सूर्योपासना का महिमामय केंद्र हड़िया

सूर्योपासना का महिमामय केंद्र हड़िया  

व्यूस : 1710 | नवेम्बर 2016

आदि अनादि काल से भारत भूमि में देवोपासना निर्बाध रूप से जारी है जिनमें जगत के प्रत्यक्ष देव श्री सूर्य का विशिष्ट स्थान है। भारत देश में सूर्य पूजन का इतिहास उतना ही प्राचीन है जितनी हमारी सभ्यता संस्कृति। सूर्य देव, रवि, मार्तण्ड, भास्कर, दीनानाथ, सविता, दिवाकर, दिनकर आदि कई नामों से विभूषित हैं। सूर्य देवता के द्वादश तीर्थों को संपूर्ण देश में उच्चतम स्थान प्राप्त है। जिस प्रकार द्वादश ज्योतिर्लिंग और द्वादश प्रधान शक्ति पीठ पूरे देश में विराजमान है ठीक इसके विपरित द्वादश सूर्य तीर्थों में से नौ तीर्थ बिहार प्रदेश में ही विराजित है। तभी तो कहा जाता है कि देश के प्रसिद्ध सूर्य मंदिरों में ज्यादातर सूर्य मंदिर बिहार में अवस्थित हैं।

बिहार प्रदेश के नवादा जिले में नारदीगंज प्रखंड का हड़िया सूर्य मंदिर उसी शृंखला की एक सशक्त कड़ी है जहां सूर्य नारायण के दर्शन पूजन से समस्त कष्टों से मुक्ति मिल जाती है। गया से 68 कि. मी., हिसुआ (नवादा) से 13 किमी. और राजगीर से 17 कि.मी. दूरी पर अवस्थित हड़िया पटना नगर से 89 किमी. दूरी पर है। हिसुआ मोड़ और राजगीर से आना यहां एकदम सहज है। छोटे-बड़े दोनों तरह के वाहन उपलब्ध हैं। मुख्य राजमार्ग से 4 किमी. की दूरी तय करके हड़िया सूर्य मंदिर तक पहुंचा जा सकता है। यहां का सूर्य मंदिर, तीन नए पुराने धर्मशाले, विशाल सूर्य सरोवर, शिवालय व नवनिर्मित हनुमान मंदिर का दर्शन मन मस्तिष्क में भक्ति तत्व का संचार करता है। धार्मिक कथा: धर्म, आस्था और विश्वास का यह तीर्थ द्वापर कालीन है जिसे श्री कृष्ण के पौत्र साम्ब ने बनवाया है।

धार्मिक मान्यता है कि भगवान श्री कृष्ण के पौत्र साम्ब को गोपियों ने भ्रमवश श्री कृष्ण मान लिया था। साम्ब भी गोपियों को अपनी पहचान बताने के बजाय गोपियों की लीला में सम्मिलित हो गए। इस कृत्य से क्षुब्ध होकर श्री कृष्ण ने श्राप दे दिया जिसके कुप्रभाव से साम्ब कुष्ठ रोगी हो गए। जब साम्ब ने नारद जी की सहमति से श्री कृष्ण से मुक्ति की प्रार्थना की तब श्री कृष्ण ने उन्हें द्वादश सूर्य तीर्थ स्थापना का आदेश दिया और इसी क्रम में इस देवालय की भी गणना की गई है। सूर्य पूजन के विशिष्ट केंद्र हड़िया (हेडार्क) के अलावा संपूर्ण बिहार प्रदेश में देवार्क (देव), उलार्क (कुलार), पुण्यार्क (पंडारक), अंगार्क (औंगारी), बालार्क (बड़गांव), उत्तरार्क (पितामहेश्वर), दक्षिण के (सूर्य कुंड), कन्दार्क (कन्दाहा), उमर्गाक (उमगा) की गणना द्वादश सौर्य तीर्थों में की जाती थी जिसमंे विश्व प्रसिद्ध सौर्य तीर्थ कोणार्क प्रथम स्थान पर विराजित है। ऐसे ऊपर वर्णित नौ सूर्य तीर्थों के अलावा काको (जहानाबाद), देवकुंड (औरंगाबाद), मधुस्रवा (अखल), टंडवा (गया), भेलावट (जहानाबाद), बड़ी मान (किशकोन) आदि का सुनाम है। ऐतिहासिक महत्ता: प्राचीन मगध के गया और नालंदा जिले के सीमा पर अवस्थित हड़िया के बारे में मान्यता है

कि इस स्थल में मगध सम्राट जरासंध की पुत्री धन्यावती राजगीर से नित्य आकर यहां पूजा करती थी। यहां से जुड़ी कथा पर प्रकाश डालते हुए पुजारी राजेंद्र पांडे बताते हैं कि मंदिर निर्माण के तुरंत बाद ही प्राकृतिक सूर्य कुंड के चारों ओर घाट व सीढ़ियां बनायी गईं जो 110 ग् 210 वर्ग मीटर क्षेत्र आकार में है। इस तालाब के जल में ऐसी चमत्कारी शक्ति है कि हरेक स्नान करने वाला कंचन काया सहज पा लेता है। इस मंदिर के उत्तर, पूरब और दक्षिण में विशाल प्राकृतिक तालाब है


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जिसका मुंह खुलते ही आस-पास के खेतिहर भूमि स्वतः सिंचित हो जाते हैं और जहां तक इसके नामकरण का प्रश्न है भौगोलिक दृष्टिकोण से यहां का भूतल ही हड़िया (बड़े सागर) के सदृश दृष्टिगोचर होता है। पालकाल में भी यह स्थान धार्मिक तीर्थ के रूप में चर्चित रहा। मंदिर के बाहरी भाग में रखे 31 भग्न मूर्तियां हैं जिनमें विष्णु, उमा-महेश्वर, भैरव, शिवलिंग, देवी मां आदि हैं। इनमें तीन को छोड़ सभी काले पत्थर के हैं। शेष तीनों लाल बलुआ पत्थर से निर्मित खंडित भाग हैं। कहने का आशय यहां पाल काल के पूर्व भी मूत्र्त शिल्प विद्यमान रहा। मंदिर के सामने सूर्य कुंड के विपरीत भाग में प्राचीन श्मशान है तो मंदिर के सामने पांच पुराने पीपल के पेड़ों को चबूतरा बनाकर सजा दिया गया है।

किनारे का एक वट वृक्ष भी चमत्कारी शक्ति से युक्त बताया जाता है।

वर्तमान विवरण: भूतल से पांच सीढ़ी चढ़ कर मंदिर तक पहुंचा जा सकता है जो द्वितल विभाग्य है। गर्भगृह में सामने की दीवार पर सबसे ऊपर श्वेत संगमरमर की नवीन सूर्य मूर्ति देखी जा सकती है। उसके ठीक नीचे एक पाषाण फलक पर सूर्य चक्र व अश्व अंकित हैं। इसके नीचे सूर्य परिवार के उत्तर गुप्तकालीन मूर्तियां देखी जा सकती हैं जिसके ऊपरी भाग को करीब 400 वर्ष पूर्व स्थानीय चोरों ने खंडित कर दिया था। कहते हैं पास के अरियन गांव का यह चोर इस घटना के बाद सपरिवार नष्ट हो गया था। परंतु वह खंडित खंड कहां गया इसका किसी को अता-पता नहीं है। यहां स्थित सूर्य पुत्र यम या शनि, पुत्री यमुना व पत्नी संध्या और छाया के साथ बनी ऐसी मूत्र्त-पट्टिका का चित्रण अन्यत्र कहीं नहीं मिलता। नीचे रखी एक पाषाण खंड की मूर्ति की आधार पट्टिका जान पड़ती है जिसके नीचे अश्व व कमल का अंकन है।

इसी के बगल में शिवलिंग व दीवार पर पार्वती की छोटी मूर्ति रखी गई है। मंदिर के शिखर की बनावट चित्ताकर्षक है जिसके गुंबद पर सूर्य प्रतीक चक्र का अंकन है। जानकारी मिलती है कि महाभारत काल के बाद इस मंदिर का नव उद्धार हिसुआ स्टेट की ओर से कराया गया जिसमें स्थानीय निवासियों का भी अमूल्य सहयोग रहा था। नवादा जिले के प्रखंडों में एक नारदीगंज में अवस्थित और राजगृह की पंच नदियों में से एक सकरी के सन्निकट शोभायमान हड़िया सूर्य मंदिर में वैसे तो सालों भर लोग आते रहते हैं पर साल के दोनों सूर्य षष्ठी पर्व (छठ) के साथ-साथ सूर्य सप्तमी, रविवार व ग्रहणकाल के अवसर पर यहां हर देश से भक्त श्रद्धालुओं का आगमन होता रहता है।

इस धार्मिक लोक समागम में बिहार के अलावा बंगाल, झारखंड, ओडिशा और छत्तीसगढ़ के भक्तों का भी आगमन बना रहता है। वैसे तो नवादा जिले में जैन तीर्थ गुणावां, रामायणकालीन तीर्थ सीतामठी, नानक संगत-रजौली, सेखो देवरा आश्रम-कौआकोल, गोविन्दपुर का छपरा कोल जल प्रपात, पुरा स्थल अपसढ़ और मनोहारी झरना का स्थान ‘ककोलत’ पर्यटन के साथ धर्म आस्था का प्राणवन्त केंद्र है। पर इन सब के मध्य हड़िया के सूर्य तीर्थ का अपना अलग महत्व है जहां भारत वर्ष के महाभारत काल से आज तक अस्तांचल सूर्य के रूप में सभी दुःख, दर्द व बुराईयों को आत्मसात कर उदयमान सूर्य के साथ, सुख, समृद्धि, शांति व सद्विचारों का पथ अहर्निश प्रशस्त कर रहे हैं।


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