यंत्रों में छिपे सफलता के बीज मंत्र

यंत्रों में छिपे सफलता के बीज मंत्र  

यंत्रों में छिपे सफलता के बीज मंत्र यंत्र मानव के क्रमिक उत्थान का मार्ग है। यंत्रों की पूजा मंत्रों से निरंतर करने से जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन आते हैं। यह साधक की श्रद्धा और विश्वास पर निर्भर है कि वह कितनी शुद्ध ता के साथ पूजा-अर्चना कर पाता है। यहां कुछ विशेष प्रभावकारी यंत्रों का परिचय दिया जा रहा है.... यंत्र में वे अक्षर लिखे जाते हैं, जो मंत्र में विकास एवं शक्ति के स्तंभ होते हैं। यंत्र के बीजाक्षर सीधे उस व्यक्ति पर प्रभाव डालते हंै, जो उनका संकल्पित प्राणी है। यंत्र मानव के क्रमिक उत्थान का मार्ग है। ये मानव को अचानक लाभ नहीं पहंुचाते, बल्कि उसे क्रमिक ज्ञान और उत्थान देते हंै तथा क्रमिक उत्थान के मार्ग को प्रशस्त करते हंै। मंत्रों एवं यंत्रों की अपूर्व शक्ति से मानव इतना शक्तिशाली हुआ है कि उसकी हड्डियों से वज्र का निर्माण किया गया। सुख समृद्धि के लिए श्री यंत्र: आर्थिक उन्नति तथा व्यापारिक सफलता के लिए श्री यंत्र बेजोड़ माना गया है। श्री यंत्र की साधना से थोड़े दिनों में ही अद्भुत चमत्कार दिखता है। श्री यंत्र कई प्रकार के होते हैं, जिनका विवरण इस प्रकार है: श्री श्री यंत्र: यह षोडषी श्री यंत्र के नाम से भी जाना जाता है। यह स्वर्णपत्र अथवा ताम्रपत्र पर रंगों को समायोजित कर के तथा स्वर्ण पाॅलिश की सहायता से निर्मित होता है। श्री यंत्र आर्थिक संकट पर विजय दिलाता है, प्रतिकूल परिस्थितियों को अनुकूल बनाता है, मन की वेदना को नष्ट कर के सुखानुभूति प्रदान करता है। यह जीवन के हर मोड़ पर कवच कुंडल का कार्य करता है। पापात्मा हो, अथवा पुण्यात्मा, यह सबको समृद्धि प्रदान करता है। संपूर्ण श्री यंत्र: इस श्री यंत्र को 12 अन्य (लक्ष्मी के प्रिय) यंत्रों के मध्य में स्थापित कर के फ्रेमिंग की जाती है। यह लक्ष्मी को अधिक प्रिय है। श्री यंत्र द्वारा वे सब अलौकिक शक्तियां प्राप्त होती हैं, जो समृद्धि से संबंध रखती हैं। अनेक प्रकार के दैविक गुणों से संपन्न यह यंत्र व्यक्ति को विचलित होने से रोकता है तथा उपलब्धियां प्रदान करता है। शिक्षा से जुड़े लोगों और विद्यार्थियों को भी यह अनेक प्रकार से लाभ तथा एकाग्रता देता है। यही नहीं, इसमें वह शक्ति भी समाहित होती है, जो धन संबंधी सभी समस्याओं का समाधान करती है। यह श्री यंत्र अनेक जन्मों के लक्ष्मी दोष को नष्ट कर के समृद्धि प्रदान करता है। मेरुपृष्ठ श्री यंत्र: यह पर्वतनुमा होता है, जिसका अंतिम भाग शिखर कहा जाता है। यह भाग नुकीला होता है। यह स्फटिक, सोना, चांदी, अथवा अष्टधातु से निर्मित होता है। स्फटिक श्री यंत्र गागर में सागर वाली बात को चरितार्थ करता है। लक्ष्मी का सर्वप्रिय यह यंत्र जादुई छड़ी जैसा चमत्कार करता है। धन की वृद्धि में यह महीनों का काम घंटों में कर बैठता है। स्फटिक श्री यंत्र में प्रकृति के वे अनेक गुण पाए जाते हैं, जो समृद्धि एवं सफलता देते हैं। निराश लोगों के लिए यह वरदान साबित होता है तथा उनकी निराशा को खत्म कर के उन्हें उन्नति दिलाता है। यह क्रोध को कम कर के इंद्रियों को वश में करता है तथा अपने आसपास के वातावरण को शीघ्र ही समृद्ध बनाता है। कच्छप श्री यंत्र: यह कछुए की पीठ जैसा, अथवा कछुए के ऊपर बना होता है, अतः इसे कच्छप श्री यंत्र कहते हैं। यह स्फटिक एवं धातु दोनों में निर्मित किया जाता है। लक्ष्मी, समृद्धि एवं यश की प्राप्ति में यह यंत्र उपयोगी है। स्थल में इस यंत्र की प्रतिष्ठा करने से व्यवसाय में वृद्धि निश्चित तौर पर देखी जाती है। इस श्री यंत्र को वाहन, दुकान, मकान, कारखाना, कार्यालय आदि में रखने मात्र से धन की आय में कई गुना वृद्धि होती है। श्रद्धा एवं विश्वासपूर्वक श्री यंत्र की स्थापना दुख-दारिद्र्य को दूर कर के समृद्धि प्रदान करने में सहायक होती है। इस श्री यंत्र में अनेकानेक गुप्त शक्तियों को नियंत्रित करने की असीम क्षमता होती है। तांत्रिक गं्रथों मंे श्री यंत्र की महिमा प्रतिपादित करते हुए इसे यंत्रराज की संज्ञा से विभूषित किया गया है। पिरामिड श्री यंत्र: यह श्री यंत्र अन्य तीन प्रमुख यंत्रों के साथ पिरामिड पर अंकित होता है, जिसे स्थापित कर क े समृद्धि एवं शांति प्राप्त की जाती है। इस यंत्र का उपयोग जीवन में सदैव उन्नति एवं प्रतिभा प्रदान करता है। पारद श्री यंत्र: पारद धातु से निर्मित होने वाला यह यंत्र मेरुपृष्ठ यंत्र जैसा होता है। यह पूजा स्थल अथवा, किसी भी पवित्र स्थान पर स्थापित किया जा सकता है। श्री यंत्र को स्थापित करने से आर्थिक स्थिति में सुधार होता है। इस यंत्र के प्रभाव से जीवन के अनेक अभाव दूर होते हैं। यदि नौकरी में अधिकारियों से मत. भेद, अथवा मनमुटाव तथा तरक्की में विलंब होता हो, तो इस यंत्र के प्रभाव से ये बाधाएं दूर होती हैं। विद्या प्राप्ति के लिए सरस्वती यंत्र उपासना: जिन्हें विद्या प्राप्ति में बार-बार अड़चनंे आती हों या विद्या अध्ययन में मन न लगता हो, तो सरस्वती यंत्र की उपासना करने से लाभ होता है। उपासना विधि: सर्वप्रथम यंत्र को, बुध, गुरु या शुक्रवार को, शुक्ल पक्ष की पंचमी, सप्तमी या नवमी तिथि पुष्य नक्षत्र में पंचगव्य, गंगा जल आदि से धो कर, सफेद वस्त्र पर स्थापित कर के श्वेत पुष्पों से पंचोपचार, या षोडशोपचार पूजा कर के नैवेद्य अर्पित करें तथा आरती करें। पूजन और आरती के पश्चात इस यंत्र को घर के पूर्व हिस्से में शुद्ध स्थान पर स्थापित किया जाता है। तत्पश्चात प्रति दिन संकल्प, संध्या आदि कर के स्फटिक की माला पर निम्न मंत्र का 108 बार जप करना चाहिए। हनुमान उपासना से विद्या प्राप्ति: बुद्धि और विद्या के दाता श्री हनुमान की उपासना से अगणित लोगों को ज्ञान की प्राप्ति हुई है। जिन्हें अध्यात्म, कानून, शिक्षा, उपासना आदि में बार-बार असफलता मिलती है, वे इस उपासना से शीघ्र ही लाभान्वित हो सकते हैं। उपासना विधि: श्राद्ध मास को छोड़ कर किसी भी माह के शुक्ल पक्ष में, पंचमी से पूर्णिमा तक यह साधना की जाती है। सर्वप्रथम साधक ब्रह्म मुहूर्त में (सूर्योदय से 3 घंटे पूर्व) उठ कर, स्नानादि कर के, यज्ञोपवीत और पीला वस्त्र धारण कर के, ऊन के आसन पर विराजित हो सामने गमले में तुलसी का पौधा रखे। तत्पश्चात हनुमान यंत्र का, शुद्ध मन से, सफेद चंदन, धूप, नैवेद्य, तुलसी, पीले लड्डू आदि से पूजन कर के, हनुमान की आरती करें। आरती आदि से निवृत्त हो कर लाल अक्षरों से लिखित हनुमान चालीसा का 8 बार पाठ करें। यदि कार्य पूर्ण हो जाए, तो साधना के पश्चात यंत्र और माला को पवित्र नदी में विसर्जित करें और हनुमान मंदिर या राम मंदिर जा कर पीले वस्त्र और लड्डू भगवान को अर्पित करें तथा आशीर्वाद ग्रहण करें। विद्या प्राप्ति का विशेष उपाय गणपत्यथर्व शीर्ष: यदि विद्या प्राप्ति में बार-बार असफल होता हो, विद्या अध्ययन में अनेक अड़चनें आती हों, या विद्या प्राप्ति में मन न लगे, तो बड़ी प्रतियोगिता आदि से पूर्व इस अथर्व शीर्ष का पाठ करने से निश्चय ही लाभ होगा। उपासना विधि: किसी भी माह के शुक्ल पक्ष को सुबह-संध्या, संकल्पादि कर के, पीले वस्त्र पर श्री गणेश यंत्र को स्थापित कर के, पंचोपचार पूजन कर के, दूर्वा युक्त खीर का भोग लगाना चाहिए। (ध्यान रहे गणेश के लिए तुलसी पत्र वर्जित हैं)। तत्पश्चात गणेश अथर्वशीर्ष का भूखे पेट पाठ करना चाहिए। पाठ की संख्या 108 होनी चाहिए। पाठ समाप्त होने पर ¬ ह्रीं ग्रीं ह्रीं मंत्र से 108 बार हवन करना चाहिए। इस प्रकार पूजन, हवनादि कर के गणेश आरती आदि करें। तत्पश्चात गणेश पूजा के पुष्पादि का पवित्र नदी में विसर्जन करने से विद्या प्राप्ति में सफलता आसान हो जाती है। गायत्री उपासना से विद्या लाभ: गायत्री मां की शक्ति से ज्ञान, दिव्य ज्ञान, विद्या आदि शास्त्र ज्ञान की प्राप्ति होती है। गायत्री उपासना करने से अनेक कष्टों का निवारण होता है एवं दिव्य ज्ञान प्राप्त होता है। उपासना विधि: किसी भी माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि से शुरू कर के 24 दिनों तक की जाने वाली यह साधना अत्यंत लाभकारी है, जिसकी विधि इस प्रकार है: सर्वप्रथम साधक गायत्री यंत्र प्राप्त करें। साधना के दिन सूर्योदय के समय स्नानादि से निवृत्त हो कर, संध्या संकल्प कर के, स्वच्छ स्थल या गोशाला, मंदिर आदि के प्रांगण में यंत्र को पंचामृत एवं गंगा जल से स्नान करा कर, श्वेत वस्त्र पर स्थापित करें। यंत्र की श्वेत पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि स े पजू ा कर।ंे तत्पश्चात गायत्री शाप विमोचन का यह मंत्र बोलें। मंत्र: ¬ श्री गायत्री त्वं ब्रह्म शापात् विमुक्ता भव। ¬ श्री गायत्री त्वं वशिष्ठ शापात् विमुक्ता भव। ¬ श्री गायत्री त्वं विश्वामित्र शापात्विमुक्ता भव। ¬ श्री गायत्री त्वं शुक्र शापात् विमुक्ता भव। अब ¬ गायत्री देव्यै नमः का चैबीस बार जप करें। व्यवसाय में सफलता कभी-कभी अपने अनुकूल ग्रह का व्यवसाय करने पर भी वांछित लाभ नहीं मिलता है, अथवा लाभ सीमित समय तक होता है। ऐसी स्थिति में जातक का वर्षफल तथा संवत का ग्रह परिषद, ग्रहों का गोचर, देश-काल-परिस्थिति आदि भी देखना आवश्यक होता है। प्रस्तुत है यहां सभी ग्रहों की उपासना विधि। जो विधिपूर्वक ग्रहों की उपासना करते हैं, उन्हें व्यवसाय में लाभ अवश्य होता है। सूर्य उपासना: सूर्य यंत्र की उपासना शुक्ल पक्ष के प्रथम रविवार से प्रारंभ की जाती है प्रत्येक रविवार को सुबह, शुद्ध वस्त्र एवं लाल चंदन धारण कर के, यंत्र को लाल वस्त्र पर स्थापित कर ¬ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः मंत्रा का लाल चंदन की माला से 108 बार जप कर के, गंधाक्षत, लाल पुष्प एवं दूर्वायुक्त जल से उपर्युक्त मंत्र पढ़ते हुए, अघ्र्य दें। चंद्र उपासना: यह उपासना श्रावण माह के प्रथम सोमवार से करने का विशेष माहात्म्य है। अपना व्रतारंभ करने वाले स्त्री या पुरुष को चाहिए कि वह स्नानादि कर के चंद्र यंत्र को स्वच्छ जल में काले तिल डाल कर, स्नान कराएं। फिर रेशमी वस्त्र पर स्थापित कर के चांदी अथवा मोती की माला पर ¬ श्रां श्रीं श्रौं सः चंद्रमसे नमः मंत्र का ग्यारह माला जप करें। मंगल उपासना: यह उपासना किसी भी माह के शुक्ल पक्ष में प्रथम मंगलवार को, स्नानादि कर के, मंगल यंत्र को लाल वस्त्र पर स्थापित कर के, लाल पुष्प, गुड़, तांबे के सिक्के, गेहूं, मसूर, कनेर के पुष्प आदि से पूजन कर के शुद्ध मन से रुद्राक्ष की माला पर ¬ क्रां क्रीं, कौं सः भौमाय नमः मंत्रा का दस माला जप करें। यह उपासना 10, या 21 मंगलवार को करने पर पूर्ण मानी जाती है। बुध उपासना: यह उपासना किसी भी माह के विशाखा नक्षत्र, बुधवार से शुरू कर के, नौ बुधवार तक की जाती है। सर्वप्रथम स्नानादि कर के, बुध यंत्र को हरे वस्त्र पर स्थापित कर धूप, दीप आदि से पूजन कर के, मूंग, घी, हाथी के दांत की बनी वस्तुएं, पंच रत्न, शहद, सौंफ आदि अर्पित कर के, मूंग की दाल से बने मिष्टान्न का भोग लगाएं। रुद्राक्ष की माला पर ¬ ब्रां ब्रीं, ब्रौं सः बुधाय नमः मंत्र का नौ माला जप करें। गुरु उपासना: यह उपासना किसी भी माह के शुक्ल पक्ष, अनुराधा नक्षत्र, गुरुवार से शुरू की जाती है। यह 13 गुरुवार तक चलने वाली उपासना ळें सर्वप्रथम स्नानादि कर के तुलसी की माला और पीला वस्त्र धारण करें तथा पूर्ण पवित्रता से पूजा करें। केले के पत्ते पर गुरु यंत्र को स्थापित करें। अनेक प्रकार के पुष्प, केसर, पीले फल आदि अर्पित करें तथा पूजन कर हल्दी अथवा रुद्राक्ष की माला पर ¬ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरुवे नमः मंत्र 19 माला जपें। शुक्र उपासना: यह उपासना श्रावण माह के प्रथम शुक्रवार से ले कर सोलह वारों तक करने पर अधिक फल मिलता है। सर्वप्रथम स्नानादि कर के सफेद वस्त्र धारण करें। श्वेत वस्त्र एवं चावल पर शुक्र यंत्र को स्थापित करें। दही, सफेद पुष्प, सुगंधित द्रव्य आदि से पूजा करें तथा स्फटिक की माला पर सोलह माला ¬ द्रां द्रीं द्रौं सः शुक्राय नमः मंत्रा का जप कर के पुनः पूजन आदि करें। शनि उपासना: यह उपासना श्रावण माह के प्रथम शनिवार से शुरू कर के, 19 शनिवार तक करनी चाहिए। सर्वप्रथम स्नानादि कर के काले वस्त्र पर शनि यंत्र, घोड़े की नाल, लोहे की कील और लौह की शनि मूर्ति को स्थापित कर के, पंचामृत एवं तेल से स्नान आदि करा कर, धूप, गंध, नीला पुष्प, नैवेद्य आदि से पूजन कर, ¬ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः मंत्र को रुद्राक्ष की माला पर 23 माला जप करें। तत्पश्चात एक बर्तन में काला तिल, नीला पुष्प, फल और नैवेद्य आदि रख कर शनि देव को अर्पित करें। अघ्र्य में जल, तिल, नीला पुष्प, फल, नैवेद्य, लौंग, तेल, गंगा जल, दूध आदि डाल कर पश्चिम दिशा की ओर मुंह कर के पीपल के वृक्ष की जड़ में डाले।ं 19 शनिवार के पश्चात दशांश हवन करें। शनि स्तोत्र का पाठ करें। काले जूते, जुराब, नीला वस्त्र, उड़द, चाकू, तेल से निर्मित वस्तुएं आदि किसी वृद्ध ब्राह्मण को दान करें। स्वास्थ्य लाभ हेतु गीता से स्वास्थ्य लाभ: स्वास्थ्य रक्षा के लिए यंत्रों की उपासना से लाभ प्राप्त होता है। यदि किसी जातक को लंबी बीमारी का सामना करना पड़े, तो गीता का नियमित पाठ करना चाहिए। निर्धन और निराश भावना के जातक के लिए भी गीता का पाठ अत्यंत लाभकारी माना गया है। जिन महिलाओं का प्रसूति के समय स्वास्थ्य खराब हो, उन्हें स्वस्थ संतान की प्राप्ति के लिए, गर्भ धारण के पश्चात, नियमित गीता का पाठ नियमित रूप से करना चाहिए। गीता यंत्र की स्थापना कर धूप-दीप, पुष्प आदि अर्पित कर के, नियमित पाठ करने से लंबी बीमारी में लाभ होता है, संतान उत्पत्ति में आसानी होती है और जन्म लेने वाली संतान भाग्यशाली तथा ज्ञानी होती है। वास्तु दोष निवारण वास्तु दोषनाशक यंत्र: यह यंत्र सोना, चांदी, तांबा तथा भोज पत्र पर बनाया जाता है। इस यंत्र को शुभ मुहूर्त में प्रतिष्ठित करने से वास्तु दोष नष्ट होता है।



रुद्राक्ष एवं आध्यात्मिक वास्तु विशेषांक   फ़रवरी 2007

प्रकृति के कोष से हमें कई जिवानोपर्यांत वस्तुएं प्राप्त होती है. ऐसी ही वस्तुओं में एक है रुद्राक्ष. रुद्राक्ष का आध्यात्मिक और औषधीय महत्त्व बहुत है. शुद्ध रुद्राक्ष की पहचान कैसे की जाए? रुद्राक्ष का सम्बन्ध भगवान शिव से कैसे जुडा हुआ हैं? रुद्राक्ष धारण

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