भोजन जीवन का सर्वाधिक महत्वपूर्ण अवयव है तथा हमारे जीवन की सभी गतिविधियां स्वयं तथा परिवार के लिए भोजन की व्यवस्था करने हेतु ही प्राथमिक तौर पर होती हैं। अतः भोजन कक्ष अथवा डायनिंग रूम भी घर के सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान पर स्थित होना चाहिए तथा पूर्णतः वास्तु सम्मत होना चाहिए ताकि भोजन करते वक्त शांति एवं शुकून का अहसास हो तथा भोजन ठीक ढंग से पचकर स्वास्थ्य की वृद्धि करे। डायनिंग रूम जितना अधिक वास्तु सम्मत होगा भोजन से लोगों को उतनी ही अधिक ऊर्जा प्राप्त होगी तथा लोग इस ऊर्जा का उपयोग अपने जीवन के हर क्षेत्र में सकारात्मक रूप से कर पाएंगे। वास्तु सम्मत डायनिंग रूम का तात्पर्य है सभी सामानों एवं अवयवों जैसे डायनिंग रूम का वास्तु के अनुसार उचित दिशा में घर में स्थिति, डायनिंग टेबल, फ्रिज, इलेक्ट्रिक एप्लायंस, लाईट, दरवाजे एवं खिड़कियों का उचित व्यवस्थापन जिससे ऊर्जा एवं स्फूर्ति का संचरण हो तथा वहां खाद्य सामग्रियों में अच्छा स्वाद मिले तथा वे सुपाच्य हों। वास्तु के अंतर्गत भोजन करने का स्थान अति महत्वपूर्ण माना जाता है। पूर्वकाल में किचन के अंदर ही भोजन करने की व्यवस्था होती थी जो कि काफी अच्छा माना जाता था। किचन के अंदर बैठकर भोजन करने से बहुत से वास्तु एवं ग्रह दोषों का शमन हो जाता था। किचन में भोजन करने से कुपित अथवा दूषित राहु का शमन होता है तथा बृहस्पति अनुकूल होते हंै। डायनिंग रूम के लिए उपयुक्त दिशाएं डायनिंग रूम घर में पश्चिम दिशा में सर्वश्रेष्ठ है किंतु स्थानाभाव में विकल्प के तौर पर पूर्व दिशा में भी डायनिंग रूम बनाया जा सकता है। डायनिंग रूम का स्थान ऐसा हो कि वहां प्राकृतिक स्वरूप में सूर्य का प्रकाश भी आता हो। डायनिंग टेबल डायनिंग टेबल आयताकार अथवा वर्गाकार तथा लकड़ी का होना चाहिए। इसकी कुर्सियां भी लकड़ी की ही होनी चाहिए। डायनिंग टेबल, गोलाकार एवं अंडाकार नहीं होना चाहिए। डायनिंग टेबल के ऊपर बीच में फल, नमक, मिर्च एवं अचार आदि के अतिरिक्त टेबल पर कोई भी फालतू सामान न रखें। डायनिंग टेबल पर खासतौर पर बाँस के पौधों का गुच्छा तथा एक पिरामिड रखें। ये दोनों वस्तुएं भोजन की गुणवत्ता एवं पौष्टिक तत्वों को और भी प्रभावपूर्ण बनाते हैं। डायनिंग टेबल दीवार से कम से कम 3’’ हटाकर रखें। कुर्सियां हमेशा सम संख्या में रखें। विषम संख्या में कुर्सियां घर के सदस्यों के बीच मनमुटाव पैदा करते हैं। भोजन करने की दिशा डायनिंग टेबल एवं कुर्सियों की व्यवस्था इस प्रकार करनी चाहिए कि भोजन करते वक्त मुंह हमेशा पूर्व, उत्तर अथवा ईशान दिशा की ओर हो। दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके कभी भी भोजन नहीं करना चाहिए। ऐसा करने से किया गया भोजन शरीर के लिए तो हानिकारक होता ही है, भोजन करने वाले व्यक्ति को अल्पायु भी करता है। पश्चिम दिशा अथवा नैर्ऋत्य कोण की ओर मुंह करके भोजन करने से रोगों के साथ ऋण में भी वृद्धि होती है। गृह स्वामी का मुंह तो भोजन करते वक्त सदैव ही पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए। वाॅश बेसिन डायनिंग रूम में वाॅश बेसिन का स्थान वास्तु के अनुरूप उत्तर-पूर्व अथवा उत्तर-पश्चिम के मध्य वायव्य कोण में होता है। पीने के पानी के लिए वाटर फिल्टर, घड़ा, सुराही आदि पूर्व, उत्तर अथवा मध्य ईशान कोण में रखना शुभ होता है। ध्यान रखें क पीने वाला जल कभी भी नैर्ऋत्य अथवा दक्षिण दिशा में न रखें। यदि ऐसा करेंगे तो प्रायः परिवार के सभी सदस्य रोगों से ग्रसित रहेंगे। दरवाजे एवं खिड़कियां डायनिंग रूम के दरवाजे मुख्य द्वार के सामने नहीं होना चाहिए। डायनिंग रूम के सामने शौचालय अथवा पूजाघर का दरवाजा नहीं खुलना चाहिए। साथ ही शौचालय अथवा पूजाघर डायनिंग रूम के साथ संलग्न भी नहीं होना चाहिए। यथासंभव डायनिंग रूम के दरवाजे एवं खिड़कियां पूर्व एवं उत्तर दिशा में होनी चाहिए। क्राॅकरी यदि डायनिंग रूम में क्राॅकरी एवं अन्य आवश्यक सामग्रियों के लिए कन्सोल (रैक एवं कैबिनेट) की आवश्यकता हो तो उसके दक्षिण अथवा पश्चिम के दीवार क्षेत्र में रखने की व्यवस्था करें। तस्वीरें डायनिंग रूम की दीवारों पर कभी भी मृतक पूर्वजों, हिंसक पशुओं, खंडहर अथवा माॅडर्न आर्ट के नाम पर अर्थहीन चित्र कदापि न लगायें। डायनिंग रूम में कम से कम चित्र लगायें जो किसी सुंदर प्राकृतिक दृश्यों के हों अथवा घर में किसी सुखद आयोजन के अवसर पर बच्चों की ली गई तस्वीरे हों अथवा किसी तीर्थस्थान के हों। इनसे उत्पन्न सकारात्मक ऊर्जा भोजन के प्रभावशाली तत्वों में और अधिक वृद्धि कर देते हैं। टी. वी. एवं इलेक्ट्राॅनिक सामान फ्रिज तथा अन्य इलेक्ट्राॅनिक सामान डायनिंग रूम में दक्षिण-पूर्व (आग्नेय) दिशा में रखना वास्तु सम्मत है। डायनिंग रूम में वैसे तो टी वी न रखें तो ज्यादा अच्छा है क्योंकि खाते वक्त ध्यान का भटकाव नहीं होना चाहिए। खाते वक्त पारिवारिक सदस्यों के बीच हल्की फुल्की बात होना ज्यादा अच्छा है। यदि टी वी रखना आवश्यक ही समझें तो इसे दक्षिण-पूर्व (आग्नेय) दिशा में रखें। पंखा छत के मध्य भाग में अथवा दीवार पर पश्चिम, उत्तर दिशा अथवा वायव्य एवं ईशान कोण में शुभ फलदायी होता है। वाटर कूलर एवं एयर कंडीशनर भी इन्हीं दिशाओं अथवा कोण में लगाना शुभ होता है। लाईट प्रकाश सकारात्मक ऊर्जा का सृजन करता है। डायनिंग रूम की सजावट तथा यहां प्रकाश की व्यवस्था घर के सदस्यों के मूड एवं रूचि के अनुसार होनी चाहिए। प्रकाश ऐसा हो जो वातावरण को सहज एवं आरामदेह बनाए। मोमबत्तियां एवं लैंप खाने की टेबल पर एक विशेष प्रभाव पैदा करती हैं। सीलिंग लाइट्स ऐसी होनी चाहिए कि उसका फोकस लंबवत् मुख्य रूप से डायनिंग टेबल पर ही आए। प्रकाश अधिक तीक्ष्ण नहीं होना चाहिए। रंग रंग मूड के साथ-साथ जीवन के हर पहलू को प्रभावित करता है। अतः हर स्थान एवं अवसर पर अलग-अलग रंगों को प्रधानता दी जाती है। डायनिंग रूम के दीवारों का रंग लाईट ग्रीन, आॅरेंज, क्रीम एवं लाईट पिंक सर्वोत्तम हैं। डायनिंग लंबवत् मुख्य रूप से डायनिंग टेबल पर ही आए। प्रकाश अधिक तीक्ष्ण नहीं होना चाहिए। रंग रूम के दीवारों पर उजला अथवा काला रंग करवाने से बचें। डायनिंग रूम के अंदर टूटी-फूटी बेकार वस्तुएं, लोहे की आलमारियां, सन्दूक अथवा पेटी आदि न रखें। डायनिंग रूम में रखी लोहे की भारी वस्तुएं अथवा टूटा-फूटा सामान नकारात्मक ऊर्जा का उत्सर्जन करते हैं जिसके फलस्वरूप परिवार के सदस्यों में भोजन के प्रति अरूचि पैदा होती है तथा किया गया भोजन रोग का कारक बनता है।


पितृ ऋण एवं संतान विशेषांक  सितम्बर 2014

फ्यूचर समाचार के पितृ ऋण एवं संतान विषेषांक में अत्यधिक ज्ञानवर्धक व जनहितकारी लेख जैसे- पितृ दोष अथवा पितृ ऋण परिचय, श्राद्ध कर्मः कब, क्यों और कैसे?, पितृदोष सम्बन्धी अषुभ योग एवं उनके निवारण के उपाय, संतान हीनताः कारण और निवारण, टेस्ट ट्यूब बेबीः एक ज्योतिषीय अध्ययन तथा ज्योतिष एवं महिलाएं आदि सम्मलित किये गये हैं। इसके अतिरिक्त पाठकों व कर्मकाण्ड के विद्वानों के लिए संक्षिप्त तर्पण तथा श्राद्ध विधि की सटीक व्याख्या की गई है। फलकथन के अन्तर्गत कुण्डली व संतान संख्या, इन्फर्टिलिटी, करियर परिचर्चा, सत्य कथा, पंचपक्षी के रहस्य, आदि लेख पत्रिका की शोभा बढ़ा रहे हैं। संतान प्राप्ति के अचूक उपाय, हिमालय की संतानोत्पादक जड़ीबूटियां, शाबर मंत्र, भागवत कथा, नक्षत्र एवं सम्बन्धित दान, पिरामिड के स्वास्थ्य उपचार, हैल्थ कैप्सूल, वास्तु परामर्ष, वास्तु प्रष्नोत्तरी, कर्मकाण्ड, पिरामिड वास्तु व अन्य मासिक स्तम्भ भी विषेष रोचक हैं।

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