कष्ट निवारण हेतु देव आराधना

कष्ट निवारण हेतु देव आराधना  

प्रश्न: क्या सभी कष्टों के शमन के लिए एक ही देवता की आराधना की जा सकती है? यदि हां, तो कैसे ? किस कष्ट के लिए किस देवता की आराधना करनी चाहिए और क्यों? सविस्तार लिखें।

हिंदु धर्मावलंबियों के 33 करोड़ देवी देवता हैं। अनेक वेदों में उनका उल्लेख मिलता है तथा अनेक अट्ठारह पुराणों में उनकी विविध गाथाएं तथा पूजा अर्चना की विधियां विस्तारपूर्वक दी गई हैं।

गीता में भी अध्याय तीन में इस विषय पर भगवान कृष्ण ने अर्जुन से विस्तृत चर्चा की है कि मानव मात्र को देवी देवताओं की आराधना, यज्ञ, हवन, दान, मंत्र जप आदि उन्हें प्रसन्न करने के लिए करने चाहिए। बदले में देवी देवता भी उन्हें पर्याप्त सुख, भोग, अन्न आदि देंगे।

एक ही देवता की आराधना कर उसे प्रसन्न कर सभी कष्टों से त्राण पा लेने को इच्छुक जातक अपनी अटूट आस्था की सिद्धि एवं भावना की दृढ़ता को पूर्ण करने के मनोविचार से अपने आराध्य देवता में संपूर्ण देवताओं को देखता है तथा उस एक ही देवता विशेष का आग्रही होकर भी अन्य देवताओं से परान्मुख नहीं हो सकता। वस्तुतः देखा जाए तो ‘‘एक देव आराधन द्वारा संपूर्ण कष्टों का निवारण’’ कर सकने में कोई योगी ही सफल हो सकता है।

मन्त्रे तीर्थे द्विजे देवे दैवज्ञे भेषजे गुरौ।
यादृशी भावना यस्य सिद्धिर्भवति तादृशी।।

श्री गणेशादि पंच देवताओं और सूर्यादि नवग्रहों के कार्य विभाग अलग-अलग हैं। सभी देव, ग्रह आदि कर्म के अधीन हैं। ये अपने-अपने विशिष्ट कार्य वर्ग के प्रतिष्ठत हैं। इन सभी देवताओं का मनुष्य जीवन में प्रमुख स्थान है। इसी बात को दृष्टिगत रखते हुए हमें सभी की वंदना स्तुति करनी चाहिए, सभी की पूजा करनी चाहिए ताकि दुखादि दूर हों और सुख शांति व्याप्त हो।

अपने समस्त जीवन के सभी कष्टों के निवारणार्थ प्रतिदिन निम्न पूजा एवं स्तुति कर सकते हैं।

  • गणेश स्तुति
  • पुरुष सूक्तं (16 मंत्र यजुर्वेद से)
  • श्री सूक्तं (16 मंत्र ऋग्वेद से)
  • नौ ग्रहों के देवताओं का पूजन
  • भगवान शंकर का अभिषेक
  • तुलसी तथा अन्य पेड़-पौधों की सुरक्षा
  • अंहिसा का पालन
  • माता-पिता और आचार्य का सम्मान

इनके अतिरिक्त बुरी आदतों से परहेज एवं सत्य का आचरण भी करना चाहिए।

ये सभी कार्य श्रद्धा और विश्वासपूर्वक किए जाने चाहिए। यज्ञ, दान, तप आदि कर्म किसी भी परिस्थिति में नहीं त्यागने चाहिए क्योंकि ये कष्टों को दूर करके मनुष्य के मन को पवित्र करते हैं तथा पूर्वकृत पाप कर्मों के प्रभाव से उसे बचाते हैं।

यज्ञ, दान, तपः कर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्।
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्।। (भ.गी.अ.-18-श्लोक.5)

लेकिन ये सभी कर्म श्रद्धापूर्वक किए जाने चाहिए। अश्रद्धा से किए गए कार्य न इस जन्म में शुभफल देते हैं न अगले जन्मों में उनसे कुछ भी लाभ प्राप्त होता है।

सूर्य से राजा रामचंद्रजी, चंद्रमा से भगवान कृष्ण, मंगल से नृसिंह भगवान, बुध से भगवान बुद्ध, बृहस्पति से वामन अवतार, शुक्र से भगवान परशुरामजी, शनि से कूर्मावतार, केतु से मत्स्यावतार- नौ ग्रहों एवं लग्न से इन दशावतारों की साधना अथवा आराधना का विचार किया जाता है। दशम अवतार कल्कि भगवान हैं।

इन दश अवतारों को केवल हिंदू धर्म में ही नहीं वरन सिख धर्म में दश गुरुजी की आराधना विधान में भी विद्वानों व दैवज्ञों द्वारा मान्यता दी गई है।

ईसाई में भी इसी तरह सूर्य से होली घोस्ट, चंद्रमा से मदर मेरी, बृहस्पति तथा शुक्र से संत महात्मा ईसा मसीह तथा अन्य की मान्यता है।

इसी प्रकार ज्योतिष के विद्वान को इष्ट देवता की आराधना के संबंध में जातक को बताना चाहिए। पराशरजी ने तो यहां तक कहा है कि प्रत्येक व्यक्ति को इस संबंध में भली भांति ज्ञान अर्जन करना चाहिए।

महर्षि जैमिनी ने अपने उपदेश सूत्रों में इष्ट देवता को जानने के लिए आत्मकारक ग्रह को प्रधानता दी है। किसी भी जातक की कुंडली में लग्न, लग्नाधिपति, लग्न नक्षत्र के स्वामी एवं वह ग्रह जो सबसे अधिक अंश में है, चाहे वह किसी भी राशि में हो, आत्मकारक समझे जाते हैं। अतः आत्मकारक ग्रह के अनुसार इष्ट की आराधना की जानी चाहिए।

पंचम स्थान व पंचमेश तथा पंचम भाव में स्थित प्रबल ग्रहों के आधार पर भी इष्ट आराधना का विधान है। वैदिक देवताओं में सूर्य से शिव, चंद्रमा से पार्वती, मंगल से कार्तिकेय, स्कंद, बुध से विष्णु, बृहस्पति से इंद्र, शुक्र से शनि या लक्ष्मी, शनि से ब्रह्मा, राहु से दुर्गा केतु से गणपति की आराधना का विधान है। इसमें प्रत्येक प्रकार के कष्ट के निवारणार्थ किए गए उपाय यज्ञ, दान, मंत्र जप आदि के कारकों को वराह मिहिर एवं पराशर दोनों की ही सहमति प्राप्त है।

सूर्य अग्नि तत्व है, इसके अधिष्ठाता देवता रुद्र हैं। चंद्रमा जल तत्व है। इसकी अधिष्ठात्री देवी अम्बा पार्वती हैं। मंगल अग्नि तत्व है और देवता कार्तिक स्वामी हैं। बुध पृथ्वी तत्व है, अधिष्ठाता देव विष्णु हैं। बृहस्पति आकाश तत्व है और देवता ब्रह्मा हैं। शुक्र जल तत्व और अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी हैं। शनि वायु तत्व है और देवता यम हैं। राहु के अधिष्ठाता देव शेष तथा केतु के ब्रह्मा हैं।

फल दीपिका के अनुसार अधिष्ठाता देवता बताने का सिद्धांत यह है कि जिस ग्रह का पांचवें तथा नौवें घर से संबंध होगा, उस ग्रह से संबंधित देवता में भक्ति होगी।

पंचम व नवम स्थान के साथ-साथ यह भी आवश्यक है कि इनके स्वामी का लग्नेश से उत्तम संबंध होना चाहिए।

यदि पंचम में कोई ग्रह न हो तो जिस ग्रह की दृष्टि हो, उससे संबंधित ग्रह की आराधना, मंत्र जप आदि फलदायी होंगे। यदि ग्रह से दृष्टि संबंध भी न हो तब पंचमेश से संबंधित आराधना फलदायी न होगी। यदि लग्नेश से उत्तम संबंध न हो तो ऐसी स्थिति में पंचम स्थान के कारक से संबंधित मंत्र, जप, दान,

यज्ञ आदि उपाय फलदायी होंगे। अनुभवहीन व्यक्तियों के हाथों में मंत्रोपचार, आराधना आदि फलहीन हो जाते हैं।

अतः चाहे इष्ट साधना हो या अन्य संबंधित देवी देवता की साधना, संपूर्ण तथ्यों की सही जानकारी के साथ करनी चाहिए।

पराशर जी ने ग्रहशान्त्याध्यायः-(86) में प्रत्येक ग्रह की जातक के लिए शुभता हेतु तथा मानव मात्र के कल्याण के लिए विस्तृत विवरण दिया है। उनके अनुसार मनुष्यों के सुख, दुख आदि सभी नवग्रहों के अधीन हैं।

नवग्रहों की शांति हेतु और ग्रह जनित कष्टों के शमन के लिए नवग्रहों को प्रतिष्ठित कर, उनके यंत्र विशेष की प्रतिष्ठा कर अक्षत, सुगंधित धूप, अगरवत्ती, दीप, चंदन, पुष्प एवं नैवेद्य आदि से आराधना करनी चाहिए। दान की निर्दिष्ट वस्तुएं जो प्राप्त हों उनका दान करना चाहिए तथा कष्टों के निवारण के लिए जिस ग्रह की शांति की आवश्यकता हो, उसी ग्रह विशेष के वार को व्रत करना चाहिए। प्रत्येक ग्रह के अरिष्ट निवारण हेतु सत्य नारायण का प्रदोष व्रत एवं गौ-पूजन सर्वोत्तम माने गए हैं।

बीज मंत्रों के विधि विधान के साथ जप का भी अपना महत्वपूर्ण स्थान है। निरोगी काया, उत्तम आयु, यश और ऐश्वर्य की प्राप्ति, बुरे स्वप्नों के नाश, विघ्न दुख नाश के लिए नवग्रह स्तोत्र तथा नवग्रह कवच का नियमित पाठ श्रद्धालुओं को अत्यंत लाभ देने वाला होता है। प्रत्येक ग्रह और देवता के पूजा-अनुष्ठान में होम की महती आवश्यकता रहती है।

आयुर्वेद के अनुसार रोग शमन हेतु देव आराधना

आयुर्वेद शास्त्राचार्यों ने पंचतत्वों अर्थात पृथ्वी, पानी, पवन, पावक और प्रकाशवान आकाश में से प्रत्येक के बिगड़ने से विविध व्याधियों के संक्रमण का उल्लेख किया है। चरक तथा सुश्रुत ने अपने ग्रंथों में अनुभव के आधार पर पंच महाभूतों के कोप जन्य विकारों का विस्तृत विवरण दिया है। पंच तत्व जनित विकारों में वायु विकार सबसे प्रमुख माना जाता है। कफ तथा पित्त दोनों वायु प्रबलता के कारण तेजी से शरीर में फैलकर मनुष्य को रोगग्रस्त कर देते हैं। वायु विकृतिजन्य रोगों के शमन हेतु सूर्य की आराधना श्रेष्ठ मानी गई है क्योंकि सूर्य वायु तत्वाधिपति हैं। कुष्ठ रोग निवृत्ति के लिए भी सूर्योपासना शास्त्रसम्मत मानी गई है।

जल के विकृत होने पर भांति-भांति के रोग शरीर को कष्ट पहुंचाते हैं। इनके शमन के लिए जलतत्वाधिपति भगवान गणेश की आराधना का प्रमाण शास्त्र देते हैं।

पंच तत्वानुसार देव आराधना

मनुष्य का स्वभाव नैसर्गिक रूप में देखा जाए तो पंचतत्वात्मक ही है।

  • जिन जातकों में सतगुणों की बहुलता होती है उनके लिए भगवान विष्णु की सेवा आराधना फलदायी होती है। श्री हरि (विष्णु) उनके दुखों का हरण कर कष्टों के भार को हल्का कर देते हैं। (आकाश)
  • जिन जातकों की प्रवृत्ति सतोगुणी होने पर भी रजोगुण से युक्त होती है उनके लिए सूर्य की आराधना शुभदायी होती है। सूर्य उनके कष्टांधकार को हटा देते हैं। (वायु)
  • जिन जातकों की प्रवृत्ति रजोगुणात्मक होती है, उनके लिए शक्ति स्वरूपा भवानी की आराधना श्रेयस्कर होती है। देवी अपने रजोगुणी भक्त जातकों के कष्टों को हवन कुंड की अग्नि में जलाकर नष्ट कर देती है। (अग्नि)
  • जल तत्वों में रज और तम दोनों का सम्मिश्रण होता है। अतः जिनकी प्रकृति में रजोगुण व तमोगुण दोनों का अंश विद्यमान हो ऐसी विशिष्टता वाले व्यक्तियों को गणेश आराधना करनी चाहिए। ऐसे व्यक्तियों के कष्टों का विलीनीकरण भगवान गणेश जल में कर देते हैं। (जल)
  • तामसी या तम तत्व की संकेतिका पृथ्वी है। भगवान शिव पृथ्वी तत्व के अधि-देवता हैं। इन्हें सृष्टि का संहारक देव रुद्र कहा जाता है। प्रकृति के तीन गुणों सत, रज, तम में से अंतिम गुण से आविर्भूत जनों के लिए भगवान शंकर की आराधना करने से उनके कष्ट भस्म हो जाते हैं। (पृथ्वी)

शास्त्रों के अनुसार एक ही देवता की मूर्ति की पूजा का निषेध है। समस्त कष्टों के निवारण एवं कामनाओं की सिद्धि के लिए विविध देवों की आराधना करनी चाहिए।

एका मूर्तिर्न सम्पूज्या गृहिणा स्वेष्टमिच्छता।
अनेक मूर्ति सम्पन्नः सर्वान् कामानवाप्नुयात्।।

भगवान गणेश

इनकी महिमा किसी से छिपी नहीं है। ये आदि पूज्य हैं। ‘‘आदि पूज्यो गणेश्वरः।’’ सहज बाल स्वभाव के कारण ये बहुत जल्दी प्रसन्न हो जाते हैं। इनकी कृपा बालकों एवं विद्यार्थियों पर सदा बरसती रहती है। पल्ली नगरी के सेठ कल्याणमल्ल का नन्हा सा बालक बल्लाल छोटे छोटे कंकड़-पत्थरों को गणेश जी मानकर अपने साथियों के साथ उनकी पूजा करता था जिस कारण वह समय पर घर नहीं पहुंच पाते थे। तंग होकर बालकों के पिताओं ने कल्याणमल्ल को नगर से निकलवा देने की धमकी दी और सेठ ने अपने पुत्र बल्लाल को मार पीट कर, डरा धमकाकर एक पेड़ से बांध दिया और कहा अब खोलें गणेश जी तेरा बंधन। तब गणेश जी ने साक्षात् प्रकट होकर बल्लाल बालक को बंधन मुक्त किया था और स्वयं बन गए ‘‘बल्लालेश्वर’’।

नौ वर्षीय अनपढ़ विप्र बालक नंबि का भक्ति भावना से समर्पित प्रसाद साक्षात् रूप में ग्रहण कर उसे संस्कृत और तमिल भाषा का प्रकांड पंडित बना देने वाले गणपति की कथा भी प्रसिद्ध है। ये दोनों लघु कथाएं भगवान गणेश की बाल-सुलभ भक्ति और बालकों पर विशेष अनुग्रह के अनुपम उदाहरण हैं।

विघ्न बाधा निवारण, रोग मुक्ति, विद्या की प्राप्ति, बंधन से मुक्ति, श्री सम्पत्ति की प्राप्ति, पारिवारिक प्रेम, पुत्र प्राप्ति आदि के लिए इनकी आराधना आवश्यक है। संकट नाश के लिए गणेश जी का ‘‘संकष्टनाशन-स्तोत्र’’ नित्य पढ़ना चाहिए जिससे विद्यार्थी को विद्या, धनार्थी को धन, पुत्रार्थी को पुत्र और मोक्षार्थी को मोक्ष की प्राप्ति होती है। चिंता एवं रोग-निवारण के लिए ‘‘मयूरेश स्तोत्र’’ का पाठ सिद्धि प्रद होता है।

भगवान शंकर

रामायण में लिखा है कि- ‘‘इच्छित फल बिनु शिव अवराधे। मिलइ न कोटि जो जप साधे’’। विद्याओं की कामना करने वालों के लिए भी शंकर जी की पूजा की आवश्यकता का संकेत शास्त्र देते हैं- ‘‘विद्या कामस्तु गिरिशं’’। भगवान शंकर के रुद्राभिषेक और उनके मृत्युंजय जप का महत्व किसी से छिपा नहीं है। ‘‘ऊँ नमः शिवाय मंत्र पंचाक्षर, जपत मिटत सब क्लेश भयंकर।’’ शनि की ढैया हो या साढ़ेसाती अथवा कष्टप्रद महादशांतर्दशा, शिवजी की आराधना कष्टों के शमन हेतु रामबाण मानी जाती है। ऊँ नमः शिवाय आशुतोष भगवान शंकर का षडाक्षर मंत्र है।

  • सांप बिच्छू और ततैया, शिवनामधुन भगाती भैया।
  • कोई कितना भी गुस्सा हो, शिव-शिव बोलो चुप हो।
  • सब कहलाते हैं देव, आप कहलाते हैं महादेव।
  • मृत्यु भय है सबसे भारी, जिसको हरते हैं त्रिपुरारी।
  • छोटे कष्टों के लिए कोई भी देव, बड़े कष्टों के लिए महादेव।
  • कोई भी मंत्र क्यों न हो, रुद्राक्ष माला से अवश्य सिद्ध हो।

आर्थिक, मानसिक, शारीरिक, बौद्धिक, पारिवारिक एवं राजनैतिक आदि क्लेश, व्यापारिक बाधाएं, दुर्घटनाएं, शत्रु पीड़ा, स्त्री-संतान आदि कष्ट, रोग, शोक झंझटें तथा नाना प्रकार के कष्ट शनि के कोप से प्रकट होते हैं। असाध्य रोग, मृत्युतुल्य कष्ट आदि और दुखदाता शनि की ढैया या साढ़ेसाती के कष्ट निवारण के लिए विधि विधान से भगवान शंकर के महामृत्युंजय मंत्र का जप रुद्राक्ष माला से करना चाहिए।

कम से कम पांच या ग्यारह माला जप व्यक्ति स्वयं कर सकता है। स्वयं न कर सकें तो किसी कर्मकांडी ब्राह्मण से मंत्र जप करवाना चाहिए। मंत्र जप घर के पूजा स्थल पर करें या करवाएं स्वयं जपें या किसी विप्र से करवाएं। उस वक्त मृत्युंजय यंत्र की पूजा प्रतिष्ठा अवश्य करवानी चाहिए। यंत्र में देवता का वास होता है, अतः मंत्र के साथ यंत्र का स्थापन जरूरी है। यदि ऐसे समय में घर में किसी भी प्रकार का शिवलिंग उपलब्ध न हो तो ढाई अंगुल प्रमाण के स्फटिक, पारद अथवा चांदी के बने शिवलिंग की स्थापना कर लेनी चाहिए।

यदि रुद्राक्ष के दानों अथवा रुद्राक्ष की मालाओं से विशेष अवसरों पर शिवलिंग के रूप में भगवान शंकर का शृंगार किया जाए तो ऐसे रुद्राक्षधारी भगवान शंकर के दर्शन से विपत्तियों का नाश होता है और पुण्य फल की प्राप्ति होती है।

अंजनी सुत हनुमान

सियाराम भक्त हनुमान, अंजनी किशोर, पवनसुत जगत प्रसिद्ध देवता हैं। इन्हें सकटमोचन, कष्ट कदन हनुमान के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त है। ये भी भगवान शंकर के ही अवतार हैं और आर्तभाव से पुकारने पर शरणागत जातक के हर कष्ट को शीघ्र दूर कर देते हैं। ऐसा कोई भी कार्य नहीं है जिसे ये पूर्ण न कर सकें। इन्हें स्मरण करते ही भूत प्रेत बाधा तक दूर हो जाती है । नासै रोग हरैं सब पीड़ा, जपत निरंतर हनुमत वीरा। शनि की पीड़ा हो, चाहे अनिष्टकारी मंगल का अमंगल या राहु-केतु की वज्रघाती पीड़ा, हनुमान जी की आराधना करने से दूर हो जाती है। चाहे सुंदर कांड का पाठ करें या हनुमान चालीसा का अथवा संकटमोचन हनुमान्नाष्टक का या फिर हनुमान के अन्य किसी स्तोत्र आदि का फल, अवश्य मिलेगा। साधना काल में घी का दीपक, गूगल या गूगल की अगरबत्ती जलाएं और अपने समक्ष राम दरबार का चित्र रखें। नैवेद्य में बूंदी के लड्डू, फलों में विशेष रूप से मौसमी, केला और सेव अवश्य चढ़ाने चाहिए। भगवान श्री राम के अनन्य भक्त श्री हनुमान जी की पूजा अत्यंत फलदायी होती है। जिन्हें अंजनीकिशोर पर भरोसा है उनके ऊपर शंकर-पार्वती और राम, लक्ष्मण एवं जानकी का अनुग्रह सदैव रहता है।

भगवान से भक्त बड़े कह गए, संत सुजान।
पुल बांध रघुवीर चले कूद पड़े हनुमान।।

हनुमान जी की आराधना करने के पूर्व तुलसी की माला से ‘‘रां रामाय नमः’’ मंत्र 108 बार अवश्य जपें।

यशोदानंदन कृष्णचंद्र

संतानाभाव रूपी कष्टों का शमन कने के लिए भगवान श्री कृष्णचंद्र आनंद कंद की आराधना करनी चाहिए। इनके मंत्र का एक लाख जप और शक्कर, शहद, घी, मेवा मिश्रित तिलों से दस हजार मंत्र से हवन करने का नियम है जिसके प्रभाव से निस्संतान लोग संतानवान, पुत्रवान बन सकते हैं। संतान गोपाल मंत्र-

‘‘देवकीसुत गोविंद वासुदेव जगत्पते।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः’’।

यह भगवान श्री कृष्ण का बत्तीस अक्षरों वाला मंत्र है जिसमें उनसे यह प्रार्थना की जाती है कि हे ! देवकी पुत्र, गोविंद, वासुदेव, श्री कृष्ण मैं आपकी शरण आया हूं, मुझे पुत्र प्रदान कीजिए।

जपकाल में संतान गोपाल यंत्र की स्थापना एवं संतान गोपाल स्तोत्र का सुबह शाम पाठ करने वाले को संतान रूपी निधि की प्राप्ति संभव होती है।

अनुष्ठान के पूर्व जातकों को योग्य ब्राह्मण, सद्गुरु, पुरोहित आदि से ज्योतिषीय परामर्श अवश्य लेना चाहिए।

भगवान विष्णु

त्रिदेवों में भगवान विष्णु एक हैं। स ब्रह्मा स विष्णुः स रुद्रः। ब्रह्मा सृजन, विष्णु पालन और शिव संहार करते हैं। लक्ष्मीपति विष्णु वरदायक देव हैं जो सदवै परमानदं से परिपूर्ण रहते हुए जगत की रक्षा के लिए सब लोगों को अभयदान देते हैं। उनके द्वादश अक्षरों वाले महामंत्र है ‘‘ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय’’ का नित्य 108 बार जप करते रहने से दुख कम होने लगते हैं और सुख का आभास होने लगता है। उनके आठ नाम, सोलह नाम, अट्ठारह नाम, बीस नाम, सौ नाम और हजार नाम वाले स्तोत्र प्रसिद्ध हैं जिनके पाठ से नाना प्रकार के कष्टों का शमन होता है और धन धान्य आदि का लाभ मिलता है।

अच्युतं केशवं विष्णुं हरिं सत्यं जनार्दनम्।
हंसं नारायणं चैवमेतन्नामाऽष्टकं पठेत्।।
त्रिसंध्यं यः पठेन्नित्यं दारिद्र्यं तस्य नश्यति।
शत्रुसैन्यं क्षयं याति दुःस्वप्नः सुखदो भवेत्।।
गंगायां मरणं चैव दृढा भक्तिस्तु केशवे।
ब्रह्म विद्या प्रबोधश्च तस्मान्नित्यं पठेन्नरः।।

प्रत्येक लग्न के अनुसार समस्याओं के निदान एवं पूजा पाठ के बारे में संक्षेप में वर्णन इस प्रकार है -

मेष लग्न: मेष लग्न के लोगों के लिए मंगल, सूर्य और गुरु कारक ग्रह हैं। चंद्रमा को भी कारक ग्रह माना जाता है। मेष लग्न के लोगों की कुंडली में मंगल यदि राहु के साथ युत हो तो अंगारक योग बनता है। फलस्वरूप राहु की दशाओं में जातक को शारीरिक एवं मानसिक कष्ट होते हैं। केतु-मंगल की युति यदि मेष लग्न वाले किसी व्यक्ति की जन्म कुंडली में हो, तो केतु की दशाओं में उसे शारीरिक एवं मानसिक कष्ट होते हैं। उसी प्रकार मेष लग्न के किसी व्यक्ति की जन्म कुडली में बुध व मंगल की युति हो, तो बुध की दशाओं में भी जातक को शारीरिक एवं मानसिक कष्ट होते हंै। ऐसी परिस्थिति में जातक को प्रतिदिन हनुमान जी की पूजा करनी चाहिए, हनुमान चालीसा, महावीर बाण और मंगल के मंत्र का पाठ करना चाहिए। मंगल का मंत्र इस प्रकार है- ‘‘ऊँ क्रां क्रीं क्रौं सः भौमाय नमः’’। इस मंत्र का 10000 बार पाठ करना चाहिए।

यदि किसी व्यक्ति की जन्म कुंडली में सूर्य राहु, केतु या शनि के साथ युत हो या उससे दृष्ट हो, तो संतान कष्ट होता है। इस परिस्थिति में सूर्य की उपासना तथा सूर्य के मंत्र का 6000 बार पाठ करना चाहिए जो इस प्रकार है- ‘‘ऊँ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः’’।

यदि किसी व्यक्ति की जन्म कुंडली में गुरु राहु के साथ युत हो, तो चांडाल योग बनता है। अतः ऐसे व्यक्ति को गुरु के मंत्र का 19000 बार पाठ करना चािहए जो इस प्रकार है- ‘‘ऊँ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरुवे नमः’’।

यदि जन्म कुंडली में क्षीण चंद्र हो या चंद्र राहु, केतु या शनि के साथ युत अथवा उससे दृष्ट हो, तो सुख में बाधा आती है तथा माता को कष्ट होता है। ऐसी परिस्थिति में चंद्र के मंत्र का 11000 बार पाठ करना चाहिए जो इस प्रकार है- ‘‘ऊँ श्रां श्रीं श्रौं सः चंद्रमसे नमः‘‘।

वृष लग्न: वृष लग्न के लोगों की जन्म कुंडली में शुक्र यदि सूर्य के द्वारा अस्त हो या शुक्र राहु के साथ युत हो, तो अभोत्वक योग बनता है जिससे शारीरिक एवं मानसिक कष्ट होते हंै। ऐसी परिस्थिति में व्यक्ति को शुक्र के मंत्र का 9000 बार पाठ करना चाहिए जो इस प्रकार है- ‘‘ऊँ ब्रां ब्रीं ब्रौं सः बुधाय नमः‘‘।

किसी व्यक्ति की जन्म कुंडली में यदि शनि की युति मंगल या राहु के साथ हो तो नन्दी योग बनता है। फलस्वरूप ऐसे जातक के पिता को समय-समय पर कष्ट होता है, जातक की कर्मशक्ति घटती है तथा भाग्य वृद्धि में रुकावट आती है। ऐसे जातक को शनि के मंत्र का 23000 बार पाठ करना चाहिए जो इस प्रकार है- ‘‘ऊँ प्रां प्रीं प्रौं सः शनये नमः‘‘।

व्यक्ति की जन्म कुंडली में यदि सूर्य शनि, केतु या राहु के साथ युत हो, तो ग्रहण योग बनता है। ऐसे व्यक्ति के सुख में कमी आती है तथा उसकी माता को कष्ट होता है। अतः ऐसे जातक को भी सूर्य के मंत्र का 6000 बार पाठ करना चाहिए।

मिथुन लग्न: मिथुन लग्न के किसी व्यक्ति की जन्म कुंडली में बुध मंगल या राहु के साथ हो, तो बुध के मंत्र का बुधवार को 9000 जप करना चाहिए।

किसी व्यक्ति की जन्म कुंडली में यदि शुक्र सूर्य के द्वारा अस्त हो या राहु के साथ हो, तो संतान कष्ट होता है। इस कष्ट को दूर करने के लिए शुक्र के मंत्र का जप करें।

कर्क लग्न: कर्क लग्न के किसी व्यक्ति की जन्म कुं. डली में यदि क्षीण चंद्र हो या चंद्रमा शनि, राहु अथवा केतु के साथ हो तो चंद्रमा के मंत्र का 11000 बार जप करना चाहिए।

व्यक्ति की जन्म कुंडली में मंगल बुध के साथ हो या उससे दृष्ट हो अथवा राहु, केतु के साथ हो, तो हनुमान चालीसा का पाठ एवं महावीर बाण तथा मंगल के मंत्र का जप करना चाहिए जिससे संतान कष्ट दूर होता है। इससे पिता को भी कष्ट से मुक्ति मिलती है।

व्यक्ति की जन्म कुंडली में गुरु राहु के साथ हो, तो चांडाल योग बनता है जिससे भाग्य वृद्धि में रुकावट आती है। अतः ऐसे व्यक्ति को गुरु के मंत्र का 19000 बार जप करना चाहिए। जप गुरुवार से प्रारंभ करें।

सिंह लग्न: सिंह लग्न के व्यक्ति की जन्म कुंडली में यदि सूर्य शनि, राहु या केतु के साथ युत अथवा उससे दृष्ट हो, तो सूर्य के मंत्र का जप (6000) करना चाहिए जिससे शारीरिक एवं मानसिक कष्ट दूर हो जाते हंै।

व्यक्ति की जन्म कुंडली में मंगल, राहु, केतु या बुध के साथ युत हो, तो सुख में कमी आती है। अतः ऐसे जातक को मंगल के मंत्र का जप (10000) तथा हनुमान चालीसा का पाठ करना चाहिए।

कन्या लग्न: कन्या लग्न के किसी व्यक्ति की जन्म कुंडली में बुध यदि मंगल या राहु के साथ हो, तो जातक को शारीरिक एवं मानसिक कष्ट होते हैं तथा उसकी कर्मशक्ति घटती है। साथ ही पिता को भी कष्ट होता है। अतः ऐसे जातक को बुध के मंत्र का 8000 बार जप बुधवार को करना चाहिए।

व्यक्ति की जन्म कुंडली में शनि राहु या केतु के साथ हो तो संतान कष्ट होता है। ऐसे जातक शनि के मंत्र का जप (23000) करें। व्यक्ति की जन्म कुंडली में शुक्र सूर्य के साथ अस्त हो, तो भाग्य वृद्धि में रुकावट आती है और धन संचय नहीं हो पाता है। अतः उसे शुक्र के मंत्र का जप (16000) करना चाहिए।

तुला लग्न: तुला लग्न के किसी व्यक्ति की जन्म कुंडली में शुक्र सूर्य के द्वारा अस्त हो या राहु के साथ हो, तो शारीरिक एवं मानसिक कष्ट होते हंै। ऐसे जातक शुक्र के मंत्र का 16000 जप करें।

जन्म कुंडली में शनि यदि राहु अथवा केतु के साथ हो, तो शनि के मंत्र का 23000 बार जप करें। इससे संतान कष्ट दूर होता है तथा सुख में वृद्धि होती है। साथ ही माता का कष्ट भी दूर होता है।

वृश्चिक लग्न: वृश्चिक लग्न के किसी व्यक्ति की जन्म कुंडली में मंगल बुध के साथ या उससे दृष्ट हो अथवा राहु या केतु के साथ या उससे दृष्ट हो, तो शारीरिक एवं मानसिक कष्ट होते हंै। ऐसे व्यक्ति को मंगल के मंत्र का 10000 बार जप एवं हनुमान जी की पूजा करनी चाहिए।

जन्म कुंडली में गुरु राहु या केतु से युत या उससे दृष्ट हो, तो गुरु के मंत्र का 199000 बार जप करें जिससे संतान कष्ट दूर होगा। जन्म कुंडली में यदि चंद्र राहु या शनि के साथ युत या उससे दृष्ट हो, तो चंद्र के मंत्र का जप (11000) करें। इससे भाग्य वृद्धि होगी और मानसिक शांति मिलेगी।

धनु लग्न: धनु लग्न के किसी व्यक्ति की जन्म कुंडली में गुरु यदि राहु के साथ स्थित अथवा उससे दृष्ट हो, तो गुरु के मंत्र का जप (16000) करना चाहिए। इससे शारीरिक एवं मानसिक कष्ट दूर हांेगे तथा सुख में वृद्धि होगी। साथ ही माता का कष्ट भी दूर होगा।

धनु लग्न के व्यक्ति की जन्म कुंडली में मंगल यदि बुध, राहु या केतु से युत अथवा दृष्ट हो तो हनुमान चालीसा का पाठ तथा मंगल के मंत्र का जप (10000) करना चाहिए। इससे संतान का कष्ट दूर होता है एवं पढ़ाई में मन लगता है। कुंडली में यदि सूर्य राहु, केतु या शनि से युत अथवा दृष्ट हो, तो सूर्य के मंत्र का जप (6000) करें, इससे भाग्य वृद्धि होगी।

मकर लग्न: मकर लग्न के किसी व्यक्ति की जन्म कुं. डली में यदि शनि मंगल, राहु, केतु या चंद्र के साथ युत अथवा उससे दृष्ट हो, तो शारीरिक एवं मानसिक कष्ट होते हैं। अतः शनि के मंत्र का जप करें।

जन्म कुंडली में शुक्र यदि सूर्य के द्वारा अस्त हो या राहु के साथ हो, तो शुक्र के मंत्र का जप करें, इससे संतान कष्ट दूर होगा और पिता को भी कष्ट से मुक्ति मिलेगी। जन्म कंुडली में बुध यदि मंगल, राहु या केतु के साथ युत अथवा उससे दृष्ट हो, तो बुध के मंत्र का जप करें, इससे भाग्य में वृद्धि होगी।

कुंभ लग्न: कुंभ लग्न के किसी व्यक्ति की जन्म कुंडली में शनि मंगल, राहु या चंद्रमा के साथ युत अथवा उससे दृष्ट हो, तो शारीरिक एवं मानसिक कष्ट होते हंै। अतः ऐसे जातक को शनि के मंत्र का जप (23000) करना चाहिए।

जन्म कुंडली में शुक्र यदि सूर्य के द्वारा अस्त हो या राहु के साथ युत हो, तो शुक्र के मंत्र का जप (16000) करें। इससे भाग्य एवं सुख में वृद्धि होगी और माता का कष्ट दूर होगा।

मीन लग्न: मीन लग्न के किसी व्यक्ति की जन्म कुं. डली में गुरु राहु के साथ युत अथवा उससे दृष्ट हो, तो गुरु के मंत्र का जप (19000) करें।

इससे शारीरिक एवं मानसिक कष्ट दूर होंगे। जन्म कुंडली में चंद्र राहु अथवा शनि के साथ युत या उससे दृष्ट हो, तो संतान कष्ट होता है। ऐसे में चंद्रमा के मंत्र का जप (11000) करें, इससे संतान कष्ट दूर होगा।



रुद्राक्ष एवं आध्यात्मिक वास्तु विशेषांक   फ़रवरी 2007

प्रकृति के कोष से हमें कई जिवानोपर्यांत वस्तुएं प्राप्त होती है. ऐसी ही वस्तुओं में एक है रुद्राक्ष. रुद्राक्ष का आध्यात्मिक और औषधीय महत्त्व बहुत है. शुद्ध रुद्राक्ष की पहचान कैसे की जाए? रुद्राक्ष का सम्बन्ध भगवान शिव से कैसे जुडा हुआ हैं? रुद्राक्ष धारण

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