बुध के जन्म की कथा काफी अद्भुत तथा उत्तेजक है। यदि हम उस काल की ओर लौटें जबकि यह घटनाएं हुई थीं तो इन घटनाओं ने सृष्टि में काफी उथल-पुथल मचा दी थी। शुरू में बुध को अपनाने के लिए कोई भी तैयार नहीं था तथा इसके पितृत्व को लेकर बहुत विवाद तथा उलझन थी, जिसके परिणाम में बुध को शुरू में एक परित्यक्त बालक का जीवन जीना पड़ा किंतु बाद में उसकी प्रतिभाओं को देखकर उसके पिता ने आगे आकर उसे अपना पुत्र स्वीकार किया। कथा के अनुसार चंद्रमा, बृहस्पति का शिष्य था तथा उनसे संसार के विभिन्न शास्त्रों की विद्या प्राप्त कर रहा था। बृहस्पति एक बड़ी आयु के व्यक्ति थे परंतु उनकी पत्नी नवयौवना व रूपमति थी जिसका नाम तारा था। चंद्रमा भी रूपवान और आकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी थे। अतः चंद्रमा व तारा एक-दूसरे की ओर आकर्षित हुए तथा परस्पर प्रेम में डूब गए। कथा के अनुसार चंद्रमा तारा को लेकर लुप्त हो गया तथा दोनो हजारों वर्षों से भी अधिक साथ-साथ रहे, इतने समय के सहवास के बाद तारा के गर्भ धारण करने पर चंद्रमा ने तारा को त्याग दिया। इस बीच बृहस्पति तारा को खोजते रहने पर भी उसका पता नहीं लगा पाए, किंतु चंद्रमा द्वारा त्यागे जाने पर तारा पुनः अपने पति के पास लौट आई। बृहस्पति को तारा के जब कुछ माह से गर्भवती होने का ज्ञान हुआ तो वह बहुत क्रोधित हुए, इस क्रोध के मारे उन्होंने तारा के गर्भ से उस जीव को खींचकर बाहर निकालकर जमीन पर फेंक दिया, भले ही वह गर्भ अभी कुछ माह का ही था किंतु उसमें से सभी को चकित करता हुआ अति सुंदर बालक बुध जन्म लेकर खेलने लगा, वह बालक इतना सुंदर व गुणवान था कि बृहस्पति उसे देख बहुत प्रसन्न हुए तथा उन्होने सहर्ष ही उसका पिता होना स्वीकार कर लिया। ऐसी मान्यता है कि चन्द्रमा का वीर्य इतना शक्तिवान था कि बुध का जन्म तो होना ही था चाहे वह पूर्ण मास पूरा करने पर हुआ होता या नौ मास होने से पूर्व। बृहस्पति सभी से कहने लगे क्योंकि बुध का जन्म उनकी पत्नी तारा से हुआ है अतः वह ही उसके पिता हैं। चंद्रमा जो कि सत्य को जानता था, उसने इस अफवाह को फैलाया कि बूढ़े और अशक्त बृहस्पति ऐसे रूपवान पुत्र के पिता हो ही नहीं सकते और वास्तव में वह ही बुध के पिता हंै। इस अफवाह की चर्चा काफी समय तक होती रही तथा बुध के वास्तविक पिता का प्रश्न संसार में अपकीर्ति का विषय बना रहा। अंततः प्रजापति ब्रह्मा जी ने इस अफवाह को शांत करने का प्रयास प्रारंभ किया तथा बृहस्पति की पत्नी तारा को बुलाया तथा इस अफवाह के सत्य के विषय में पूछा। यह एक सार्वभौमिक सत्य है कि माता ही बालक के पिता के विषय में बता सकती है। तारा ने प्रजापति ब्रह्मा को सब कुछ सच-सच बता दिया कि वास्तव में चंद्रमा ही बुध के पिता हैं। बुध के जन्म का संबंध चूंकि बृहस्पति और चन्द्रमा के साथ है, अतः कल्पनाशीलता तथा बुद्धिमत्ता के दो गुण उसमें नैसर्गिक रूप से ही विद्यमान हैं किंतु उसका स्वभाव दोनों ही से भिन्न है तथा उसके इस स्वतंत्र व्यक्तित्व को किसी भी प्रकार से चुनौती नहीं दी जा सकती। बुध संसार में बुद्धि का स्वामी है। अपनी बुद्धि के सही प्रयोग द्वारा वह कल्पना और ज्ञान की सीमाओं में न बंधकर बुद्धिमत्तापूर्ण प्रयासों से सत्य को प्राप्त करता है। उसका यही गुण उसे अन्य ग्रहों से अलग पहचान देता है। मानव बुद्धि में तर्क और चिंतन का स्वामी होने के कारण बुध सबका चहेता और प्रिय है। चेतना की उच्च शक्तियों के अनुभव के बिना विद्वान और ज्ञान की ऊंचाइयां पाना संभव नहीं है अतः बुध को स्वतः ही एक उच्चतम् स्थान प्रदान करता है। विज्ञान अथवा दर्शन में अपने पक्ष को सिद्ध करने के लिए हमें तर्क, चिन्तन व विश्लेषण की शक्तियों का उपयोग करना पड़ता है और यही बुध का क्षेत्र है। बुध, मिथुन व कन्या राशि का स्वामी है। ये दोनों ही अस्वाभाविक राशियां हैं। मिथुन वायु तत्व की राशि है और कन्या पृथ्वी तत्व की। ऐसी मान्यता है कि विचार वायु मार्ग से गति करते हैं तथा पृथ्वी पर स्थापित होते हैं। यहां पृथ्वी से हमारा अभिप्राय संसार से है। यदि हम मिथुन के स्वभाव का ध्यान पूर्वक अध्ययन करं तो हम पाते हैं कि विचारों का जन्म तो वायु में होता है और द्विस्वभाव राशि में जन्म के कारण विचारों में नैसर्गिक द्वि स्वभाव बना रहता है। कन्या में कोई भी विचार आरंभ से ही द्विस्वभावी रहता है, पूर्ण अध्ययन तथा बाद में जीवन में कार्यरूप लेने के पश्चात भी वह अपने द्विस्वभाव रूप को बनाए रखता है। अतः इस संसार में कुछ भी स्थायी स्वभाव वाला अथवा अपरिवर्तनीय बुध में नहीं है। शायद इसी कारण इस संसार के एक प्रमुख धर्म मुख्य रूप से बौद्ध धर्म के अनुसार यह संसार निरंतर परिवर्तनों से परिपूर्ण है। विज्ञान भी इस मूल सत्य से दूर नहीं है जहां नित्य नई खोजें निरंतर पुराने विचारों में परिवर्तन लाती रहती हं। तार्किक चिंतन का यह स्वभाव है कि वह प्रत्येक अनुभव और सत्य के परिपेक्ष्य में बदलता रहता है। संसार की प्रत्येक घटना को बहुत ही सुंदर ढंग से सिद्ध किया जा सकता है जो सुनने में बहुत विश्वसनीय और प्रभावी प्रतीत होती है। इसी बात को कुछ अधिक स्पष्टता से समझाने के लिए हम एक कहानी का सहारा लेंगे: बुध दर्शाता है कि कैसे व्यक्ति परिस्थितियों का संकलन करता है तथा उससे अधिकतम लाभ प्राप्त कर सकता है। इस प्रक्रिया में वह अपने जीवन के समस्त अनुभव तथा ज्ञान को अपनी परिकल्पना द्वारा इस प्रकार पुनः स्थापित और नियोजित करता है कि वह पूर्ण रूपेण तर्कसंगत लगे। शायद इसीलिए बुध को द्विस्वभाव वाला माना जाता है। बुध की यह प्रकृति दो विभिन्न स्तरों पर काम करती दिखाई देती है। पहला उच्च बौद्धिकता का वह स्तर है जहां गहरा विश्वास, तार्किक विश्लेषण तथा नकार एवं शून्यता के ज्ञान द्वारा दिव्य अनुभूतियों का प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त करना है। वेदों में उच्चतर ईश्वरीय ज्ञान प्राप्ति का एक मार्ग सभी के नकार द्वारा अंतिम सत्य को पाने का मार्ग भी है जिसे कि नेति-नेति (यह नहीं, यह भी नहीं) के सिद्ध त के नाम से जाना जाता है। वहीं दूसरे स्तर स्वार्थप्रियता, छल, प्रपंच, अतार्किकता, मानसिक असंतुलन या मूर्खता मुखर होती प्रतीत होती है। यदि हम विशेष ध्यान दें तो बुध के व्यवहार में निर्लिप्तता और भाव शून्यता स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है। यद्यपि विभिन्न मानसिक वृत्तियों से जनित भावनाएं इसकी कथा को भावनात्मक रंग देते हुए दिखाई देती हैं किंतु मूल भाव फिर भी बात को कहने का अंदाज बुरे को बुरा कहने का तथा तथ्यों को सबके सम्मुख सीधे-सीधे रखने का ही रहता है। इससे प्रतीत होता है मानो, संवाद के नियमों के अनुरूप अपने विचारों से लोगों को सोचने को बाध्य करते हुए सभी सत्यों से उन्हें अपगत कराने का प्रयास है। अवचेतन के स्तर पर यह इच्छा प्रतीत होती है कि चेतन में तथ्यों को इस रूप में प्रस्तुत किया जाए कि वह न केवल प्रभावशाली लगे बल्कि आंतरिक भावनाओं को भी एक सार्वभौमिक अभिव्यक्ति प्रदान करे। व्यक्तित्व के अवचेतन भावों को चेतन के स्तर पर लाने का एक प्रयास रहता है। फिर वह अवचेतन का खंडन चाहे हीरों की खान हो अथवा उसमें कोयला भरा हो, अतः बुध का प्रभाव मानवता के लिए नितांत आवश्यक हो जाता है क्योंकि यह अपनी तार्किकता की तीक्ष्णता से अतिवाद को दोनों ओर से काटता है। दूसरों के साथ गहराई से जुड़ने के लिए यह जरूरी है कि व्यक्ति पहले अपने आप से संवाद स्थापित करे तथा अपने अंतः करण को स्पष्टता से जाने। इस आंतरिक और बाध्य जगत में तारतम्यता और सौहार्दपूर्ण संबंध हुए बिना व्यक्ति वास्तविक उन्नति नहीं कर सकता। इस लक्ष्य को पाने के लिए अनुभव, विचारों व विश्लेषण को दूसरों से बांटना होता है। यह वैयक्तिक आदान-प्रदान तब तक चलता रहता है जब तक कि पूर्णता को प्राप्त न कर लें अर्थात समस्त सुझाव, ज्ञान, चिन्तन को एक सूत्र में न पिरो लें। अपने को सृजनात्मक अभिव्यक्ति देने के लिए विश्लेषण की महान योग्यता, ज्ञान की तीव्र जिज्ञासा तथा विश्व की नई खोजों और अवधारण् से संबंध की आवश्यकता होती है। जहां सृजन है वहां विध्वंस भी दूर नहीं रहता। अतः विपरीत बुध शक्ति और सामंजस्य को भंग करने के लिए अपनी विपरीत सोच और तार्किकता के प्रयोग भी उसी उग्रता से करता है। वाणी, वाद-विवाद, तर्क, संघर्ष तथा अपने मत को पूर्ण परिपक्वता से प्रस्तुत करना बुध का काम है तथा उसे सही अथवा गलत किसी भी प्रकार से प्रयोग करने में वह सक्षम है। बुध, मिथुन और कन्या राशि का स्वामी है। बुध कन्या राशि में 0 अंश से 15 अंश तक का उच्च माना जाता है तथा 15 अंश पर उच्चतम होता है तथा राशि के 16 अंश से 20 अंश तक वह अपने मूल त्रिकोण में होता है तथा शेष 21 से 30 अंश तक वह कन्या राशि को अपनी राशि मानता है। मीन राशि में यह नीच का होता है तथा 15 अंश पर नीचतम माना जाता है।


पराविद्या विशेषांक  जुलाई 2013

फ्यूचर समाचार पत्रिका के पराविद्या विशेषांक में शिक्षा के क्षेत्र में सफलता/असफलता के योग, मानसिक वेदना, विवाह के लिए गुरु, शुक्र एवं मंगल का महत्व, ईश्वर एवं देवताओं के अवतार, वास्तु दोष व आत्महत्या, श्रीयंत्र का अध्यात्मिक स्वरूप, पितृमोक्ष धाम का महातीर्थ ब्रह्म कपाल, फलित ज्योतिष में मंगल की भूमिका, प्रेम का प्रतीक फिरोजा, स्त्री रोगों को ज्योतिष व वास्तु द्वारा आकलन, हृदय रोग के ज्योतिषीय कारण, क्या है पूजा में आरती का महत्व, राजयोग तथा विपरीत राजयोग, चातुर्मास का माहात्म्य इत्यादि रोचक व ज्ञानवर्धक आलेखों के अतिरिक्त दक्षिणामूर्ति स्तोत्र, अंक ज्योतिष के रहस्य, सीमा का वहम नामक सत्यकथा, अर्जुन की शक्ति उपासना नामक पौराणिक कथा, कालसर्प दोष से मुक्ति के लिए लालकिताब के अचूक उपाय, भगवान श्री गणेश और उनका मूल मंत्र तथा जियोपैथिक स्ट्रेस व अन्य नकारात्मक ऊर्जाओं आदि विषयों पर भी विस्तृत रूप से चर्चा की गई है।

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