आदिकाल में जब ब्रह्माण्ड से ब्रह्मा जी की उत्पत्ति हुई तो उन्होंने सर्वप्रथम ओऽम का उच्चारण किया। यही ओऽम सृष्टि का प्रथम शब्द तथा सूर्य का शरीर कहा जाता है। जब ब्रह्मा के चारों मुखों से वेद प्रकट हुए तब वे सूर्य के तेज से प्रकाशित हुए। सूर्य के सर्वव्यापी प्रकाश ने उन्हें एकीकृत कर शक्ति पुंज बना दिया। यही एकीकृत शक्ति पुंज वास्तव में वैदिक सूर्य देवता के रूप में जाना जाता है। यह भी मान्यता है कि समस्त ज्ञात जगत इसी सूर्य के द्वारा उत्पन्न किया गया है तथा उसी के कारण अस्तित्व में है। सूर्य सृष्टि के प्रारम्भ से ही उपस्थित रहा है तथा आदित्य के नाम से भी जाना जाता है। सूर्य की उत्पत्ति से जुड़ी ये कथाएं उसे उन्नत संभावनाओं और शक्ति के स्रोत के रूप में चित्रित करती हैं। हम सभी जानते हैं कि पृथ्वी पर सूर्य ही समस्त प्राणियों के जीवन का आधार है चाहे वे पेड़-पौधे हों, जानवर या मनुष्य। यदि सूर्य का प्रकाश किसी भी कारण से मिलना बंद हो जाये तो वे निश्चित ही कुछ समय में नष्ट हो जायेंगे और पृथ्वी पर जीवन ही समाप्त हो जायेगा। वास्तव में समस्त जीवन का आधार सूर्य ही है। ब्रह्मांड की प्रथम शक्ति के रूप में सूर्य ज्ञान का मार्गदर्शक है तथा पृथ्वी पर जीवन के शुरू होने का ही नहीं बल्कि उसके समायोजित रूप से चलते रहने का कारण है। सूर्य की कथा से स्पष्ट संकेत मिलता है कि वह सृष्टि के प्रारम्भ से ही उपस्थित था तथा वही इस जगत के लिए प्रकाश और शक्ति का मूल स्रोत है। ऐसी मान्यता है कि वैदिक काल में ज्ञान चहुंमुखी था। वैदिक सभ्यता विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक है। ज्ञान को भी प्रकाश का ही रूप माना जाता है तथा सूर्य की किरणों के तेज से प्रकाशित होकर वह नया आयाम प्राप्त करता है और ‘आप्त दीपो भव’ के भाव को चरितार्थ करता है। इसी कारण सूर्य समस्त ऊर्जा और प्रकाश का प्राचीनतम स्रोत है। अतः आश्चर्य नहीं कि ज्योतिष में सूर्य को समस्त शक्ति, पद, मान और उपाधि से जोड़कर देखा जाता है। सूर्य सौरमंडल का केंद्र है तथा सभी ग्रह उसके चारों ओर चक्कर लगाते हैं। ज्योतिष में सूर्य को निज से जोड़कर देखते हैं तथा वही व्यक्ति को उसका निजत्व प्रदान करता है। सूर्य को मानव मन की मूल वृत्तियों में से एक मान सकते हैं। इस वृत्ति का महत्व इसलिए भी बहुत अधिक है क्योंकि वह व्यक्ति के निज का प्रतीक है तथा वह निजत्व ही समस्त से व्यक्ति को जोड़ता है। जन्मकुंडली मनुष्य के चारों ओर उसी प्रकार घूमती जान पड़ती है जैसे सभी ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते हैं। यह तथ्य सूर्य को मानव स्वभाव में महत्वपूर्ण स्थान प्रदान करता है जिसे हम व्यक्ति का प्राण या आत्मा कह सकते हैं। यही वह मूल शक्ति है जिसके साथ हमारा जन्म होता है तथा जिस पूर्ण की संभावनाओं को जानकर उसे प्राप्त करना ही जीवन की उच्चतम उपलब्धि है जिसमें मनुष्य जीवन भर लगा रहता है। जन्मकुंडली में सूर्य की भूमिका हमें यह ज्ञान देती है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने आप में पूर्णतः स्वतंत्र और विशिष्ट होते हुए भी अपने से जुड़े अथवा पास आने वाले प्रत्येक व्यक्ति को प्रभावित करने की शक्ति और संभावना रखता है। सूर्य जीवन के बहुत से पक्षों पर प्रभाव रखता है जैसे-शक्ति, बल, रचनात्मकता, क्रियाशीलता, सामथ्र्य, ऊर्जा तथा जीवनशक्ति, व्यक्ति की शक्ति समय-समय पर इन्हीं पक्षों को सिद्ध करने में व्यय होती है। उदार आत्मा ग्रह सूर्य के स्वभाव से जुड़े हुए अन्य महत्वपूर्ण गुण हैं-स्वतंत्रता, ईच्छाशक्ति, आत्मविश्वास, उदारता, उद्देश्यपूर्णता, सभ्यता, निष्ठा तथा चमत्कारी नेतृत्व। कुंडली में सूर्य के अलाभकारी होने पर व्यक्ति में निम्न दुर्वृत्तियों का उदय हो सकता है जैसे कि अयोग्यता, निर्दयता, अहंकार, आत्मरति, आत्मनिर्णय का अभाव, आत्मप्रेरणा या उत्साह में ह्रास आदि। सूर्य मनुष्य की आत्मा का भी द्योतक है। आत्मा प्रत्येक में परमेश्वर का अंश रूप ही है। यह ही मानव का सम्बन्ध विश्व की निर्माणकारी शक्तियों से जोड़कर उसमें रचनात्मकता को जन्म देती है किन्तु विरला ही अपने वास्तविक सत्य को जानकर अपने सूर्य की पूर्ण क्षमता का प्रयोग कर पाता है। अधिकांशतः तो विभिन्न रूप में ही उलझकर रह जाते हैं। यदि कोई अपने सूर्य की पूर्ण क्षमता को जान पाए तो वह अपने व्यक्तित्व पर पूर्ण अधिकार प्राप्त कर लेता है। ज्योतिष द्वारा मानव स्वभाव को 12 रूपों में जाना जाता है जो सूर्य द्वारा राशिचक्र के बारह चित्रों पर होने से जाने जाते हैं। सूर्य का रंग लाल तथा उसका वाहन रथ है जिसका एक ही चक्र है जो वर्ष को दर्शाता है। इस चक्र के बारह भाग हैं जो 12 मासों के द्योतक हैं। इस चक्र के मध्य में छह भाग हैं जो छह ऋतुओं के द्योतक हैं। सूर्य अनाज, तांबे और स्वर्ण पर प्रभाव रखता है। इससे संबंधित रत्न माणिक है। ज्योतिष के अनुसार सूर्य सिंह राशि का स्वामी है तथा सिंह राशि जो कि राशिचक्र की पांचवीं राशि है, वह रचनात्मकता, बुद्धि, संतति तथा प्रारब्ध (पूर्व जन्म का प्रभाव) को दर्शाती है। मेष राशि में सूर्य उच्च का होता है तथा इसका उच्चतम स्थान 15 अंश पर होता है। तुला राशि का सूर्य नीच का कहलाता है तथा 20 अंश पर सबसे अधिक नीच का माना जाता है। सिंह राशि में सूर्य अपने मूल त्रिकोण में होता है तथा उसमें 4.20 अंश पर वह पूर्ण स्वगृही माना जाता है। सूर्य और चंद्र जैसे प्रकाशित ग्रहों के अतिरिक्त अन्य पांच ग्रहों को दो-दो राशियों का स्वामी माना जाता है। यह देखा गया है कि स्वभावानुसार ग्रहों में आपस में निश्चित मैत्री संबंध होते हैं। जब भी ग्रह अपने स्वयं के अथवा मित्रों के स्थान पर होते हैं तो बहुत लाभकारी होते हैं। इसी प्रकार सम अथवा शत्रु ग्रह के स्थान पर इनका पूर्ण दुष्प्रभाव भी देखने में आता है। जन्मकुंडली के विभिन्न भावों पर सूर्य का प्रभाव प्रथम भाव जब सूर्य प्रथम भाव में होता है तो व्यक्ति बलवान, आत्मविश्वासी तथा आलसी किंतु कुछ भी ठान लेने पर पूर्ण शक्ति लगाकर लक्ष्य को प्राप्त करने वाला होता है। प्रभावी सूर्य होने पर शासन से लाभ, न्यायप्रिय, परिवार तथा ज्ञान से प्रेम करने वाला, उच्च आदर्शों वाला किंतु लोभी होता है। नीच का सूर्य उसे प्रतिशोधी, मिथ्याभिमानी और आत्मलीन बनाता है। द्वितीय भाव दूसरे भाव का सूर्य व्यक्ति को अपव्ययी, उदारमना, ऋणी तथा चेहरे अथवा नेत्र के रोग से पीड़ित करता है। परिवार तथा पत्नी से संतप्त किंतु विरोधियों और शत्रुओं पर प्रभावी होता है। वह प्रभावी वक्ता होता है। तृतीय भाव तृतीय भाव का सूर्य व्यक्ति को साहसी व निर्भीक करता है। वह दयावान और अपनी संपदा व उपलब्धियों के लिए विख्यात होता है। शास्त्रों में रुचि वाला, कुशल, आत्मविश्वास से भरपूर, भ्रमणशील तथा कार्यक्षेत्र में पूर्ण स्वतंत्रता चाहने वाला होता है। चतुर्थ भाव चतुर्थ भाव में सूर्य बहुत लाभकर नहीं होता क्योंकि वह व्यक्ति को पैतृक संपदा से वंचित रखता है। मानहानि का कारण होता है तथा भाई-बहनों में मेल का भी विरोधी होता है किंतु अच्छे ग्रहों के प्रभाव से व्यक्ति धनवान और बड़ी उम्र में शासन द्वारा सम्मान का अधिकारी होता है। पंचम भाव पंचम भाव का सूर्य व्यक्ति को अधीर, भ्रमण में रुचि लेने वाला तथा नाटक, सिनेमा व टेलीविजन को चाहने वाला बनाता है। षष्ठम भाव छठे भाव का सूर्य व्यक्ति को आत्मसम्मान, साहस, शासन से सम्मान तथा प्रसिद्धि प्रदान करता है। वह आयुर्वेद एवं अन्य चिकित्सा पद्धतियों में रुचि रखता है। नौकरी से लाभ, व्यवहार कुशल, दूसरों की सहायता करने वाला, खुशमिजाज, भोजन का प्रेमी तथा स्पष्टवादी होने के कारण बहुत से शत्रुओं वाला होता है। सप्तम भाव सप्तम् भाव का सूर्य व्यक्ति को क्रोधी बनाता है। पत्नी से सुख में कमी तथा कुछ समय के लिए वियोग भी हो सकता है। ईमानदार, साझेदारी में लाभ, पत्नी के प्रभाव में बहुत बातें बनाने वाला किंतु सुनने वालों का प्रिय होता है। अष्टम भाव अष्टम् भाव: आठवें भाव में सूर्य होने पर व्यक्ति हृदय से असंतुष्ट रहने वाला, रोगी देह वाला, अन्यों से अनादर पाने वाला तथा जीवन के तीसरे वर्ष में मृत्यु तुल्य कष्ट पाने वाला होता है। पति-पत्नी में तालमेल की कमी होती है। बुरा स्वभाव, चंचल, उपद्रवी नेत्र रोगी तथा अपने परिजनों द्वारा ठगा जाने वाला होता है। नवम भाव नवें भाव का सूर्य व्यक्ति को माता-पिता व गुरु का द्रोही तथा अपने से अन्य धर्म को मानने वाला बनाता है। जीवन के प्रारम्भ में रोगी किंतु बाद में स्वस्थ तथा धनवान होकर संतान के साथ खुशमय तथा सुखी लंबा जीवन बिताता है। दशम भाव दशम् भाव का सूर्य व्यक्ति को पिता द्वारा सम्पत्ति तथा सुख प्राप्त कराने वाला होता है। अपने स्वभाव के कारण अच्छे मित्रों वाला, राजसी सुख भोगने वाला, अच्छे स्वभाव का स्वामी, बहुत बुद्धिमान, लेखक, शासन से लाभ पाने वाला तथा उच्च पद का लाभ प्राप्त करने वाला होता है। कलात्मक अभिरुचि होने के कारण वह किसी भी कला में सहज ही निपुणता प्राप्त कर लेता है। एकादश भाव ग्यारहवें भाव में सूर्य के प्रभाव से व्यक्ति अत्यन्त धनवान, बहुत-से भृत्यों वाला, बुद्धिमान तथा ईच्छानुसार बल प्रयोग करने वाला होता है। धार्मिक कष्टों पर विजय पाने वाला, शत्रुओं का नाश करने वाला, उच्च वर्ग में मैत्री रखने वाला, ज्ञानवान, पत्नी को समझने वाला, सभी सुखों का भोक्ता किंतु पुत्र से सुख में कमी वाला होता है। द्वादश भाव बारहवें भाव का सूर्य व्यक्ति को पिता के साथ नहीं चलने देता अथवा पिता से स्नेह में कमी करता है। जीवन में आर्थिक कष्ट आते ही रहते हैं। सूर्य के प्रभाव में कमी आने पर शासन व अधिकारियों से दंड का भागी होता है। नीच का सूर्य कारावास का कारक होता है। विभिन्न राशियों में सूर्य का प्रभाव मेष इस राशि में सूर्य उच्च का माना जाता है। वैसे तो वह राशि के तीसों अंशों पर उच्च का रहता है किन्तु दस अंश पर वह विशेष रूप से पूर्ण उच्चता का माना जाता है। मेष राशि का स्वामी उग्र ग्रह मंगल है तथा मंगल और सूर्य में विशेष मैत्री के कारण मंगल उच्च के सूर्य के लिए विशेष लाभकर होता है। मेष राशि मं सूर्य परिवार से आर्थिक लाभ, पैतृक संपदा, संतान और पत्नी का सुख प्रदान करता है। व्यक्ति अपनी धार्मिक पृष्ठभूमि पर मान रखने वाला अत्यन्त आदर्शवादी, प्रखर बुद्धिमान एवं अत्यन्त महत्वाकांक्षी होता है। वृष वृष राशि का स्वामी शुक्र है तथा शुक्र और सूर्य में मैत्री न होने के कारण सूर्य यहां असहज रहता है। ग्रह असहज राशि में अपना प्रभाव खो देता है तथा बुरे परिणाम देता है। वृष राशि का सूर्य इसी कारण पत्नी तथा संतान के सुख में कमी लाता है। परिवार में सदा तनाव रहता है। मिथुन मिथुन राशि का स्वामी उद्दीप्त ग्रह बुध है। सूर्य और बुध में विशेष मैत्री है। यहां सूर्य विशेष प्रभावी होता है और बहुत अच्छे प्रभाव देता है। इस राशि में सूर्य होने पर व्यक्ति को प्राचीन शास्त्रों में विशेष श्रद्धा होती है। वह ज्ञानवान और धनी होता है। कर्क कर्क राशि का स्वामी चन्द्र है जो सूर्य के प्रकाश से ही प्रकाशवान है। अतः सूर्य इस राशि में विशेष सहजता अनुभव करता है किंतु कुछ हद तक हठी हो जाता है। शासन व समाज में विशेष पद पाने वाला, उच्च वर्ग में मैत्री रखने वाला होता है। सिंह इस राशि का स्वामी होने के कारण सूर्य का इस राशि से विशेष प्रेम है। यह राशि सूर्य का मूल त्रिकोण है। सिंह राशि का सूर्य व्यक्ति को साहसी, विश्वस्त, सहायक, दयावान, धैर्यवान एवं भव्यता प्रदान करता है। आर्थिक रूप से संपन्न तथा दूसरों पर प्रभाव रखने वाला होता है। कन्या कन्या: इस राशि से विशेष संबंध के कारण सूर्य इसमें बुध की आशावादी वृत्ति को बढ़ावा देता है। वह ज्ञानी जनों से विचारों का आदान-प्रदान करने में रुचि लेता है। वह वाहन सुख का भोक्ता तथा भूमि और संपदा से लाभ पाने वाला होता है। मृदुभाषी होने के कारण वह विपरीत लिंग वाले लोगों को विशेष रूप से प्रभावित करता है। तुला यह सूर्य के नीच का स्थान है। यहां वह अपने प्रभाव को ही नहीं, अपने स्वभाव को भी खो देता है। नीच का ग्रह कभी भी अच्छे परिणाम नहीं देता। आर्थिक हानि, पत्नी से सुख का अभाव तथा बहुत बुरी अवस्था में संपत्ति की हानि भी होती है। वृश्चिक वृश्चिक राशि का स्वामी मंगल है। अतः मित्र ग्रह की राशि में सूर्य मुक्ति और स्वतंत्रता का अनुभव करता है। वृश्चिक राशि में सूर्य व्यक्ति को साहसी, उग्र, बहानेबाज बनाता है। उसे शत्रु तथा विषैले जीवों से हानि का भय रहता है। धनु धनु राशि का स्वामी गुरु है। अतः सूर्य यहां बलवान और संयमी हो जाता है। सूर्य इस राशि में कल्पना को बढ़ावा देने और व्यक्ति को नये आयाम छूने की प्रेरणा देता है। व्यक्ति बहुत धन कमाता है तथा पत्नी व संतान के साथ सुख-शान्ति से जीवन के आनंद का भोग करता है। मकर मकर राशि का स्वामी शनि है। अतः सूर्य यहां सहज नहीं रहता क्योंकि सूर्य और शनि में परस्पर विशेष विरोध है जो कि इस राशि में सूर्य के होने पर मिलने वाले परिणामों से सहज ही स्पष्ट होता है। सूर्य मकर राशि में शोक व भय का कारण होता है तथा जातक को बहुत कम सुख प्रदान करता है। कुंभ शनि कंुभ राशि का भी स्वामी है। अतः यहां भी सूर्य के संबंध में विशेष अंतर नहीं आता किंतु यहां सूर्य कुछ अच्छे परिण् ााम देता जान पड़ता है। कुंभ का सूर्य जातक को धन और संतान से सुख प्रदान करता है किंतु पत्नी के कारण कष्ट तथा बढ़ी हुई आयु में हृदय रोग व मानसिक कष्ट की संभावना रहती है। मीन मीन का स्वामी बृहस्पति है। हालांकि सूर्य व बृहस्पति मित्र ग्रह हैं तथापि इस राषि (मीन) में सूर्य कुछ अपने सकारात्मक गुणों को खो देता है। यह इसलिए होता है क्योंकि इस राषि की प्रकृति और सूर्य की प्रकृति आपस में मेल नहीं रखती।


कालसर्प योग एवं राहु विशेषांक  मार्च 2013

फ्यूचर समाचार पत्रिका के कालसर्प योग एवं राहु विशेषांक में कालसर्प योग की सार्थकता व प्रमाणिकता, द्वादश भावों के अनुसार कालसर्प दोष के शांति के उपाय, कालसर्प योग से भयभीत न हों, सर्पदोष विचार, सर्पदोष शमन के उपाय, महाशिवरात्रि में कालसर्प दोष की शांति के उपाय, राहु का शुभाशुभ प्रभाव, कालसर्पयोग कष्टदायक या ऐश्वर्यदायक, लग्नानुसार कालसर्पयोग, हिंदू मान्यताओं का वैज्ञानिक आधार, वास्तु परामर्श, वास्तु प्रश्नोतरी, यंत्र समीक्षा/मंत्र ज्ञान, होलीकोत्सव, गौ माहात्म्य, पंडित लेखराज शर्मा जी की कुंडली का विश्लेषण, व्रत पर्व, कालसर्प एवं द्वादश ज्योर्तिलिंग आदि विषयों पर विस्तृत रूप से चर्चा की गई है।

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