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स्वर्ण श्रीयंत्र- वैज्ञानिक परिचर्चा

स्वर्ण श्रीयंत्र- वैज्ञानिक परिचर्चा  

श्रीयंत्र अर्थात् हमारे जीवन में ‘‘श्री’’ (लक्ष्मी) आकर्षित करने का यंत्र। संन्यासी इसे ब्रह्माण्ड का नक्शा या खाका कहते हैं। पौराणिक शास्त्रों में श्रीयंत्र को दुनिया का सबसे पुराना और प्रभावशाली यंत्र माना गया है तथा कई शास्त्रों में यंत्रराज (यंत्रों का राजा) भी कहा गया है। प्राचीन लोग श्री यंत्र की शक्ति को इतनी अच्छी तरह से समझते थे कि श्रीयंत्र आकार के विभिन्न मंदिरों का भारत और दुनिया भर में निर्माण किया गया है। इसके अलावा कई प्रसिद्ध मंदिरों जैसे तिरुपति बालाजी मंदिर (अंाध्र प्रदेश), पशुपतिनाथ मंदिर (नेपाल), श्रीराम मंदिर (माॅरीशस) आदि में किसी न किसी रुप में मंदिर परिसर में स्थापित है। 1990 के दशक में अमेरिका के ओरेगन में एक सूखी झील पर एक प्राकृतिक श्रीयंत्र देखा गया। वह अलौकिक 23 कि.मी. लंबा व 23 कि.मी. चैड़ा श्रीयंत्र अमेरिका की समृद्धि और प्रगति का एक कारण माना जाता है। इस घटना ने कई आधुनिक वैज्ञानिकों को श्रीयंत्र पर अनुसंधान के लिए प्रेरित किया। अमेरिकी वैज्ञानिक डाॅ. पैट्रिक फ्लेनेगन के अनुसार श्रीयंत्र की ऊर्जा एक समतुल्य पिरामिड संरचना की तुलना में 70 गुना अधिक है। विभिन्न प्राचीन शास्त्रों में श्रीयंत्र के महान प्रभावों के बारे में बताया गया है। रुद्रयामल ग्रंथ के अनुसार- सौ यज्ञ, सोलह महादान एवं 1.5 करोड़ तीर्थों में स्नान के पुण्य फल की प्राप्ति श्रीयंत्र के केवल प्रेम और समर्पण से दर्शन करने मात्र से प्राप्त होती है। श्रीयंत्र एक दिव्य साधन (यंत्र) है जो हमें उच्च आध्यात्मिक चेतना का अनुभव करने में मदद करता है एवं इसलिए हमारे मस्तिष्क और एकाग्रता में समग्र सुधार करता है। माॅस्को विश्वविद्यालय में हुए शोधों ने इस बात की पुष्टि की है कि श्रीयंत्र के साथ ध्यान करने से मस्तिष्क तरंगंे अल्फा स्तर पर पहुँच जाती हैं - अल्फा स्तर अंतज्र्ञान, रचनात्मकता, विश्राम व गहरे ध्यान से जुड़े मन की एक अवस्था है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से श्रीयंत्र ब्रह्माण्ड से ब्रह्माण्डीय ऊर्जा को आकर्षित करता है और लगातार उसके आसपास के क्षेत्रों में इस दिव्य ऊर्जा को फैलाता है एवं नकारात्मकता और वास्तु दोषों को दूर करता है। शास्त्रों में वर्णित और वैज्ञानिकों द्वारा प्रमाणित, ऊपर बताए गये श्रीयंत्र के सकारात्मक प्रभावों को आभा फोटोग्राफी एवं मनुष्य के ऊर्जा चक्रों के स्कैन से प्रमाणित किया गया है- सात ऊर्जा चक्रों में मनुष्य के पिछले जन्मों के अच्छे - बुरे कर्मों की मनोवैज्ञानिक छाप होती है जो उस व्यक्ति के सुख, दुख और वर्तमान परिस्थितियों के कारण होते हैं। स्वर्ण श्रीयंत्र के संपर्क में आने से व्यक्ति के ऊर्जा चक्रों एवं आभामंडल में सुधार होना यह बताता है कि श्रीयंत्र बेहतर स्वास्थ्य, खुशी, शांति, समृद्धि और सकारात्मकता को आकर्षित करता है। क्या आपका श्रीयंत्र सही है?- किसी भी श्रीयंत्र की प्रामाणिकता सुनिश्चित करने के लिए आठ अनिवार्यताएं होती हैं - 1. श्रीयंत्र के सभी त्रिकोण समवर्ती और संकेन्द्रित होने चाहिए एवं बिंदू के नीचे का त्रिकोण समभुज होना चाहिए। 2. सभी नौ स्तरों की ऊँचाई बराबर होनी चाहिए। यह ज्यामिति में समरुपता लाता है। 3. नौ स्तरों के नीचे का आधार सही होना जरुरी है जैसे नीचे चित्र में दिखाया गया है। 4. श्रीयंत्र का भीतरी क्षेत्र अंदर से खाली होना चाहिए - जिसकी ज्यामिति भी बाहरी ज्यामिति के समान होनी चाहिए। उत्पादन तकनीक के अभाव में लोगों ने ठोस श्रीयंत्र बनाए हैं। अंदर से ठोस श्रीयंत्र ’यंत्र’ नहीं बल्कि श्रीयंत्र की मूर्ति होता है। 5. सौभाग्यलक्ष्मी उपनिषद् के अनुसार, श्रीयंत्र का न्यूनतम वज़न 160 मासा (154 ग्रा.) होना चाहिए। अधिकाधिक वज़न अच्छा एवं अधिक प्रभावी होता है। 6. पौराणिक शास्त्रों- तंत्रराज तंत्रम्, दक्षिणामूर्ति संहिता और लक्षसागर में सोना, चाँदी एवं तांबे से बना श्रीयंत्र समृ़िद्ध, स्वास्थ्य, खुशी और समग्र सफलता देता है। 7. पौराणिक शास्त्र तंत्रराज तंत्रम् के अनुसार, सीसा (जो पीतल का हिस्सा है) और काँसे से बना श्रीयंत्र नकारात्मक परिणाम देता है। 8. सौभाग्यलक्ष्मी उपनिषद् के अनुसार पीला श्रीयंत्र वित्तीय लाभ के लिए आदर्श है। केवल सही ज्यामिति वाला श्रीयंत्र सकारात्मक परिणाम देता है, गलत ज्यामिति नकारात्मक ऊर्जा देती है। श्रीयंत्र साधना किसी भी प्रकार की संगठित या संरचित धार्मिक भावनाओं के भी पूर्वकाल से चली आ रही है क्योंकि यह साधना संन्यासियों को उनके ध्यान एवं आध्यात्मिक जागरण की उच्चतम स्थिति में प्राप्त हुई है। इस कारण श्रीयंत्र किसी भी धर्म, जाति, लिंग, राशि, समय सीमा या जीवन काल से नही बंधा है। श्रीयंत्र पूजन- एक सही श्रीयंत्र स्वयं जागृत होता है फिर भी श्रीयंत्र को निम्न में से किसी भी मंत्र जाप द्वारा मंत्र चैतन्य किया जा सकता है: 1. ऊँ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद ऊँ श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः। 2. ऊँ श्रीं ह्रीं श्रीं नमः। 3. ऊँ श्रीं ऊँ नमो देव्यै उज्ज्वल हस्तिकायै । 4. श्रीसूक्त का सम्पुटित पाठ। श्रीयंत्र स्थापना- स्वर्ण श्रीयंत्र को किसी भी शुभ दिन एवं मुहूर्त में स्थापित किया जा सकता है। इसे आॅफिस टेबल, घर, आॅफिस, दुकान आदि के पूर्व, उत्तर, अथवा उत्तर-पूर्व दिशाओं में रखा जा सकता हैं।

रत्न विशेषांक  जुलाई 2016

भूत, वर्तमान एवं भविष्य जानने की मनुष्य की उत्कण्ठा ने लोगों को सृष्टि के प्रारम्भ से ही आंदोलित किया है। जन्मकुण्डली के विश्लेषण के समय ज्योतिर्विद विभिन्न ग्रहों की स्थिति का आकलन करते हैं तथा वर्तमान दशा एवं गोचर के आधार पर यह निष्कर्ष निकालने का प्रयास करते हैं कि वर्तमान समय में कौन सा ग्रह ऐसा है जो अपने अशुभत्व के कारण सफलता में बाधाएं एवं समस्याएं उत्पन्न कर रहा है। ग्रहों के अशुभत्व के शमन के लिए तीन प्रकार की पद्धतियां- तंत्र, मंत्र एवं यंत्र विद्यमान हैं। प्रथम दो पद्धतियां आमजनों को थोड़ी मुश्किल प्रतीत होती हैं अतः वर्तमान समय में तीसरी पद्धति ही थोड़ी अधिक प्रचलित है। इसी तीसरी पद्धति के अन्तर्गत विभिन्न ग्रहों के रत्नों को धारण करना है। ये रत्न धारण करने के पश्चात् आश्चर्यजनक परिणाम देते हैं तथा मनुष्य को सुख, शान्ति एवं समृद्धि से ओत-प्रोत करते हैं। फ्यूचर समाचार के वर्तमान अंक में रत्नों से सम्बन्धित अनेक उत्कृष्ट एवं उल्लेखनीय आलेखों को सम्मिलित किया गया है जो रत्न से सम्बन्धित विभिन्न आयामों पर प्रकाश डालते हैं।

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