प्रश्न: ज्योतिष में ऐसे कौन से योग होते हैं, जिनके कारण व्यक्ति उत्पीड़न, शोषण व अत्याचार का शिकार होता है? ज्योतिष में शुभ-अशुभ योग होते हैं अर्थात् जातक की कुंडली में ग्रहों का संबंध कैसा है, ग्रहों का आपसी संबंध जैसे युति एक-दूसरे से 2/12 होना केंद्र या त्रिकोण में होना, भावाधिपति होना जैसे- कंद्रेश- (1, 4, 7, 10) तथा त्रिकोणेश (1, 5, 9) का संबंध होना। ऐसे योग भी होते हैं जो अति कष्ट कारक होते हैं। फल दीपिका के अनुसार: दुःस्थैर्भाव ग्रहेश्वरैशु असंयुक्तेशितैवा, क्रमादभावः स्युस्त्ववयोगनिः स्वमृतयः प्रोक्ताः कुहुः पामरः। हर्षो दुष्कृतिरित्यर्थापि सरलो निर्भाग्यदुर्योगकौ योग द्वादश ते दरिद्रविमले प्रोक्ता विपश्चिज्जनैः।।57। अर्थात् जिस भाव का स्वामी 6, 8, 12 में गया हो या जो भावेश पापयुक्त दृष्ट हो, तो क्रमशः लग्न में अवयोग, द्वितीय भाव में निस्वः, तृतीय भाव में मृति। चतुर्थ भाव में कुहु। पंचम भाव में पामर। षष्ट भाव में हर्ष। सप्तम में दुष्कृति। अष्टम में सरल। नवम में निर्भाग्य, दशम में दुर्योग। एकादश में दरिद्र। द्वादश में विमल योग होता है। लग्नेश यदि 6, 8, 12 भाव में हो या पाप युक्त, पाप दृष्ट हो तो अवयोग में अप्रसिद्ध, दीन, निर्बल, अल्पायु, दुष्टों द्वारा अपमानित, कुचि, चंचल स्थिति वाला जातक होता है। द्वितीयेश यदि 6, 8, 12 (द्विस्थान) में हो तो जातक कुटुंब सुख से हीन, खराब आंखों व दांतों वाला, बुद्धि, पुत्र, विद्या से हीन शत्रुआंे द्वारा धन का नाश होता है तृतीयेश यदि दुःस्थान में हो तो भाइयों से रहित, बल व धन से रहित, गलत कार्यों से परेशान, खराब गुणों वाला जातक होता है। चतुर्थ भाव में बनने वाला कुयोग में माता, धन, वाहन, मित्र उम वस्त्रों से हीन अपने निवास का नाश करने वाला, गलत स्त्री से प्रेम करने वाला जातक होता है। पंचम भाव (पामर योग) पंचमेश यदि दुःस्थान में हो तो दुःख से जीवन बिताने वाला, झूठा, धोखेबाज नष्ट संतान वाला या संतानहीन, दुष्ट व्यक्तियों के साथ रहने वाला होता है। षष्ट भाव में बनने वाला, हर्ष योग होता है अर्थात् षष्ठेश दुःस्थान में हो तो जातक शत्रुहंता होता है। सप्तमेश यदि 6, 8, 12वें में भाव में हो तो अपनी पत्नी से वियुक्त परस्त्रीगामी, प्रमेह, मधुमेहादि रोगों से पीड़ित, सरकार से कष्ट पाने वाला बंधु-बांधवों से तिरस्कार पाने वाला जातक होता है। नवमेश से बनने वाला निर्भाग्य योग होता है। यह जातक पिता द्वारा अर्जित धन संप को नष्ट करने वाला गुरुओं व संतों की निंदा करने वाला, फटे कपड़े पहनने वाला, बहुत दुःख भोगने वाला होता है। दशमेश यदि दुःस्थान में हो तो यह दुर्योग बनता है। जातक द्वारा पूर्ण परिश्रम के बाद भी कामों में सफलता नहीं मिलती। हर स्थान पर निरादर होता है। अपना पेट भरने के लिए प्रवास करता है। यदि एकादशेश 6, 8, 12 भाव में हो तो जातक ऋणी, उग्र स्वभाव, दरिद्र, कान में रोग, अच्छे मित्रों से रहित, गलत दिशा में जाने वाला, कटु वाणी बोलने वाला, दूसरों के अधीन काम करने वाला होता है। इसे दरिद्र योग भी कहते हैं। यदि 6, 8, 12 भावों के स्वामी बलवान होकर शुभ भावों में केंद्र, त्रिकोण में हों और 1, 4, 9, 10 भावेश 6, 8, 12 मं निर्बल हो तो यह दुर्याग होता है। इसक अतिरिक्त अन्य अशभ् यागे हाते हैं। जिससे जातक उत्पीड़न, शोषण व अत्याचार का शिकार होता है। 1- महापातक योग: राहु से युक्त चंद्रमा, गुरु से दृष्ट हो तो इंद्र समान होने पर भी महापातक करने वाला होता है। - जन्म के समय में कारक ग्रह रहते हुए भी यदि लालटिक योग लग्न से अष्टम स्थान में चंद्रमा हो और कर्क राशि में सूर्य-शनि-शुक्र हांे तथा पूर्ण केमद्रुम योग हो तो लालटिक योग होता है। ऐसा जातक दरिद्रता को प्राप्त करता है, अगले जन्म तक दरिद्रता उसे नहीं छोड़ती। 2- वृषहंता योग: जन्म लग्न को यदि मंगल और सूर्य देखते हों और गुरु-शुक्र न देखते हों तो उस जातक को बैल से आघात मिलता है। 3- हठहंता योग: सूर्य के स्थान पर चंद्रमा और चंद्रमा की राशि कर्क में सूर्य हो तो जातक हठ से नष्ट होता है। यदि लग्न में पाप ग्रह हो तो बहुत ही हठी होता है। 4- वृक्षात् पतन योग: यदि लग्न पर राहु की दृष्टि हो तो पतन योग होता है। इस योग में इंद्र के समान होने पर भी वृक्षादि से पतन होता है। 5- खंजयोग: शुक्र से युत शनि और गुरु से युत सूर्य हो और उन पर अन्य शुभ ग्रहों की दृष्टि न हो तो जातक लंगड़ा होता है। 6- सर्पदंश येाग: लग्न से सप्तम भाव में शनि, सूर्य और राहु तीनों हों तो जातक को सोने पर भी सर्पदंश का भय होता है। 7- व्याध्रघात योग: जन्म समय में धनु और मीन राशि में बुध और मकर या कुंभ राशि में मंगल हो तो 25 वर्ष की आयु में बाघ से आघात होता है। 8- खड्गघात योग: वृषभ या तुला (स्वामी शुक्र) राशि में चंद्रमा और चंद्रमा की राशि (कर्क) में शनि हो तो तलवार या शस्त्र से चोट लगती है। 9- शरघात योग: नवम भाव में मंगल हो, शनि-सूर्य दोनों राहु से युक्त हों और उन पर शुभ ग्रहों की दृष्टि न हो तो वह शर से आहत होता है। - शुभ ग्रह के लग्न में बृहस्पति हो, अष्टम घर में शनि हो और उसी घर में अन्य पाप ग्रह भी हों तो जातक की मृत्यु शीघ्र होती है। - बृहस्पति-सूर्य-राहु तथा मंगल यह चारों ग्रह क्रूर ग्रह के घर में हों और लग्न से सप्तम घर में शुक्र हो तो शरीर में सदा कष्ट रहता है। - छठे भाव में राहु-शनि से युक्त मंगल हो तो उसे सरकार से पीड़ा मिलती है तथा वह अपने स्थान पर नहीं बैठता है। - चतुर्थ घर में राहु-सूर्य तथा शनि हो और चंद्रमा-बुध-मंगल-शुक्र छठे घर में हों तो जातक अपने घर का नाश करता है। - लग्नेश पाप ग्रह युक्त हो अथवा लग्न पापकर्री हो तो जातक आत्मघाती होता है। - अष्टम घर में शनि हो और लग्न में चंद्रमा हो तो वह उदर का रोगी तथा किसी अंग से हीन होता है। - लग्न में या छठे घर में बुध और मंगल हो तो वह जातक चोरी का काम करने वाला होता है तथा इसी लिए हाथ-पांव नष्ट होते हंै। - लग्न में राहु और छठे घर में चंद्रमा हो तो जातक को मिर्गी का रोग होता है। - बुध युक्त चंद्रमा 6-8वें घर में हो तो जातक की विष से मृत्यु होती है। - सूर्य युक्त चंद्रमा 6-8 भाव में हो तो जातक की हाथी या शेर से मृत्यु होती है। - लग्न में एक भी पाप ग्रह हो तो वह स्थान से हीन होकर दुष्ट जीविका करने वाला होता है। - लग्न से नवम भाव में या दशम भाव में चंद्रमा और सप्तम भाव में शुक्र और चतुर्थ घर में कोई पाप ग्रह हो तो जातक वंश नाशक होता है। - चंद्रमा के क्षेत्र में मंगल बैठा हो तो वह जातक रक्तपि के विकार से हीन अंग और कई प्रकार की बीमारियों से युक्त होता है। - चंद्रमा के घर में यदि बुध हो तो जातक क्षय रोग और कुष्ठ रोग से ग्रस्त होता है। - लग्न या सप्तम घर में शनि हो और अष्टम घर में चंद्रमा हो तो ब्रह्मा का पुत्र भी हो तो नहीं जीता। - लग्न में मंगल, अष्टम में सूर्य तथा चतुर्थ में शनि हो तो वह कुष्ठी होता है। - लग्न से नवम तथा चतुर्थ में पाप ग्रह हो और दशम मंे राहु हो तो जातक म्लेच्छ होता है। - लग्न से 12वें भाव में चंद्रमा हो तो जातक बाईं आंख से काना होता है और द्वितीय में सूर्य हो तो अंधा होता है। - सिंह लग्न में जन्म हो और उसमें शनि हो तो जातक नेत्रहीन होता है और यदि शुक्र हो तो जन्मांध होता है। - लग्न से 12वें भाव में सूर्य हो तो जातक दाईं आंख से काना होता है। - लग्न में क्रूर ग्रह अपने घर के हों और चैथ,े 10वें भाव में भी पाप ग्रह हो तो जातक दुःख से जीता है। यदि जीवित रहे तो माता को दुःख देने वाला होता है। - सूर्य-शनि, मंगल इनमें से कोई ग्रह यदि राहु-केतु से युत होकर नीच में हो तो जातक माता का हत्यारा होता है। - लग्न में क्रूर ग्रह और लग्नेश क्रूर ग्रह की राशि में हो तो जातक कष्ट से ऊब कर आत्महत्या कर लेता है। - 7वें भाव में मंगल, पांचवें भाव में सूर्य हो तो जातक का जन्म जंगल या किसी वृक्ष के नीचे होता है। - लग्न में चंद्रमा, दूसरे में शुक्र, 12वें भाव में बुध-सूर्य, 5वें में राहु हो तो जातक भाई को बंधन दिलाने वाला होता है। - दूसरे और बारहवें भाव में पाप ग्रह हो तो जातक माता को डराने वाला और चैथे-दशवें भाव में पाप ग्रह हो तो जातक पिता को डराने वाला होता है। - शनि-मंगल के बीच में सूर्य हो तो पिता और यदि शनि-मंगल के बीच में चंद्रमा हो तो जातक माता को मारता है। - यदि षष्ठेश स्वराशिस्थ लग्न में हो या 8वें भाव में हो तो निम्न अंगों में रोग होता है षष्ठेश सूर्य हो तो मस्तक में, चंद्रमा हो तो मुख में, मंगल हो तो गले में, बुध हो तो नाभि में, गुरु हो तो नासिका में, शुक्र हो, आंख में, शनि हो तो पैर में, राहु हो तो पेट में, केतु हो तो भी पेट में रोग हो सकता है। - लग्नेश यदि मंगल या बुध की राशि हो और बुध से दृष्ट हो तो जातक को मुख का रोग होता है। - 12वें या 7वें भाव में पाप ग्रह हो तथा 5वें भाव में चंद्रमा हो तो वह जातक स्त्री और पुत्र विहीन होता है। - लग्न से अष्टम स्थान में चर राशि में हो तो विदेश में, स्थिर राशि हो तो स्वदेश में तथा द्विस्वभाव हो तो मार्ग में मृत्यु समझनी चाहिए। - दशम भाव में मंगल शत्रु राशि का हो तो जातक का पिता जल्दी मर जाता है। - लग्न में गुरु, द्वितीय में शनि, सूय-मंगल-बुध हो तो जातक के विवाह के समय पिता का मरण होता है। - लग्न से 12वें भाव में भी कोई भी ग्रह हो तो जातक दुष्ट स्वभाव वाला, पापी, दुःखी, बहुत अपव्ययी तथा महादुष्ट होता है। - 12वें भाव में चंद्रमा या सूर्य या दोनों साथ हों और यदि उस पर मंगल की दृष्टि हो तो उसका धन सरकार ले जाती है। परंतु यदि शुभ ग्रह की दृष्टि भी हो तो भी शुभ फल नहीं मिलता। - बृहस्पति वक्री होकर शनि के घर अर्थात् (मकर-कुंभ) में हो और बुध-सूर्य सप्तम भाव में हो तो जातक वांछित मृत्यु पाता है और एकादश में शनि हो तो जातक शीघ्र ही मृत्यु पाता है। इसके अतिरिक्त अन्य अशुभ योग बहुत हैं जैसे शूल योग, सब ग्रह तीन स्थानों में होते हैं जिससे जातक दरिद्र, आलसी, जन्मभूमि से दूर रहता है। 10- गजकेसरी योग: चंद्रमा से दशम गुरु हो सम्मानित तो होता है परंतु मानसागरी के अनुसार जातक पत्नी और बच्चों का त्याग करके संयासी हो जाता है। 11- चाप रोग: दशम से सात स्थानों में सातों ग्रह के रहने पर चाप योग होता है। जातक चोर, धूर्Ÿा, भाग्यहीन, असत्यभाषी होता है। 12- देह-कष्ट योग: लग्नेश पाप ग्रहों के साथ हो या अष्टम भाव में हो। तो देह-कष्ट योग होता है।


पराविद्या विशेषांक  अप्रैल 2013

फ्यूचर समाचार पत्रिका के पराविद्या विशेषांक में नवग्रह के सरल उपाय, भाग्य, पुरुषार्थ और कर्म, राहु का अन्य ग्रहों पर प्रभाव, अपरिचित महत्वपूर्ण ग्रह, क्या आप बन पाएंगे सफल इंजीनियर, द्वादशांश से अनिष्ट का सटीक निर्धारण, क्रिकेटर बनने के ग्रह योग, लग्नानुसार विदेश यात्रा के प्रमुख योग, विभिन्न लग्नों में सप्तम भावस्थ गुरु का प्रभाव एवं उपाय, हेल्थ कैप्सुल, लाल किताब के विशिष्ट टोटके, दुर्योग, संत देवराहा बाबा, जगत की गति का द्योतक है 108, विक्रम संवत 2070, अंक ज्योतिष के रहस्य, फलित विचार व चंद्र, सत्यकथा, ईश्वर प्राप्ति का सहज मार्ग कौन, हिंदू मान्यताओं का वैज्ञानिक आधार, पर्यावरण वास्तु, वास्तु प्रश्नोतरी, हस्तरेखा, यंत्र समीक्षा/मंत्र ज्ञान, बिहार का खजुराहो: नेपाली मंदिर, विवादित वास्तु, आदि विषयों पर विस्तृत रूप से चर्चा की गई है।

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