शिक्षा पर शनि का प्रभाव

शिक्षा पर शनि का प्रभाव  

व्यूस : 2600 | जनवरी 2016

शनि जातक को शिक्षा प्रदान करने के लिए एक मुख्य ग्रह है। इसके शुभ भाव या लग्न पर प्रभाव होने से जातक अच्छी शिक्षा ग्रहण करता है। इसका गोचर भी शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

जन्मकुंडली के विभिन्न भावों में शनि का निम्न प्रभाव रहता है

प्रथम भाव

व्यक्ति शोधपरक कार्यों में रुचि लेता है। यह आवश्यक नहीं है कि विद्यार्थी यह कार्य लैब में जाकर करे अपितु वह अपने दैनिक कार्यों को नवीनता के साथ करता है। शनि की यह स्थिति छात्र को एकान्तप्रिय बनाती है। छात्र गंभीरता के साथ अपना अध्ययन कार्य पूर्ण करता है।

द्वितीय भाव

विद्यार्थी अपने जन्म स्थान से दूर रहकर शिक्षा प्राप्त करता है। विदेश जाकर इच्छित विषय में शिक्षा प्राप्त करता है। शैक्षिक क्षेत्र में ईमानदारी, सदाचार का पालन करता है। उसे प्रतियोगियों का भय नहीं होता है। ऐसा छात्र समय का सदुपयोग करता है तथा उसे उसकी सफलता का परिणाम आशानुसार प्राप्त होता है।

तृतीय भाव

विद्यार्थी को पुरुषार्थ से सफलता प्राप्ति की ओर अग्रसर करता है। छात्र अपना मनोबल उच्च रख अपनी शिक्षा क्षेत्र के बाधाओं को दूर करता है। यहां स्थित शनि शिक्षार्थी को न्यायी, प्रामाणिक और चतुर बनाता है। वह गहरी बुद्धि वाला और अच्छी सलाह माननेवाला छात्र बनता है। उसकी रुचि ज्योतिष जैसे गूढ़ शास्त्रों में हो सकती है। ऐसा छात्र विवेकवान, सभा में चतुर, शीघ्र कार्य सम्पन्न करने वाला, मितव्ययी और प्रतापी होता है।

चतुर्थ भाव

उच्च शिक्षा क्षेत्र में लेकर जाता है। शनि छात्र को उदार, शांत, गंभीर और धैर्य संपन्न बनता है। वह घर से दूर रहकर शिक्षा प्राप्त कर तरक्की प्राप्त करता है। उसे प्रतियोगियों के माध्यम से भी लाभ मिलते हंै। कृषि, भूमि, वाहन, गृह निर्माण कला, वास्तु कला जैसे विषयों को बारीकी से जानने, समझने और सीखने में रूचि लेता है। कई बार छात्र को अपनी योग्यता से अधिक अंक प्राप्त होते हैं।

पंचम भाव

छात्र को बुद्धिमान और विद्वान बनाता है। वह परिश्रमी और भ्रमणशील भी होता है। शनि तकनीकी क्षेत्र, गणित, लौह तत्व, तेल, मशीनरी आदि विषय का कारक है। अतः ऐसे छात्रों की शिक्षा व्यवधान के साथ पूर्ण होती है। ऐसा जातक गूढ़ विषयों के अध्ययन में विशेष रूचि दिखाता है। ऐसे छात्र के शिक्षा कार्यों में किसी भी प्रकार की धन की कमी नहीं होती है। पंचम भाव चूंकि शेयर बाजार और खेल क्षेत्रों का भी भाव है इसलिए शिक्षार्थी को खेल-कूद, व्यायाम और शेयर बाजार के विषयों को सीखने के लिए भी तत्पर देखा गया है।

छठा भाव

विद्यार्थी को मशीन निर्माण कार्य, कानून की शिक्षा प्राप्ति के लिए प्रोत्साहित करता है। शनि की यह स्थिति छात्र को शोध विषयों से जोड़ती है। ऐसा छात्र अपने प्रतियोगियों को अपनी योग्यता से शांत रखता है। वह अच्छा वक्ता और तर्ककुशल बनता है। उसके प्रतिवादी उससे भयभीत रहते हैं। लम्बे समय तक अध्ययन कार्य करने पर भी उसे थकावट का अनुभव नहीं होता है। शिक्षार्थी की ज्ञान अर्जन क्षमता कमाल की होती है।

सप्तम भाव

छात्र को शैक्षिक जीवन में अच्छे परिणाम देता है। उसे योग्यता अनुसार अंक प्राप्त होते हैं। ऐसा छात्र मेहनती और कर्मठ होता है। बहुत लम्बे समय तक भी अध्ययन करने से वह थकता नहीं है। अपनी मेहनत पर भरोसा कर शिक्षा में सफलता प्राप्त करता है। ऐसे छात्र को खनन आदि विषयों से जुड़े क्षेत्रों के अध्ययन कार्य में रुचि होती है। छात्र भूवैज्ञानिक बनने के प्रयासों में सफल होता है। उसकी रुचि भूमि से प्राप्त खनिजों के अध्ययन में विशेष रूप से रहती है।


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अष्टम भाव

विद्यार्थी को गहन शिक्षण क्षेत्र से जोड़ता है। शिक्षा प्राप्ति ऐसे छात्र के लिए नवीन खोजों का क्षेत्र होती है। ऐसे छात्र विषयों की तकनीकी जानकारी पाने की कोशिश करते हैं। उसमें शिक्षा कार्यों के लिए विशेष उत्साह देखा जा सकता है। जीवन बीमा, शेयर बाजार, चिकित्सा क्षेत्र, देश के सीमा के प्रहरी अथवा शोध छात्र के रूप में अध्ययन करते हुए इन्हें देखा जा सकता है। सेना व पेंशन से संबंधित क्षेत्रों की पढ़ाई में रुचि लेता है।

नवम भाव

विद्यार्थी को शिक्षा क्षेत्र में बिना किसी के सहयोग के अपनी योग्यता से सफलता प्राप्ति के लिए प्रयासरत रखता है। शैक्षिक क्षेत्र में उन्नति पाने में उसे गुरु के अतिरिक्त किसी अन्य की सहायता अच्छी नहीं लगती है। एक विषय का अध्ययन करते समय उसे अनेक पुस्तकों का अध्ययन करना पसंद होता है। वह विचारशील, स्थिरचित्त, मृदुभाषी और दूसरों के साथ मृदु व्यवहार करने वाला होता है। अपनी योग्यता और प्रतिभा से सभी के आकर्षण का केंद्र होता है।

दशम भाव

विद्यार्थी को नीति विषयों का ज्ञाता, महत्वाकांक्षी और स्वाभिमान से सफलता अर्जित करने का गुण देता है। ऐसे शिक्षार्थी को लोक सेवा से जुड़े विषय, राजनीति के विषय, समाज सेवा के विषय, न्याय क्षेत्रों से सम्बंधित विषयों में शिक्षा प्राप्त करना पसंद हो सकता है। उसकी सभी बड़ी सफलताओं का श्रेय उसकी कर्तव्यनिष्ठा को दिया जाता है। भूमि व इंटीरियर डिजाइनिंग और वास्तुकला इंजीनियरिंग से संबंधित क्षेत्रों में शिक्षा प्राप्त करने के प्रयास करता है।

एकादश भाव

विद्यार्थी को विभिन्न विधाओं का जानकार बनाता है। ऐसे छात्र स्थिर बुद्धि वाले होते हैं। इस भाव में शनि शिक्षा क्षेत्र में आंशिक बाधा देकर छात्र को आय और लाभ क्षेत्रों से अधिक से अधिक धन प्राप्त करने के उद्देश्य से शिक्षा प्राप्ति की भावना देता है। महत्वाकांक्षा की भावना प्रबल होने से शिक्षार्थी अधिक से अधिक मेहनत करने में विश्वास करता है।

द्वादश भाव

विद्यार्थी को आलस्य रहित बनाकर शिक्षा की ओर प्रेरित करता है। वह एकांत में अध्ययन कार्य करना पसंद करता है। अपनी योग्यता से वह शत्रुओं को सहजता से पराजित करता है। कठिन विषयों के अध्ययन में भी उसकी रूचि जागृत होती है। ऐसा छात्र न्याय क्षेत्र की शिक्षा पाकर वकील, बैरिस्टर या ज्योतिषी भी हो सकता है। ऐसे व्यक्ति में न्याय के लिए लड़ने की विशेष योग्यता होती है।

शनि का गोचर फल

कई बार ऐसा देखा गया है कि बच्चा पढ़ने में पहले तो बहुत अच्छा था, लेकिन अचानक उसका मन अस्थिर हो जाता है। धीरे-धीरे कक्षा में बहुत कमजोर हो जाता है और बच्चे का आत्मविश्वास स्वयं पर कम होने लगता है। देखा गया है कि अक्सर शनि के जन्म चंद्र के ऊपर गोचर के कारण ऐसा होता है। ऐसी स्थिति प्रायः दो से तीन साल चलती है। उसके बाद बच्चा पुनः आत्मविश्वास प्राप्त करता जाता है और लगभग 5 साल के अंतराल के बाद जब शनि पूर्णतः जन्म चंद्र से दूर हो जाता है तो पुनः बच्चा अपनी योग्यता स्तर प्राप्त करता है।

यदि यह स्थिति विद्यार्थी के 11वीं, 12वीं कक्षा में होने पर आ जाती है जो कि उसके लिए एक महत्वपूर्ण काल होता है तो इसकी हानि इसे जीवन भर चुकानी पड़ती है क्योंकि उसे मनचाहा विषय या काॅलेज नहीं मिल पाता है। इससे वह मानसिक रूप से प्रथम होते हुए भी द्वितीय श्रेणी का विद्यार्थी रह जाता है। ऐसी स्थिति तब आती है जब जन्मकुंडली में चंद्रमा शनि से अष्टम भाव में स्थित हो। क्योंकि शनि एक राशि चलने में ढाई वर्ष का समय लेता है अतः उसे आठवें भाव पर आने में 17 वर्ष लगते हैं और इस उम्र में जातक 11-12 कक्षा में होता है। आजकल संतान होने से पहले अधिकांश माता-पिता अपने भावी बच्चे की कुंडली बनवाने की कोशिश करते हैं अर्थात उसका जन्म समय निर्धारित करवाते हंै। उस समय यदि इस बात का ध्यान रख लिया जाए कि चंद्रमा शनि से अष्टम आदि में न हो तो ऐसी स्थिति से बचा जा सकता है।

शनि के चंद्र पर कुप्रभाव को निरस्त करने के लिए निम्न उपाय करना विशेष लाभकारी होते हंै:

  1. चार मुखी, छः मुखी एवं सात मुखी रुद्राक्ष का लाॅकेट धारण कराया जाए।
  2. संभव हो तो 14 मुखी रुद्राक्ष धारण करें जो कि शनि की साढ़ेसाती में विशेष प्रभावशाली होता है।
  3. विद्यार्थी को हनुमान चालीसा का नित्य पाठ करना चाहिए।
  4. सुंदर कांड का पाठ इस कष्ट निवारण में विशेष फलदायी होता है। यदि नित्य थोड़ा-थोड़ा पाठ भी कर लिया जाए तो विशेष लाभ मिलता है।
  5. शनिवार को पात्र में सरसों का तेल लेकर सिक्का डालें और उसमें छाया देखकर शनि भगवान को चढ़ायें।
  6. शनिवार को विद्यार्थी के काले कपड़ों का एक जोड़ा दान करें।
  7. ग्रहण अवधि में सतनाजा का दान करें।

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