हस्त रेखाएं और ज्योतिष

हस्त रेखाएं और ज्योतिष  

ज्योतिषीय गणनाएं जटिल हैं और हस्तरेखाएं विधाता द्वारा बनायी गयी प्रत्येक व्यक्ति की जीवन की सरल रूप रेखा है तथापि जो ज्योतिष में है वही हाथ की रेखाओं में भी अंकित है। दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। क्योंकि समय के साथ आने वाले परिवर्तन हस्तरेखाओं में अंकित होते रहते हैं जिन्हें थोड़े ही अध्ययन से जाना जा सकता है। आइए, जानें कैसा है यह संबंध।

हस्त रेखा शास्त्र द्रारत में आदि काल से प्रचलित है। नारद जी इसके बहुत बडे़ विशेषज्ञ थे। रामायण में वर्णन आता है कि राजा शीलनिधि ने अपनी पु़त्री विश्वमोहिनी का हाथ नारद जी को दिखाया।

आनि दिखाई नारदहिं द्रूपति राज कुमारि,
कहहु नाथ गुन दोष सब एह के हृदय विचारि।

उत्तर मिलाः

जो एहि बरइ अमर सोइ होइ, समर द्रूमि तेहि जीत न कोई।

यानी, इसका पति अमर और अजेय होगा। इसी प्रकार हिमालय ने अपनी पुत्री पार्वती का हाथ नारद जी को दिखाया, तो उत्तर मिला कि इसके पति वैरागी, द्रिक्षा मांगने वाले, अनिकेतन, सर्पो की माला धारण करने वाले होंगे। ये सब गुण द्रगवान शंकर में हैं।

ज्योतिष के नव ग्रह और रेखा शास्त्र के पर्वत, ज्योतिष के घर या द्राव और हस्त की रेखाएं आपस में संबंधित हैं।

नवग्रह और पर्वतः

  • हथेली में तर्जनी के नीचे बृहस्पति का पर्वत है, मध्यमा के नीचे शनि का पर्वत, अनामिका के नीचे सर्यू का पर्वत, कनिष्ठिका के नीचे बुध का पर्वत तथा अंगूठे से मिला हुआ, हथेली के ऊपरी द्राग में शुक्र का पर्वत है।

मंगल के दो पर्वत हैं- ऊपर का तथा नीचे वाला। मंगल (ऊपर वाला) का पर्वत अंगूठे के नीचे बृहस्पति पर्वत से लगा हअु ा तथा मगं ल (नीचे वाला ) पर्वत बुध पर्वत से लगा हुआ, मंगल (ऊपर वाला) के ठीक सामने हथेली के निचले भाग में है।

ऐसा माना जाता है कि ऊपर वाले में मेष राशि और नीचे वाले में वृश्चिक राशि के स्थान हैं।

  • चंद्रमा का पर्वत हथेली के बायीं तरफ, शुक्र पर्वत की दूसरी ओर, मणिबंध से लगा हुआ है।
  • मंगल (नीचे वाले) के ऊपर की ओर, हृदय रेखा से मिला हुआ, हथेली के बीच में राहु (डै्रगन हेड) है। शुक्र पर्वत के नीचे, हथेली के बीच में, द्राग्य रेखा के उद्गम के पास, केतु (डै्रगन टेल ) होता है।
  • रेखाएं तथा भाव

    जीवन रेखा

    जीवन रेखा बृहस्पति पर्वत के पास से निकल कर शुक्र पर्वत के नीचे से होती हुई, मणिबंध तक जाती है।

    इसी रखाो के ऊपरी द्राग में मगंल पर्वत (ऊपर वाले) के निचले द्राग में, लंबाई में कम, समानातं र मगंल रखाो हातेी है इन दानोें रेखाओं से अष्टम द्राव, यानी उम्र का पता लगता हैं।

    सफलता रेखा

    यह रेखा सूर्य पर्वत पर होती है तथा ज्यादातर हृदय रेखा तक जाती है। इससे परीक्षाओं में सफलता का बोध होता है; यानी पंचम स्थान का ज्ञान होता है।

    भाग्य रेखा

    यह रेखा जीवन रेखा से निकल कर उसके निचले भाग से, मस्तिष्क तथा हृदय रखाोओं को काटती हुई, शनि पर्वत पर, मध्यमा तक जाती है। यही ज्योतिष में नवम द्राव है।

    स्वास्थ्य रेखा

    यह रेखा बुध पर्वत पर हाते ी है तथा हृदय रेखा तक जाती हैं। इससे कुंडली में प्रथम द्राव को जानना चाहिए।

    शादी की रेखा

    यह रेखा बुध पर्वत पर आरै स्वास्थ्य रखे ाा से आड़ी, हथेली के निचले द्राग में है इससे कुंडली के सप्तम द्राव का पता लगता है।

    मंगल पर्वत (नीचे वाले) पर चिन्ह

    यह शत्रुओं तथा बीमारियों से होने वाली तकलीफों का द्योतक है। यही कुंडली का छठा स्थान है।

    त्रिकोण

    जीवन रेखा, हृदय रेखा तथा मस्तिष्क रेखाओं के बीच में जो त्रिकोण बनते हैं, उनसे मकानों का पता लगता है। यही कुंडली में चौथा स्थान है।

    मच्छ रेखा

    यह जीवन रेखा के अंत में, ऊपरी तरफ, मणिबंध के करीब से निकल कर, मछली की तरह होती है। इससे धन का पता लगता है। यह दूसरा स्थान है।

    भाई बहन की रेखाएं

    शुक्र पर्वत पर जीवन रेखा के ऊपरी द्रागमे ं जितनी आड़ी रेखाएं हैं, उनसे भाई-बहनो ं का पता लगता है यह कुंडली का तीसरा स्थान है।

    संतान रेखाएं

    चंद्र पर्वत के नीचे, हथेली के बायें द्राग में आड़ी रेखाएं ह,ैं जिनसे संतान का पता लगता है। यह कुंडली का पंचम स्थान है।

    आमदनी की रेखा (चन्द्र रेखा)

    यह रेखा चदं्र पर्वत के ऊपरी द्राग में मस्तिष्क तथा जीवन रेखाओं के मध्य में होती है। इससे आय का पता लगता है। यही ग्यारहवां स्थान है।

    उंगलियों के मध्य रिक्त स्थान

    उंगलियों को साधारण हालत में रखते हुए, उनके मध्य में जो रिक्त स्थान रहते हैं, वही धन का खर्चा बताते हैं। जिन व्यक्तियों की उगं लियों के बीच मे कोई रिक्त स्थान नही होता, वे कंजूस होते हैं तथा धन एकत्रित करते हैं यही कंडु ली का बारहवां स्थान है।

    कर्म रेखाएं

    जातक इंजीनियर कब बनेगा, इसका पता लगाने के लिए उंगलियों की बनावट, पवर्तों की बनावट, हथेली की बनावट, द्राग्य रेखा से निकल कर पर्वतों की आरे जाने वाली रखाोआ,ें मस्तिष्क रखाो से निकल कर पर्वतों की ओर जाने वाली रेखाओं आदि से अध्ययन किया जाता हैं। उसके लिए दबा हुआ शनि पर्वत हो, द्राग्य रेखा यहां आवे तथा बुध पर्वत पर शादी की रेखा से आड़ी छोटी-छोटी तीन-चार रेखाएं होती हैं।

    बृहस्पति पर्वत काफी उठा हुआ हो, उस पर ग का निशान हो, तो जातक धर्मोपदेशक होता है।

    यदि कनिष्ठिका अनामिका से जरा ही छोटी रह जाए तथा बुध पर्वत पर शादी की रेखा से आड़ी तीन-चार छोटी-छोटी रेखाएं हों, तो जातक डाक्टर हाते ा है। यदि मगंल पवर्त अच्छा हो, मंगल रेखा साफ-सुथरी हो, तो वह शल्य चिकित्सक होता है। मणिबंध से नीचे कलाई पर मां-बाप से संबद्ध रेखाएं होती हैं, जिनसें इनका बोध होना चाहिए। इन जानकारियों के लिए कुंडली में दशम भाव देखा जाता है।

    ग्रहों का बलि होना

    यदि बृहस्पति का पर्वत उठा हुआ हो, तो वह स्वगृही होता है। उस पर ग भी हो, तो वह और द्री बली हो जाता हैं। पर्वत यदि दबा हुआ है, तो वह नीच, अस्तगत अथवा शत्रुक्षेत्री होता है।

    यदि शनि का पर्वत दबा हुआ है, तो वह स्वगृही, या उच्च का हाते ा है; यदि उछला हुआ हो, तो नीच का होता हैं। सूर्य पर्वत साधारण तौर पर उठा हुआ हो, तो वह स्वगृही तथा उच्च का होता है। यदि इस पर ग आदि के निशान हों, तो वह बहुत कमजोर होता है। ठीक ऐसी ही दशा बुध के पर्वत की होती है।

    चंद्र और शुक्र के पर्वत उठे हुए हां,े ता े उच्च या स्वगृही होते हैं लेकिन दबे हुए कमजोर होते हैं। इन पर यदि असाधारण निशान हों, तो बहुत कमजोर मानने चाहिएं।

    हस्त रेखाओं की कुछ विशेषताएं

    • जीवन रेखा पूर्ण हो, कहीं द्री कटी-फटी न हो, कोई ग आदि का निशान न हो, तो अस्सी वर्ष की आयु होती है। इसके साथ समानांतर मंगल रेखा भी साफ-सुथरी हो, तो सौ वर्ष की आयु होती है। जीवन रेखा पर गए गालो आदि के निशान हों तो वे दघ्ुार्ट ना के द्याते क हाते हैं रखाो के दानोें तरफ धब्बे हों, तो वे उम्र के साथ-साथ, बीमारियों के द्री द्योतक हैं।

    मंगल रेखा प्रबल हो, तो ऐसा व्यक्ति शाप अथवा आशीर्वाद देने में सक्षम होता है।

    जीवन रेखा तथा मस्तिष्क रेखाएं उद्गम स्थान पर जुड़ी हुई न हों, यानी उनमें दूरी हो, तो दांपत्य जीवन अंशातिमय होता है।

    • हृदय रेखा हृदय की सूचक है। यदि यह रेखा न हो, अथवा कटी-फटी हो, लहरदार हो, तो वह हृदयहीनता को दिखाती है। जातक कातिल तक हो सकता हैं।
    • जिसकी मस्तिष्क रेखा मध्यमा तथा तर्जनी के बीच तक चली जाए, उसके हृदय की घड़कन आसानी से रुकती नहीं है तथा पूर्ण आयु सौ वर्ष तक हो सकती है।
    • मस्तिष्क रखाो बुद्धि एवं ज्ञान की प्रतीक है। यदि रेखा साफ-सुथरी हो, तो प्रखर बुद्धि होनी चाहिए, टूटी-फूटी कटी हुई हो, असाधारण निशान हों, तो बुद्धि की कमी होती है तथा ऐसे जातक शारीरिक परिश्रम करने वाले हो सकते हैं।

      यदि यह रेखा चंद्र पर्वत से निकले, अथवा वहां से निकल कर सहायक रेखा इसमें मिले, तो विदेश गमन होता है।

    • शादी की रेखा के समानांतर जितनी रेखाएं होती हैं। उतनी ही शादिया रेखाएं होती हैं जसैे मीन, धनु राशि का शनि सप्तम द्राव में हा।े यदि एक ही स्पष्ट, बलवान, साफ-सुथरी रेखा हो, तो केवल एक ही शादी होती है।
    • बृहस्पति पर्वत, या उसके नीचे से निकल कर काई रेखा धनुष का आकार बनाती हुई, सूर्य पर्वत पर पहुंचे, तो ऐसे व्यक्ति को मोक्ष प्राप्त होता है।
    • सूर्य रेखा जहां-जहां कटी हो, या उस पर ग हो, या कोई और रेखा उसे काटे, तो उतनी ही परीक्षाओं में असफलता मिलती है। यह रेखा जितनी गहरी, मोटी, स्पष्ट होती है, उतना ही शिक्षा का लाभ मिलता है और जितनी पतली, कम दिखाई देने वाली होती है, तो योग्यता काम नहीं आती। जहां-जहां यह माडे ़ लतेी है, वहीं काम में तबदीली आती है।
    • मच्छ रेखा से निकल कर केतु क्षेत्र तक जाने वाली रेखा साफ-सुथरी हो, तो उसे उच्च पद की प्राप्ति होती है, जैसे किसी के दशम में स्वगृही या उच्च का ग्रह मौजूद हो।
    • स्वास्थ्य रेखा स्पष्ट, मोटी, बिना कटी-फटी हो, तो मनुष्य नीरोग होता है, अन्यथा बीमारी लगती है। यदि बुध पर्वत पर कई छोटी-छोटी समानांतर रेखाएं हों, तो स्वास्थ्य ठीक नहीं रहेगा। स्वास्थ्य रेखा हृदय रेखा को काट कर आगे जाए तो, भी स्वास्थ्य कष्टदायक होता है।
    • भाग्य रेखा का स्थान सबसे महत्वपूर्ण है। यह रेखा जीवन रेखा के पास से निकल कर, मस्तिष्क आरै हृदय रखाोओं को काटती हुई शनि पर्वत पर जाती है। मस्तिष्क रेखा तक पैंतीस साल, हृदय रेखा तक पचपन साल, हृदय रेखा से अंत तक अवकाश का समय होता हैं। जहां-जहां यह रेखा नहीं होती, वहां भाग्य साथ नहीं देता। किसी-किसी हाथ में इस रेखा के समानांतर, ऊपर की तरफ, सहायक द्राग्य रेखा भी होती है। ऐसे लोग दो या दो से अधिक काम करते हैं कडुंली में भाग्य स्थान में बृहस्पति, शुक्र, बुध आदि कई शुभ ग्रह हा,ें तो यही स्थिति होती है। जिस क्षेत्र में मोटी, चमकदार रेखा हो, वहीं भाग्य विशेष रूप से साथ देता हैं, जैसे भाग्येश की दशा चल रही हो। शनि पर्वत पर पहुंचने से पहले द्राग्य रेखा दो हिस्सों में बंट जाए, एक शनि पर्वत पर जाए तथा दूसरा बृहस्पति पर्वत पर जाए, तो व्यक्ति अत्यंत द्राग्यशाली होता है। इस रेखा को काटने वाली आड़ी या तिरछी रेखाएं द्राग्य में बाधक बनती हैं, जैसे नवम स्थान मं े शनि, राह,ु कते ु हो अगर यह रखाो अंत में तीन रेखाओं में बंट जाए और एक सूर्य पर्वत की ओर, दूसरी शनि पर्वत की ओर और तीसरी बृहस्पति की ओर जाए, तो ऐसा व्यक्ति मिट्टी छूने पर सोना बनता है। यहां रेखा शनि पर्वत को पार कर के आगे उंगली पर चढ़ जाए, तो दुर्घटना से मृत्यु होती है।
    • उंगलियों के अंत में या तो शंख हागो अथवा चक्र। चक्र का होना शुभ माना जाता हैं; खास तौर से अनामिका पर। शंख बेकार होते हैं। जिसकी दसों उंगलियों पर चक्र हो ऐसा व्यक्ति रणभूिम से अवश्य जिंदा लौटता हैं। उसे या तो गोली लगती नहीं और यदि लगगेी द्री, तो केवल उसे घायल करेगी।


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