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प्लूटो, अन्य उपग्रह एवं संवेदनशील बिन्दु

प्लूटो, अन्य उपग्रह एवं संवेदनशील बिन्दु  

प्लूटो, अन्य उपग्रह एवं संवेदनषील बिन्दु आचार्य अविनाश सिंह खगोलीय दृष्टिकोण सर्य की परिक्रमा करने वाले ग्रहों में प्लूटो की कक्षा नौवीं है। इस नवीन ग्रह की खोज 23 जनवरी 1930 ई. को अमेरिकन खगोल शास्त्री क्लाईड टाॅमबाग ने की थी। उसकी दूरी सूर्य से 3,667,0 लाख मील है। अपनी कक्षा पर औसत गति 2.9 मील प्रति सेकंड है इसका सम्पातिक काल 247. 7 वर्ष है। संयुति काल 366.7 दिन है। भूमध्यीय व्यास 1800 मील है। कक्षा की उत्केन्द्रता 0.248 है। इसी कक्षा की कांति वृत पर झुकाव 17010’ हैं अपनी धुरी पर 6 दिन 9 घंटे 17 मिनट में एक चक्कर काटता है। भारतीय खगोलशास्त्रियों ने प्लूटो को ‘यम’ के नाम से संबोधित किया है। प्लूटो का एक चंद्रमा है जिसका नाम केरोन है। इसकी खोज 1978 में अमेरिकन खगोलशास्त्री जीम्म चेरिस्टी ने की थी। प्लूटो और केरोन दोनों का वातावरण बर्फीला है। यहां पर किसी भी प्रकार के जीव नहीं हैं। जब प्लूटो सूर्य के निकट रहता है तब इसके ऊपर खास वातावरण बनता है जिससे नाइट्रोजन और मिथेन गैस बनती है। पौराणिक दृष्टिकोण: इस ग्रह की खोज किए हुए कुछ वर्ष हुई हैं, इसलिए इसका कोई भी पौराणिक दृ ष्टिकोण नहीं है। ज्योतिषीय दृष्टिकोण: ज्योतिष शास्त्र भी इसे नवीन ग्रह के ज्योतिषीय फलों को जानने में लगे हैं, परंतु अभी तक इसके मानव जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों के बारे में ठीक से नहीं कह पाए। क्योंकि इसकी अवधि एक राशि में 20 वर्ष 4 मास है और पूर्ण राशि चक्र को पार करने में 248 वर्ष लग जाते हैं। इसलिए यह ग्रह किसी जातक के जीवन में 3 या 4 राशि ही चल पाता है। उपग्रह: वैदिक ज्योतिष में नवग्रहों का वर्णन किया गया है। इस नवग्रहों के उपग्रह भी होते हैं। जो अदृश्य हैं जिनका कोई भौतिक अस्तित्व नहीं होता, बल्कि यह गणना से निकाले गए संवेदनशील बिन्दु मात्र हैं। इन संवेदनशील बिन्दुओं का जन्म कुंडली, देश-विदेश या वर्ष कुंडली में महत्वपूर्ण स्थान है। साधारणतः इनके बुरे प्रभाव ही होते हैं। इन्हें गौण ग्रह भी कहते हैं। उपग्रह: धूम, पथ, परिधि, इंद्र चाप (व्यतीपात) एवं शिखि हैं। सूर्य के भोगांश द्वारा इनकी गणना करने की विधि निम्न है। - त्र धूम: सूर्य के भोगांश $133020 त्र पथ: 360-धूम त्र परिधि: पथ $ 1800 त्र इंद्रचाप: 3600-परिधि त्र शिखि: 360$16‘40’ उदाहरण: मान लें किसी जन्म कुंडली में सूर्य कर्क राशि की 40 पर है। तो सूर्य के कुछ भोगांश 940 हो गए। इस प्रकार उपरोक्त समीकरण के अनुपात निम्न परिणाम मिलेंगे। त्र धूम: 94$133020=2270.20’ त्र पथ: 3600-2270.20=133040’ त्र परिधि: 133040’$1800=313040’ त्र इंद्र चापः 3600-313040’=47020’ त्र शिखि: 49020’$160040’=630 ये संवेदनशील बिंदु, जिनकी गणना सूर्य के भोगांश के आधार पर की गई, इन ग्रहों के उपग्रह माने गए हैं। 1 मंगल (धूम), 2 राहु-पथ, 3 चंद्रमा-परिधि, 4 शुक्र-इंद्रचाप तथा 5 केतु-शिखि। अन्य चार ग्रहों सूर्य, बुध, गुरु और शनि की गणना करने के लिए दूसरी विधि है। यदि जन्म दिन के समय है अर्थात् सूर्य उदय से सूर्य अस्त के बीच: दिन मान साधन कर दिनमान को आठ बराबर भागों में बांटें। प्रथम भाग उस वार का स्वामी ग्रह को तथा सप्ताह के दिनों के क्रम में अन्य ग्रह को 7 भाग दिए जाते हैं। आठवां भाग निरीश (खाली) कहलाता है अर्थात् इसका स्वामित्व किसी ग्रह को नहीं दिया जाता। यदि जन्म रात्रि के समय अर्थात् सूर्य अस्त से सूर्य उदय के बीच है तो- रात्रि मान साधन कर रात्रिमान को आठ बराबर भागों में बांटें। प्रथम भाग उस दिन के वार-पति से पांचवें ग्रह (सप्ताह के दिनों के क्रम में) को दिया जाता है। जैसे रविवार को रात्रि में प्रथम भाग यम घंटा (स्वामी गुरु) का है, क्योंकि रविवार का वार अधिपति सूर्य है और सप्ताह के वार क्रम में सूर्य से पंचम गुरु होता है जिसका उपग्रह यम घंटक है, इसीलिए रविवार को रात्रि, का प्रथम मान यम घंटक को दिया गया है। फिर अन्य को वार के क्रम में ही रखा गया अर्थात् दण्ड (शुक्र), गुलिक (शनि), काल (सूर्य), परिधि (चंद्र), घूम (मंगल), अर्द्धमय (बुध)। अंत में वह भाग जो किसी ग्रह को नहीं दिया गया है। प्रत्येक उपग्रह के समय-खंड (रात्रिमान या दिनमान के भाग) के प्रारंभ में लग्न निकाला जाता है। यह उस उपग्रह का भोगांश होगा। ज्योतिशास्त्र के अनुसार नौ ग्रहों से संबंधित नौ उपग्रह हैं जो फलित ज्योतिष में प्रायः अशुभ फल ही देते हैं। जातक की कुंडली में ये जिन भावों में बैठते हैं उन भावों से मिलने वाले शुभ फलों का नाश करते हैं। जैसे यदि पंचम भाव में यमघंटक अर्थात् गुरु का उपग्रह स्थित है तो जातक को विद्या बुद्धि, संतान में रुकावट डालेगा। इसी प्रकार अन्य उपग्रह भी कुंडली में जहां स्थित होते हैं उस स्थान से मिलने वाले फलों को प्रभावित करते हैं। जैसा कहा गया है कि उपग्रह ग्रहों के प्रतिरूप हैं, इसलिए जो ग्रह कुंडली में शुभफलदायक होते हैं उनके उपग्रह कुंडली अशुभ फल देते हैं और जो ग्रह कुंडली में अशुभफलदायक हैं, उनके उपग्रह शुभफल उपग्रह शुभ फल देते हैं, क्योंकि ग्रह के प्रतिकूल फल उपग्रह का माना गया है। कुंडली में उपग्रह जिस ग्रह से युति बनाते हैं उस ग्रह के शुभ या शुभ फलों को भी नष्ट कर देते हैं। यदि कोई शुभदायक ग्रह कुंडली में किसी उपग्रह से युति बनाता है तो उसकी शुभता को नष्ट करता है। इसी के विपरीत यदि कोई अशुभदायक ग्रह कुंडली में किसी उपग्रह से युति बनाता है तो अपनी अशुभता खो देता है अर्थात् अशुभ यह शुभ फलदायक हो जाता है। फलित ज्योतिष में इन उपग्रहों अर्थात् संवेदनशील बिंदु को विशेष महत्व है यदि इन को भी ध्यान में रखकर फलित किया जाए तो फल कथन अधिक सही होगा।


वास्तु विशेषांक   दिसम्बर 2008

वास्तु के विविध नियम एवं सिद्धांत, धर्मग्रंथों, पौराणिक ग्रंथों में वास्तु की चर्चा, मानव जीवन में वास्तु के उपयोग, ज्योतिष और वास्तु, विभिन्न प्रकार के घर, फ्लैट, कोठी, कालोनी, धर्मस्था, स्कूल-कॉलेज, अस्पताल, व्यवसायिक परिसर आदि का वास्तु के नियमानुकूल निर्माण

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