जब चंद्र पर होगा मनुष्य का जन्म

जब चंद्र पर होगा मनुष्य का जन्म  

जब चंद्र पर होगा मनुष्य का जन्म... भारतीय वैज्ञानिकों को चंद्र अभियान कार्यक्रम में ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल हुई है। अमरीका, रूस, यूरोप, जापान व चीन के बाद भारत चंद्र अभियान शुरू करने वाला विश्व का छठा राष्ट्र है। चंद्रयान का प्रक्षेपण गत 22 अक्तूबर 2008 को प्रातः श्री हरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से देश में निर्मित पी एस एल वी सी-11 यान से किया गया। चंद्रयान को पहले 255 किमी और फिर 22,860 किमी दूर अंडाकार कक्षा में स्थापित किया गया। फिर 5 चरणों में क्रमशः 37,900, 74,715, 1,64,600, 2,67,000 तथा अंत में 3,80,000 किमी की दूरी तक पहुंचाया गया। इसके बाद इसे पृथ्वी की गुरुत्व शक्ति से मुक्त कर चांद के गुरुत्वाकर्षण में लाया गया। धीरे-धीरे यह चंद्र से 100 किमी दूरी तक पहुंच जाएगा। इसके बाद इससे एक उपकरण को चंद्र की सतह पर उतारा जाएगा और साथ में उतारा जाएगा भारत का झंडा। चंद्रयान लगभग 2 वर्ष तक चंद्र का चक्कर लगाता रहेगा और वहां से विभिन्न प्रकार की सूचनाएं, चित्र आदि अंतरिक्ष केंद्र को भेजता रहेगा। उम्मीद है कि 2015 तक भारत किसी मनुष्य को चंद्र पर भेजने में सक्षम होगा। वह दिन दूर नहीं जब चंद्र की भूमि पर भी मनुष्य का जन्म और मानव जाति का विकास होगा। ज्योतिष के आईने से देखते हैं कि कैसे बनेगी उस शिशु की जन्मपत्री जो चंद्र पर पैदा होगा और कैसे दिखती होगी अन्य ग्रहों की चाल। राशि और भाव किस प्रकार से बदलते होंगे चंद्र पर और कौन सा ग्रह सर्वाधिक फलदायी होगा। चंद्र एक उपग्रह है जो पृथ्वी के चारों ओर चक्कर लगाता है। पृथ्वी से इसका सर्वदा एक ही भाग दिखाई देता है, क्योंकि इसकी अपनी धुरी पर चक्कर काटने की गति और पृथ्वी के चारों ओर चक्कर काटने की गति बराबर है। इस तरह 27 दिन में 12 लग्न बदलते हैं अर्थात् 1 लग्न लगभग सवा दो दिन रहता है। इसके विपरीत पृथ्वी पर एक लग्न केवल दो घंटे ही रहता है। उपग्रह होने के नाते चंद्र की पृथ्वी के चारों ओर गति लगभग एक सी जबकि सूर्य के चारों ओर कंगारू की सी रहती है। अर्थात् कंगारू की तरह उछलता हुआ यह हर अमावस्या को एक कूद लगाता है और दूसरी अमावस्या पर आकर ठहरता है। पुनः उस अमावस्या से कूदकर अगली अमावस्या पर आकर रुकता है और यह क्रम चलता रहता है। यही कारण है कि चंद्र पर सूर्य की गति एक समान न दिखाई देकर घटती बढ़ती दिखाई देती है। अमावस्या पर सूर्य की गति कम और पूर्णिमा पर अधिक दिखाई देती है। चंद्र से पृथ्वी की स्थिति एक स्थान पर बिल्कुल स्थिर दिखाई देती है अर्थात् यदि चंद्र के किसी स्थान से पृथ्वी पूर्व में उदित होती दिखाई दे रही है, तो वह सर्वदा ऐसी ही दिखाई देगी और यदि चंद्र के किसी स्थान से पृथ्वी नहीं दिख रही है तो वहां से कभी दिखाई नहीं देगी। लेकिन चंद्र से पृथ्वी पूरी घूमती हुई नजर आएगी अर्थात् कभी भारत दिखाई देगा, कभी लंदन तो कभी अमेरिका - वह भी मात्र 24 घंटे में। इसी प्रकार कभी उत्तरी ध्रुव पर छह महीने की छाया दिखाई देगी तो कभी दक्षिणी ध्रुव पर। पृथ्वी पर से चंद्र का जो आकार दिखाई देता है, उसकी तुलना में चंद्र पर से पृथ्वी व्यास में 4 व पूर्ण आकार में 16 गुणा बड़ी दिखाई देगी। चंद्र पर दिन व रात की अवधि साढ़े 29 दिन की होती है अर्थात् पूर्णिमा से पूर्णिमा तक का एक दिन होता है और इतने समय में पृथ्वी लगभग 30 अंश आगे चली जाती है। अतः जब पुनः सुबह होती है तो राशि परिवर्तन हो जाता है। अन्य ग्रह मंगल, बुध, गुरु, शुक्र एवं शनि की गति और अंश लगभग वही दिखाई देते हैं जो पृथ्वी पर होते हैं। राहु और केतु परिवर्तित हो जाते हैं - राहु केतु बन जाता है और केतु राहु। चंद्र ग्रहण सूर्य ग्रहण बन जाता है और सूर्य ग्रहण पृथ्वी ग्रहण के रूप में दिखाई देता है। चंद्र पर कुंडली बनाने पर एक स्थान पर पृथ्वी सदा एक भाव में ही दिखाई देगी। भाव में राशियां बदलती रहती हैं। जिस प्रकार पृथ्वी पर कुंडली में चंद्र का प्रभाव सर्वाधिक होता है, उसी प्रकार चंद्र पर कुंडली में सर्वाधिक प्रभाव पृथ्वी का रहेगा। यह प्रभाव लगभग 80 गुणा अधिक होगा, क्योंकि पृथ्वी चंद्र से लगभग 80 गुणा भारी है। अतः कह सकते हैं कि चंद्र पर कुंडली देखना ज्यादा आसान होगा, क्योंकि केवल पृथ्वी का भाव व राशि ही मुख्य रूप से भविष्य को प्रभावित करेगी।



वास्तु विशेषांक   दिसम्बर 2008

वास्तु के विविध नियम एवं सिद्धांत, धर्मग्रंथों, पौराणिक ग्रंथों में वास्तु की चर्चा, मानव जीवन में वास्तु के उपयोग, ज्योतिष और वास्तु, विभिन्न प्रकार के घर, फ्लैट, कोठी, कालोनी, धर्मस्था, स्कूल-कॉलेज, अस्पताल, व्यवसायिक परिसर आदि का वास्तु के नियमानुकूल निर्माण

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