पयोव्रत

पयोव्रत  

पयोव्रत पं. ब्रज किशोर ब्रजवासी यह व्रत फाल्गुन शुक्ल प्रतिपदा से द्वादशी तक बारह दिन में पूर्ण होता है। इसके लिए गुरु शुक्रादि का उदय और उन्नत मुहूर्त देखकर फाल्गुनी अमावस्या को वन में जाकर ‘त्वं देयादिवराहेण रसायाः स्थानमिच्छता। उद्धृतासि नमस्तुभ्यं पाप्मानं मे प्रणाशय।।’ इस मंत्र से जंगली सूकर की खोदी हुई मिट्टी को शरीर में लगाएं और समीप के सरोवर में जाकर शुद्ध स्नान करें। फिर गौ के दूध की खीर बनाकर दो विद्वान ब्राह्मणों को खिलाएं स्वयं भी उसी का भोजन करें। दूसरे दिन (फाल्गुन शुक्ल प्रतिपदा को) कमल नयन भगवान को गौ के दूध से स्नान कराकर हाथ में जल लेकर ‘मम सकल गुणगण वरिष्ठ महत्व सम्पन्ना युष्मत्पुत्र प्राप्ति कामनया विष्णु प्रीतये पयोव्रतमहं करिष्ये।’ यह संकल्प करें। तदनंतर स्वर्ण के बने हुए हृषीकेश भगवान का ‘¬ नमो भगवते वासुदेवाय’ इस मंत्र से आवाहनादि षोडशोपचार पूजन करके 1. महापुरुषाय, 2. सूक्ष्माय, 3. द्विशीष्र्णे, 4. शिवाय, 5. हिरण्यगर्भाय 6. आदिदेवाय, 7. मरकत श्यामवपुषे 8. त्रयीविद्यात्मने 9. योगैश्वर्यशरीराय नमः। से भगवान को प्रणाम और पुष्पांजलि अर्पित करके दूध एक बार पीएं। इस प्रकार प्रतिपदा से द्व ादशी तक बारह दिन का व्रत करके त्रयोदशी को भगवान विष्णु का यथाविधि पूजन करें। पंचामृत से स्नान कराएं और तेरह ब्राह्मणों को गोदुग्ध की खीर का भोजन कराएं। व्रत विसर्जन करके 13वें दिन स्वयं भी स्वल्प मात्रा में खीर का भोजन करें। यह व्रत पुत्र प्राप्ति की इच्छा रखने वाले अपुत्र स्त्री-पुरुषों के करने का है। देवमाता अदिति के उदर से वामन भगवान इसी व्रत के प्रभाव से प्रकट हुए थे। इस पयोव्रत का उपदेश कश्यप जी के द्वारा आदिति को जिस प्रकार दिया गया, उसकी कथा इस प्रकार है। श्री शुकदेव जी कहते हैं- ‘परीक्षित! जब दैत्यों ने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया; तब देवमाता अदिति को बड़ा दुख हुआ। वे अनाथ-सी हो गईं। एक बार बहुत दिनों के बाद जब परम प्रभावशाली कश्यप मुनि की समाधि टूटी, तब वे अदिति के आश्रम पर आए। उन्होंने देखा कि न तो वहां सुख-शांति है और न किसी प्रकार का उत्साह या सजावट ही। वहां जाकर वे आसन पर बैठ गए और अदिति ने विधिपूर्वक उनका सत्कार किया, तब वे अपनी पत्नी अदिति से, जिनके चेहरे पर बड़ी उदासी छायी हुई थी, बोले ‘कल्याणी! इस समय संसार में ब्राह्मणों पर कोई विपत्ति तो नहीं आई है? धर्म का पालन तो ठीक-ठीक होता है? प्रिये ! तुम तो सर्वदा प्रसन्न रहती हो; परंतु तुम्हारी अवस्था को देखकर ऐसा लगता है कि इस समय तुम्हारा चित्त अस्वस्थ है। तुम्हारे सब लड़के तो कुशल मंगल से हैं न ?’ अदितिने कहा- ‘भगवन् ! ब्राह्मण, गौ, धर्म और आपकी यह दासी सब सकुशल हैं। मेरे स्वामी ! यह गृहस्थ आश्रम ही अर्थ, धर्म और काम की साधना में परम सहायक है। प्रभो! आपके निरंतर स्मरण और कल्याण-कामना से अग्नि, अतिथि, सेवक, भिक्षुक और अन्य याचकों का भी मैंने तिरस्कार नहीं किया है। भगवन् ! जब आप जैसे प्रजापति मुझे इस प्रकार धर्म-पालन का उपदेश करते हैं, तब भला मेरे मनकी ऐसी कौन-सी कामना है जो पूरी न हो जाए? आर्यपुत्र ! समस्त प्रजा, वह चाहे सत्वगुणी, रजोगुणी या तमोगुण् ाी हो, आपकी ही संतान है। कुछ आपके संकल्प से उत्पन्न हुए हैं और कुछ शरीर से। भगवन् ! इसमें संदेह नहीं कि आप सब संतानों के प्रति, चाहे वे असुर हों या देवता, एक सा भाव रखते हैं, सम हैं। तथापि स्वयं परमेश्वर भी अपने भक्तों की अभिलाषा पूर्ण किया करते हैं। मेरे स्वामी ! मैं आपकी दासी हूं। आप मेरी भलाई के संबंध में विचार करें। मर्यादापालक प्रभो! शत्रुओं ने हमारी संपत्ति और रहने का स्थान तक छीन लिया है। आप हमारी रक्षा करें। बलवान दैत्यों ने मेरे ऐश्वर्य, धन, यश और पद छीन लिए हैं तथा हमें घर से बाहर निकाल दिया है। इस प्रकार मैं दुख के समुद्र में डूब रही हूं। आपसे बढ़कर हमारी भलाई करने वाला और कोई नहीं है। इसलिए मेरे हितैषी स्वामी ! आप सोच विचारकर अपने संकल्प से ही मेरे कल्याण का कोई ऐसा उपाय करें जिससे कि मेरे पुत्रों को वे वस्तुएं फिर से प्राप्त हो जाएं।’ श्रीशुकदेवजी कहते हैं- ‘इस प्रकार अदिति ने जब कश्यप जी से प्रार्थना की, तब वे कुछ विस्मित-से होकर बोले- ‘बड़े आश्चर्य की बात है। भगवान की माया भी कैसी प्रबल है! यह सारा जगत स्नेह की रज्जु से बंधा हुआ है। कहां यह पंचभूतों से बना हुआ अनात्मा शरीर और कहां प्रकृति से परे आत्मा? न किसी का कोई पति है, न पुत्र है और न तो संबंधी ही है। मोह ही मनुष्य को नचा रहा है। प्रिये ! तुम सभी प्राणियों के हृदय में विराजमान, अपने भक्तों के दुख मिटाने वाले जगद्गुरु भगवान वासुदेव की आराधना करो। वे बड़े दीनदयालु हैं। अवश्य ही श्रीहरि तुम्हारी कामनाएं पूर्ण करेंगे। मेरा यह दृढ़ निश्चय है कि भगवान की भक्ति कभी व्यर्थ नहीं होती। इसके सिवा कोई दूसरा उपाय नहीं है।’ अदिति ने पूछा - भगवन् ! मैं जगदीश्वर भगवान की आराधना किस प्रकार करूं, जिससे वे सत्यसंकल्प प्रभु मेरा मनोरथ पूर्ण करें। पतिदेव ! मैं अपने पुत्रों के साथ बहुत ही दुख भोग रही हूं। जिससे वे शीघ्र ही मुझ पर प्रसन्न हो जाएं, उनकी आराधना की वही विधि मुझे बताएं। कश्यप जी ने कहा- ‘देवि ! जब मुझे संतान की कामना हुई थी, तब मैंने भगवान ब्रह्माजी से यही बात पूछी थी। उन्होंने मुझे भगवान को प्रसन्न करने वाले जिस व्रत का उपदेश किया था, वही मैं तुम्हें बतलाता हूं। फाल्गुन के शुक्ल पक्ष में बारह दिन तक केवल दूध पीकर रहें और परम भक्ति से भगवान कमलनयन की पूजा करें। अमावस्या के दिन यदि मिल सके तो सूअर की खोदी हुई मिट्टी से अपना शरीर मलकर नदी में स्नान करें। हे देवि ! प्राणियों को स्थान देने की इच्छा से वराहभगवान ने रसातल से तुम्हारा उद्वार किया था। तुम्हें मेरा नमस्कार है। तुम मेरे पापों को नष्ट कर दो। इसके बाद अपने नित्य और नैमित्तिक नियमों को पूरा करके एकाग्रचित्त से मूर्ति, वेदी, सूर्य जल, अग्नि और गुरुदेव के रूप में भगवान की पूजा करे। और इस प्रकार स्तुति करे- ‘प्रभो ! आप सर्वशक्तिमान् हैं। अंतर्यामी और आराधनीय हैं। समस्त प्राणी आप में और आप समस्त प्राणियों में निवास करते हैं। इसी से आपको ‘वासुदेव’ कहते हैं। आप समस्त चराचर जगत और इसके कारण के भी साक्षी हैं। भगवान ! मेरा आपको नमस्कार है। आप अव्यक्त और सूक्ष्म है। प्रकृति और पुरुष के रूप में भी आप ही स्थित हैं। आप चैबीस गुणों के जाने वाले और गुणों की संख्या करने वाले सांख्यशास्त्र के प्रवर्तक हैं। आपको मेरा नमस्कार है। आप यह यज्ञ हैं, जिसके प्रायणीय और उदयनीय- ये दो कर्म सिर हैं। प्रातः, मध्याह्न और सायं- ये तीन सवन ही तीन पाद हैं। चारों वेद चार सींग हैं। गायत्री आदि सात छंद ही सात हाथ हैं। यह धर्ममय वृषभरूप यज्ञ वेदों के द्वारा प्रतिपादित है और इसकी आत्मा हैं स्वयं आप! आपको मेरा नमस्कार है। आप ही लोककल्याण- कारी शिव और आप ही प्रलयकारी रुद्र हैं। समस्त शक्तियों को धारण करने वाले भी आप ही हैं। आपको मेरा बार-बार नमस्कार है। आप समस्त विद्याओं के अधिपति एवं भूतों के स्वामी हैं। आपको मेरा नमस्कार। आप ही सबके प्राण और आप ही इस जगत के स्वरूप भी हैं। आप योग के कारण तो हैं ही स्वयं योग और उससे मिलने वाला ऐश्वर्य भी आप ही हैं। हे हिरण्यगर्भ ! आपके लिए मेरे नमस्कार । आप ही आदिदेव हैं। सबके साक्षी हैं। आपको मेरा नमस्कार । आपका शरीर मरकतमणि के समान सांवला है। समस्त संपत्ति और सौंदर्य की देवी लक्ष्मी आपकी सेविका हैं। पीतांबरधारी केशव! आपको मेरा बार-बार नमस्कार। आप सब प्रकार के वर देने वाले हैं। उसके बाद गंध, माला आदि से पूजा करके भगवान को दूध से स्नान कराएं। उसके बाद वस्त्र, यज्ञोपवीत, आभूषण, पाद्य, आचमन, गंध, धूप आदि के द्वारा द्व ादशाक्षर मंत्र से भगवान की पूजा करें। यदि सामथ्र्य हो तो दूध में पकाये हुए तथा घी और गुड़ मिले हुए शालि के चावल का नैवेद्य लगावे और उस का द्वादशाक्षर मंत्र से हवन करें। उस नैवेद्य को भगवान के भक्तों में बांट दे या स्वयं पा ले। आचमन और पूजा के बाद ताम्बूल निवेदन करें। एक सौ आठ बार द्वादशाक्षर मंत्र का जप करें और स्तुतियों के द्व ारा भगवान का स्तवन करें। प्रदक्षिणा करके बड़े प्रेम और आनंद से भूमि पर लोटकर दंडवत्-प्रणाम करें। निर्माल्य को सिर से लगाकर देवता का विसर्जन करें। कम-से-कम दो ब्राह्मणों को यथोचित रीति से खीर का भोजन कराएं। दक्षिणा आदि से उनका सत्कार करें। इसके बाद उनसे आज्ञा लेकर अपने इष्ट-मित्रों के साथ बचे हुए अन्न को स्वयं ग्रहण करें। उस दिन ब्रह्मचर्य से रहें और दूसरे दिन प्रातःकाल ही स्नान आदि करके पवित्रापूर्वक पूर्वोक्त विधि से एकाग्र होकर भगवान की पूजा करें। इस प्रकार जब तक व्रत समाप्त न हो, तब तक दूध से स्नान कराकर प्रतिदिन भगवान की पूजा करें। भगवान की पूजा में आदर-बुद्धि रखते हुए केवल पयोव्रती रहकर यह व्रत करना चाहिये। फाल्गुन शुक्र प्रतिपदा से लेकर त्रयोदशीपर्यंत ब्रह्मचर्य से रहे, पृथ्वी पर शयन करें और तीनों समय स्नान करें। झूठ न बोले। किसी भी प्राणी को किसी प्रकार से कष्ट न पहुंचावे।



रुद्राक्ष एवं आध्यात्मिक वास्तु विशेषांक   फ़रवरी 2007

प्रकृति के कोष से हमें कई जिवानोपर्यांत वस्तुएं प्राप्त होती है. ऐसी ही वस्तुओं में एक है रुद्राक्ष. रुद्राक्ष का आध्यात्मिक और औषधीय महत्त्व बहुत है. शुद्ध रुद्राक्ष की पहचान कैसे की जाए? रुद्राक्ष का सम्बन्ध भगवान शिव से कैसे जुडा हुआ हैं? रुद्राक्ष धारण

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