सुख, समृद्धि सौभाग्यदाई दुर्लभ शंख

सुख, समृद्धि सौभाग्यदाई दुर्लभ शंख  

सुख, समृद्धि एवं सौभाग्यदायी दुर्लभ शंख पं. सीताराम त्रिपाठी हर मंगल कार्य का प्रारंभ शंखध्वनि से होता है क्योंकि शंख ध्वनि से काल कंटक दूर भागते हैं और चारों ओर का वातावरण परिशुद्ध हो जाता है। शंख अनेक प्रकार के होते हैं और सबकी अपनी अलग पहचान होती है। इस आलेख में कुछ दुर्लभ शंखों की जानकारी देने का प्रयास किया गया हैकृ रतीय संस्कृति में शंख को मांगलिक चिह्न के रूप में स्वीकार किया गया है। स्वर्ग के सुखों में अष्ट सिद्धियों व नव निधियों में शंख भी एक अमूल्य निधि माना गया है। पूजा के समय जो व्यक्ति शंखनाद करता है, उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। शंखों की उत्पत्ति के स्थलों में मालद्वीप, श्रीलंका, कैलाश मानसरोवर, निकोबार द्वीप समूह, अरब सागर, हिंद महासागर, प्रशांत महासागर आदि प्रमुख हैं। शंख से रुद्र भगवान देवाधिदेव शिव का रुद्राभिषेक करने का विशेष माहात्म्य है। सूर्य को अघ्र्य देने के लिए भी सभी प्रकार के शंख काम में लाए जाते हैं। ज्योतिष और तांत्रिक साधनाओं में, भिन्न-भिन्न कार्यों की सिद्धि के लिए विभिन्न आकृतियों और नामों वाले शंखों को काम में लिया जाता है। धन्वन्तरि के आयुर्वेद में भी शंख का महत्व कम नहीं है। शंख के बारे में बताया गया है कि इसके मध्य में वरुण, पृष्ठ भाग में ब्रह्मा तथा अग्र भाग में पवित्र नदियों गंगा और सरस्वती का वास है। शंख के दर्शन मात्र से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। इन दिव्य शंखों को दरिद्रतानाशक, आयुवर्धक और समृद्धिदायक कहा गया है। दक्षिणावर्ती शंख: संसार में जितने भी प्रकार के शंखों की प्रजातियां पाई जाती हैं, अधिकतर वामावर्ती ही होती हैं। लेकिन जो शंख दाहिनी तरफ खुलता है, उसे दक्षिणावर्ती शंख के नाम से जाना जाता है। यह शंख समुद्री क्षेत्रों में मिलता है। दिखने में यह मिट्टी के ढेर जैसा लगता है। बाहर लगी मिट्टी को तेजाब से साफ कर इसके रूप का परिष्कार किया जाता है। जिस घर में यह रहता है वहां मंगल ही मंगल होते हैं। लक्ष्मी स्वयं स्थायी रूप से वास करती है तथा परिवार में सुख-समृद्धि तथा वैभव लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है। इस तरह के शंख सहज सुलभ नहीं होते हैं। अत्यंत ही दुर्लभ और चमत्कारी होने के कारण इस शंख का मूल्य अत्यधिक होता है। मूल्य अधिक होने के कारण बाजार में नकली दक्षिणावर्ती शंख भी बनाए जाने लगे हैं। नकली शंख की सफेदी, चमक, सफाई अत्यधिक होती है। असली दक्षिणावर्ती शंख रूपाकृति में जितना बड़ा होता है, उतना ही अधिक लाभकारी होता है। इसमें आचमन करने के लिए सफेद गाय का दूध ही काम में लिया जाता है। धन प्राप्ति के व्यवधानों के निवारण के लिए दक्षिणावर्ती शंख प्रभावकारी माना गया है। इसकी स्थापना करने और शंखोदक छिड़कने से दुख, कष्ट, दरिद्रता और दुर्भाग्य का शमन होता है और यह भाग्य को चमकाता है। यह शंख साक्षात लक्ष्मी का रूप है। दुर्लभ देवी शंख: इस शंख की उत्पत्ति कैलाश मानसरोवर और श्रीलंका के समुद्रों में होती है। इसे नवदुर्गा ने शक्तिशाली आयुध के रूप में हाथ में धारण कर रखा है। माता के भक्तों को अवश्य ही इस शंख को अपने भवन में स्थापित करना चाहिए। दुर्गा के भक्तों को इस शंख का नौ बार नाद करने के बाद दुर्गा सप्तशती का पाठ करना उत्तम फलदायक माना गया है। शुभ मुहूर्त के दिन से इस शंख से पूजा करने पर लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं। यह धनवृद्धि का अचूक उपाय है। असली देवी शंख को शंख माला से अभिमंत्रित कर आचमन करने का विधान है। शंख को सामने रख कर ¬ नमः देवी रूपेण शंखायः मम गृह धनवृ(ि कुरु-कुरु स्वाहा मंत्र का जप करते हुए इस पर फूंक मारने से यह जाग्रत होता है। इसे जाग्रत करने के बाद परिवार के सभी सदस्यों के गंगा जल से आचमन करने पर परिवार में सुख-समृद्धि की वृद्धि होती है तथा माता का पूर्ण आशीर्वाद प्राप्त होता है। परिवार की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। शंख में कैल्सियम की मात्रा सौ प्रतिशत होती है, अतः इसमें रात को जल भरकर रखना चाहिए और प्रातः काल हृदय व गठिया के मरीजों को तांबे के पात्र से सेवन कराना चाहिए, लाभ होगा हृदय रोगी के लिए रोजाना इस शंख का नाद करना लाभदायक होता है। इसके व्याधिनाशक और आरोग्यकारी गुणों के कारण भारतीय संस्कृति और धर्म के विधि-विधान में इसकी विशेष उपयोगिता मानी गई है। हमारे प्राचीन ऋषि-मुनियों ने अनुभव एवं अनुसंधान के आधार पर प्रयोग कर यह सिद्ध किया कि शंख भस्म से अनेक रोगों का निवारण किया जा सकता है। प्राचीन काल में शंख थेरैपी ही मुख्यतः रोग निदान का कार्य करती थी। मणिपुष्पक शंख: इस शंख को महाभारत काल में सहदेव बजाते थे। इसका रंग पीला होता है। इसका मुंह पूरा खुला होता है। इसकी परत पतली होती है। दुर्लभ और चमत्कारी होने के कारण इसका मूल्य भी अधिक होता है। इसलिए इसे आजकल कृत्रिम भी बनाया जाने लगा है। असली प्रामाणिक मणिपुष्पक शंख प्राप्त कर अपने घर में दीपावली के दिन स्थापित करना चाहिए। ¬ मणिपुष्पक शंखायः मम् गृह धनवृद्धि कुरु-कुरु स्वाहाः मंत्र का 11 दिन तक प्रतिदिन मोती माला से 108 बार एक माला रोजाना जप कर उसे अभिमंत्रित कर लेना चाहिए। इस शंख में फाॅस्फोरस व कैल्सियम की मात्रा भरपूर होती है। रात में इसमें गंगा जल भरकर तांबे की प्लेट से ढककर प्रातः मधुमेह व हृदय रोगियों को उससे आचमन करना चाहिए। इसके प्रभाव से शरीर स्वस्थ रहता है। हनुमान एवं शिव भक्तों के पीली गाय के दूध से आचमन करने से उनकी साधनाएं शीघ्र सफल होती हैं। स्त्री-पुरुष सभी मणिपुष्पक शंख को स्थापित कर लाभ प्राप्त कर सकते हैं। कैलाश मानसरोवर में उच्च श्रेणी के मणिपुष्पक शंख मिल जाते हैं जो मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाले होते हैं। इंद्र का ऐरावत शंख: इंद्र देवता समुद्र मंथन से निकले इस गजराज ऐरावत शंख को आयुध के रूप में हाथ में धारण कर विशाल ऐरावत की हाथी की सवारी करते हैं। ऐरावत हाथी के साथ ही इस शंख का प्रादुर्भाव हुआ। इसलिए यह ऐरावत शंख कहलाता है। यह शंख गजराज की सूंड के आकार का होता है। कहा जाता है कि इंद्र को अजर-अमर होने का वरदान भी इसी शंख से मिला था। इस शंख की साधना एवं नित्य इससे आचमन करने से मनचाहा रूप धारण किया जा सकता है। काम पीड़ित इंद्र ने गौतम की अनुपस्थिति में ऐरावत शंख का अनुचित प्रयोग कर गौतम का रूप धारण कर छल-कपट से अहिल्या के साथ दुराचार किया। इस कुकृत्य के कारण इंद्र घोर रूप से कलंकित हुए और उन्हें गौतम ऋषि के शाप का शिकार होना पड़ा। इसलिए तंत्र सिद्धियों का सदुपयोग करना ही ठीक माना गया है। प्राचीन काल में ऋषि महर्षियों को इस शंख का ज्ञान था, इसलिए वे मनचाहा रूप धारण कर लेते थे। नारद जी को भी इस शंख की सिद्धि थी, इसलिए वह पल भर में परलोक गमन कर के संवाददाता का कार्य करते थे। वह एक कुशल संवाददाता थे और मनचाहा रूप धारण करने में भी सक्षम थे। प्राचीन ग्रंथों में ऐरावत शंख का विशद विवरण मिलता है। नीलकंठ शंख: समुद्र मंथन से निकले हलाहल को भगवान शिवजी पीकर जब हिमालय की ओर रवाना हुए तब समुद्र में जल ग्रहण इसी शंख से किया। उसी समय से इस शंख का रंग भी विष के समान हो गया और उसी दिन से इसका नाम नीलकंठ शंख हो गया। शंख की आकृति दोनों ओर से खुली हुई होती है। इसके ऊपर से नीचे तक मुंह पूरा खुला रहता है। किसी को सर्प डंस ले या बिच्छू डंक मारे तो इस शंख में गंगाजल भर कर पिलाने से जहर उतर जाता है। शंख में देशी गाय का गोमूत्र डालकर जहरीले जानवर के काटे स्थान को साफ करना चाहिए। इस शंख की घर पर स्थापना करने से घर में सांप, बिच्छू तथा अन्य जहरीले जानवर प्रवेश नहीं करते हैं। इस शंख में काली गाय का दूध डालकर कुछ समय तक सूर्य की किरणों में रख कर पीने से आंतरिक असाध्य रोग खत्म होते हैं तथा सफेद देशी गाय का दूध डालकर पीने से मानसिक तनाव हमेशा के लिए खत्म हो जाता है। लक्ष्मी शंख: समुद्र मंथन के समय दायें हाथ में यह शंख लेकर लक्ष्मी प्रकट हुईं, इसलिए इस का नाम लक्ष्मी शंख है। इसकी पूजा करना माता लक्ष्मी की आराधना के बराबर माना गया है। दीपावली के दिन असली प्रामाणिक लक्ष्मी शंख प्राप्त कर उसे इस मंत्र से जाग्रत करें- ¬ नमः लक्ष्मी महाशंखाय मम् गृह धनवर्षा कुरु-कुरु स्वाहाः। मंत्र का जप रुद्राक्ष माला से करें और जाग्रत शंख में गंगा जल भरकर भवन में छिड़काव करें। इसी जल से परिवार के सभी सदस्य आचमन करें, लक्ष्मी का स्थायी वास होगा। दक्षिणावर्ती शंख से भी अधिक इसका लाभ माना गया है। यह शंख श्वेत रंग का अद्धर् चंद्रमा की भांति खुला हुआ होता है। इसकी उत्पत्ति हिंद महासागर और अन्य बड़े सागरों में होती है। दुर्लभ होने के कारण इसका मूल्य भी अधिक होता है। यह शंख जहां भी रहता है, दरिद्रता और असफलता वहां से पलायन कर जाती है। प्रतिदिन शंख फूंकने वाले को सांस से संबंधित और फेफड़ों के रोग नहीं होते हैं। शंख में गंधक, फाॅस्फोरस एवं कैल्सियम की भरपूर मात्रा होती है। अतः इसमें कुछ समय तक जल रखा रहने से वह सुवासित और रोगाण् ाुरहित हो जाता है। यही वजह है कि धार्मिक अनुष्ठान, पूजा, आरती आदि कृत्यों में इस शंख में जल भरकर लोगों पर छिड़का जाता है। गोमुखी शंख: इस शंख की उत्पत्ति स्वच्छ मीठे पानी की झीलों और समुद्रांे में अधिक होती है। विश्व में सबसे अधिक साफ-सुथरे और सुंदर आभायुक्त चमत्कारी शंख की अधिक उत्पत्ति मानसरोवर, लक्षद्वीप, अंडमान निकोबार द्वीप समूह, श्रीलंका के हिंद महासागर, अरब सागर और बंगाल की खाड़ी के समुद्री तटों में होती है। कैलाश मानसरोवर में सफेद और पीले रंग के गोमुखी शंख पाए जाते हैं। गाय के मुख जैसी रूपाकृति होने के कारण इसे गोमुखी शंख के नाम से जाना जाता है। पौराणिक शास्त्रो में इसका नाम कामधेनु गोमुखी शंख है। इस शंख का प्राकृतिक भार 500 ग्राम से 3 किलो तक होता है। शंख का ऊपरी भाग गाय के सींग की तरह ऊपर उठा होता है। यह श्ंाख बहुत दुर्लभ है और प्रकृति की अनुपम देन है। इस शंख को प्राप्त कर, प्राण प्रतिष्ठित करवा कर, सिद्ध जागृति मंत्र का उपयोग कर शंख माला से जाग्रत कराना चाहिए। पौराणिक शास्त्रों के अनुसार इंद्रलोक में भी यही शंख स्थापित है। इस शंख से आचमन करने और इसे बजाने से असाध्य रोगों का शमन होता है। विष्णु शंख: यह श्वेत आभायुक्त शंख प्रकृति द्वारा जटिल रूपाकृति में बनाया गया है। इस शंख की रूपाकृति भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ जैसी प्रतीत होती है। शास्त्रों में इस शंख को चंद्र शंख की संज्ञा भी दी गई है। इस शंख को देखने पर ऐसा प्रतीत होता है जैसे उड़ता हुआ गरुड़ हो। विष्णु शंख को लक्ष्मी का रूप कहा गया है। कैलाश मानसरोवर, लक्षद्वीप, गोवा, अरब सागर, हिंद महासागर, प्रशांत महासागर और अमेरिका के पश्चिमी तट अटलांटिक महासागर में यह पवित्र, दिव्य, दुर्लभ चमत्कारी शंख प्राप्त होता है। इस शंख का उपयोग व्यक्ति अपने व्यवसाय में उन्नति के लिए और दरिद्रता को दूर करने में करता है। गणेश शंख: यह शंख समुद्र में उत्पन्न होता है। यह एक अद्भुत और चमत्कारी शंख है। इस शंख की आकृति आदिनाथ प्रथम पूज्य भगवान गणपति जैसी है। चारांे ओर से घुमा कर देखने पर लंबोदर, विघ्नहरण गणेश की प्रतिमा के दर्शन होते हैं। इसलिए इस शंख का नाम गणेश शंख रखा गया है। इस दिव्य शंख की रूपाकृति सफेद और पीली आभायुक्त एवं इसकी लंबाई 2 से 3 इंच तक होती है। इसकी उत्पत्ति हिमालय की मानसरोवर झील और समुद्र के तटवर्ती क्षेत्रों में कम गहराई में होती है। दुर्लभ हाने े क े कारण इसका मल्ू य भी अधिक होता है। गणेश शंख के सूंड क्षेत्र से बाण गंगा निकली होती है। असली गणेश शंख को ¬ गणेश शंखाय मम् धनवर्षा कुरु-कुरु नमः मंत्र से 108 बार शंख माला से सिद्ध और प्राण प्रतिष्ठित कर, अपने घर में पूजा स्थल या व्यवसाय स्थल पर, स्नानादि से निवृत्त हो कर, स्थापित करें और जल भर कर आचमन करें तथा भवन और व्यवसाय स्थल पर जल का छिड़काव करें। जिस घर में इस शंख की स्थापना होती है, उसमें आर्थिक समस्या नहीं रहती है और ऋद्धि-सिद्धि का भंडार भरा रहता है। अन्नपूर्णा शंख: शंखों में अन्नपूर्णा शंख बहुत भारी होता है। इस शंख का वजन औसतन 3 किलोग्राम से 9 किलोग्राम तक होता है। इस शंख की आकृति मन मोह लेती है। इसके उत्पत्ति स्थलों में, समुद्रांे की अपेक्षा, कैलाश मानसरोवर, मालद्वीप, लक्षद्वीप, कन्याकुमारी आदि प्रमुख हैं। इस शंख के नाम की तरह ही इसका कार्य भी दिव्य और चमत्कारी है। जिस घर में अन्नपूर्णा शंख स्थापित होता है, वह घर अन्न-धन से परिपूर्ण और चहुंमुखी विकास की ओर अग्रसर होता है। मोती शंख: यह शंख भी अपने नाम के प्रभाव और अपनी रूपाकृति से व्यक्ति को अपनी ओर आकर्षित करता है। यह चमकदार आभायुक्त होता है। इस शंख की ऊंचाई 4 से 5 इंच की होती है तथा यह गोलाकार होता है। यह ऊपर से संकरा और नीचे से चैड़ा होता है। इस शंख की उत्पत्ति कैलाश मानसरोवर झील के बर्फीले ठंडे-मीठे स्वच्छ जल में होती है। उच्च गुणवत्ता का मोती भी इसी शंख में उत्पन होता है। मानसिक अशांति दूर करने के लिए यह उत्तम माना गया है। इस शंख से गंगा जल का रोजाना आचमन करने से हृदय और श्वास संबंधी रोगों का शमन होता है। पांचजन्य शंख: महाभारत युद्ध के समय भगवान श्री कृष्ण ने इस शंख का निनाद किया था। धर्म गं्रथों में इस पांचजन्य शंख को विजय, समृद्धि, यश, कीर्ति और मनोकामना पूर्ति करने वाला माना गया है। पांचजन्य शंख में पंच तत्व सम्मिलित हैं। वास्तु दोष शांति के लिए पांचजन्य शंख ही सबसे प्रभावी है।



रुद्राक्ष एवं आध्यात्मिक वास्तु विशेषांक   फ़रवरी 2007

प्रकृति के कोष से हमें कई जिवानोपर्यांत वस्तुएं प्राप्त होती है. ऐसी ही वस्तुओं में एक है रुद्राक्ष. रुद्राक्ष का आध्यात्मिक और औषधीय महत्त्व बहुत है. शुद्ध रुद्राक्ष की पहचान कैसे की जाए? रुद्राक्ष का सम्बन्ध भगवान शिव से कैसे जुडा हुआ हैं? रुद्राक्ष धारण

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