भाग्य का सिकंदर

भाग्य का सिकंदर  

हिंदू शास्त्रों में कहा गया है कि जैसा हम बोयेंगे वैसा ही काटेंगे अर्थात जैसे हमारे कर्म होंगे वैसा ही परिणाम हमें भुगतना होगा। यह जरूरी नहीं कि इस जन्म में किये कर्मों का फल अभी भुगतना पड़े, यह तो अगले जन्मों में भी चुकाना पड़ सकता है। इसी तरह कुछ कर्मों का फल प्रारब्ध के रूप में हमें इस जन्म में मिलता है। बच्चे का जन्म भी उसे प्रारब्ध के अनुसार ही मिलता है। और भाग्य भी उसी के अनुसार निर्धारित होता है अर्थात् कर्म और भाग्य दोनों एक दूसरे पर आधारित हैं। कर्म के अनुसार ही भाग्य निर्धारित होता है और भाग्य के अनुरूप ही व्यक्ति कर्म करता है, वही उसे सही दिशा की प्रेरणा देता है। और जिसे सही दिशा मिल जाए, वही भाग्य का सिकंदर बन जाता है। क र्म और भाग्य में से किसका स्थान श्रेष्ठ? यदि इस पर चर्चा की जाए तो अनेक तथ्य सामने आएंगे कि कर्म किए बिना कुछ नहीं होता। बच्चा भी दूध पीने के लिए रोता है, तभी मां दूध पिलाती है। लेकिन भाग्य के महत्व को हम नजरअंदाज नहीं कर सकते। भाग्य व्यक्ति को बिना कर्म करे ही कुछ भी दे सकता है और भाग्यहीन व्यक्ति जीवन भर कर्म करता रहे तो भी उसे कुछ नहीं मिलता। जन्मपत्री का विश्लेषण करते हुए अनेक कुंडलियां ऐसी आती है जिनमें भाग्य अजीबोगरीब खेल खेलता है। ऐसा ही कुछ हुआ वीरेंद्र और सुनील के साथ । वीरेंद्र और सुनील की बहुत गहरी दोस्ती थी। दोनों काॅलेज में एक साथ पढ़ते थे, एक साथ घूमते थे और एक जैसे ही नंबर भी लाते थे। केवल एक या दो नंबर के अंतर से ही वे प्रथम अथवा द्वितीय स्थान पर रहते थे। यह बात 1970 के आस-पास की है जब बी. ए. में प्रथम आने वाले छात्र को लंदन में आगे पढ़ने के लिए वहां से विशेष बुलावा आता था। वीरेंद्र कक्षा में प्रथम आया था और सुनील द्वितीय स्थान पर था। वीरेंद्र शुरू से विदेश जाने के सपने देखता था और उसने प्रथम आने के लिए जी-तोड़ मेहनत की थी जिससे उसे विदेश जाने का अवसर मिल सके, इसलिए वह प्रथम आने पर बहुत खुश था कि उसके मन की मुराद पूरी होने जा रही है। उधर सुनील एक साधारण से परिवार से था। वह अपने मां-बाप का इकलौता बेटा था। कभी उनको छोड़ कर कहीं जाने का नहीं सोचा। उसने तो दिल्ली विश्वविद्यालय से ही एम. ए. करने का मन बना लिया था। वीरेंद्र की खुशी से वह भी बहुत खुश था। दोनों ने एक दूसरे की खुशी मनाते हुए पार्टी की। उसी दिन वीरेंद्र को एंबेसी में साक्षात्कार के लिए बुलाया गया था। वीरेंद्र सुनील को भी अपने साथ ले गया वहां पर सुनील वीरेंद्र के साथ ही बैठा था। तभी एक अर्दली आकर सबको एक फार्म दे गया और सबसे उसे भरने के लिए कहा। वीरेंद्र के साथ सुनील ने भी फार्म भर कर दे दिया और कुछ देर बाद वीरेंद्र के साक्षात्कार के बाद सुनील को भी साक्षात्कार के लिए बुलाया गया तो दोनों को ही काफी आश्चर्य हुआ। सुनील से काफी सवाल पूछे गये जिसका उसने अत्यंत सहजता से उत्तर भी दे दिया। दोनों घर आ गये परंतु वीरेंद्र को यही बात खलती रही कि सुनील ने वहां पर बिना बात के क्यों फार्म भरा और इंटरव्यू भी दिया जबकि सुनील ने यह सब खेल खेल में किया था। कुछ ही दिन बाद सुनील के घर यू. के. एंबेसी से काॅल लेटर आ गई, उसे वहां पढ़ने का वीजा दे दिया गया जबकि वीरेंद्र को निरस्त कर दिया गया। सुनील के लिए यह बिल्कुल अप्रत्याशित था। उसके घर वाले भी बिल्कुल भी इस पक्ष में नहीं थे कि वह बाहर जाए। परंतु होनी के आगे किसी की नहीं चलती। सुनील के भाग्य ने उसे विदेश ले जाना था, तो कैसे भी अपने माता-पिता को मना कर वहां चला गया और वायदा कर गया कि शीघ्र ही पढ़ाई खत्म करके वापिस आ जाएगा। लेकिन वहां पढ़ाई खत्म होते-होते नौकरी मिल गई, वहीं विवाह भी हो गया और फिर बच्चे। कुछ साल बाद लंदन से अमेरिका में शिफ्ट हो गये और वहीं के होकर रह गये। वीरेेंद्र से उसकी कभी मुलाकात नहीं हुई । हां, उसका चयन होने के बाद उसने उसे बहुत खरी खोटी सुनाई थी तथा उसका स्थान चुराने का आरोप भी लगाया था परंतु उस वक्त दोनों ही अपने भाग्य से बंधे थे और चाह कर भी कुछ नहीं कर सकते थे। आइये, देखें सुनील की जन्मपत्री में ग्रहों का खेल। सुनील की जन्मकुंडली में भाग्य के स्वामी बुध, चंद्र लग्नेश होकर छठे भाव में षष्ठेश गुरु के साथ बैठे हैं और द्वादश भाव में स्थित शनि को देख रहे हैं। द्वादश भाव में शनि योग कारक होकर बुध और गुरु को दृष्टि दे रहे हैं। चतुर्थेश व शुक्र अधिष्ठित राशि के स्वामी होकर द्वादश में वक्री अवस्था में बहुत बलवान हैं। लाभेश सूर्य पंचम त्रिकोण भाव में शुक्र, बुध व गुरु के बीच शुभकर्तरी योग में हैं तथा अपने घर एकादश भाव अर्थात् लाभ स्थान को देख रहे हैं। इसलिए सुनील को जीवन भर प्रचुर मात्रा में विदेश से धन प्राप्त होता रहा। चंद्रमा दशमेश होकर भाग्य स्थान में त्रिकोण भाव में बैठे हैं। चंद्र कुंडली के अनुसार गुरु और चंद्र लग्नेश बुध चंद्र से दशम भाव में बैठ कर गजकेसरी योग भी बना रहे हैं। लग्न कुंडली और चंद्र कुंडली दोनों से ही सुनील की कुंडली में कई राजयोग बन रहे हैं। नीच का बुध भाग्येश होकर नीच भंग राजयोग बना रहे हैं क्योंकि चंद्रमा से बुध केंद्र में हैं और गुरु के साथ है। - चतुर्थेश व पंचमेश शनि और शुभ ग्रह बुध व गुरु की आपसी दृष्टि से बने राजयोग के कारण ही सुनील को मकान व वाहन का सुख प्राप्त हुआ। धनेश मंगल, नवांश में एकादश भाव में अपनी मूल त्रिकोण राशि में उच्च सूर्य के साथ प्रबल धनराज योग बना रहे हैं। - सूर्य भी लाभेश होकर नवांश में उच्च राशि में बैठे हैं इसलिए सुनील को धन का अभाव कभी नहीं रहा और लक्ष्मी जी की कृपा सदा बनी रही। -सुख का कारक शुक्र जन्म कुंडली में लग्नेश होकर सुख स्थान में चतुर्थ भाव के स्वामी शनि से त्रिकोण में होकर राजयोग बना रहे हैं। इसलिए सुनील को हर प्रकार का सुख प्राप्त हुआ। मातृ कारक ग्रह चंद्रमा के लग्न से भाग्य स्थान में तथा गुरु से केंद्र में होने से माता से भी अत्यधिक लगाव रहा। इन्हीं सब योगों के कारण 1974 में गुरु में शनि की दशा शुरू होते ही सुनील को बिना चाहे ही विदेश यात्रा का मौका मिला और वहां पर जाकर पंचमेश शनि ने उच्च शिक्षा दिलवाई तथा चतुर्थेश शनि ने वहां स्थायी निवास भी करवा दिया। गुरु और शनि की पूरी दशा में इनका जीवन विदेश में पढ़ाई करने के पश्चात काम करते हुए बीता। वर्तमान समय में बुध की महादशा चल रही है। चंद्र से दशम भाव में बुध व गुरु होने से इसकी धर्म और ज्योतिष में रूचि बढ़ी व इन्होंने ज्योतिष सीखा और आजकल विदेश में ज्योतिष की शिक्षा दे रहे हैं। 2023 तक बुध की महादशा चलेगी, तब तक सुनील ज्योतिष के क्षेत्र में भी अपने नाम की कीर्ति विदेश में फैलाएगें।


भगवत प्राप्ति  फ़रवरी 2011

भगवत प्राप्ति के अनेक साधन हैं। यह मार्ग कठिन होते हुए भी जिस एक मात्र साधन अनन्यता के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है, आइए ,जानें सहज शब्दों में निरुपित साधना का यह स्वरूप।

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