काल सर्प योग कष्टदायक अथवा ऐश्वर्यदायक

काल सर्प योग कष्टदायक अथवा ऐश्वर्यदायक  

काल सर्प योग जितना कष्टदायक होता है उतना ही ऐश्वर्यदायक भी होता है। निम्नांकित छः योग जातक के भाग्य निर्णय में बहुत महत्वपूर्ण होते हैं: 1. पहले से सातवें स्थानों में बनने वाला योग। 2. दूसरे से आठवें स्थानों में बनने वाला योग 3. तीसरे से नवें स्थानों में बनने वाला योग 4. चैथे से दसवें स्थानों में बनने वाला योग। 5. पांचवें से ग्यारहवें स्थानों में बनने वाला योग। 6. छठे से बारहवें स्थानों में बनने वाला योग। 1. पहले से सातवें स्थानों में बनने वाले योग से जातक का वैवाहिक जीवन नष्ट हो जाता है और यहां तक कि वह संन्यास भी ले सकता है। इस योग से जातक को आरंभ में संघर्ष, मध्यकाल में परेशानियां पीछा नहीं छोड़तीं। जीवन में किसी महिला की सहायता मिलती है परंतु तत्पश्चात् कोई दूसरी महिला पीछे कर देती है। 2. दूसरे से आठवें स्थानों में बनने वाले योग से जातक जीवन भर निर्धन रहता है। जो पैसे पास होते हैं वह बुरे कार्यों में लगा देता है और लोगों का विश्वास खो देता है। जातक कामुक और कई स्त्रियों के संपर्क में रहता है। जातक की जुबान काली होती है, जो मुंह से निकालता है वह पूरा होता है। 3. तीसरे स्थान से नवें स्थान वाला काल सर्प दोष योग का संबंध विदेश से व्यापार स्थापित करवाता है। परंतु उसे बहुत हानि होती है और शत्रु बढ़ जाते हैं तथा उच्चाधिकारियों से संबंध बिगड़ जाते हैं और फिर हानि उठानी पड़ती है। 4. चैथे से 10वें स्थान वाला काल सर्प योग वाले जातक का मान-सम्मान नहीं होता और अपयश होता है। अवैध संतान या गोद लिये हुये पुत्र से अपमान होता है। जातक इन सब कारणों से पैतृक संपत्ति से भी हाथ धो बैठता है। 5. 5वें से 11वें स्थान के काल सर्प योग से यार दोस्तों से दगा (धोखा) मिलती है। इसलिये जातक अपनी मनमर्जी पर आ जाता है। इस आदत के कारण उसे अपमान और नुकसान उठाना पड़ता है। 6. छठे से 12वें स्थान वाला काल सर्प योग बहुत घातक होता है। जातक बीमार रहता है और जेल भी जाता है। गुप्त शत्रु इसे धोखा देते हैं। इस योग से जातक या तो सुखी जीवन बिताता है या बहुत दुखी। लेखक भी होता है और इस कला से जातक अच्छी उन्नति करता है। राहु प्रधान व्यक्ति के गुण: स्वाभिमान - अन्याय का मुकाबला करने वाला, किसी भी कार्य के पूरे होने तक गोपनीय रखने वाला, काम पर विश्वास करने वाला, वाद-विवाद में निपुण, सामाजिक-राजकीय कार्यों में नेतृत्व करने वाला जातक राहु के प्रभाव में होता है। खांसी-वात-कफ, पेट दर्द, कैंसर, पेशाब में रक्त, गुदा एवं धातु क्षय रोग राहु के अनिष्ट से होते हैं। राहु के कारोबार: कोयला, अफीम, शराब, भांग, सिगरेट, गांजा, चरस आदि वस्तुओं की बिक्री रक्त व पेशाब की जांच करने वाला पैथोलाॅजिस्ट, हड्डियों का व्यापारी, श्मशान में काम करने वाला, चमड़े व दालों का व्यापारी राहु के आधिपत्य में है। अन्य जानकारी: 1. लग्नेश से कोई संबंध न रखने वाला पंचमेश मंगल या राहु की दृष्टि में हो तो संतान की मृत्यु हो जाती है। 2. राहु दूसरे स्थान में हो, मंगल सातवें में, शुक्र त्रिक भाव में 6, 8, 12 में से किसी एक जगह पर होने से शादी से पहले जातक की मृत्यु हो जाती है। यदि शादी हो जाये तो तलाक हो जाता है। 3. राहु पांचवें स्थान में और पंचमेश भी 5वें स्थान में हो या पंचमेश के साथ राहु की युति हो तो संतान का नाश होता है। 4. राहु पांचवे स्थान में और इस पर मंगल की दृष्टि हो तो गर्भपात होता है या संतान नहीं होती। 5. सप्तमेश शनि एवं राहु की युति हो तो जातक के तीन विवाह होते हैं। कालसर्प योग के सदैव सभी कुंडलियों में बुरे फल नहीं मिलते। जैसे जवाहर लाल नेहरू, सचिन तेंदुलकर, धीरू भाई अंबानी, मुरारी बापू, नारायण दत्त तिवारी, इंदिरा गांधी, लता मंगेश्कर, राजेश पाइलट आदि की कुंडलियों में भी काल सर्प योग बनता है। इसके बावजूद भी ये लोग जीवन की बुलंदियों तक पहुंचे और विश्व प्रसिद्ध रहे। जैसे उदाहरण के तौर पर 1. कालसर्प योग की कुंडली में एक कारक ग्रह उच्च का बलवान हो और दूसरा कोई भी उच्च का हो तो ऐसा जातक हर क्षेत्र में सफलता के झंडे गाड़ देता है। मुश्किल से मुश्किल कार्य उसके लिये आसान हो जाता है। परंतु सूर्य-चंद्रमा की युति किसी भी भाव में इस योग के साथ हो तो जातकों को सफलता मिलने में देरी होती है। सूर्य के साथ शनि और चंद्रमा के साथ बुध की युति हो तो कालसर्प वाले जातक धार्मिक, प्रसिद्ध व धनवान होते हैं। 2. कालसर्प योग की कुंडली में केमद्रुम योग तथा शकट योग बनता हो तो ऐसे जातक बिना किसी मेहनत के सफलता प्राप्त करते हैं। उन्हें अपना धन बहुत कम लगाना पड़ता है। ऐसे जातकों को धन बहुत मिल जाता है परंतु उनके जीवन काल में ही समाप्त हो जाता है। यदि वह कोई फैक्ट्री लगाता है तो उसे हानि हो जाती है। 3. कालसर्प योग की कुंडली में चंद्रमा से केंद्रस्थ गुरु व बुध से केंद्रस्थ शनि होने पर जातक सुखी व ऐश्वर्यशील जीवन जीता है। कम मेहनत से अधिक धन मिलता है। जातक के पास सुख सुविधायें होने पर भी घर-परिवार में क्लेश रहता है। गुरु के प्रभाव वाला जातक गुरु की शरण में जाकर तंत्र-मंत्र विद्या में रूचि ले तो अधिक प्रसिद्ध होता है। 4. लग्नेश शुभ ग्रह हो और लग्न में बैठा हो उच्च या अपने मित्र की राशि का होकर केंद्र या त्रिकोण में बैठा हो तो ऐसा जातक सदा सुखी रहता है। यदि कुंडली में चतुर्थेश-नवमेश चतुर्थ भाव में बैठा हो तो जातक बड़ा अधिकारी होता है। यदि चतुर्थेश लग्न में मित्र गुरु से दृष्ट हो तो भी जातक उच्च पद पर होता है। यदि चतुर्थेश एकादश्.ा भाव को दृष्टि दे या चतुर्थेश किसी स्थान में बैठकर चैथे घर को दृष्टकरे तो मनुष्य को अपनी ईच्छानुसार वाहनों की प्राप्ति होती है। इसी प्रकार चतुर्थेश लग्नेश के साथ चैथे भाव में बैठा हो तो जातक को बना बनाया मकान मिलता है और समाज में मान-सम्मान प्राप्त होता है। 5. यदि जातक की जन्मपत्रिका में तृतीय-षष्टम-अष्टम अथवा एकादश भाव में किसी एक भाव में मेष या सिंह राशि में राहु हो तो प्रबल राज योग होता है। यदि जन्मपत्रिका में राहु छठे भाव में और गुरु केंद्र में हो तो अष्टलक्ष्मी योग बनता है। इस योग से जातक सुखमय जीवन व्यतीत करता है। राहु छठे स्थान में और गुरु दसवें स्थान पर हो तो भी यही योग बनता है और शुभ फल जातक को देता है।


कालसर्प योग एवं राहु विशेषांक  मार्च 2013

फ्यूचर समाचार पत्रिका के कालसर्प योग एवं राहु विशेषांक में कालसर्प योग की सार्थकता व प्रमाणिकता, द्वादश भावों के अनुसार कालसर्प दोष के शांति के उपाय, कालसर्प योग से भयभीत न हों, सर्पदोष विचार, सर्पदोष शमन के उपाय, महाशिवरात्रि में कालसर्प दोष की शांति के उपाय, राहु का शुभाशुभ प्रभाव, कालसर्पयोग कष्टदायक या ऐश्वर्यदायक, लग्नानुसार कालसर्पयोग, हिंदू मान्यताओं का वैज्ञानिक आधार, वास्तु परामर्श, वास्तु प्रश्नोतरी, यंत्र समीक्षा/मंत्र ज्ञान, होलीकोत्सव, गौ माहात्म्य, पंडित लेखराज शर्मा जी की कुंडली का विश्लेषण, व्रत पर्व, कालसर्प एवं द्वादश ज्योर्तिलिंग आदि विषयों पर विस्तृत रूप से चर्चा की गई है।

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