तारीख से वार की गणना और उसका आधार

तारीख से वार की गणना और उसका आधार  

वार, पंचांग के पाँच अंगों में से एक है और इसकी गणना का एक आधार है। इसी आधार से कुछ सूत्र भी बने हैं और इस सरल से आधार को समझने के बाद आप भी अपने सूत्र बना सकते हैं। आइये, सर्वप्रथम हम वार के आधार को समझें: कैलेंडर के आरंभ की गाथा 532 ई. के आसपास जूलियस सीजर का बोल-बाला था और उसने अपने शासन के दौरान एक कैलेंडर निकाला था जिसे रोमन या जुलियन कैलेंडर भी कहा गया। इस गणना में एक साल को 365.25 दिन के बराबर माना गया। अर्थात, प्रत्येक वर्ष में 365 दिन हुए और प्रत्येक चार वर्षों के पश्चात वाले वर्ष में एक दिन (0.25 ग् 4 = 1) जोड ़ दिया गया और उसे लीप वर्ष कहा गया क्योंकि उसमें 366 दिन थे। करीब 1000 वर्षों तक जुलियन कैलेंडर चलता रहा। समय के साथ-साथ सौरमंडल एवं दिन-रात का अध्ययन भी गहरा होता रहा और कुछ महत्वपूर्ण शोधों द्वारा यह निष्कर्ष निकाला गया कि पृथ्वी, सूर्य के सापेक्ष (सूर्य को केंद्र या स्थिर मानकर) में, बसंत सम्पात बिंदु से वापस उसी बि ंदु पर 365.2422 दिन में आती है न कि 365.25 दिन में जो जुलियन कैलेंडर का आधार था। इस गलती के कारण प्रत्येक 400 वर्षों में करीब 3 दिन ज्यादा हो रहे थे: जुलियन = 365.25 ग् 400 = 146100 दिन नया दृष्टिकोण = 365.2422ग् 400= 146096.88 दिन इन शोधों में महत्वप ूर्ण भूमिका खगोलविद ।सवलेपने स्पसपने ने निभाई और उनके बाद ब्ीतपेजवचीमत ब्संअपने ने उसमें जरूरी संशोधन किये। फलतः जुलियन कैलेंडर में सुधार की जरूरत महसूस की गयी। उस समय कैथोलिक चर्चों का अधिकार क्षेत्र बहुत विस्तृत था और सभी महत्वपूर्ण निर्णय पोप द्वारा लिये जाते थे। 1582 ई. में, जब च्वचम ळतमहवतल ग्प्प्प् रोम की चर्च के मुख्य पोप थे, तब यह निष्कर्ष निकाला गया कि जुलियन कैलेंडर के 365.25 दिन की वजह से अब तक करीब 12 दिन ज्यादा हो चुके हैं: 365.25 - 365.2422 = 0.0078 ग् 1582 = 12.3 दिन परन्तु उन्होंने गणना का आधार 1 ई. से नहीं लिया बल्कि 325 ई. से लिया जब ब्वनदबपस व िछपबमं ने म्ंेजमत की तारीख घोषित की थी जिसका आधार बसंत सम्पात बिंदु था। इस प्रकार 1257 (1582-325) वर्षों की गलती ही उनके लिये महत्वपूर्ण थी: 365.25 -365.2422 = 0.0078ग्1257 = 9.8046 दिन अतः च्वचम ळतमहवतल ग्प्प् ने एक धर्मादेश द्वारा यह घोषित किया कि गुरुवार -व्बजवइमत-1582 के बाद शुक्रवार -व्बजवइमत-1582 नहीं होगा बल्कि शुक्रवार -व्बजवइमत-1582 होगा। 4-अक्तूबर की रात को लोग सोये पर जब उठे तो 15-अक्तूबर की सुबह थी। व्बजवइमत-1582 का कैलेंडर कुछ इस प्रकार दिखा: इसलिये 1582 में जन्मे इस नये कलेंडर को ‘ग्रेगोरी कैलेंडर’ कहा गया। धीरे-धीरे सभी देशों ने इस कैलेंडर को अपना लिया और आज यह सर्वमान्य है। इसमें केवल जुलियन कैलेंडर के 400 वर्षों में 3 दिन वाली गलती को सुध् ाारने के लिए शताब्दी (1700, 1800, 1900 इत्यादि) को लीप वर्ष नहीं माना गया और केवल उसी शताब्दी को लीप वर्ष माना गया जो 400 से भाग हो सके जैसे शताब्दी 1600, 2000, 2400 इत्यादि। इससे कई हजार वर्षों में एक दिन का अन्तर आयेगा। अर्थात, एक वर्ष को 365.2422 की बजाय 365.2425 मान लिया गया जो कि निम्न प्रकार से परिभाषित किया गया: अगर हर 400 वर्षों में 303 (400/4=100 उपदने तीन शताब्दियाँ जिनको लीप वर्ष नहीं माना गया) सामान्य वर्ष और 97 लीप वर्ष होते हैं तो औसत साल की लम्बाई: 365 $ (97/400) = 365.2425 दिन = 365 दिन, 5 घंटे, 49 मिनट और 12 सेकंड इस प्रकार: एक वर्ष = 365.2425 दिन 100 वर्ष = 36524.25 दिन 400 वर्ष = 36524.25 ग 4 =झ 146097 दिन अगर हम 400 वर्षों के कुल दिनों में से पूर्ण सप्ताह निकाल दें (7 से भाग करके) तो शून्य शेष बचेगा। अथार्त, 1-1-1601 को जो दिन था वही दिन 400 वर्षों के पश्चात 1-1-2001 को भी होगा। इसके अतिरिक्त कैलेंडर भी एक ही होगा क्योंकि 1600 और 2000 चार से भाग होने वाली शताब्दी हैं अर्थात दोनों लीप वर्ष हैं और दोनों के फरवरी में 29 दिन होंगे। इससे यह भी तात्पर्य है कि किसी भी वर्ष की एक निश्चित तारीख का वही वार होता है जो 400 वर्ष पूर्व उस तारीख को था। अर्थात, हर 400 वर्ष के बाद वही वर्ष कैलेंडर पुनः आवृत्ति करता है, 2015 में 1615 वाला कैलेंडर ही होगा। वार निकालने की विधि वार निकालने के लिये हमें तारीख तक के पूर्ण सप्ताहों को निकाल कर देखना होता है कि कितना शेष बचा और इस शेष से ही वार निकलता है: शताब्दी में पूर्ण सप्ताहों से अधिक दिन वार गणना में वर्ष अगर, Û 2000 के बाद का होगा तो हम आधार शताब्दी 2000 लेंगे क्योंकि 31-12-2000 (रविवार) तक के कुल दिनों को सात से भाग देने के बाद शेष दिन शून्य था और 1-1-2001 सोमवार से शुरू हुआ। इसी प्रकार 1-1-1601 एवं 1-1-2401 भी सोमवार होगा और उनके कुल दिनों में से पूर्ण सप्ताह निकालने के बाद कुछ भी शेष नहीं बचता। Û 2000 या उससे पहले का होगा तो हम आधार शताब्दी 1600 लेंगे। Û 1700-1800, 1800-1900 या 1900-2000 के बीच का हो तो हम इसकी निम्न गणना करेंगे: तरीके से समझते हंै कि प्रत्येक महीने में पूर्ण सप्ताह निकालने के बाद कितने दिन शेष बचेंगे। महीना दिन पूर्ण सप्ताहों से अधिक दिन की गणना अधिक दिन जनवरी 31 31 $ 7 = 4 प ूर्ण सप्ताह और अधिक दिन? 3 फरवरी 28 सामान्य वर्ष 28$7 = 4 और अधिक दिन? लीप वर्ष 0 29 29$7 = 4 और अधिक दिन? 1 मार्च 31 31$7 = 4 और अधिक दिन? 3 अप्रैल 30 30$7 = 4 और अधिक दिन? 2 मई 31 31$7 = 4 और अधिक दिन? 3 जून 30 30$7 = 4 और अधिक दिन? 2 जुलाई 31 31$7 = 4 और अधिक दिन? 3 अगस्त 31 31$7 = 4 और अधिक दिन? 3 सितम्बर 30 30$7 = 4 और अधिक दिन? 2 अक्तूबर 31 31$7 = 4 और अधिक दिन? 3 नवम्बर 30 30$7 = 4 और अधिक दिन? 2 दिसंबर 31 31$7 = 4 और अधिक दिन? 3 ज्ंइसम 2रू महीनों में पूर्ण सप्ताहों से अधिक दिनों की गणना प्रत्येक महीने के अधिक दिन याद रखने के लिये निम्न तरीके का प्रयोग कर सकते हैं या आप अपनी सुविधानुसार कोई और तरीका निकाल सकते हैं: Û ज. फ. मा.: 3 0 3 (लीप वर्ष में 3 1 3) Û अ. म. ज ू.: 2 3 2 Û जु. अ. सि.: 3 3 2 Û अ. न. दि.: 3 2 3 गणना की गति तेज करने के लिये हर चैथाई वर्ष (जैसे ज. से मा.) की कुल संख्या याद रखें: Û ज. फ. मा.: 6 (लीप वर्ष में 7) Û अ. म. ज ू.: 7 Û जु. अ. सि.: 8 Û अ. न. दि.: 8 सामान्य वर्ष में अगर तारीख अक्तूबर की है तो आप को बाकी के महीनों के अधिक दिनों के चिंता नहीं करनी है क्योंकि वह शून्य ही होगा। कैसे? 6 $ 7 $ 8 = 21 $ 7 = 0 इसी प्रकार नवम्बर और दिसम्बर में भी आप अक्तूबर के अधिक दिनों से गिनना शुरू कर सकते हैं। 3.2 वार की संख्या तारीख तक के पूर्ण सप्ताह निकालने के बाद जो संख्या शेष बचेगी उसी से वार निकलेगा। अगर शेष: संख्या 1 =झ सोमवार संख्या 2 =झ मंगलवार संख्या 3 =झ बुधवार संख्या 4 =झ गुरुवार संख्या 5 =झ शुक्रवार संख्या 6 =झ शनिवार संख्या 7 या 0 =झ रविवार उदाहरण वार निकालने के लिये इतना आधार पर्याप्त है। अब हम कुछ उदाहरण लेंगे और नियमबद्ध तरीके से वार निकालेंगे और धीरे-धीरे आपकी वार निकालने की गति स्वतः तेज होती जायेगी। कोशिश करें कि निम्न ैपग ैजमचे के क्रम से ही गणना करें जिससे आरम्भ में गलती होने की सम्भावना न्यूनतम हो जाये:


ज्योतिष के विभिन्न विषय विशेषांक  जनवरी 2015

रिसर्च जर्नल आॅफ एस्ट्राॅलोजी के इस विषेषांक में ज्योतिष के विभिन्न विषयों जैसे शनि व व्यवसाय, गुलिक/मांदी आदि उपग्रह, प्रष्न शास्त्र नक्षत्र मेलापक, द्वादषांष का विचित्र नियम आदि अनेक महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा की गई है। इसीलिए इस विषेषांक का नाम ज्योतिष के विभिन्न विषय रखा गया है। इस विषेषांक में ज्योतिष के अतिरिक्त वास्तु, फेंगषुई और अंकषास्त्र पर भी कुछ रोचक व ज्ञानवर्धक लेख सम्मिलित किये गये हैं।

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