारम्भ से ही आंदोलित किया है। जन्मकुण्डली के विश्लेषण के समय ज्योतिर्विद विभिन्न ग्रहों की स्थिति का आकलन करते हैं तथा वर्तमान दशा एवं गोचर के आधार पर यह निष्कर्ष निकालने का प्रयास करते हैं कि वर्तमान समय में कौन सा ग्रह ऐसा है जो अपने अशुभत्व के कारण सफलता में बाधाएं एवं समस्याएं उत्पन्न कर रहा है। ग्रहों के अशुभत्व के शमन के लिए तीन प्रकार की पद्धतियां- तंत्र, मंत्र एवं यंत्र विद्यमान हैं। प्रथम दो पद्धतियां आमजनों को थोड़ी मुश्किल प्रतीत होती हैं अतः वर्तमान समय में तीसरी पद्धति ही थोड़ी अधिक प्रचलित है। इसी तीसरी पद्धति के अन्तर्गत विभिन्न ग्रहों के रत्नों को धारण करना है। ये रत्न धारण करने के पश्चात् आश्चर्यजनक परिणाम देते हैं तथा मनुष्य को सुख, शान्ति एवं समृद्धि से ओत-प्रोत करते हैं। फ्यूचर समाचार के वर्तमान अंक में रत्नों से सम्बन्धित अनेक उत्कृष्ट एवं उल्लेखनीय आलेखों को सम्मिलित किया गया है जो रत्न से सम्बन्धित विभिन्न आयामों पर प्रकाश डालते हैं।

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