राहु-केतु का फलकथन

राहु-केतु का फलकथन  

राहु केतु का फलकथन प्रश्नः छाया ग्रह राहु-केतु का फलकथन का आधार क्रमानुसार क्या माना जाना चाहिए? अपने अनुभवों के आधार पर उत्तर दें। अपने उत्तर के पक्ष में साक्ष्य के रूप में उदाहरण कुंडलियां भी प्रस्तुत करें। राहु एवं केतु आकाशीय पिंड नहीं वरन चंद्रमा एवं क्रांतिवृत्त के कटाव बिंदु हैं। अपने क्रांतिवृत्त या परिक्रमा पथ पर पृथ्वी के चारों ओर भ्रमण करता हुआ चंद्रमा पृथ्वी के भचक्र को एक बिंदु पर काटकर उत्तर की ओर चला जाता है। इसी कटाव बिंदु को राहु नाम दिया गया है। पाश्चात्य ज्योतिष शास्त्र में इसे ''नार्थ नोड ऑफ द मून'' कहा जाता है। इसे ''ड्रेगंस हेड'' भी कहा जाता है। केतु की स्थिति इस कटाव बिंदु के ठीक सामने 180 अंश पर मानी गई है। इसीलिए केतु की स्थिति राहु के सप्तम भाव में दर्शायी जाती है। प्रत्येक जातक की आयु के 25 वर्ष राहु व केतु के आधिपत्य में रहते हैं। (18 वर्ष राहु की महादशा + 7 वर्ष केतु की महादशा = दोनों का योग 25 वर्ष हुआ)। इसके अतिरिक्त अन्य ग्रहों की महादशाओं के अंतर्गत राहु/केतु की अंतर व प्रत्यंतर दशा अवधि-कुल 19 वर्ष, 09 माह व 15 दिन रहती है। अर्थात 120 वर्ष की आयु में से 44 वर्ष, 09 माह व 15 दिन इन्हीं दोनों की कृपा या अकृपा पर निर्भर पर है। सामान्यतः राहु/केतु के प्रभावों की भविष्यवाणी करना काफी कठिन है क्योंकि ये दोनों ग्रह बहुत ही आकस्मिक रूप से ऐसे-ऐसे शुभाशुभ फल प्रदान करने की क्षमता रखते हैं जिनके विषय में पूर्व अनुमान लगाना लगभग असंभव है। लेकिन कुछ परिस्थितियों वश राहु/केतु द्वारा शुभ फल भी प्रदान किये जाते हैं। हमारे ऋषि मुनियों द्वारा राहु/केतु से संबंधित फल कथन के लिए कुछ महत्वपूर्ण सूत्रों का सृजन किया गया है जो निम्न प्रकार हैं- (प) सर्व प्रथम देखें लग्न से किस भाव में राहु/केतु की स्थिति है तथा उस भाव में कौन सी राशि स्थित है क्योंकि राहु/केतु की स्थिति को कुछ भावों/राशियों में शुभ माना गया है और कुछ में अशुभ। (पप) राहु/केतु के ग्रहाक्रांत राशीश के नैसर्गिक गुण धर्मों का पूर्ण प्रभाव इन छाया ग्रहों पर रहता है। राहु/केतु द्वारा प्राप्त होने वाले फलों में इनके ग्रहाक्रांत राशिशों के फलों का मिश्रण भी पूर्ण रूप से अपना प्रभाव उजागर करता है। जिस प्रकार राहु/केतु किस भाव/राशि में स्थित हैं इसकी गणना महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है, ठीक इसी प्रकार इनकी ग्रहाक्रांत राशि किस भाव/राशि में स्थित हैं, किन-किन ग्रहों से युत व दृष्ट हैं, उनके क्या-क्या कारकत्व (स्वामित्व) हैं आदि का पूर्ण प्रभाव राहु/केतु द्वारा प्रदान किए जाने वाले फलों में शामिल रहता है। यदि इनके ग्रहाक्रांत आपस में स्थित हों, योग कारक ग्रहों से इनका संबंध स्थापित हो रहा हो या ये स्वयं ही राजयोगों का सृजन कर रहे हों तो जातक को राहु/केतु से संबंधित शुभ फलों की प्राप्ति होती है। अर्थात् राहु/केतु की गणना योगकारक ग्रह के रूप में की जाती है। ठीक इसी प्रकार यदि राहु/केतु के ग्रहाक्रांत राशीश यदि नैसर्गिक रूप से शुभ ग्रह हों (गुरु, शुक्र, चंद्र, बुध) या दोनों परस्पर केंद्र में स्थित हों, अपनी उच्च, मूल त्रिकोण, स्वयं की या मित्र राशि में स्थित हों तब भी जातक को शुभ फलों की प्राप्ति होती है। इसके विपरीत स्थितियां जैसे कि यदि राहु/केतु से ग्रहाक्रांत अशुभ (नैसर्गिक) ग्रह हों, एक-दूसरे से षडाष्टक या द्विर्द्वादश हो, त्रिक भाव या भावेशों से प्रभावित हो, नीच या शत्रु राशि में स्थित हो तो अशुभ फलों की प्राप्ति होती है। ''अर्थात् राहु/केतु के ग्रहाक्रांत राशीशों का पूर्ण प्रभाव इन दोनों छाया ग्रहों का पूर्ण प्रभाव अपने ग्रहाक्रांत राशीशों पर रहता है। ''अपने अंशों के अनुसार राहु/केतु और इनके ग्रहाक्रांत जितने अधिक निकट होते हैं उतना ही वे एक दूसरे के प्रभावों को अपनी दशा अवधियों में प्रकट करते हैं।'' (पपप) राहु/केतु की युति किन-किन ग्रहों से है। उन ग्रहों को किन-किन भावों का स्वामित्व प्राप्त है तथा उनके नैसर्गिक कारकत्व क्या है। राहु/केतु व उनसे युत ग्रहों के आंशिक मान यदि एक समान या अधिक निकट हों तो युत ग्रहों का अत्यधिक प्रभाव राहु/केतु में समाहित हो जाता है। राहु/केतु की युति यदि अपने-अपने ग्रहाक्रांत राशीशों से हो रही हो तो जिस भाव में इनकी युति होती है उस भाव से संबंधित सर्वोच्च शुभ कार्यों को जातक सफलता पूर्वक कर पाता है। राहु और शनि की युति को कष्टप्रद माना गया है। (पअ) राहु/केतु के नक्षत्र स्वामियों के नैसर्गिक गुण धर्म भी राहु/केतु से संबंधित फलकथन को प्रभावित करते हैं। (अ) जन्म कुंडली के अन्य ग्रहों से राहु/केतु के परस्पर संबंधों का विश्लेषण भी अति आवश्यक है। (अप) राहु/केतु पर पड़ने वाली दृष्टि भी राहु/केतु के फलों को प्रभावित करने की पूर्ण क्षमता रखती है। (अपप) राहु/केतु की दृष्टि किन-किन भाव/भावेशों पर है। (अपपप) नवांश वर्ग चार्ट में राहु/केतु की स्थिति/युति/दृष्टि का विश्लेषण भी जन्मकुंडली की तरह ही किया जाना चाहिए। निष्कर्ष : सर्व प्रथम राहु/केतु जिस भाव व राशि में स्थित है उनके संयुक्त फलों में उनके नक्षत्र स्वामी का प्रभाव भी शामिल रहता है। राहु/केतु जिस भाव में स्थित होते हैं, उस भाव के स्वामी की तरह अपना प्रभाव व्यक्त करते हैं। यदि मकर लग्न की कुंडली में राहु द्वितीय भाव में स्थित हो तो राहु की गणना द्वितीयेश के रूप में भी होगी तथा वह कुंभ राशि में स्थित होने के कारण वह शनि की तरह कार्य करेगा। लेकिन शनि लग्नेश भी है लेकिन राहु का लग्न से न होकर मुखय संबंध द्वितीय भाव से ही रहेगा। षष्टम व एकादश भाव में राहु की स्थिति को अति उत्तम माना गया है। कुछ इसी प्रकार के शुभ फल यदि राहु तृतीय भाव में स्थित हो तो प्राप्त होते हैं ''ज्योतिष शास्त्र का एक मुखय सूत्र है कि 3, 6, 11 भावों में पाप ग्रहों की उपस्थिति शुभ फलदायक रहती है। यदि इन भावों (त्रिषडाय) में राहु/केतु की युति नैसर्गिक शुभ ग्रहों या इन्हीं भावों के स्वामियों से हो जाए तो शुभ फल प्राप्ति में कोई संशय नहीं रह जाता है। शुभ भावेशों (केंद्र या त्रिकोण अधिपति) से यदि राहु/केतु की युति हो तो राहु/केतु योग कारक ग्रहों के समान फल प्रदान करते हैं और इसके विपरीत यदि अशुभ भावों के स्वामियों से युत हो तो अकारक ग्रहों के समान अशुभ फल प्रदान करते हैं। राहु/केतु पर किस ग्रह की दृष्टि पड़ रही है तथा वह दृष्टि डालने वाला ग्रह जन्मकुंडली से किस भाव (शुभ-अशुभ) में स्थित है तथा उसे किन-किन भावों (शुभ या अशुभ) का स्वामित्व प्राप्त है इन सभी तथ्यों का बहुत ही गहरा प्रभाव राहु/केतु में समाहित हो जाता है। ग्रहों के अरिष्ट (अशुभ) प्रभावों को भंग करने में राहु की स्थिति का एक मुखय रोल रहता है। सामान्य रूप से 3, 6, 11वें भाव में स्थित राहु को शुभ माना गया है। यदि इन भावों में स्थित राहु पर शुभ ग्रहों की दृष्टि भी हो तो राहु एक रक्षक की भूमिका अदा करता है। अर्थात अरिष्टों को भंग करता है। यदि त्रिषडाय भावों में राहु की स्थित होने के साथ-साथ जन्म कुंडली के सभी ग्रह भी शीर्षोदय राशियों (मिथुन, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, कुंभ) में स्थित हो तब भी राहु एक रक्षक की भूमिका अदा करता है। राहु/केतु द्वारा शुभ फल प्राप्ति के ये सभी सूत्र तब अपना प्रभाव ज्यादा असरदार रूप से व्यक्त करते हैं जब राहु/केतु पाप प्रभावों से मुक्त अशुभ ग्रहों से युति व दृष्टि संबंध न बन रहा हो। जन्म कुंडली में राहु की स्थिति यदि मेष, वृष या कर्क राशि में हो तब भी राहु के फल शुभ ही होते हैं। यदि ये राशियां त्रिक भावों में स्थित हों तब भी राहु के शुभ फलों में कोई अंतर नहीं आता है। यदि राहु की स्थिति केंद्र में हो लेकिन राहु अशुभ ग्रहों से दृष्ट हो तो जातक को दसवें व सोलहवें वर्ष में कष्ट प्रदान करता है। यदि राहु की स्थिति केंद्र या त्रिकोण में अपने मित्र ग्रह बुध की राशि (मिथुन या कन्या) में हो तो राहु शुभ फल प्रदान करता है। मेष, वृष व कर्क लग्न की कुंडलियों में यदि राहु की स्थिति लग्न में हो तो राहु शुभ फल प्रदान करता है। गुरु की दोनों राशि (धनु, मीन) तथा बुध की राशि (कन्या) अर्थात तीनों द्विस्वभाव राशियों में राहु की स्थिति को शुभफल (विवाह, संतान प्राप्ति, अन्य भौतिक सुखों की प्राप्ति) दायक माना गया है। लेकिन यह तब ही संभव है जब राहु/केतु के ग्रहाक्रांत भी शुभ स्थिति में हों। एकादश भाव में राहु/केतु का स्थित होना जातक को अपने भाई बहनों में सबसे बड़ा होने की संभावना को व्यक्त करता है या सबसे छोटा होना। दशा-राहु/केतु की दशा अवधि के दौरान ही इन छाया ग्रहों से संबंधित शुभ-अशुभ फलों की प्राप्ति होती है। जीवन में हमेशा ही इनका अशुभ प्रभाव नहीं रहता है। राहु/केतु-दशा प्रत्येक ग्रह की दशा अवधि के दौरान प्राप्त होने वाले फलों की संभावना निम्न ज्योतिषीय सिद्धांतों के आधार पर बड़ी सरलता पूर्वक व्यक्त की जा सकती है। दशा (राहु)- जन्मकुंडली या नवांश अपनी उच्च मूल त्रिकोण, मित्र या स्वराशि में स्थिति हो या तृतीय एकादश भाव में स्थित होने पर शुभ फल प्राप्ति की संभावना होती हैं। यदि दशा पति जन्मांग या नवांश में अपनी नीच राशि, शत्रु राशि में स्थित होकर दुर्बल अवस्था में हो, त्रिक (6, 8, 12) या मारक (2, 7) भावों में स्थित हो, तो अशुभ फल प्राप्ति की संभावना अधिक रहती है। महादशापति व अंतर्दशापति की स्थिति यदि (जन्मांग में) एक दूसरे से षडाष्टक या द्विर्द्वादश हो तब भी अशुभ फल प्राप्ति की स्थिति बनती है। राहु/केतु की युति योग कारक ग्रहों से हो या योग कारक ग्रहों की दृष्टि इन पर हो या केंद्र/त्रिकोण के स्वामियों से युति या दृष्टि संबंध स्थापित हो रहा हो तो राहु/केतु की दशा अवधि में शुभ फल प्राप्त होते हैं। व्यय भाव में स्थित राहु की दशा अवधि में विदेश गमन व जीवन में विशेष बदलाव की संभावना रहती है। विशेष-अत्यधिक रूप से यह देखा गया है कि राहु की दशा अवधि के अंत में जातक को वह सब कुछ गंवाना पड़ता है जो उसने राहु/केतु की दशा के दौरान प्राप्त किया था। केतु को मोक्ष प्राप्ति तथा राहु को तीर्थ यात्रा का कारक ग्रह माना गया है। केतु : केतु की स्थिति सदैव राहु से सप्तम रहती है। राहु के विपरीत फल केतु प्रदान करता है यदि राहु देता है तो केतु लेता है। निम्न परिस्थितियों में केतु द्वारा शुभ फल प्रदान किए जाते हैं। (प) यदि केतु की युति व स्थिति शुभ हो तो केतु को शुभ मानना चाहिए। (पप) यदि लग्न/लग्नेश से केतु का संबंध स्थापित हो रहा हो तो केतु शुभ फल दाता होता है। (पपप) केतु की केंद्र या त्रिकोण में स्थिति, केंद्रेश या त्रिकोणेश से युति हो तो केतु की दशा अंतर्दशा में शुभ फलों की प्राप्ति की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। शुभ फल प्रदायक केतु की दशा अवधि के दौरान निम्न फल प्राप्ति की प्रबल संभावनाएं रहती है। अच्छा स्वास्थ्य, धन व अन्य भौतिक सुखों की प्राप्ति, मन की इच्छाओं की पूर्ति। ज्योतिष शास्त्र की एक कहावत है कि- ''जिसे केतु पार उतारे उसका कोई भला क्या बिगाड़े' निम्न परिस्थितियों में केतु अशुभ फल दाता माना गया है- (प) जन्म कुंडली के अष्टम में केतु (अर्थात द्वितीय में राहु) या व्यय भाव (द्वादश) में केतु और षष्टम में राहु स्थित हो तो अशुभ फल प्राप्त होते हैं। (पप) सप्तम में केतु और लग्न में राहु तथा द्वितीय में केतु और अष्टम में राहु स्थित होने पर भी अशुभ फल ही प्राप्त होते हैं। (पपप) अष्टमेश की युति यदि केतु से हो तब भी कष्टप्रद स्थितियां उत्पन्न होती हैं। (पअ) यदि जन्म कुंडली में कालसर्प योग का सृजन केतु से राहु के मध्य हो रहा हो तो अधिक कष्ट दायक सिद्ध होता है। अशुभ केतु की दशा अवधि में निम्न अशुभ फल प्राप्त होने की संभावनाएं रहती हैं। मानसिक व्याधियां, मां व भाई-बहनों से अलगाव, चोरी का भय, सर्पदंश की पीड़ा या सर्पदंश के ही समान, विषाक्त भोजन के कारण या दवाईयों के कारण जटिल बीमारी या जान लेवा परिस्थितियों का अचानक ही उत्पन्न होना। केतु की महादशा अवधि के आरंभ में सुखों की प्राप्ति की संभावनाएं तथा दशा के मध्य और अंत में दुखों की प्राप्ति की संभावनाएं अधिक होती हैं। इसी प्रकार राहु की महादशा अवधि के आरंभ में दुख, मध्य अवधि में सुख और अंतमें दुखों की प्राप्ति होती है। दोनों ग्रहों (राहु/केतु) की दशा के अंतिम पड़ाव में सुखों का अभाव दर्शाया गया है। सर्वप्रथम यदि देखें तो राहु की स्थिति मारक (द्वितीय) भाव में है। और केतु की त्रिक (अष्टम) भाव में है। यदि चंद्र से देखे तो भी राहु द्वादश में है। ''यदि राहु/केतु की महादशा से संबंधित फलकथन के सूत्रों का पुनरावलोकन करें तो स्पष्ट हो जाता है कि मारक (व) त्रिक भावो में स्थिति होने के कारण राहु/केतु की महादशा के अंतर्गत अशुभ फलों की प्राप्ति होगी। अब यह देखा जाए कि राहु/केतु जिस भाव में स्थित है। उनके कारकत्व क्या-क्या है। राहु लग्न से द्वितीय भाव में स्थित है। राहु चंद्रमा से द्वादश भाव में स्थित है तथा नवांश कुंडली में राहु द्वादश भाव में स्थित है। ''अतः द्वितीय और द्वादश भाव में स्थित राहु अपनी महादशा अंतर्दशा के अंतर्गत द्वितीय और द्वादश भाव से संबंधित अशुभ फल प्रदान करेगा। द्वितीय और द्वादश भाव क्रमशः दाईं और बाई आंख का प्रतिनिधित्व करते हैं। नोट : मई 2008 में राहु की महादशा के अंतर्गत जातक के नेत्र संबंधित परेशानी से पीड़ित होना पड़ा। आंखों का कार्निया खराब होने के कारण जातक को आंखों के ऑपरेशन की पीड़ा से गुजरना पड़ा। राहु/केतु से संबंधित अन्य ज्योतिषीय विश्लेषण इस प्रकार है। (प) अकेला राहु, द्वितीय भाव में स्थित होकर एवम् द्वितीयेश (मारकेश) बन गया है। और मारक (चंद्रमा) के फल स्वयं प्रदान करने का अधिकारी बन गया है। (पप) राहु की स्थिति शनि के नक्षत्र पुष्य में है। शनि नैसर्गिक रूप से रोग कारक ग्रह है और जन्मकुंडली का अष्टमेश भी है अतः अष्टमेश के नक्षत्र में स्थित राहु की महादशा में ''आपरेशन' का कष्ट भोगना पड़ा। (पपप) मई 2008 में गोचर के राहु/केतु का अक्ष तथा जन्मांग के राहु केतु का अक्ष एक ही था। (राहु अष्टम भाव में तथा केतु द्वितीय भाव में गोचर कर रहे थे।) (पअ) मई 2008 में जातक की साढ़े-साती का दूसरा चरण चल रहा था (गोचर का शनि तृतीय भाव में नेत्र के कारक चंद्रमा के उपर गोचर कर रहा था तथा द्वादश भाव पर दृष्टि निक्षेपित कर रहा था। 4 मई 2008 तक शनि वक्री था अतः वक्री शनि की नीच दृष्टि नेत्र के कारक सूर्य पर थी। और स्थिति द्वितीय भाव में थी। सूत्र के अनुसार जन्मांग के राहु/केतु के अक्ष व गोचर के राहु केतु के अक्ष का आपस में एक होना तथा इसी दौरान शनि की साढेसाती का भी होना अशुभ फल प्राप्ति की पूर्ण संभावनाएं व्यक्त करता है। साथ में दशा अवधि भी अशुभ ग्रह राहु (मारकेश) की चल रही थी। (अ) जन्मकुंडली का षष्टेश (मंगल) भी गोचर वश द्वितीय भाव में राहु/केतु के अक्ष पर ही गोचर कर रहा था। (अप) मई 2008 में प्रत्यंतर दशा राहु के ग्रहाक्रांत राशीश चंद्रमा (मारकेश) की थी। जन्मकुंडली में चंद्रमा की स्थिति अष्टम से अष्टम भाव यानी तृतीय भाव में है। राहु (महादशा पति) व प्रत्यंतर दशा पति (चंद्रमा) परस्पर द्वि-र्द्वादश स्थिति में है। '' अतः उपरोक्त सभी तथ्य राहु की महादशा में अशुभ फल प्राप्ति की पुष्टि कर रहे है।'' नोट : अंतर्दशा गुरु की होने के कारण जातक का ऑपरेशन सफल रहा और दो माह के उपचार के उपरांत जातक ठीक हो गया। ;प) गुरु केंद्र में स्थित है तथा जन्मकुंडली में राहु और गुरु की परस्पर स्थिति तृतीय एकादश है।


हस्त रेखाएं और ज्योतिष  अप्रैल 2011

जो ज्योतिष में है वही हाथ की रेखाओं में है दोनों एक दूसरे के पूरक है। हाथ की विभिन्न रेखाएं क्या फलित कथन करती है इसकी जानकारी इस विशेषांक में दी गई है।

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