विभिन्न भावों में मंगल का फल

विभिन्न भावों में मंगल का फल  

व्यूस : 35407 | जून 2013

प्रथम भाव जन्मकुंडली के प्रथम भाव में मंगल जातक को साहसी, निर्भीक, क्रोधी, किसी हद तक क्रूर बनाता है, पित्त रोग का कारक होता है तथा चिड़चिड़ा स्वभाव वाला बनाता है। उसमें तत्काल निर्णय लेने की क्षमता होती है तथा वह लोगों को प्रभावित करने तथा अपना काम करवाने की योग्यता रखता है। वह अचल संपत्ति उत्तराधिकार से प्राप्त करता है। साथ ही साथ स्वयं के प्रयास से भी निर्माण करता है। परन्तु यदि इस भाव में मंगल नीच का हुआ तो जातक दरिद्र, आलसी, असंतोषी, उग्र स्वभाव का, सुख में कमी, कठोर, दुव्र्यसनी तथा पतित चरित्र वाला बना सकता है। जातक को नेत्रों के कष्ट तथा पांचवें वर्ष में जीवन पर संकट का भय होता है। द्वितीय भाव जन्मकुंडली के दूसरे भाव का मंगल जातक को कृषि से आजीविका प्रदान करता है। चरित्रहीन लोगों से कष्ट पा सकता है। अनावश्यक विश्वास के कारण धन हानि तथा दांतों में कष्ट का भी भय रहता है। परिवार के अन्य सदस्यों का रूखा स्वभाव दुखों का कारण हो सकता है तथा उसके बिजली तथा आग से सावधान रहने की आवश्यकता है। वह तीखे भोजन का शौकीन, चिड़चिड़ा तथा औषधियों और पशुओं से लाभ प्राप्त करता है। जीवन के नवें वर्ष में स्वास्थ्य का तथा 12वें वर्ष में धन की हानि का भय रहता है।

तृतीय भाव तृतीय भाव का मंगल जातक को पराक्रमी, शत्रु पर विजय पाने वाला, यु़द्ध कला में निपुण, परिवार जनों से सुख पाने वाला, छोटे भाई के लिए कष्ट का कारण तथा यात्रा का प्रेमी बनाता है। वह राजा अथवा शासन द्वारा सम्मान का अधिकारी होता है, परंतु पीड़ित मंगल मानसिक कष्ट, धन अभाव तथा जीवन के 13वें वर्ष में माता के लिए कष्ट का कारण हो सकता है। चतुर्थ भाव चतुर्थ भाव के मंगल का जातक पत्नी के प्रभाव में रहता है। माता से अप्रसन्न तथा विभिन्न रोगों से पीड़ा प्रदान करता है। जातक व्याकुल, चोर व अग्नि का भय तथा जीवन साथी (पति या पत्नी) से असंतोष का अनुभव करता है। इस भाव में उच्च का मंगल जातक को अचल संपत्ति तथा वैभवशाली वाहन का सुख प्रदान करता है किंतु नीच का मंगल आठ वर्ष की आयु में परिवार में दुर्घटना का कारण होता है। पंचम भाव पंचम भाव का मंगल जातक को शारीरिक रोगों से कष्ट, संतान से चिंता, अग्नि से भय तथा कम अक्ल लोगों से प्रभावित होने वाला बनाता है। जातक परिवार के साथ तीर्थ यात्रा करने वाला, क्रूर, चंचल, पत्नी का गर्भपात से कष्ट की संभावनाओं वाला होता है। जोखिम उठाने वाला, वैभवशाली, शिक्षा में बाधा, अनैतिक कार्य करने वाला तथा जीवन के छठे वर्ष में बिजली अथवा आग से कष्ट पाने वाला होता है। षष्ठम भाव छठे भाव का मंगल जातक को प्रसिद्धि, विद्वानों से मैत्री तथा उपक्रमों में सफलता प्रदान करता है।


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उनमें विरोधी और प्रतिद्वंद्वियों से सीधे सामना करने की योग्यता होती है। यदि छटे भाव में मंगल नीच का हो या कमजोर हो तो जातक अधीनस्थों व ठगों से छला जाने वाला, माता से सुख में कमी, निर्भीक किन्तु रोगों से कष्ट पाने वाला बनाता है। आयु का 34वां वर्ष लाभकारी होता है। सप्तम भाव सप्तम् भाव में मंगल जातक को साझेदारी से कष्ट, वैवाहिक जीवन में असंतोष अथवा परिवार से दूर आवास दे सकता है। यदि मंगल पीड़ित हो तो विभिन्न प्रकार से कष्ट देता है। जातक अनैतिक कार्यों में लिप्त हो सकता है। नशे आदि व्यसन का आदि हो सकता है। उसे विभिन्न मामलों में अदालत में खींचा जा सकता है। जीवन में समय-समय पर चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। आयु के 27वें वर्ष में परिवार में किसी सदस्य के स्वास्थ्य के प्रति कष्टदायक होता है। अष्टम भाव अष्टम् भाव का मंगल जातक को धनवान और नेता बनाता है। उसमें व्यय की उत्कृष्ट ईच्छा होती है तथा वह नेत्र विकार से पीड़ित होता है। उसे अग्नि व अस्त्र से भय रहता है। इस भाव में उच्च का मंगल जातक को पैतृक संपत्ति पाने में सहायक होता है किंतु नीच का मंगल समस्याओं को जन्म देता है। ऐसा जातक बवासीर से पीड़ित तथा सदा आर्थिक समस्याओं से घिरा रहता है। आयु का 25वां वर्ष दुर्भाग्य देने वाला हो सकता है। नवम भाव नवम् भाव में मंगल जातक को झूठा, हठी, क्रूर, संदेही, ईष्र्यालु तथा पिता के प्यार से वंचित रखता है।

उच्च का मंगल जातक को प्रसिद्धि, धार्मिक, धनी, दानी, शासन से सम्मानित, बुद्धिमान तथा अपने प्रयास द्वारा कार्यक्षेत्र में उन्नति के शिखर को पाने वाला बनाता है। नीच का मंगल उसे विभिन्न रोगों से पीड़ित, पापमय तथा दुर्भाग्यवान करता है। आयु के 28वें वर्ष में भाग्य लक्ष्मी जी की उस पर विशेष कृपा होती है। दशम भाव दशम् भाव का मंगल जातक को तेजस्वी, विजयी, उदारमना, बलिष्ठ, शक्तिमान तथा विपरीत लिंग वालों को सहज ही प्रभावित करने वाला बनाता है। वह अपने लक्ष्य को प्राप्त करने वाला कोई भी कार्य अधूरा न छोड़ने वाला तथा अपने गुरु व बड़ों का आदर करने वाला होता है। वह धैर्यवान, दूसरों की सहायता करने वाला, दानी तथा अपने पराक्रम द्वारा विद्रोहियों को परास्त करने की क्षमता रखने वाला होता है। वह चुनौतियों को स्वीकार करने वाला तथा अधिकतर अवसरों पर अपनी योग्यता को सिद्ध कर दिखाले वाला होता है। यदि मंगल कमजोर है तो जातक को नशे की लत, व्यापार में नुकसान तथा आयु के 26वें वर्ष में स्वयं पर संकट देता है। एकादश भाव ग्यारवें भाव का मंगल व्यक्ति को धनवान तथा अपनी अधिकांश इच्छाओं व अकांक्षाओं को पूरा करने वाला बनाता है। जातक उदार हृदय, शासन से लाभ पाने वाला, मुख्यतः अपने द्वारा किए गये प्रयासों से लाभान्वित होने वाला तथा प्रभावशाली लोगों से मैत्री रखने वाला होता है, किंतु नीच का मंगल समय-समय पर बाधाएं उत्पन्न करता है।


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उसे नीतिहीन, दुश्चरित्र मित्रों व संतान द्वारा धनहानि का भय रहता है। जीवन के 24वें वर्ष में वह विशेष लाभ अर्जित करता है। द्वादश भाव बारहवें भाव का मंगल जातक को सम्मान से वंचित तथा दूसरे के धन पर कुदृष्टि रखने वाला बनाता है। ऐसे व्यक्ति में नशे की लत व विवाह से अतिरिक्त संबंध होने की संभावना रहती है। यद्यपि वह परिश्रमी तथा धनसंग्रह की ईच्छा रखने वाला परंतु परिवार, विशेष रूप से पत्नी उसके जीवन की एक बड़ी बाधा होती है। नीच का मंगल होने पर जातक उच्च पद से पतित होता है एवं जेल का कष्ट भी भोगना पड़ सकता है। आयु के 45वें वर्ष में उसे समस्याओं से जूझना पड़ सकता है। विभिन्न राशियों में मंगल का परिण् ााम व प्रभावः मेष मंगल मेष राशि में व्यक्ति को साहसी, यु़द्ध क्षेत्र में विजयी तथा अधिकारियों व शासन से लाभ पाने वाला बनाता है। राजा व शासन से सम्मान, अधिकाधिक धन कमाने वाला तथा जीवन में संपत्ति और समृद्धिवान करता है। मेष राशि का व्यक्ति सदा सदाचारी रहता है किंतु कभी-कभी शारीरिक रोग का भागी होता है। वृष वृष राशि में मंगल व्यक्ति को ज्ञानी, व्यक्तियों का सम्मान करने वाला बनाता है।

उसके उद्देश्य सदा सकारात्मक होते हैं। वह सत्य कर्मों में अपने धन को लगाने में रुचि रखता है। वह चिन्तनशील तथा जहां तक हो सके व्यवहारी होने का प्रयास करता है। उसमें वृद्धावस्था के लिए बहुत-सा धन संचय करने की एक महत्वपूर्ण ईच्छा रहती है तथा पत्नी के लिए वह अस्वस्थता का कारक होता है। मिथुन यदि मंगल मिथुन राशि में विराजमान हो तो यह व्यक्ति को भ्रमण प्रिय बनाता है। अतः वह विभिन्न स्थानों से अच्छी तरह परिचित हो जाता है। इस जातक का अपने पिता से हमेशा मतभेद रहता है किंतु अपने उच्चाधिकारियों पर वह अच्छा प्रभाव छोड़ता है। परिजनों से समरूपता का अभाव रहता है।

वह बातूनी तथा विभिन्न कलाओं में दक्ष होता है। मंगल की इस राशि में उपस्थिति इसे अतिव्ययी बनाती है। कर्क कर्क राशि में मंगल जातक को वाहन, घर, नौकर, चाकर तथा अचल सम्पत्ति का सुख प्रदान करता है। उसमें अनावश्यक विवादों में पड़ने तथा उसके कारण मानसिक कष्ट भोगने की वृत्ति रहती है। कभी-कभी उसके अवैचारिक कार्य उसके लिए कष्ट का कारण होते हैं तथा पत्नी व संतान से असंतोष भी स्पष्ट दिखाई देता है। सिंह सिंह राशि में मंगल जातक को उच्चाधिकारी तथा दूसरों को सदा ही प्रभावित करने वाला होता है। वह व्यक्ति साहसी, विश्वसनीय, दृढ़ निश्चय वाला तथा नेतृत्व के गुणांे वाला होता है। वह राजा व अधिकारियों का प्रिय, संयमी, भाग्यवान तथा अपने अधिकारों के लिए सदा लड़ने को तैयार रहने वाला होता है। पत्नी या पति द्वारा भाग्य में वृद्धि, किंतु पुत्र से असंतोष, बिजली व आग से कष्ट का भय रहता है।


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कन्या कन्या राशि का मंगल जातक को चरित्रवान, नैतिक, समर्थ तथा अति धनी बनाता है। वह हंसमुख, प्रसन्नचित्त, हास-परिहास में रुचि वाला तथा दूसरों को सहज ही अपनी ओर कर लेने वाला होता है। विपरीत लिंग वालों से बहुत-सी आशाएं लगाने वाला होता है। जटिल परिस्थितियों के निर्णय में समर्थ किंतु धन का आना कुछ बाधित रहता है। तुला तुला राशि में मंगल जातक को कार्योन्मुख, स्पष्ट व्यवहार वाला, ईमानदार तथा उन्मुक्त स्वभाव वाला बनाता है। उसमें विद्युत गति से निर्णय लेने की शक्ति होती है। वह यात्राओं का प्रेमी तथा नए लोगों से मिलने को सदा आतुर रहता है। इन जातकों में व्यावसायिक समझ सदा सही होती है तथा विपरीत लिंग वालों से संबंधों में भाग्यवान होते हैं। वृश्चिक भाव वृश्चिक राशि में मंगल जातक को अचल संपत्ति से आय प्रदान करता है। वह साहसी, निर्भीक, खतरे उठाने वाला तथा बिना किसी देर के येन केन प्रकारेण सफलता के मार्ग पर बढ़ने वाला होता है। वह अपने इर्द-गिर्द बहुत से शत्रु बना लेता है। किंतु कोई भी उसके सम्मुख होकर उसकी आलोचना नहीं कर पाता। इनकी रुचि व अरुचि अति हद तक बढ़ी होती है।

इन्हें जो रुचिकर होता है उस पर वह प्यार व ममता की बौछार कर देते हैं किंतु अरुचि होने पर उनके द्वेष व घृणा की कोई सीमा नहीं रहती तथा तब वह अपने वृश्चिक स्वभाव में आ जाते हैं। धनु भाव धनु राशि का मंगल जातक को सदा सत्य कार्यों में लिप्त तथा अपनी स्पष्ट छवि के प्रति सदा सचेत बनाता है। वह मेहनती व कर्मठ होते हैं तथा एक बार लक्ष्य के प्रति एकाग्र होने पर वह उसे पाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। अनावश्यक विवादों से दूर रहने वाले तथा संबंधों में खुलेपन से व्यवहार करने वाले होते हैं। ये धार्मिक प्रवृत्ति तथा पौराणिक ग्रंथों में रुचि लेने वाले होते हैं।

मकर मकर राशि में मंगल जातक को विजयी तथा युद्ध भूमि में सम्मान पाने वाला बनाता है। वाद-विवाद में बहुत कुशल तथा कभी भी प्रतिवादी से न हारने वाला होता है। वह उच्च पद प्राप्त करता है। समृद्ध वातावरण में जीवनयापन करता है। अच्छी आय तथा उच्च अधिकारी पद प्राप्त करने में समर्थ होता है। नेतृत्व की योग्यता होती है तथा अपने कार्यों के कारण समाज में ख्याति प्राप्त करता है। कुंभ कुंभ राशि में मंगल जातक को अर्थहीन, वाद-विवादों में लिप्त तथा अलाभकारी उपक्रमों में समय अपव्यय करने वाला बनाता है। यद्यपि सावधान रहते हैं किंतु अपने से संबंध न रखने वाले विषयों में उलझने वाले होते हैं। इनमें धार्मिक कर्मकांडों के विरोध की वृत्ति होती है। परंतु अधार्मिक होने का दिखावा करते हैं जो कि वे वास्तव में नहीं होते। संतान के साथ तालमेल में कमी तथा उन्हें न समझ पाना चिंता का कारण होता है।


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वह अतिव्ययी व क्रोधी हो सकता है। मीन मीन राशि में मंगल जातक को मानसिक द्वंद्व प्रदान करता है। इनमें दूसरों की सहायता व सत्यकर्म की अटूट ईच्छा होती है। किंतु इनका चित्त विभिन्न विचारों से इतना चिंताग्रस्त रहता है कि वह अपना संयम खोकर कठोर वृत्ति वाला हो जाता है। अव्यावहारिक निवेश उसके दुखों को बढ़ा देते हैं तथा उन्हीं के चलते वह कर्ज के बोझ में भी दब सकते हैं। संतान के लिए चिंता व बिना ईच्छा के परदेश में वास करना पड़ सकता है।

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पराविद्या विशेषांक  जून 2013

फ्यूचर समाचार पत्रिका के पराविद्या विशेषांक में शनि जयंती, विवाह, विवाह में विलंब के कारण व निवारण, कुंडली में पंचमहापुरूष योग एवं रत्न चयन, तबादला एक ज्योतिषीय विश्लेषण, शुक्र की दशा का फल, शनि चंद्र का विष योग, उंगली और उंगलियों के दूरी का फल, दक्षिणावर्ती शंख, बृहस्पति का प्रिय केसर, दाह संस्कार-अंतिम संस्कार, परवेज मुशर्रफ के सितारे गर्दीश में, चांद ने डुबोया टाइटेनिक को, अंक ज्योतिष के रहस्य, विभिन्न भावों में मंगल का फल, स्वर्गीय जगदंबा प्रसाद की जीवन कथा, महोत्कट विनायक की पौराणिक कथा के अतिरिक्त, काल सर्प दोष से मुक्ति के लिए लाल किताब के अचुक उपाय, वास्तु प्रश्नोत्तरी, यंत्र समीक्षा/मंत्र ज्ञान, हेल्थ कैप्सुल, प्राकृतिक ऊर्जा संतुलन, विवादित वास्तु, विशिष्ट महत्व है काशी के काल भैरव का तथा हस्तरेखा द्वारा जन्मकुंडली निर्माण की विधियों पर विस्तृत रूप से चर्चा की गई है।

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