मोटापे पर काबू कैसे पाएं

मोटापे पर काबू कैसे पाएं  

मोटापा क्या है? जब मनुष्य का वजन निर्धारित बी. एमआइ. की अधिकतम सीमा 30 से अधिक हो तो उसे मोटापा कहते हैं। बी. एम. आइ. क्या है? यह एक माप है जो निर्धारित करती है कि अमुक लंबाई वाले व्यक्ति का वजन कितना होना चाहिए। बी. एम. आइ. = वजन कि. ग्रा. (लंबाई मी.)2 इसकी माप 18.5 से 24.5 तक सामान्य मानी जाती है। परंतु हिंदुस्तानियों में बी. एम. आइ. का न्यूनतम रहना आवश्यक है। इसका कारण हमारे वंशजों में वंश-दर-वंश चले आ रहे दो प्रकार के ऐसे जीन्स हैं, जिनमें इन्सुलिन की गुणवत्ता कम रहती है और रक्त में खराब चर्बी ट्रिंगलसाइड, कोलेस्ट्रोल की मात्रा अधिक रहती है। इन दो कारणों से बी. एम. आइ. के 24.5 से अधिक होने पर भारतीयों को हृदय रोग का खतरा अन्य जातियों की अपेक्षा बहुत अधिक बढ़ जाता है। मोटापे के कारण: पारिवारिक कारण, फास्ट फूड का प्रयोग, व्यायाम की अनियमितता या अभाव, मधुमेह एवं हाइपोथाइराइड रोग आदि। बेकाबू मोटापे से होने वाले रोग 1. रक्त में खराब चर्बी की अधिक मात्रा 2. उच्च रक्त चाप 3. पित्ताशय के रोग 4. मधुमेह 5. हृदय रोग 6. कैंसर 7. गुर्दे के रोग कैसे होता है मोटापा? शरीर दिन के समय ऊर्जा के लिए केवल वसा (चर्बी) का उपयोग करता है, ग्लूकोज का नहीं। ग्लूकोज तभी इस्तेमाल में आता है जब मनुष्य कुछ शारीरिक परिश्रम करता है। जो भी भोजन हम प्रातःकाल अथवा दोपहर में करते हैं उसमें जो कार्बोज रहता है, पाचन के पश्चात वह ग्लूकोज में परिवर्तित हो जाता है। यह ग्लूकोज इंसुलिन की मदद से ग्लाइकोजन में परिवर्तित कर दिया जाता है। जब ग्लाइकोजन के भंडार पूरे भरे हुए हांे तब यह चर्बी में परिवर्तित हो जाता है। कितना ग्लूकोज चर्बी में परिवर्तित होगा यह इस पर निर्भर करता है कि भोजन में कार्बोज कितना है तथा इस कार्बोज का ग्लाइसिमिक इन्डेक्स कितना है। ग्लाइसिमिक इन्डेक्स एक ऐसी माप है जो हमें यह बताती है कि कार्बोज से शरीर को ग्लूकोज कितने समय में मिलेगा। उदाहरण के तौर पर ग्लूकोज की ग्लाइसिमिक इन्डेक्स 100 है और यह 15 मिनट के अंदर पूरे शरीर को मिल जाता है। इस ग्लूकोज के अति शीघ्र मिलने से शरीर के बीटा सेल, जो अग्न्याशय (पैंक्रियाज) नामक ग्रंथि में होते हैं, यह आदेश देते हंै कि अधिक इन्सुलिन का निर्माण करें ताकि ग्लूकोज को रक्त में इसकी अधिकतम निर्धारित सीमा 139 से कम रखा जा सके। ज्यादा ग्लाइसिमिक मान के कार्बोज खाने से कम गुणवत्ता वाले इन्सुलिन का ही अधिक निर्माण होता चला जाता है। यदि यह क्रम दिन-प्रतिदिन, महीनों, वर्षों तक चलता रहता है तो पहले तो लोगों को मोटापा होना शुरू होता है, बाद में बीटा सेल के अधिकाधिक कार्य करने से उनकी आयु कम होती चली जाती है। इन मोटे लोगों को पहले आइ.जी.टी. (मधुमेह से पहले की बीमारी) और 8-10 वर्षों में मधुमेह का रोग हो जाता है। इन मोटे लागों में हृदय रोग के बढ़ जाने का कारण भी रक्त में बढ़ी हुई चर्बी (टी.जी. एवं कोलेस्ट्राॅल) तथा बढ़े हुए कम गुणवत्ता वाले इन्सुलिन का होना है। इस इन्सुलिन से धमनियों की कोशिकाओं के एन्डोथिलियल सेल शनैः शनैः खत्म होते चले जाते हैं। उनकी जगह चर्बी के आॅक्सीकृत होने के पश्चात उसके थक्के जमा होते रहते हैं। यही धमनियों के लचीलेपन को कम करते चले जाते हैं। परिणामस्वरूप रक्तचाप बढ़ने लगता है और हृदय रोग की संभावना बढ़ जाती है। व्यायाम की कमी या अनियमितताः - रक्त में ग्लूकोज की मात्रा निर्धारित मात्रा से अधिक हो जाती है। - ग्लूकोज की मात्रा ज्यादा समय तक रहती है। - अच्छी चर्बी और खराब चर्बी का अनुपात कम हो जाता है। - इन्सुलिन की गुणवत्ता कम रहने से इन्सुलिन की मात्रा रक्त में अधिक बनी रहती है। फास्ट फूड: फास्ट फूड से तात्पर्य ऐसे खाद्य पदार्थों से है जिनसे शरीर को ऊर्जा तो जरूरत से अधिक मिलती है परंतु उसकी गुणवत्ता बहुत खराब होती है। उदाहरण के तौर पर कृत्रिम पेय पदार्थ पेप्सी या कोका कोला में केवल मीठे के अलावा स्वास्थ्य के लिए लाभदायक कुछ नहीं होता, अपितु उसमें फास्फोरिक एसिड नामक पदार्थ होता है जो शरीर की हड्डियों एवं दांतों के लिए अत्यंत हानिकारक है। ठीक इसी प्रकार पिज्जा, बर्गर एवं मैदे से बनी ब्रेड इत्यादि का ग्लाइसिमिक मान अधिक होने से तथा इन सभी खाद्य पदार्थों में बी समूह के विटामिन तथा रेशे (्फाइबर) की कमी से ये खाद्य पदार्थ उन रासायनिक क्रियाओं को जन्म देते हैं एवं चालू रखते हैं जिनका जिक्र ऊपर किया जा चुका है। आस्ट्रेलिया में 15 वर्ष या अधिक आयु की औरतों में मोटापा 39 प्रतिशत है। अमेरिका में 55 से 64 वर्ष की आयु में 40 प्रतिशत से भी ज्यादा लोगों में मोटापा है तथा 50 प्रतिशत से अधिक उच्च रक्त चाप से पीड़ित हैं। कनाडा में 1979 में 14 प्रतिशत लोग मोटे थे, अब बढ़कर 23 प्रतिशत हैं। वहां बच्चों में मोटापा 3 प्रतिशत से बढ़कर वर्ष 2004 में 9 प्रतिशत पहुंच गया है। इन सर्वेक्षणों से यह पता लगा है कि सभी समुदायों एवं आयु वर्गों में मोटे लोग हो सकते हैं, वे चाहे कितने भी पढ़े लिखे हों अथवा अनपढ़। भारत वर्ष में मोटापे के प्रकाशित आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं, फिर भी हमारे शहरों एवं देहातों में इस व्याधि का विस्तार हो रहा है। टेलीविजन: यूं तो इसके बिना आजकल एक दिन भी काटना बहुत मुश्किल सा प्रतीत होता है, परंतु इसके घर-घर में आगमन ने हमारे देश ही क्या, सभी देशों के बच्चों एवं बूढ़ों को टी. बी. (क्षय रोग) की तरह ग्रस लिया है। क्षय रोग से तो 6-9 महीनों में दवाएं खाने से छुटकारा मिल जाएगा परंतु टी. वी. आपको उम्र भर नहीं छोड़ेगा। टी. वी. पर बार-बार दिखाए जाने वाले फास्ट फूड, चिप्स, पेप्सी, नूडल्स, बर्गर्स एवं चाकलेट आदि के विज्ञापनों एवं 2 घंटे से ज्यादा टी. वी. देखने की आदत से अमेरिका के बच्चों में मोटापा दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। उस देश में मोटापे से उत्पन्न हुए रोगों के इलाज पर हर वर्ष 100 खरब रुपये तक खर्च किए जा रहे हैं। वह दिन दूर नहीं जब भारत में भी अमेरिका की ही तरह हर पांचवें भारतवासी को मोटापा, दसवें को मधुमेह एवं हृदयरोग जैसे रोग हो जाएंगे। इन ीमारियों से देश को कितना आर्थिक नुकसान होगा इसका केवल अंदाजा ही लगाया जा सकता है। अज्ञान: मोटापा क्यों होता है और इससे किन-किन रोगों का खतरा बढ़ जाता है, अधिकांश शिक्षक भी इन से अनभिज्ञ हैं। मोटापे से हृदय रोग होने की कितनी संभावना है, यह बात कमर और नितंब के अनुपात पर भी निर्भर करती है, जो कि सामान्यतः 0.8 से कम रहना चाहिए। इसके 0.8 से ज्यादा होने पर हृदय रोग का खतरा 250» तक बढ़ जाता है। आज मां एवं पिता के पास बच्चे के लिए समय ही नहीं है। वे इस सचाई से बचने एवं बच्चों को खुश करने के लिए उन्हें जगह-जगह पर खुले फास्ट फूड के अड्डांे पर ले जाते हैं। इन पदार्थों में न तो बी समूह के विटामिन होते हैं, न ही एन्जाइम। साथ ही रक्त बनाने और हड्डियों के लिए आइरन और कैल्शियम भी पर्याप्त नहीं होते। इन सभी से अधिक जरूरी रेशा भी इन पदार्थों में नहीं होता। वहां पर भोजन के बाद किसी भी प्रकार के शारीरिक परिश्रम का न तो वे प्रयास करते हैं न ही इसके लिए उनके पास समय होता है। क्या किया जाए: कुछ लोग शीघ्र पतला होने के लिए मोटापा कम करने वाले विज्ञापनों पर मोहित होकर स्लीमिंग सेंटर पहुंच जाते हैं। इस प्रकार के विज्ञापनों के भुलावे में आकर लोगों का वजन शुरू में तो महंगी दवाओं के प्रयोग से जरूर कम होता है परंतु जैसे ही उन दवाओं को छोड़ देते हैं, उनका वजन पुनः बढ़ जाता है। इसलिए ऊपर जो कारण बताए गए हैं उन पर ध्यान देने से ही वजन धीरे-धीरे एवं स्थायी रूप से कम हो सकता है। इसके लिए यह जरूरी है कि अपनी खाने-पीने की आदतों में न केवल सुधार करें, बल्कि उन पर कायम भी रहें। भोजन की मात्रा कम न करके उसे संतुलित रखने की जरूरत होती है क्योंकि अनुसंधानों से यह पता चला है कि केवल 15 प्रतिशत मोटे लोग ही ज्यादा खाते हैं। भोजन तो पर्याप्त हो परंतु वह संतुलित भी हो। उसमें फलों, कच्ची सब्जियांे, साग, मेवों एवं रेशों का समुचित समावेश हो। नियमित व्यायाम करने की आदत डालें, इससे मोटापे, रक्त में अधिक कोलेस्ट्रोल, रक्तचाप एवं मधुमेह जैसे रोगों से बचा जा सकता है और जिन्हें ये रोग हो गए हैं वे इन पर आसानी से काबू पा सकते हैं। स्वस्थ रहने के लिए प्रस्तावित आहार सुबह का भोजन: अंकुरित दाल, मूंग, मोठ या चना 30 ग्राम, अंकुरित गेहूं 30 ग्राम, अंकुरित मूंगफली या अखरोट की गिरी 15 से 20 ग्राम, अंकुरित मेथी 5 ग्राम, मौसम का कोई भी एक फल, हरी कच्ची मौसमी सब्जी, करी पत्ता, चर्बी रहित दही या लौकी का रस। दोपहर का भोजन: दिन में मोटे या चोकरयुक्त अनाज की रोटियां, हाथ से कुटा हुआ या सेला चावल, एक कटोरी दाल, हरी सब्जी। 400 से 500 ग्राम तक कच्चा सलाद जैसे खीरा, ककड़ी, मूली, गाजर, शलगम, पत्तागोभी, हरी गोभी एवं कच्ची लौकी, कच्ची फली आदि। मौसम का कोई एक फल, सोयाबीन, दूध का दही। शाम के समय एक कप चाय या फल या गाजर का रस। रात्रि का भोजन: मोटे या चोकरयुक्त रोटी, साग, सब्जी 400 से 500 ग्राम कच्चा सलाद सोने से पहले एक कप चर्बी रहित दूध (जिन्हें दूध पीने की आदत है)। रात्रि के भोजन के बाद दो किलोमीटर तक चलना अनिवार्य है। इससे पाचन में सहायता तथा शारीरिक एवं मानसिक शांति मिलती है। क्या न खाएं: तले हुए नमकीन, पैकेट बंद चिप्स, तले हुए आलू या इनसे बने हुए पदार्थ समोसे और पकौड़े आदि। कृत्रिम रासायनिक पेय पदार्थ। सफेद ब्रेड एवं मैदे से बनी चीजें जैसे पिज्जा, बर्गर, नूडल्स इत्यादि। काॅर्न फ्लेक्स, चाॅकलेट एवं बाॅर्नविटा, मिठाई, आइसक्रीम। वनस्पति घी। मांस-मछली, अंडा। डिब्बा बंद खाद्य पदार्थ। मदिरा, धूम्रपान एवं तंबाकू। ऊपर बताए गए तरीकों से लाभ होने पर इन उपायों का प्रचार-प्रसार जरूर करें। आपका यह कदम देश में मोटे लोगों का प्रतिशत कम करने में मददगार साबित हो सकता है। प्रस्तावित दिनचर्या: - सुबह उठकर शौच से निपटकर व्यायाम करें या घूमने जरूर जाएं - शुरू में 1 किलोमीटर और धीरे-धीरे बढ़ाते हुए 2 किलोमीटर तक। ध्यान रहे कि व्यायाम से या चलने से तकलीफ न हो और सांस न फूले। अगर ऐसा महसूस हो तो उसी समय बैठकर आराम करें। - हो सके तो कार्यालय पहुंचने से एक किलोमीटर पहले ही यातायात के साधन को छोड़ कर कार्यालय पैदल आएं। दिन में जब समय मिले तो पैदल तेज चलें। - शारीरिक परिश्रम वाले खेल खेलें। - तैरना एक ऐसा व्यायाम है जिससे बिना शारीरिक कष्ट के कम समय में वजन घटाया जा सकता है। - हमेशा प्रसन्न रहने की आदत डालें। बिना भूख कभी भी भोजन न करें। सप्ताह में एक दिन उपवास रखें। प्रतिदिन 8 से 12 गिलास पानी अवश्य पीएं। भोजन में सलाद का महत्व भोजन में सलाद का काफी महत्व है। उदाहरण के तौर पर 500 ग्राम कच्चे लौकी या खीरा या ककड़ी खाने पर शरीर को केवल 65 कैलरी ही मिलेगी। परंतु शरीर को इसे पाने के लिए अनुमानतः 200 कैलरी खर्च करनी पड़ेगी। तो दिन के अंत में केवल 750 ग्राम कच्चा सलाद खाने से 200 कैलरी का अनुमानित घाटा रहेगा। और इसे शरीर की चर्बी को पिघलाकर पूरा किया जाएगा। साथ ही ज्यादा सलाद खाने की आदत से भोजन में खाये जाने वाले अधिक ऊर्जाकृत कार्बोज एवं वसा की मात्रा कम होगी और शरीर को प्रतिदिन 500 या इससे अधिक कैलरी का घाटा रहेगा जो कि महीने के अंत में 2) कि.ग्रा. या इससे भी अधिक वजन कम करने में सहायक होगा। मजे की बात यह है कि व्यक्ति को कोई डायटिंग नहीं करनी पड़ती और वह शारीरिक तथा मानसिक रूप से प्रसन्न रहता है। और महत्वपूर्ण बात यह है कि ऐसे भोजन चयन के परिवर्तन से लाभ केवल उस व्यक्ति को ही नहीं बल्कि उसके परिवार के सभी लोगों को एवं कार्यालय में उसके मित्रों को तथा सारे समाज को भी इस परिवर्तन से लाभ होता है। वजन कम होने के साथ बोनस के तौर पर रक्त चाप, रक्त में बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रोल, मधुमेह, हृदय रोग, घुटनों और कमर में दर्द, कब्ज एवं बवासीर इत्यादि रोगों में सुधार होता रहता है, बिना महंगी दवाइयों के। याद रहे कि एक माह में अधिक मोटापे का केवल 10 प्रतिशत तक ही वजन घटाया जाना चाहिए, ताकि स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर न पड़े। ज्यादा सलाद खाने से शरीर को जरूरत के अनुसार ऊर्जा नहीं मिलने पर शरीर की चर्बी से उसकी पूर्ति की जाती है और व्यक्ति का वजन धीरे-धीरे कम होता चला जाता है। खाद्य पदार्थ ग्लाइसिमिक इन्डेक्स - चीनी 65 - कोल्ड ड्रिंक्स 70-80 - शहद 73 - सफेद ब्रेड 96 - भूरी ब्रेड 75 - इडली 57 - मोटा आनाज 30-45 - दालें 28 - अंकुरित दालें (कच्ची) 18 - सोयाबीन 18 - काॅर्न फ्लेक्स 84 - चिवड़ा 82 -सेव 35 - संतरा 43 - खुमानी/आड़ू 42 - केला 53 - तरबूज 72 - दूध 27 - दही 14 - आइसक्रीम 61 - चाकलेट 49 - नूडल 47 - मटर 23 - राजमा 27 - जौ 25 - आटा रोटी 58 - चोकर की रोटी 42 - आलु बुखारा 25 - चेरी 23 - प्रौसेस्ड पनीर 60 - संतरे का रस 57 - पाइन एप्पल 66 - किविफ्रूट 52 - आम 55 - आलू 85 - शरीफा 75 - गाजर 71 - मक्का 55 - कच्चा टमाटर 38 - हरी सब्जियां 5-10


रत्न विशेषांक  फ़रवरी 2006

हमारे ऋषि महर्षियों ने मुख्यतया तीन प्रकार के उपायों की अनुशंसा की है यथा तन्त्र, मन्त्र एवं यन्त्र। इन तीनों में से तीसरा उपाय सर्वाधिक उल्लेखनीय एवं करने में सहज है। इसी में से एक उपाय है रत्न धारण करना। ऐसा माना जाता है कि कोई न कोई रत्न हर ग्रह से सम्बन्धित है तथा यदि कोई व्यक्ति वह रत्न धारण करता है तो उस ग्रह के द्वारा सृजित अशुभत्व में काफी कमी आती है। फ्यूचर समाचार के इस विशेषांक में अनेक महत्वपूर्ण आलेखों को समाविष्ट किया गया है जिसमें से प्रमुख हैं- चैरासी रत्न एवं उनका प्रभाव, विभिन्न लग्नों में रत्न चयन, ज्योतिष के छः महादोष एवं रत्न चयन, रोग भगाएं रत्न, रत्नों का शुद्धिकरण एवं प्राण-प्रतिष्ठा, कितने दिन में असर दिखाते हैं रत्न, लाजवर्त मणि-एक नाम अनेक काम इत्यादि। इसके अतिरिक्त स्थायी स्तम्भों के भी महत्वपूर्ण आलेख विद्यमान हैं।

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