महान संत दलाई लामा

महान संत दलाई लामा  

महान संत दलाई लामा पं. शरद त्रिपाठी दलाई लामा एक उपाधि है जो किसी विशेष व्यक्ति को प्रदान की जाती है । यह विशेष व्यक्ति बौद्ध धर्म के गिलगू संप्रदाय का आध्यात्मिक नेता होता है। दलाई लामा के संबंध में यह विश्वास किया जाता है कि ये तुल्कुओं की लंबी परंपरा का वर्तमान अवतार हैं। बौद्ध धर्म के अनुसार तुल्क वह आत्मा होती है जिसे बुद्धत्व की प्राप्ति हो चुकी हो। वह जन्म व मरण के चक्र से भी मुक्त हो चुका है। लामा का अर्थ है शिक्षक। इस शब्द का प्रयोग तिब्बती बौद्ध पुरोहित-वर्ग की बहुत सी उपाधियों के साथ होता है जैसे करमापा लामा, पंचेन लामा आदि। 17वीं शताब्दी के मध्य से लेकर 1959 तक दलाई लामा ही तिब्बत का सर्वोच्च पद होता था। तिब्बती लोग आमतौर पर दलाई लामा को परंपरा के अनुसार ग्यालवा रिनपोशे या येशे नोरबू के नाम से पुकारते हैं। इस संबोधन का अर्थ मूल्यवान विजेता या इच्छा पूरी करने वाला रत्न होता है। वैश्विक स्तर पर उन्हें ‘हिज होलिनेस द दलाई लामा’ के नाम से संबोधित किया जाता है। तेरहवें दलाई लामा के प्रयाण के बाद एक दल को दलाई लामा के नए अवतार को खोजने का कार्यभार सौंपा गया। खोज के दौरान एक नया लक्षण उभरा जिसने दलाई लामा की खोज में अहम भूमिका अदा की। तेरहवें दलाई लामा का पवित्र शव इस तरह रखा गया था कि सिर दक्षिण दिशा की ओर रहे, किंतु उनका सिर रहस्यपूर्ण ढंग से उŸार-पूर्व की तरफ हो गया। इससे यह अनुमान लगाया गया कि अगले दलाई लामा का जन्म इसी दिशा में हुआ है। खोजी दल के मुखिया को सपने में पवित्र तालाब हल्लास-लात्सो दिखाई दिया जिसे दलाई लामा के पवित्र स्थल एम्डो के रूप में चिह्नित किया गया। साथ ही एक खास तरह का मकान दिखाई दिया जिसमें जल निकासी की विशेष व्यवस्था थी और जो विशेष प्रकार की खपरैल से ढका था। काफी खोज के बाद सपने से मिले इस घर में ‘थोनडप’ नाम का दो वर्षीय बालक मिला। खोजी दल ने बालक को बहुत से खिलौने और स्मृति चिह्न दिए जिनमें से कुछ पूर्व दलाई लामा से संबंधित थे। बालक ने सभी को पहचान लिया और ‘मेरे हैं मेरे हैं’ कहने लगा। आखिर खोजी दल की खोज पूर्ण हुई। यही थोनडप दलाई लामा के रूप में स्वीकारा गया और उसका नाम बदल कर ‘जेटसन जेमफेल गवांग लोबसेंग येशी तेनजिंग ग्यात्सो’ रखा गया। इसका अर्थ है पवित्र ईश्वर, सौम्य ज्योति, करुणा के अवतार, आस्था के संरक्षक, ज्ञान का सागर। थोनडप का जन्म एक किसान परिवार में सन् 1935 में हुआ। उनके अभिभावक चोकयोंग और डीको सेरिंग जीवनयापन के लिए पूर्ण रूप से कृषि पर निर्भर थे। सबसे बड़ी बहन डोरमा इनसे 18 वर्ष बड़ी थी। इनके बड़े भाई थुपरन जिग्मे नोरबू को हाई लामा तक्तसर रिनपोशे के रूप में पहचाना जाता है। इनकी दूसरी बहन जेटसन पेमा को 1997 में फिल्म सेवन ईयर्स इन तिब्बत में उनकी मां के रूप में देखा गया है। अपनी शिक्षा दीक्षा के दौरान वे अन्य बच्चांे की तरह मठ के प्रासाद को नापना चाहते थे। वे भी अन्य बच्चों के समान खेलना चाहते थे, किंतु जानते थे कि वे कुछ खास हैं। उनके प्रति उनके अभिभावकों का व्यवहार भी विशेष था। शायद इसी कारण लगभग 73 वर्ष के होने पर भी उनके अंदर का बच्चा अभी भी मौजूद है। बौद्ध दर्शन को समझना थोनडप के लिए आसान कार्य न था, लेकिन उनके शिक्षक प्रतिबद्ध थे और कठोर भी। 1939 में दलाई लामा को पहली बार ल्हासा में लामाओं की एक बड़ी शोभायात्रा में शामिल होने का अवसर प्राप्त हुआ। यहीं पर उन्हें तिब्बत के नए धार्मिक नेता के रूप मान्यता प्राप्त हुई। जब थोनडप थोड़े समझदार हो गए तो उन्हें बाहरी दुनिया की जानकारी देने की आवश्यकता थी। ऐसे में एक विशेष शिक्षक की आवश्यकता पड़ी और काफी खोज के बाद आस्ट्रेलिया के पर्वतारोही हिनरिन हैरर को यह उत्तरदायित्व सौंपा गया। हैरर ने इसे बखूबी निभाया भी। वे उन लोगों में थे जिन्होंने दलाई लामा के जीवन को गहरे तक प्रभावित किया। आइए, करते हैं धर्मगुरु दलाई लामा की कुंडली का ज्योतिषीय विश्लेषण। दलाई लामा का जन्मांग स्थिर लग्न (वृष) का है जिसमें लग्नेश शुक्र सिंह राशि में 50-13’ का है अर्थात् केतु के नक्षत्र में है। केतु दूसरे और चैथे भावों के स्वामियों के साथ है। केतु आध्यात्मिक ग्रह है, इसलिए इस योग ने उन्हें आध्यात्मिक बनाया। सूर्य उनके सुंदर व्यक्तित्व को दर्शा रहा है। लग्नेश चतुर्थ में बैठा है। द्वितीय भाव वाणी का भाव होता है। द्वितीय भाव का स्वामी दूसरे भाव में सूर्य और केतु के साथ हो तो व्यक्ति सत्यवादी होता है। इस जन्मांग में लग्नेश शुक्र षड्बली है जो उनकी संघर्ष क्षमता को बढ़ाता है। लग्नेश शुक्र और भाग्येश शनि का आपस में दृष्टि संबंध है। लग्नेश और भाग्येश का दृष्टि संबंध हो तो जातक दीर्घजीवी और प्रसिद्ध होता है। यह दृष्टि संबंध चतुर्थ और दशम भाव में घटित हो रहा है। इस योग से प्रभावित व्यक्ति अपने परिवार, समाज व जातीय लोगों की सेवा अपना जीवन समर्पित कर देता है। सुख भाव अर्थात् चतुर्थ भाव में तीसरे भाव का स्वामी चंद्र बैठा है। तीसरा भाव अर्थात् चतुर्थ का व्यय भाव हुआ और चतुर्थ के मारक भाव (सप्तम) अर्थात् दशम भाव मारक और व्यय भाव दोनों में दृष्टि संबंध है। अष्टम भावस्थ राहु की नीच दृष्टि भी चतुर्थ भाव पर पड़ रही है। यही कारण है कि दलाई लामा को घर का सुख कभी नहीं मिला। कुटंुब स्थान अर्थात् द्वितीय भाव में द्वितीयेश है, पर साथ ही सूर्य भी स्थित है, इसीलिए परिवार बड़ा रहा, पर साथ ही सदस्यों की हानि भी हुई। जन्म से ही लग्नेश की महादशा 1951 तक चली। 1939 में शुक्र में राहु का अंतर चल रहा था। राहु का कुंडली में लग्नेश से दृष्टि संबंध भी है। 1944 से 1947 तक शुक्र में शनि की अंतर्दशा चली। शनि इनका भाग्येश और दशमेश केतु-गुरु से दृष्ट है। ऐसा होने से उन्हें धर्म-अध्यात्म के साथ ही गूढ़ ज्ञान आदि भी मिला। 17 नवंबर 1950 को महज 15 वर्ष की आयु में दलाई लामा को अस्थायी तौर पर तिब्बत की प्रशासनिक बागडोर सौंप दी गई। उस समय तिब्बत और चीन के संबंधों में बहुत अधिक खटास थी। उसी वर्ष चीन की सेना ने तिब्बत में प्रवेश कर उस पर अपना कब्जा कर लिया। दलाई लामा ने इस मामले को सुलझाने के लिए एक प्रतिनिधि दल को बीजिंग रवाना किया। तिब्बत प्रशासन और दलाई लामा ने एक 17 सूत्री समझौते पर हस्ताक्षर किए। यह समझौता एक तरफा और चीनी लोगों के दबाव में हुआ था। सन् 1954 में दलाई लामा और दसवंे पांचेन लामा ‘नेशनल पीपल्स कांग्रेस’ के पहले सत्र में भाग लेने के लिए चीन रवाना गए। माओ जेदौंग’ से मुलाकात उनका मुख्य लक्ष्य था, किंतु इससे भी उन्हें कोई विशेष लाभ नहीं मिल सका। सन् 1959 दलाई लामा के जीवन में विशेष महत्व रखता है। ल्हासा के जोगदेंग मंदिर में मोनलम उत्सव के अवसर पर बौद्ध धर्म की मुख्य परीक्षा का सामना दलाई लामा को करना पड़ा। थोनडप ने सम्मानपूर्वक यह परीक्षा उत्तीर्ण कर लारप्पा की डिग्री और दलाई लामा की उपाधि हासिल की जो बौद्ध दर्शन में डाक्टरेट के समान होती है। उस समय तिब्बती लोगों का असंतोष काफी गहरा हो गया था। उन्हें लगने लगा था कि चीन दलाई लामा की हत्या करवा सकता है, इसलिए दलाई लामा अपने सर्मथकों के साथ 17 मार्च को अपना अ ा िध् ा क ा िर क आवास छोड़कर भारत आ गए। 31 मार्च को वे भारत पहुंचे और भारत से शरण देने की प्रार्थना की। दलाई लामा तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. नेहरू से मिले और उन्हें अपनी समस्याओं से अवगत कराया। पं. नेहरू ने उन्हें पहले 17 सूत्री कार्यक्रम पर ही पुनः विचार की सलाह दी, क्योंकि चीन के साथ भारत के संबंध बहुत अच्छे नहीं चल रहे थे। इसी बीच 1962 में भारत पर चीन ने आक्रमण कर दिया। तब दलाई लामा ने भारत के हिमाचल प्रदेश में धर्मशिला नामक स्थान पर अपने 80,000 समर्थकों के साथ समानांतर सरकार बनाई। आज धर्मशाला को लिटिल ल्हासा की संज्ञा दी जाती है। यहीं पर दलाई लामा ने ‘तिब्बतन इंस्टिट्यूट आॅफ परफाॅर्मिंग आर्ट’ की स्थापना की और फिर मात्र एक ही प्रयास में 200 से अधिक बौद्ध मठों और शिक्षा केंद्रों की स्थापना कर डाली। आइए, अब ज्योतिष की दृष्टि से दलाई लामा के छठे या सप्तम भाव को देखें। छठे भाव में छठे से छठे अर्थात् ग्यारहवें और अष्टम का स्वामी गुरु है। गुरु की इस स्थिति के फलस्वरूप उनके शत्रु बुद्धिमान, शक्तिशाली व गोपनीय रूप से धोखा देने वाले सिद्ध हुए। गुरु छठे भाव में बैठकर नौवीं दृष्टि से धन भाव को देख रहा है। छठे भाव का गुरु शत्रुहंता योग बनाता है, जो संकेत देता है कि उनकी सम्मानजनक विजय होगी। सप्तम भाव पर वृश्चिक राशि उदित हो रही है। उस पर मंगल के शत्रु शनि और राहु की दृष्टि है, फलतः उनका विवाह नहीं हुआ। स्थिर लग्न (वृष) की पत्री में शनि योग कारक होने के साथ-साथ बाधक भी है और संन्यास का कारक भी। शायद इसी संन्यास योग के कारण विवाह से वंचित रहे। सन् 1950 में शुक्र में केतु का अंतर चल रहा था। केतु उनकी पत्री में 290-2’ का है अर्थात् गुरु के नक्षत्र में है। गुरु की केतु पर दृष्टि है और केतु का गुरु से पंचम-नवम दृष्टि संबंध है। गुरु लाभेश भी है, अतः उन्हें सत्ता सुख मिला, पर उसके छठे भाव में स्थित होने के कारण सत्ता अस्थायी रही। सन् 1957 से 1967 तक दलाई लामा पर चंद्र की महादशा रही। इसी बीच सितंबर 1958 से मार्च 60 तक चंद्र में राहु का अंतर रहा, चंद्र को राहु नवम दृष्टि से देख रहा है। चंद्र-राहु का दृष्टि संबंध ठीक नहीं है। यह ग्रहण योग भी बनता है। अष्टमस्थ राहु गूढ़ ज्ञान को दर्शाता है और बृहस्पति की राशि है, अतः उन्हें अध्ययन के क्षेत्र में सफलता मिली। दलाई लामा तिब्बतियों पर हो रहे अत्याचार खत्म करने के लिए तन-मन-धन से प्रयासरत हैं। इस प्रयास में उन्हें धीरे-धीरे इन्हें अन्य देशों का भी समर्थन मिलने लगा। दलाई लामा की आवाज पर संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 1959, 1961 और 1965 मंे तिब्बत से संबंधित संकल्प को स्वीकार किया। इन संकल्पों में मांग की गई थी कि चीन तिब्बत में तिब्बतियों के मानवाधिकार और आत्मसम्मान का सम्मान करेगा। 1987 में वाशिंगटन डी. सी. में आयोजित कांग्रेसनल मानव अधिकार बैठक में दलाई लामा ने 5 सूत्री शांति प्रस्ताव रखा। यह तिब्बत-चीन संघर्ष की समाप्ति का घोषणा पत्र था। 15 जून 1988 को फ्रांस के स्ट्रेसबोर्ग शहर में भी दलाई लामा ने इसी तरह का प्रस्ताव चीन के सामने रखा। इसमें चीन के सहयोग से एक स्वतंत्र सरकार की स्थापना और रूपरेखा प्रस्तुत की गई। किंतु 1991 में इस प्रस्ताव को तिब्बत की निर्वासित सरकार ने अस्वीकृत कर दिया। अक्तूबर 1991 में दलाई लामा ने अपनी शर्तों पर तिब्बत जाने की इच्छा जाहिर की, किंतु चीन ने इसे मानने से इन्कार कर दिया। 10 दिसंबर सन 1989 को पूरी दुनिया ने दलाई लामा के संघर्ष को मान्यता प्रदान की और उन्हें ‘नोबल शांति’ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह इस बात का प्रमाण था कि यह संत इतनी विपरीत परिस्थितियों में भी कितना अटल है। वर्ष 2005 और 2008 में टाइम मैगजीन ने दलाई लामा को विश्व के सौ सर्वाधिक प्रभावशाली लोगों की सूची में शामिल किया। जून 2006 को कनाडा की संसद में दलाई लामा को कनाडा की नागरिकता देने के पक्ष में अभूतपूर्व मतदान हुआ और उन्हें कनाडा की मानद नागरिकता से सम्मानित किया गया। 2006 में संयुक्त राज्य अमेरिका की कांग्रेस में भी दलाई लामा को कांग्रेसनल अवार्ड देने के पक्ष में भारी मतदान हुआ और उन्हें अमेरिकी कांग्रेसनल गोल्ड मेडल प्रदान किया गया। इसके बाद वे जर्मनी गए और चांसलर एलेजां मोरकेल से मिले। दलाई लामा अत्यंत सरल स्वभाव के हैं, यह बात चीन को छोड़कर पूरी दुनिया स्वीकार करती है। उनके संघर्ष पर संत शांतिदेव की एक तिब्बती कविता खरी उतरती है, जिसका भावार्थ इस प्रकार है- ‘उसके लिए जो ब्रह्मांड से भी विस्तृत है और इतना दीर्घ कि जब तक जीवन शेष है, तब तक मैं अटल रह पाऊं ! जब तक इस दुनिया से पाप और दुख को तितर-बितर न कर दूं।’ आइए जानते हैं कि कैसे दलाई लामा बार-बार विदेश यात्राएं करते रहे। यदि जन्मपत्रिका में द्वादश भाव में मंगल हो या उसे मंगल देखता हो या द्वादशेश मंगल से संबंध रखता हो तो जातक मरणोपरांत शीघ्र जन्म लेकर आता है या पहले से कहीं न कहीं उसका पुनर्जन्म होता है। इस कुंडली में मंगल ऐसा ही योग बना रहा है। अतः दलाई लामा बौद्धों के विकास हेतु पुनः जन्म लेंगे और पृथ्वी पर अवतरित होंगे। बारहवें भाव का स्वामी मंगल पंचम भाव में बुध की राशि में बैठकर अपनी आठवीं दृष्टि से बारहवें भाव को देख रहा है। विदेश यात्रा के लिए बारहवें भाव व बुध का मजबूत होना आवश्यक है। दलाई लामा के लग्न का संबंध राहु से है, इसीलिए वे ज्यादातर बाहर ही रहेंगे। चतुर्थ भाव में स्थित चंद्र पर राहु ने दृष्टि डालकर घर छुड़वा दिया। चंद्र तीसरे भाव का स्वामी है, इसीलिए उन्हें घर का सुख नहीं मिला। 19 अक्तूबर 1985 से 19 अक्तूबर 1988 तक राहु में शुक्र का अंतर चला। राहु लग्नेश (शुक्र) को देख रहा है जो चतुर्थ में स्थित है, इसलिए घर से संबंधित अर्थात् देश से संबंधित समस्याओं में कमी आई। वर्ष 1989 में राहु में सूर्य का अंतर चल रहा था। राहु अष्टम में और सूर्य द्वितीय भाव में है। दोनों एक-दूसरे को देख रहे हैं। इस कुंडली में 190-54’ का सूर्य राहु के नक्षत्र में है और राहु 290-2’ का होकर सूर्य के नक्षत्र में है अर्थात् आपस में नक्षत्र परिवर्तन भी है। इसी योग ने दलाई लामा को ‘नोबल शांति पुरस्कार’ से सम्मानित कराया। सन् 1991 में राहु में चंद्र का अंतर था, इसीलिए उनकी अपने देश वापसी की योजना टल गई। अप्रैल 2008 से उनकी बृहस्पति महादशा समाप्त होकर शनि की महादशा आरंभ हो चुकी है। इस महादशा की अवधि उनके जीवन काल की सर्वश्रेष्ठ अवधि होगी। शनि दशम भाव में अपनी ही राशि का होकर स्थित है जो उन्हें इस महादशा में उनके जीवन के उद्देश्यों की पूर्ति के काफी करीब लाएगा, क्योंकि वृष लग्न में शनि योगकारक भी होता है। शनि दशम में स्थित होकर तीसरी दृष्टि से व्यय भाव को देखने से उन्हें सम्मान के साथ ही यश भी प्राप्त होगा और यही दशा उनके जीवन की अंतिम दशा होगी। दलाई लामा की मंशा है कि वे अब अवकाश ले लें। राजनैतिक नेतृत्व समय के साथ किसी योग्य व्यक्ति को सौंप दिया जाएगा, लेकिन दलाई लामा का पद किसी दूसरे को नहीं दिया जाएगा। हालांकि चीन की सरकार ने अगले दलाई लामा के चयन संबंध सभी काम अपने नियंत्रण में लेने की घोषणा की है, लेकिन पूरी दुनिया समझती है कि धर्मगुरुओं, संतों, लामाओं आदि का चयन कोई सरकार नहीं कर सकती।



वास्तु विशेषांक   दिसम्बर 2008

वास्तु के विविध नियम एवं सिद्धांत, धर्मग्रंथों, पौराणिक ग्रंथों में वास्तु की चर्चा, मानव जीवन में वास्तु के उपयोग, ज्योतिष और वास्तु, विभिन्न प्रकार के घर, फ्लैट, कोठी, कालोनी, धर्मस्था, स्कूल-कॉलेज, अस्पताल, व्यवसायिक परिसर आदि का वास्तु के नियमानुकूल निर्माण

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