विवाह की चर्चा करते समय भिन्न-भिन्न पहलुओं, पक्षों पर विचार करना चाहिये विशेषतः गोत्र, जाति-वर्ण, कुंडली आदि। हमारे ऋषियों ने हमें चार वर्णों में पहचान दी। उन चार वर्णों में भिन्न-भिन्न जाति के लोग हैं। मुख्यतः ब्राह्मण के विवाह संबंध तय करते समय चार गोत्र, क्षत्रिय को तीन गोत्र, वैश्य को 2 गोत्र तथा शूद्र को स्वयं निज का गोत्र टालकर विवाह की परंपरा का निर्वाह करना चाहिए। ऋषि गोत्र के अलावा 4 शासन टालने की परंपरा है। स्वयं, माता, दादी, नाती। परंतु आज समाज में विजातीय विवाह, अन्य धर्मों में विवाह हो रहे हैं। इन मापदंडों को निभाने में मुश्किल आ रही है। परंतु इन विषम परिस्थितियों में भी ब्राह्मण समाज में इन परंपराओं का पालन होता रहे इसके लिये निरंतर प्रयासरत हैं। आज के इस विषम युग में भौतिकता की दौड़ में दौड़ते हुए मानव को अपने बारे में पूरी तरह जान पाने का समय ही नहीं है। हमारे ऋषियों ने मनुष्य के जीवन के प्रारब्ध व भाग्य को समझने का पूर्ण व प्रमाणित शास्त्र ज्योतिष विज्ञान के माध्यम से जीवन में घटने वाली घटनाओं को कुंडली के माध्यम से जानने के लिये कुछ सूत्र दिये हैं। उनमें मंगली दोष और अष्टकूट मिलान मुख्य माने गये हैं। प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम और द्वादश भाव में मंगल होने पर मंगली दोष माना जाता है। लग्न व चंद्र कुंडली में इन्हीं भावों में मंगल होने पर मंगलीक दोष माना जाता है। इसी प्रकार शुक्र लग्न से भी इसका विचार करना चाहिए। तो सिद्धांत यह हुआ कि चंद्र लग्न और शुक्र को लग्न में तीनों के सिद्धांत को देखकर मंगली का विचार करना चाहिए। विवाह का मूल उद्देश्य है सिद्धांत और परंपरा अनुसार वर्ण, समाज, जाति की मर्यादा के अनुसार जीवन का निर्वाह करना। दूसरा सिद्धांत है अष्टकूट मिलान। मुख्य रूप से आठ प्रकार के विचार हैं तारा, वश्य, योनी, गण, वर्ण, ग्रह मैत्री भकुट व नाड़ी जिसमें मुख्यतः ब्राह्मण के लिये नाड़ी दोष होता है। वर व कन्या की एक नाड़ी होने पर विवाह नहीं करना चाहिए। वर एवं कन्या का एक ही नक्षत्र हो किंतु वे भिन्न-भिन्न चरण में हां तथा एक नक्षत्र भिन्न-भिन्न राशि में हो तो नाड़ी दोष नहीं होता। नाड़ी दोष होने पर स्वास्थ्य व आयु संबंधी परेशानी होती है। ब्राह्मण को नाड़ी, क्षत्रिय को वर्ण, वैश्य को गणदोष व शूद्र को योनि दोष लगता है। अगर अपने गण में विवाह हो तो संबंध उच्च होता है। देव व राक्षस में विवाद व कलह, मनुष्य व राक्षस में मृत्युतुल्य कष्ट होता है। भकुट संबंध अच्छा नहीं हो तो आर्थिक तंगी रहती है। परंतु राशीश मैत्री होने पर भकुट, गण, वश्य, तारा सभी के दोष का निर्वाह होता है। परंतु विद्वानों की राय है कि नाड़ी दोष सभी वर्णों को टालना चाहिए। इन सभी बातों पर विचार करने के अलावा विवाह के लिये वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, कार्तिक, माघ, फाल्गुन को सही एवं उपयोगी माना गया है। देशाचार की प्रधानता से सभी भागों में विवाह होते हैं। इनमें भी, नक्षत्र वर्जित, काल व्यतिपात दोष, दग्ध तिथि, क्षय तिथि, संक्रांति, ग्रहण दिन, गुरु शुक्र अस्त, मृत्युबाण, वेध तथा अन्य कुयोग में विवाह वर्जित है। इसमें विशेषतः मृत्युबाण में विवाह नहीं करना चाहिये। चंद्र विचार विवाह में चंद्रमा स्वक्षेत्री व मित्र क्षेत्री हो तो कई दोषों का हरण करता है और दांपत्य जीवन को सुखी बनाता है। कन्या रजस्वला दोष विवाह समय कन्या मासिक धर्म से हो तो विवाह पूर्व (युंजानी) नख चोटनी की आहुति दिला कर विवाह करने पर दोष नहीं लगता। ‘‘युन्जानः प्रथमं मन्स्तत्याय सविता क्षियः अग्नि ज्योति निर्णय प्रथिव्या अध्या भरत्।’’ निर्णय सिंधु प्रथम 621 विशेष रूप से अनाक्षुति दोषों के निवारण के लिये विवाह के एक सप्ताह पूर्व, या विवाह के दिन नादीमुख श्राद्ध करना चाहिए, इससे कन्या को रजस्वला दोष नहीं लगता। जो व्यक्ति कन्या दान करे उसे ही इसको करने का अधिकार है। भिन्न-भिन्न दोषों की चर्चा इसमें की गयी है लेकिन अपने स्थान व लोकोचार के अनुसार पालन करना चाहिए। आज के इस आधुनिक भौतिक युग में सफल वैवाहिक जीवन का प्रतिशत कम होता जा रहा है। उसके मूल कारण में हमारे शास्त्रीय नियमों की अवहेलना के साथ-साथ धर्म, जाति विरूद्ध विवाह भी एक बड़ा कारण है।


पराविद्या विशेषांक  जून 2013

फ्यूचर समाचार पत्रिका के पराविद्या विशेषांक में शनि जयंती, विवाह, विवाह में विलंब के कारण व निवारण, कुंडली में पंचमहापुरूष योग एवं रत्न चयन, तबादला एक ज्योतिषीय विश्लेषण, शुक्र की दशा का फल, शनि चंद्र का विष योग, उंगली और उंगलियों के दूरी का फल, दक्षिणावर्ती शंख, बृहस्पति का प्रिय केसर, दाह संस्कार-अंतिम संस्कार, परवेज मुशर्रफ के सितारे गर्दीश में, चांद ने डुबोया टाइटेनिक को, अंक ज्योतिष के रहस्य, विभिन्न भावों में मंगल का फल, स्वर्गीय जगदंबा प्रसाद की जीवन कथा, महोत्कट विनायक की पौराणिक कथा के अतिरिक्त, काल सर्प दोष से मुक्ति के लिए लाल किताब के अचुक उपाय, वास्तु प्रश्नोत्तरी, यंत्र समीक्षा/मंत्र ज्ञान, हेल्थ कैप्सुल, प्राकृतिक ऊर्जा संतुलन, विवादित वास्तु, विशिष्ट महत्व है काशी के काल भैरव का तथा हस्तरेखा द्वारा जन्मकुंडली निर्माण की विधियों पर विस्तृत रूप से चर्चा की गई है।

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