पूजनीय दुर्लभ वस्तुएं

पूजनीय दुर्लभ वस्तुएं  

पूजनीय दुर्लभ वस्तुएं कुछ वस्तुएं ऐसी होती हैं जो आसानी से उपलब्ध नहीं हो पाती परंतु उनकी सही जानकारी होने से उन्हंे प्राप्त कर लाभ प्राप्त किया जा सकता है और दुर्लभ वस्तुओं को सुलभ बनाया जा सकता है, कैसे आइए जानें... श्वेतार्क गणपति: श्वेतार्क को हिंदी में आक तथा अकौड़ा, पंजाबी में देशी आक, उर्दू में मदार, संस्कृत में अर्क और गुजराती में आकड़ा कहते हैं। श्वेत आक का यह पौधा गणपति जी का स्वरूप माना जाता है। जिस व्यक्ति के घर में यह पौधा होता है उसे कोई शत्रु हानि नहीं पहुंचा पाता। सफेद आक के गणपति की प्रतिमा अत्यंत दुर्लभ मानी जाती है। मान्यता है कि जिसके घर में सफेद आक के गणपति की प्रतिमा स्थापित होती है उसे किसी प्रकार का कोई अभाव नहीं रहता। ऐसी धारणा है कि श्वेत आक की जड़ में, जो कम से कम 27 वर्ष पुरानी हो, स्वतः ही गणेश जी की प्रतिमा बन जाती है। यह प्रकृति का एक आश्चर्य ही है। श्वेत आक की जड़ यदि खोदकर निकाली जाए, तो सबसे निचले भाग में गणपति जी की प्रतिमा प्राप्त होगी, जिसका पूजन करना महान कल्याणकारी होता है। यह प्रतिमा स्वतः सिद्ध होती है। तंत्र शास्त्रों के अनुसार जिस घर में, यह प्रतिमा स्थापित हो, उसमें ऋद्धि-सिद्धि तथा अन्नपूर्णा वास करती हैं। आक के अन्य पौधे, जिनके फूल गुलाबी-नीली आभा लिए होते हैं, हर स्थान पर सुलभ हैं, परंतु श्वेत आक दुष्प्राप्य है। इसकी टहनियां, मोटी, पत्ते बरगद के पत्तों जैसे फूल, गुच्छेदार व दूध जैसे सफेद और बीज अलसी के बीजों जैसे होते हैं। शालिग्राम: शालिग्राम भगवान विष्णु का साक्षात स्वरूप है। इसे बड़ी-बड़ी पूजाओं एवं यज्ञादि में रखना आवश्यक होता है। भगवान विष्णु का दुर्लभ प्रतीक शालिग्राम भारत की गंडकी नदी से प्राप्त होता है। यह वैष्णव धर्म के लोगों के लिए साक्षात विष्णु है। इस शालिग्राम को घर में प्रतिष्ठित करने से धर्म, कर्म और ऐश्वर्य की वृद्धि होती है। शालिग्राम को तुलसी, बेलपत्र, चंदन, शंख और गोमती चक्र इन पांच वस्तुओं को साथ रखने से हर प्रकार की कामना की पूर्ति होती है। शालिग्राम को प्रतिदिन विभिन्न प्रकार के भोग लगाने से रोगों से रक्षा होती है। हरिद्रा गणपति: तंत्र शास्त्र में हरिद्रा गणपति का विशेष महत्व बताया गया है। जब हरिद्रा का पौधा कई वर्षों का हो जाता है, तो उसकी जड़ में गणपति का वास हो जाता है। तब उसे अच्छे मुहूर्त में प्राप्त करके पूजन स्थल में प्रतिष्ठित किया जाता है। जिस किसी के घर या व्यापार स्थल में यह प्रतिमा होती है उसे विघ्न बाधाएं नहीं सताती हैं तथा शत्रु पर विजय प्राप्त होती है। इस प्रतिमा को नित्य दूर्वांकुर अर्पित करने से सभी प्रकार की बाधाएं दूर होती हैं। एकाक्षी नारियल: यह नारियल बहुत कम पाया जाता है। सामान्यतः सभी नारियलों में दो आंखें पाई जाती है, किंतु इसमें एक ही आंख होती हैं, इसलिए इसे एकाक्षी कहा जाता है। यह शुभ एवं समृद्धि का प्रतीक है। एकाक्षी नारियल के नित्य पूजन से व्यक्ति की भौतिक तथा आध्यात्मिक उन्नति होती है। इसे अपने घर में पूजा स्थल अथवा व्यवसाय स्थल में सिंदूर से रंग कर तथा लाल कपड़े में लपेटकर स्थापित करना चाहिए। पारद शिव लिंग: पारद शिव लिंग बहुत दुर्लभ है। इसे घर में स्थापित कर नित्य बिल्व पत्र अर्पित करने से धन की वृद्धि होती है। पारद शिव लिंग पर पानी का असर नहीं होता। इसे धूप में देखने पर इंद्रधनुषी आभा दिखाई देती है। पारद अपने आप में सिद्ध पदार्थ माना गया है। रत्न समुच्चय में पारद शिव लिंग की महिमा का विशद उल्लेख है। इसकी आराधना से सभी रोग दूर हो जाते हैं। भगवान शंकर को पारा अति प्रिय है। यह काया, वाणी तथा मानसिक कष्टों को नष्ट करने की क्षमता रखता है। पारद शिवलिंग के स्पर्श मात्र से इसकी दैवीय शक्ति व्यक्ति के शरीर में प्रवेश कर जाती है और वह अनेक रोगों से मुक्त हो जाता है। इसका अभिषेक करने से अन्य शिवलिंगों की अपेक्षा हजारों गुना अधिक फल मिलता है। इसे बनाने में अत्यंत परिश्रम करना पता है तथा तरह-तरह के खतरे भी सामने आते हैं। विश्व भर में मुख्यतः तीन या चार पारद शिवलिंग हैं। भारत में काशी क्षेत्र में, दिल्ली क्षेत्र के केशवपुरम में और उत्तरांचल में कनखल में यह लिंग अवस्थित है। जहां भी इनके मंदिर हैं, वहां दर्शन के लिए हजारों की संख्या में लोग दूर-दूर से आते रहते हैं। पारद शिवलिंग के प्रभाव का प्रत्यक्ष प्रमाण उसे स्पर्श करने मात्र से मिल जाता है। इसका तापमान बहुत कम होता है। इस शिवलिंग के आस-पास बर्फ रखने से उसे शीघ्र ही यह अपने आप में समाहित कर लेता है और उसके जल को पी जाता है। यह शिवलिंग बर्फ के समान ठंडा और वजन में बहुत भारी होता है। नर्मदेश्वर: शिव की साधना में नर्मदेश्वर शिवलिंग का विशेष महत्व है। नर्मदेश्वर शिवलिंग नर्मदा नदी से प्राप्त होता है। यह भगवान शिव का प्रतीक है। इस शिवलिंग की पूजा उपासना करने से अनेक लाभ प्राप्त होते हैं तथा शिव की कृपा से ज्ञान की वृद्धि होती है। नर्मदेश्वर शिवलिंग को नित्य बेलपत्र अर्पित करने से लक्ष्मी, काला तिल अर्पित करने से शनि ग्रह की कृपा, उसका पंचामृत स्नान कराने से भाग्यशाली पुत्र की प्राप्ति और सरसों का तेल अर्पित करने से शत्रु का नाश होता है। हत्था जोड़ी: यह एक वनस्पति है। एक विशेष जाति के पौधे की जड़ खोदने पर उसमें मानव भुजा जैसी दो शाखाएं दीख पड़ती हैं। इसके सिरे पर पंजा जैसा बना होता है। उंगलियों के रूप में उस पंजे की आकृति ठीक इस तरह की होती है जैसे कोई मुट्ठी बांधे हो। जड़ निकालकर उसकी दोनों शाखाओं को मोड़कर परस्पर मिला देने से करबद्धता की स्थिति आती है, यही हत्था जोड़ी है। इसके पौधे प्रायः मध्य प्रदेश में होते हैं जहां वनवासी जातियों के लोग इसे निकालकर बेच दिया करते हैं। हत्था जोड़ी में अद्भुत प्रभाव निहित रहता है। यह साक्षात चामुंडा देवी का प्रतिरूप है। सम्मोहन, वशीकरण, अनुकूलन, सुरक्षा और संपत्ति संवर्धन की इसमें चमत्कारी शक्ति होती है। इसे कहीं से प्राप्त करके तांत्रिक विधि से सिद्ध कर दिया जाए तो साधक निश्चित रूप से चामुंडा देवी का कृपा पात्र हो जाता है। पूजन विधि: सर्वप्रथम कहीं से हत्था जोड़ी प्राप्त करें। लाल वस्त्र पर रखें। थोड़ी देर में पानी सूख जाएगा। इसे तिल के कच्चे तेल में डुबोकर रख दें, कटोरी में तेल इस प्रकार भरें कि यह डूब जाए। वह तेल पात्र कहीं एक पवित्र स्थान पर रखें। 15 या 21 दिनों तक वैसा ही रहने दें फिर किसी शुभ मुहूर्त में उसे तेल से निकाल कर पुनः लाल वस्त्र पर स्थापित करें और हनुमानी लाल सिंदूर, चंदन, फूल, अक्षत, धूप दीप से पूजा करें। जप के बाद सामथ्र्यानुसार 9, 11 या 21 माला मंत्र का जप करें और 21 बार उस मंत्र के द्वारा आहुति देकर हवन करंे तथा उसे किसी डिब्बी में रख दें। उसे रखते समय सिंदूर, कपूर, लौंग, तुलसी पत्र, अक्षत और चांदी का टुकड़ा भी साथ में रख देना चाहिए। इसका दैनिक पूजन दर्शन बहुत लाभकारी होता है। बिल्ली की जेर: बिल्ली प्रसव के समय एक प्रकार की थैली त्यागती है। जिसे आंवल या जेर कहते हैं। प्रायः सभी पशुओं के शरीर से प्रसव के समय आंवल निकलता है। बिल्ली अपना आंवल तुरंत खा जाती है। पालतू बिल्ली का आंवल किसी कपड़े से ढक कर प्राप्त कर लिया जाए तो इसका तांत्रिक प्रभाव धन-धान्य में वृद्धि करता है। मुख्य रूप से यह जेर धातुओं के संग्रह में (सोना चांदी बटोरने में) सहायक होती है। पूजन विधि: सर्वप्रथम कहीं से जेर प्राप्त करके उस पर हल्दी का चूर्ण मल कर रख लेना चाहिए। इसके बाद किसी शुभ मुहूर्त में उसे लाल वस्त्र पर लपेट कर उसकी लोबान की धूनी और कपूर के दीप से पूजा कर दुर्गा मंत्र ‘‘¬ दुं दुर्गाये नमः’’ का 108 बार जप कर, उसे कहीं सुरक्षित रख देना चाहिए। इंद्र जाल: इंद्र जाल एक दुर्लभ एवं अमूल्य वस्तु है। इसे प्राप्त करना न तो आसान है और न ही यह नकली होता है। इंद्र जाल का उल्लेख डामरतंत्र, विश्वसार, रावण संहिता आदि ग्रन्थों में मिलता है। इसे विधि पूर्वक पूजा प्रतिष्ठा करके शुद्ध वस्त्र में लपेट कर पूजा घर में रखना चाहिए।



रुद्राक्ष एवं आध्यात्मिक वास्तु विशेषांक   फ़रवरी 2007

प्रकृति के कोष से हमें कई जिवानोपर्यांत वस्तुएं प्राप्त होती है. ऐसी ही वस्तुओं में एक है रुद्राक्ष. रुद्राक्ष का आध्यात्मिक और औषधीय महत्त्व बहुत है. शुद्ध रुद्राक्ष की पहचान कैसे की जाए? रुद्राक्ष का सम्बन्ध भगवान शिव से कैसे जुडा हुआ हैं? रुद्राक्ष धारण

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