विशिष्ट अंकों की गणना-3

विशिष्ट अंकों की गणना-3  

पिछले दो अंकों में महत्वपूर्ण विशिष्ट अंकों की गणना की विधि एवं उनकी व्याख्या की विधि की सविस्तार चर्चा की गई। इस अंक में भी पाइथागोरियन अंक ज्योतिष में अति विशिष्ट श्रेणी में माने जाने वाले अंकों की गणना की विधि एवं उनकी व्याख्या प्रस्तुत की जा रही है। इस अंक में हम मुख्ययतया व्यक्तित्व अंक, कलश अंक एवं चुनौती अंक की चर्चा कर रहे हैं। सर्वविदित है कि अंक हमारे जीवन में अति महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं तथा हमारे आसन्न भविष्य की रूपरेखा तय करते हैं। अतः जरूरत है कि हम अंकों की भाषा को समझें तथा उनके निर्देश से अपने जीवन को सही दिशा प्रदान करें। व्यक्तित्व अंक व्यक्तित्व अंक हमारे बाह्य आकृति को प्रकट करता है, जो दूसरे हममें देखते हैं। जैसा कि कहा गया है- थ्पतेज पउचतमेेपवद पे जीम स्ंेज पउचतमेेपवदश् अर्थात् हमारे व्यक्तित्व का प्रभाव प्रथम दृष्ट्या जो सामने वाले पर पड़ता है, सामने वाले का व्यवहार उसी के अनुरूप होता है। व्यक्तित्व परिचय-पत्र की भांति होता है तथा किसी भी प्रकार के व्यक्तिगत अथवा आधिकारिक लेन-देन तथा संबंधों के मामले में अहम भूमिका निभाता है। सामान्य परिस्थितियों में हम स्वयं को प्रभावशाली तरीके से प्रस्तुत करते हैं। हमारा व्यक्तित्व ही हमारे हर प्रकार के संबंधों तथा सामंजस्य की कड़ी होता है तथा किसी भी प्रकार के सामाजिक संबंधों की सफलता में अहम भूमिका अदा करता है। व्यक्तित्व अंक की गणना: व्यक्तित्व अंक की गणना नाम के व्यंजन वर्णों के अंकों को जोड़कर की जाती है। नियम वही है, नाम के प्रत्येक हिस्से के व्यंजन वर्णों को जोड़ें फिर हर हिस्से को एकल अंक में परिवर्तित करें। पुनः नाम के सारे हिस्सों के एकल व्यंजन अंकों को जोड़कर कुल योग मालूम करें तथा फिर उसे एकल अंक में तब्दील करें। यही आपका व्यक्तित्व अंक होगा। दूसरी विधि: व्यक्तित्व अंक की गणना की एक सरल विधि भी है। भाग्यांक में से हृदय अंक को घटा दें, यदि भाग्यांक हृदय अंक से बड़ा है। यदि भाग्यांक हृदय अंक से छोटा है तब पहले भाग्यांक में 9 जोड़ें फिर हृदय अंक को घटाएं। विराट कोहली का व्यक्तित्व अंक इस प्रकार 1 हुआ। व्यक्तित्व अंक 1 वाले जातक काफी सम्मानित, अप्रतिम, सुसज्जित एवं प्रभावशाली होते हैं तथा एंसे व्यक्ति सबों के प्रिय होते हैं। ऐसे लोग अपने घर को काफी सजा-संवारकर रखना पसंद करते हैं। यहां चूंकि भाग्यांक हृदय अंक से छोटा है अतः पहले हम भाग्यांक में 9 जोड़ेंगे तब उसमें से हृदय अंक को घटाएंगे। अतः व्यक्तित्व अंक = (3$9) - 6 जिन व्यक्तियों का व्यक्तित्व अंक 6 होता है वे बातचीत एवं व्यवहार से सहानुभूतिपूर्ण एवं दयालु होते हैं। ये अपने साज-संवार तथा कपड़ों पर अधिक ध्यान नहीं देते तथा इनको यह परवाह नहीं होती कि इनके कपड़े फैशन के मुताबिक हैं या नहीं अथवा लोग इस पर क्या टीका टिप्पणी करेंगे। कलश अंक संपूर्ण जीवन को चार चतुर्थांशों में विभाजित किया गया है जिसे कलश कहा जाता है। प्रत्येक कलश पर पाए गए अंक ही यह निर्धारित करते हैं कि व्यक्ति किस चरण में किस तरह की परिस्थितियों से गुजरेगा तथा उसे किस प्रकार के अवसर प्राप्त होंगे। उसकी क्षमता एवं योग्यता कलश के द्वारा प्रदान किए गए अवसरों की ओर निर्देशित होंगे तथा व्यक्ति कलश पर अंकित अंक के द्वारा प्रदत्त परिस्थितियों के अनुरूप कार्य करेगा। जीवन के चार चरणों में इन्हीं चार मार्गों से व्यक्ति अपने सभी संसाधनों के साथ यात्रा करता है। प्रथम कलश: प्रथम कलश वह अंक है जिसकी गणना जन्म के माह एवं दिन के अंकों को जोड़कर किया जाता है। यह जन्म के समय से शुरू हो जाता है तथा 36 में से योग्यता अंक को घटाकर जो अंक आता है उतने वर्षों तक चलता है। अंक 36, 9 वर्ष के 4 चक्रों को प्रदर्शित करता है। प्रथम कलश गणना किए गए वर्ष के 31 दिसंबर तक चलता है। द्वितीय कलश: द्वितीय कलश वह अंक है जिसकी गणना जन्म के दिन एवं जन्म के वर्ष को जोड़कर की जाती है। यह प्रथम कलश के समाप्त होने के अगले दिन से यानि 1 जनवरी से प्रारंभ होता है तथा अगले 9 वर्ष तक चलता है। तृतीय कलश: तृतीय कलश वह अंक है जिसकी गणना प्रथम एवं द्वितीय कलश के अंकों को जोड़कर प्राप्त किया जाता है। यह द्वितीय कलश की समाप्ति के अगले दिन से प्रारंभ हो जाता है। इसकी अवधि भी 9 वर्ष की है तथा यह भी अपने समाप्ति वर्ष में 31 दिसंबर को समाप्त हो जाता है। तृतीय कलश मध्य आयु के दूसरे भाग को प्रदर्शित करता है जो कि विकास एवं उत्पादकता की उम्र होती है। चतुर्थ कलश: चतुर्थ कलश वह अंक है जिसकी गणना जन्म के माह एवं जन्म के वर्ष को जोड़कर किया जाता है। इसकी शुरूआत भी तीसरे कलश के अंत के दूसरे दिन यानि 1 जनवरी से होता है तथा इसकी अवधि यहां से जीवन भर है। अंतिम कलश का जीवन द्वितीय एवं तृतीय कलश के दौरान की गई तैयारियों पर निर्भर करेगा। इसमें व्यक्ति दूसरे एवं तीसरे कलश के दौरान किए गए अच्छे कार्यों के लिए या तो ईनाम पाएगा अथवा बुरे एवं नकारात्मक कार्यों के दंडस्वरूप दुख भोगेगा। नये कलश का प्रभाव धीरे-धीरे समाप्ति वर्ष के मध्य से दिखना प्रारंभ हो जाता है तथा शनैः शनैः हर महीने इसके प्रभाव में एक समान अनुपात में वृद्धि होती जाती है। साथ ही पिछले कलश का प्रभाव नये कलश के प्रारंभ होने के एक माह तक ही समाप्त हो जाता है। i कलश अंक - 7 (0-30) ii कलश अंक - 13/4 (30-39) iii कलश अंक - 11/2 (39-48) iv कलश अंक - 10/1 (48-) इसका तात्पर्य यह है कि इनका प्रथम कलश अंक 7, जन्म से शुरू होकर 30 वर्ष की उम्र तक चलेगा और 30वें वर्ष में 31 दिसंबर को समाप्त होगा। द्वितीय कलश अगले दिन यानि 1 जनवरी से प्रारंभ होकर 9 वर्ष तक चलेगा। इसी तरह यह क्रम चलेगा। अंतिम कलश अंक तीसरे कलश अंक की समाप्ति के अगले दिन से जीवन भर चलेगा। इन कलश अंकों के 1 से लेकर 9 तक के विहित अर्थ होते हैं। इनके अर्थ 1 से 9 तक के अंकों के अर्थ से थोड़े भिन्न हो सकते हैं किंतु कमोबेश वही होते हैं जो आपको पहले बताया गया है। यहां स्थान एवं समय की सीमितता तथा बाध्यता के कारण हर आयाम का सूक्ष्म विश्लेषण संभव नहीं है। चुनौती अंक चुनौती अंक एवं कलश अंक समानान्तर चलते हैं- प्रथम कलश अंक प्रथम चुनौती अंक के सापेक्ष चलता है, द्वितीय कलश अंक द्वितीय चुनौती अंक के सापेक्ष तथा इसी तरह चारों कलश अंक चारों चुनौती अंक के सापेक्ष चलते हैं। चुनौती अंक विशिष्ट अंकों की श्रेणी का अंतिम अंक है। यह जीवन के प्रारंभिक चरण में अन्य जुड़े हुए अंकों के नकारात्मक पहलुओं को प्रदर्शित करता है। यह अनेक रूपों में अपना प्रभाव दिखा सकता है, जैसे -बुरी आदतों के रूप में, दूसरों के प्रति उज्जड व्यवहार के रूप में अथवा नकारात्मक अनुभव के रूप में। कोई व्यक्ति किसी काम को सफलतापूर्वक पूर्ण करता है किंतु वह अच्छी तरह से इसे प्रस्तुत नहीं कर पाता अथवा किसी छोटी सी गलती के कारण उसे अपने सफल काम का ईनाम नहीं मिल पाता। यही गलती चुनौती है जिसपर तीव्र ईच्छाशक्ति एवं दृढ़ता से विजय प्राप्त की जा सकती है। यदि इसे ठीक से समझा जाय एवं परिस्थितियों का सही लाभ लिया जाय तो यह एक बड़ी पूंजी साबित हो सकता है अन्यथा इसकी समझ में कमी दूसरों के प्रति क्रूर व्यवहार के रूप में प्रकट हो सकता है जिससे जीवन संकटपूर्ण एवं दुखी होने की संभावना हो सकती है। चुनौती अंकों की गणना निम्न प्रकार से की जाती है- प्रथम चुनौती अंक - जन्म तिथि के महीने के अंक में से दिन/तारीख के अंक का अंतर निकालें। द्वितीय चुनौती अंक - दिन/तारीख के अंक में से वर्ष के अंक का अंतर निकालें। तृतीय चुनौती अंक - ऊपर प्राप्त दोनों अंकों का अंतर निकालें अर्थात् प्रथम एवं द्वितीय चुनौती अंक का अंतर निकालें। चतुर्थ चुनौती अंक - महीने के अंक एवं वर्ष के अंक का अंतर निकालें। चार चुनौती अंक क्रम से चार कलश अंकों के ही समरूप होते हैं इसकी चर्चा ऊपर की जा चुकी है। यदि चुनौती अंक पहले से ही किसी विशिष्ट अंक के रूप में आ चुका है तो इसका मतलब है कि यद्यपि व्यक्ति में उस अंक के गुण हैं किंतु सफलता के लिए उसे और विकसित करना चाहिए। यदि यह नया अंक है तो इसको सही समझ के साथ सफलता की अतिरिक्त कुंजी के रूप में इसका उपयोग किया जाना चाहिए। जाने-अनजाने हमेशा जीवन में अचानक परिस्थितियां बदल जाती हैं और उनसे निबटने एवं सफलता प्राप्त करने के लिए विशेष योग्यता की जरूरत पड़ती है।


पराविद्या विशेषांक  जून 2013

फ्यूचर समाचार पत्रिका के पराविद्या विशेषांक में शनि जयंती, विवाह, विवाह में विलंब के कारण व निवारण, कुंडली में पंचमहापुरूष योग एवं रत्न चयन, तबादला एक ज्योतिषीय विश्लेषण, शुक्र की दशा का फल, शनि चंद्र का विष योग, उंगली और उंगलियों के दूरी का फल, दक्षिणावर्ती शंख, बृहस्पति का प्रिय केसर, दाह संस्कार-अंतिम संस्कार, परवेज मुशर्रफ के सितारे गर्दीश में, चांद ने डुबोया टाइटेनिक को, अंक ज्योतिष के रहस्य, विभिन्न भावों में मंगल का फल, स्वर्गीय जगदंबा प्रसाद की जीवन कथा, महोत्कट विनायक की पौराणिक कथा के अतिरिक्त, काल सर्प दोष से मुक्ति के लिए लाल किताब के अचुक उपाय, वास्तु प्रश्नोत्तरी, यंत्र समीक्षा/मंत्र ज्ञान, हेल्थ कैप्सुल, प्राकृतिक ऊर्जा संतुलन, विवादित वास्तु, विशिष्ट महत्व है काशी के काल भैरव का तथा हस्तरेखा द्वारा जन्मकुंडली निर्माण की विधियों पर विस्तृत रूप से चर्चा की गई है।

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