पक्षी फ्लू से दशहत

पक्षी फ्लू से दशहत  

वेद प्रकाश गर्ग
व्यूस : 4471 | अकतूबर 2006

हर वर्ष फ्लू होना कोई नई बात नहीं है। लाखों लोग हर वर्ष इस रोग से ग्रस्त हो जाते हैं। कुछ बूढे़ तथा एड्स जैसी बीमारी से ग्रसित लोगों की इससे मृत्यु भी हो जाती है। इन्फ्लुऐंजा ए तथा बी का संक्रमण मनुष्यों में सामान्यतः होता ही रहता है। पक्षी फ्लू या एवियन इन्फ्लुएंजा भ्5छ1 जिससे कि हजारों की तादाद में चूजों की मृत्यु हो रही है, वायरस इन्फ्लुऐंजा ए के उपसमूह में से एक है। इसका संक्रमण केवल पक्षियों में ही होता है।


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यह वायरस जंगली पक्षियों में साधारणतः प्राकृतिक रूप से बिना कोई बीमारी किये विद्यमान रहता है। जंगली पक्षियों आदि में सामान्य रूप से विद्यमान रहने के कारण ये पक्षी बीमार नहींे होते हैं और इस वायरस को कहीं भी ले जा सकते हैं। इस वायरस का प्रसार पक्षियों की मुंह/चोंच, मल और अंडों इत्यादि स हो सकता है। कुछ प्रवासी पक्षी एक देश से दूसरे देश जाते रहते हैं। संभवतः उनके जंगली पक्षियों के संपर्क में आने से यह रोग फैलता है। कई बार संक्रमित पक्षियों का आयात भी एक कारण हो सकता हैं। पिछले वर्ष मंगोलिया और अन्य दूसरे कई देशों में पक्षी फ्लू की खबरें मिलती रही हंै।

कुछ हजार पक्षियों की मौत चीन में भी हुई। पक्षियों की बीट में इस वायरस का होना और इसके संपर्क में मनुष्य का आना, इस वायरस के मनुष्य में संक्रमण का मुख्य कारण है। इनकी बीट की बचावी सतहें इस वायरस को लंबे समय तक नष्ट होने से बचाती हैं। बीट बहुत हलकी होने की वजह से हवा में दूर-दूर तक आसानी से फैल जाती है और संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। बीट द्वारा दूसरे पक्षियों एवं मुर्गी पालन केंद्रों में संक्रमण फैलता है और फिर इसका प्रसार अत्यंत आसान हो जाता है।

वायरस कितना घातक?: पक्षी फ्लू के वायरस का मनुष्यों में संक्रमण सर्वप्रथम मुर्गी केंद्रों में काम कर रहे कर्मचारियों में और फिर संक्रमित चूजों, मुर्गियों या अंडे खाने वाले लोगों में होता है। अभी जिस वायरस का संक्रमण पक्षियों में फैल रहा है वह अधिक घातक प्रकार का नहीं है परंतु यह वायरस घातक प्रकार में कभी भी बदल सकता है। यह बदलाव इस वायरस की सामान्य प्रकृति है। मनुष्य में इस वायरस के प्रति प्रतिरोध क्षमता नहीं होती है, इस कारण कुछ लोगों में इसका संक्रमण जानलेवा भी साबित हुआ है।

अखबारों में इसके घातक परिणामों की खबरों से दहशत सी फैल गई है और इसके उपचार हेतु कई देशों में बाजार में उपलब्ध टेमिफ्लू नामक दवा को लोगों ने अपने घरों में संग्रह कर लिया है। इन देशों में इस दवा की कमी महसूस की जा रही है। पक्षी फ्लू द्वारा विभिन्न देशों में लगभग 90 व्यक्तियों की अब तक मृत्यु हो चुकी है। इस वायरस का संक्रमण सामान्यतः एक मनुष्य से दूसरे मनुष्य में नहीं होता है परंतु निकट भविष्य में भी ऐसा नही होगा, कोई नहीं कह सकता है। वायरस में म्यूटेशन द्वारा प्राकृतिक बदलाव आने से मनुष्य से मनुष्य में प्रसार/संक्रमण संभव हो जाएगा, ऐसा वैज्ञानिकों का मानना है

और तब पक्षी फ्लू जानलेवा विश्व महामारी में परिवर्तित हो जाएगा। सन् 1957 में जो महामारी एशिया महादीप में फैली थी उसके अनुसंधान से ज्ञात हुआ कि सामान्य फ्लू और एशियाई फ्लू के वायरस के जीन के मिलने से नये वायरस बने और उसक संक्रमण से सन् 1918 में 28 प्रतिशत लोग संक्रमित हुए और 3 प्रतिशत लोगों की मृत्यु हो गयी। प्रसार: पिछले वर्ष में संसार के विभिन्न देशों मंगोलिया, चीन, हांगकांग, जापान, दक्षिणी कोरिया, रूस, जर्मनी, फ्रांस, कनाडा, केन्या एवं अन्य अफ्रीकी देशों में इस रोग का प्रसार पाया गया है। भारत में पक्षी फ्लू: महाराष्ट्र के नवापुर इलाके में हजारों की तादाद में मुर्गियांे की पक्षी फ्लू से मृत्यु हो गई है। अब लाखों मुर्गियों को मुर्गी केंद्रों में मारा जा रहा है।

एहतियायत के तौर पर कई राज्यों ने महाराष्ट्र से चूजों, मुर्गियों एवं अंडों का आयात बंद कर दिया है और बाकी राज्यों के मुर्गीपालन केंद्रों में मुर्गियों की स्वास्थ्य जांच का काम तेज कर दिया गया है। रोग के संक्रमण से कैसे निपटंेः इससे पहले कि फ्लू मनुष्यों में फैले, पक्षियों में इस वायरस का संक्रमण समाप्त कर देना चाहिए। इस कार्य को सोचना जितना आसान है उसको क्रियान्वित करना उतना ही मुश्किल है। इस फ्लू का वायरस जंगली पक्षियों में सामान्य रूप से विद्यमान रहने के कारण कोई बीमारी नहीं फैलाता है, अतः इसके संक्रमण को पहचान पाना बहुत मुश्किल है। उच्चतम स्तर की साफ-सफाई और मुर्गियों को जंगली पक्षियों के संपर्क में नहीं आने देना इसकी रोकथाम के सफल उपाय हैं।

अति उत्तम है कि अंडांे या चूजे/मुर्गी आदि का सेवन ही न किया जाए जिससे पक्षी फ्लू का खतरा हमेशा के लिए पूरे विश्व से ही समाप्त हो जाए। परंतु क्या यह संभव हो पाएगा? टीका: आज तक मनुष्यों में पक्षी फ्लू वायरस से बचाव हेतु कोई वैक्सीन उपलब्ध नहीं है और सरकार द्वारा इस ओर समुचित प्रयास नहीं हो रहे हैं। अगर वेक्सीन विकसित हो जाता है तो भी यह पूर्ण रूप से रोग से रक्षा नहीं करेगा, ऐसा वैज्ञानिकों का मानना है। मुर्गी के अंडों से वेक्सीन बनाने की प्रक्रिया 6 महीने से 12 महीने तक समय लेती है। पूरे विश्व के लिए अरबों अंडों की आवश्यकता पड़ेगी जो कि अत्यंत कठिन कार्य है। महामारियां: पक्षी फ्लू विश्व में 1997 से मौजूद है। इन्फ्लुएंजा की तीन विश्व महामारियां अब तक हो चुकी हैं।


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Û स्पेनिश फ्लू- सन 1918 में। इससे कई करोड़ लोग मौत के शिकार हुए।

Û 1957-58 एशियाई फ्लू, इसमें 20 लाख लोगों की मृत्यु हुई। 1968-69 हांगकांग फ्लू, इसमें 10 लाख लोगों की मृत्यु हुई। अगर भविष्य में पक्षी फ्लू महामारी शुरू भी हो जाती है तो इतनी मौत नहीं होंगी क्योंकि इस रोग के साथ में होने वाली जानलेवा बैक्टीरियल निमोनिया जैसी बीमारियों को ठीक करने हेतु विभिन्न एन्टीबायटिक दवाएं सभी देशों में उपलब्ध हैं।

कैसे करें बचाव: मुर्गी पालन व्यवसाय से संबद्ध व्यक्तिः

1. उच्चतम स्तर की सफाई रखनी चाहिए।

2. किसी भी बाहरी जंगली पक्षी या अन्य पक्षी फ्लू वाहक का प्रवेश मुर्गी केंद्र में न होने दें।

3. अपने चेहरे पर मास्क, सिर पर टोपी, हाथों में दस्ताने और पैरों में जूतों आदि का नियमित प्रयोग करें।

4. फार्म के पक्षियों को 100 प्रतिशत टीका लगाएं।

5. एक भी पक्षी बीमार हो तो तुरंत उसे अलग कर नष्ट कर दें।

6. सभी पक्षियों की नियमित रूप से स्वास्थ्य जांच करें।

जन साधारण: अति उत्तम उपाय तो यही है कि मुर्गी, अंडे या इनसे बनी चीजें खाई ही न जाएं। अच्छी प्रकार से समुचित समय तक पकाया गया भोजन ही करें। जो लोग इसे खाना बंद करेंगे वे न केवल पक्षी फ्लू से बल्कि अन्य रोगों जैसे उत्तेजित रहना, अधिक रक्तचाप का होना, रक्त में यूरिक एसिड बढ़ना, शरीर में अप्रत्याशित मात्रा में डाइओक्सिन नामक रसायन का होना आदि रोगों से भी बच पाएंगे। दवा: उपचार हेतु दवाओं में हेमिफ्लू या रेलेन्जा नामक दवाए इस रोग के लिए प्रयोग में लाई जा रही हैं। एशियाई पक्षी फ्लू वायरस की कुछ प्रजातियांे पर टेमिफ्लू बेअसर पाई गई है।

पक्षियों को मारने से बचाव: संक्रमित पक्षियों, उनके उत्पादकों, बीट, पंख, अंडो आदि को नष्ट कर जला दिया जाता है ताकि वायरस 1000 सेंटीग्रेड, पर जल कर खत्म हो जाए और वातावरण शुद्ध हो जाए जिससे मुर्गी केंद्र में कार्य कर रहे कार्यकर्ताओं या मुर्गी केंद्र के व्यवसाय से जुड़े अन्य लोगों को संक्रमण न हो पाए। इसके साथ-साथ पूरे मुर्गी केंद्र को कीटनाशक एवं अन्य रसायन छिड़क कर शुद्ध किया जाता है।

रोग के लक्षण: इस रोग में बुखार, खांसी, गले में खराश, बदन दर्द इत्यादि होते हैं। कुछ लोगों में निमोनिया, सांस लेने में परेशानी या अन्य जानलेवा बीमारी जैसे फेफड़ों में सूजन इत्यादि होते हैं।


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