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भगवद् भक्त एवं भक्ति प्राप्ति

भगवद् भक्त एवं भक्ति प्राप्ति  

पहचान एवं ज्योतिषीय योग आर. के. शर्मा विभिन्न धर्म ग्रंथों के आधार पर भक्त के स्वरूप को जानना उचित है। उसके लक्षणों का निर्धारण होने पर ही यह संभव है। धार्मिक जीवन, संन्यास योग आदि कारक व्यक्ति को भगवद् प्राप्ति की दिशा में अग्रसर करते हैं और विभिन्न ज्योतिषीय योग ही उसको प्रकाशित करते हैं। इन सबके बारे में जानने के लिए यह लेख प्रकाश-स्तंभ का कार्य करेगा। श्रेष्ठ भगवद् भक्त कौन है? इस प्रश्न के उत्तर के लिए निम्नलिखित श्लोक दृष्टव्य है। ये हिताः सर्वजन्तूनांगतासूया अमत्सराः। समबुद्ध्या प्रवर्तन्ते वै-भागवताः स्मृताः॥ (नारद पुराण-1/5) 'जो सब जीवों के हितैषी हैं, जो दूसरों का दोष नहीं देखते, जो किसी से डाह नहीं करते, मन-इंन्द्रियों को वश में रखते हैं, निःस्पृह और शांत हैं, वे उत्तम भगवद् भक्त हैं। जो मन, कर्म और वचन से दूसरों को पीड़ा नहीं पहुंचाते, जिनका संग्रह करने का स्वभाव नहीं है, वे भगवद् भक्त है। जिनकी सात्विकी बुद्धि उत्तम भगवत कथा सुनने में लगी रहती है, जो श्रेष्ठ मनुष्य माता-पिता के प्रति गंगा और विश्वनाथ का भाव रखकर उनकी सेवा करते हैं, वे श्रेष्ठ भगवद् भक्त हैं। जो श्रेष्ठ पुरुष सबके लिए हित भरे वचन बोलते हैं और केवल गुणों को ही ग्रहण करते हैं, वे इस लोक में भगवद् भक्त हैं। जो श्रेष्ठ पुरुष समस्त जीवों को अपने ही समान देखते हैं तथा शत्रु-मित्र में भी समान भाव रखते हैं, वे श्रेष्ठ भगवद् भक्त हैं, जो मनुष्य दूसरों का अभ्युदय देखकर प्रसन्न होते हैं और सदा हरिनाम परायण रहते हैं, वे श्रेष्ठ भगवद् भक्त हैं और जो परमेश्वर शिव एवं परमात्मा विष्णु के प्रति समबुद्धि से बर्ताव करते हैं वे श्रेष्ठ भगवद् भक्त हैं। कथा-श्रवण से भगवत प्राप्ति! : य एवमेतां हरिमेधसो हरेः कथां सुभद्राकथनीय मायिनः। आपीय कर्णा जलिभिर्भवापहामहो विरजयेत विना परेतरम्॥ (मैत्रेयजी कहते हैं)- 'विदुरजी! भगवान के लीलामय चरित्र अत्यंत कीर्तनीय हैं और उनमें लगी हुई बुद्धि सब प्रकार के पाप-तापों को दूर कर देती है। जो पुरुष उनकी इस मंगलमयी मंजुल कथा को भक्ति भाव से सुनता या सुनाता है, उसके प्रति भक्त-वत्सल भगवान हृदय से शीध्र प्रसन्न हो जाते हैं। भगवान तो सभी कामनाओं को पूर्ण करने में समर्थ हैं, उनके प्रसन्न होने से संसार में क्या दुर्लभ है? किंतु उन तुच्छ कामनाओं की आवश्यकता ही क्या है? जो लोग अनन्य भाव से भजन करते हैं, उन्हें तो वे अंतर्यामी परमात्मा अपना परमपद दे देते हैं। अरे! संसार में पशुओं को छोड़कर अपने पुरुषार्थ का सार जानने वाला ऐसा कौन पुरुष होगा, जो आवागमन से छुड़ा देने वाली भगवान की प्राचीन (पौराणिक) कथाओं में से किसी भी अमृतमयी कथा का अपने कर्णपुटो से एक बार पान करके फिर उनकी ओर से मन हटा लेगा।' (महाभारत से) जो श्रेष्ठ पुरुष समस्त जीवों को अपने ही समान देखते हैं तथा शत्रु-मित्र में भी समान भाव रखते हैं, वे श्रेष्ठ भगवद् भक्त हैं, जो मनुष्य दूसरों का अभ्युदय देखकर प्रसन्न होते हैं और सदा हरिनाम परायण रहते हैं, वे श्रेष्ठ भगवद् भक्त हैं। पृथ्वी किन के भार से पीड़ित रहती है? पृथ्वी देवी ब्रह्माजी से कहती हैं- 'जो श्रीकृष्ण की भक्ति से हीन हैं और जो श्रीकृष्ण भक्त की निंदा करते हैं, उन महापातकी मनुष्यों का भार वहन करने में मैं सर्वथा असमर्थ हूं। जो अपने धर्म तथा आचार से रहित हैं तथा नित्य कर्म से हीन हैं, जिनकी वेदों में श्रद्धा नहीं है, उनके भार से मैं पीड़ित हूं। जो माता-पिता, गुरु, पत्नी, पुत्र तथा आश्रित वर्ग का पालन-पोष्ण नहीं करते हैं, उनका भार वहन करने में मैं असमर्थ हूं। पिता श्री, जो झूठ बोलते हैं, जिनमें दया तथा सत्य के आचरण का अभाव है तथा जो गुरुजनों और देवताओं की निंदा करते हैं, उनके भार से मैं पीड़ित हूं। जो मित्र द्रोही, कृतघ्न, झूठी-गवाही देने वाले, विश्वासघाती और धरोहर हड़प लेने वाले हैं, उनके भार से मैं पीड़ित हूं। जो कल्याणमय सूक्तों, साम मंत्रों तथा एकमात्र मंगलकारी हरि-नामों को बेचते हैं, उनके भार से मैं पीड़ित हूं। जो जीवों की हिंसा करने वाले, गुरु द्रोही, ग्रामयाजी, लोभी, मुर्दा फूंकने वाले तथा शूद्रान्न भोजी हैं, उनके भार से मैं पीड़ित हूं। जो मूढ़ मनुष्य पूजा, यज्ञ, उपवास-व्रत तथा नियमों का भंग करने वाले हैं, उनके भार से मैं पीड़ित हूं। जो पापी लोग सदा गौ, ब्राह्मण, देवता, वैष्णव, श्रीहरि कथा और श्री हरि की भक्ति से द्वेष करते हैं, उनके भार से मैं पीड़ित हूं।' (ब्रह्मवैवर्त्त कृष्ण 04/20-28) भगवान को प्रसन्न करने वाले आठ भाव-पुष्प : अहिंसा प्रथमं पुष्पं पुष्पमिन्द्रियनिग्रहः। सर्वपुष्पं दया भूते पुष्पं शान्तिर्विशिष्यते। शमः पुष्पं तपः पुष्पं ध्यानं पुष्पं च सप्तमम्। सत्यं चैवाष्टमं पुष्पमेतैस्तुष्यति केशवः॥ (अग्नि पुराण-202/17-18) 'अहिंसा' (किसी भी प्राणी को तन-मन-वचन से दुखी न करना, प्रथम पुष्प है। 'इंद्रिय-निग्रह' (इंद्रियों को मनमाने विषयों में न जाने देना) दूसरा पुष्प है। 'प्राणिमात्र पर दया' (दूसरों के दुःख को अपना दुःख समझकर उसे दूर करने के लिए चेष्टा) करना तीसरा सर्वोपयोगी पुष्प है। 'शांति' (किसी भी अवस्था में चित्त का क्षुब्ध न होना) चतुर्थ पुष्प सबसे बढ़कर है। 'शम' (मन को वश में रखना) पांचवां पुष्प है। 'तप' (स्वधर्म के पालनार्थ कष्ट सहना छठवां पुष्प है। 'सत्य' (इष्ट देव के स्वरूप में चित्त की तदाकार-वृत्ति) सातवां और आठवां पुष्प है। इन पुष्पों से भगवान संतुष्ट होते हैं। धार्मिक जीवन : जातक का जीवन कैसा होगा? इस बात पर विचार करने के लिए सर्व प्रथम सभी लग्नों (लग्न, चंद्र एवं सूर्य लग्न) एवं लग्नेशों पर विचार करना चाहिए। लग्न अथवा लग्नेश के साथ नवम् (धर्म भाव) अथवा (धर्मेश) एवं लग्नेशों पर विचार करना होता है। जब लग्न अथवा चंद्र लग्न (आत्मा) तथा उसके स्वामी का लग्न और चंद्र से नवम भाव के स्वामी से संबंध हो जाता है तो मनुष्य का जीवन बहुत धर्ममय हो जाता है। यदि सूर्य लग्न (हृदय) तथा उसके स्वामी का युति अथवा दृष्टि संबंध, सूर्य से नवम (धर्म) तथा उसके स्वामी के साथ भी हो तो मनुष्य वह चाहे गृहस्थी हो अथवा सन्यासी ज्ञानियों में श्रेष्ठ जीवन वाला और मोक्ष प्राप्त महात्मा होता है। सन्यासी योग : नवमेश एवं दशमेश का अष्टम या षष्ठ भाव के स्वामी के साथ संबंध हो तो जातक सन्यासी बनता है। लग्नेश तथा शनि ग्रह निर्बल हो तो मनुष्य सन्यास ग्रहण करता है। चार या अधिक ग्रह एक साथ हों तो वैराग्य की प्रबलता होती है। चंद्रमा शनि के द्रेष्क्रोण या शनि, मंगल के नवांश में हों और उस पर केवल शनि की दृष्टि हो तो संन्यास योग होता है। सूर्य, चंद्र या गुरु में से एक भी निर्बल होकर लग्न, दशम या द्वादश स्थान में हों और उस पर बलवान शनि की दृष्टि हो तो संन्यासी एवं वीतरागी होता है। अरविंद घोष एवं विवेकानंद की कुंडली इस का ज्वलंत उदाहरण है। मोक्ष प्राप्ति योग : यदि लग्नेश का संबंध धर्म (नवम) स्थानों से हो और द्वादश भाव तथा भावेश पर सात्विक ग्रहों का तथा केतु का प्रभाव हो तो मनुष्य को मोक्ष प्राप्त होता है। प्रभु कृपा योग : नवम भाव धर्म स्थान होने के साथ-साथ प्रभु कृपा का भी है। अतः नवमेश बलवान होकर तथा शुभ युक्त अथवा शुभ दृष्ट होकर जिस भी शुभ भाव में स्थित हो जाता है तो जातक को अचानक दैवयोग (प्रभु कृपा) से उस भाव द्वारा प्रदर्शित वस्तु की प्राप्ति होती है। यथा- नवमेश बली होकर दशम भाव में हो तो राज्य प्राप्ति, चतुर्थ में वाहन प्राप्ति, द्वितीय भाव में धन प्राप्ति होती है प्रभु कृपा का अनुभव होता है। साधु संतों की संगति : लग्न या लग्नों तथा तृतीय भावों/भावेशों का संबंध जब नवम भाव से हो जाता है तो मनुष्य साधुओं एवं महात्माओं की संगति अधिक करता है। कुछ भगवत् प्राप्त महापुरूषों की कुंडलियों का नीचे किया गया विश्लेषण ध्यान देने योग्य है। ईसा मसीह की कुंडली में चतुर्थ-पंचम भाव का स्वामी शनि शांति एवं बुद्धि का स्वामी होकर ईश्वर/धर्म के नवम् भाव में बैठकर, नवमेश बुध को देख रहा है। नवमेश बुध भी अपने भाव को देख रहा है। अतः बुद्धि का धर्म-विवेक व ईश्वर से पूर्ण संबंध हो गया है। तृतीयेश व षष्ठेश गुरु लग्न में बैठा है। देवगुरु लग्न (तन भाव) में बैठने से पूजनीय योग बन गया है। गुरु से परिश्रम एवं महान पुरुषार्थी योग बना है। लग्नेश शुक्र भी केंद्र में बैठा है। इन योगों से एक महात्मा एवं ईश्वरत्व की प्राप्ति हुई। भक्त नामदेव जी की कुंडली में ईश्वर प्राप्ति वाले नवम भाव का स्वामी चंद्र, बुद्धि भाव में बैठा है, जो मन का भी स्वामी है। अतः आपके मन में ईश्वरीय गुणों की महानता का स्रोत बहना आवश्यक हो गया था। पंचमेश (बुद्धि) गुरु तन भाव में बैठकर पंचम भाव को देख रहा है और धर्मेश तथा मनके स्वामी चंद्र को भी देखता है। हृदयेश गुरु, बुद्धि व आत्मा में भक्ति (नवमेश चंद्र) की भावना मजबूत हो गयी। देहाधीश (लग्नेश) मंगल के साथ सूय को नवमेश चंद्र देख रहा है। आदि शंकराचार्य जी की कुंडली में धर्मेश गुरु षष्ठेश होकर लग्न (तन) में उच्च का होकर बैठा है तथा अपने धर्म (नवम) भाव को देख रहा है, साथ में बुद्धि भाव को भी देख रहा है गुरु हृदय का अधिकारी भी है। साथ में पंचमेश मंगल अपने भाव को देख रहा है। मंगल कर्मेश (दशम) भी है जो धर्म (नवम भाव) को अष्टम दृष्टि से देख रहा है। अतः यहां धर्म-कर्म-बुद्धि-तन (चंद्र) एवं हृदय-आत्मा (सूर्य) सभी बलवान होने से धर्म-ईश्वरत्व के गुण की प्रधानता हुई और ईश्वर की भक्ति भावना प्रबल हुई। आप अवतारी पुरुष कहलाए। गुरु नानक देव जी की कुंडली में धर्मेश एवं शांति (चतुर्थ) का भावेश मंगल स्वक्षेत्री है। लग्नेश (तन) सूर्य भी चतुर्थ में मित्र के साथ बैठा है। अतः तन में उत्तम भक्ति तथा शांति स्थापित हुई। साथ में लाभेश बुध भी है। सूर्य तन एवं आत्मा का स्वामी है। अतः महान ईश्वर-भक्ति, धन (बुध), सुख और शांति प्राप्ति हुई। चतुर्थ भाव में तीन बलवान ग्रहों की युति से अखंड सुख (ईश्वर भक्ति का) भोगने का अधिकारी बनता है। यदि तन भाव का स्वामी का संबंध धर्मेश (नवम) के साथ हो तो वह जातक महान भक्त बनता है परंतु यह भी शर्त है कि दोनों ग्रह तथा वह राशि मित्र होना आवश्यक है। साथ में पंचमेश-धनेश या लाभेश भी हों या इनका दृष्टि या स्थान संबंध हो तो अति उत्तम भक्ति योग होता है। स्वामी विवेकानंद की कुंडली में देहाधीश शनि धर्म भाव में, मित्र क्षेत्री चंद्र - लग्न में बैठा है। धर्मेश बुध, लग्न में मित्र क्षेत्री बैठा है। साथ ही पंचमेश शुक्र कर्मेश होकर देह (लग्न) में मित्र क्षेत्री मित्र बुध के साथ बैठा है। इन योगों से तन में धर्म और बुद्धि का, धर्म और ईश्वरीय ज्ञान-भक्ति की गहनता तथा वाणी का तेज प्राप्त हुआ। मंगल चतुर्थेश एवं लाभेश और स्वक्षेत्री होकर लाभ भाव को देख रहा है। शनि, बुध और शुक्र के योग से ईश्वर में भक्ति और ज्ञान में अटूट विश्वास और श्रद्धा प्राप्त हुई। आप इन्ही योगों के कारण समदर्शी, तत्वदर्शी तथा ईश्वर के अनन्य ज्ञानी भक्त हुए। रामकृष्ण परमहंस : देहाधीश शनि उच्च का होकर धर्म भाव में है। धर्मेश शुक्र भी उच्च का होकर धन भाव में है। कुण्डली में तीन ग्रह शुक्र (चतुर्थेश -नवमेश), शनि (लग्नेश-तीनों लग्नों का) एवं मंगल (पराक्रमेश व दशमेश) भी उच्च का है। गुरु पंचम में बैठकर लग्न तथा लग्नेश को देख रहा है। इन योगों से ईश्वरीय ज्ञान-भक्ति एवं महान महात्मा का योग बना। राज्येश मंगल का द्वादश भाव में उच्च का होकर बैठना (केतु का प्रभाव) ही सन्यासी बनाता है। धार्मिक तथा परम भक्त ईश्वर के जनमांग में के ग्रह योग : कुंडली में नवमेश नवम में हो या लग्न में बैठा हो। नवमेश पंचम भाव में हो या लग्नेश चतुर्थ भाव में हो। लग्नेश (चंद्र नहीं) पंचम भाव में बैठा हो या लग्नेश नवम भाव में बैठा हो। लग्नेश या पंचमेश ग्रह लग्न, पंचम या नवम भाव में बैठा हो। नवमेश व लग्नेश की युति व दृष्टि संबंध या स्थान परिवर्तन योग हो। लग्न, पंचम तथा नवम भावों में कोई भी ग्रह न तो नीच राशि का होकर बैठा हो और न कोई राहु या केतु इन तीनों स्थानों में बैठे हों। लग्नेश, नवमेश, पंचमेश के साथ राहु या केतु न बैठे हों।

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