श्री कृष्ण जन्मांग

श्री कृष्ण जन्मांग  

ह सर्वविदित है कि श्री कृष्ण का जन्म भाद्र कृष्ण अष्टमी को मथुरा में हुआ। जैसा ग्रंथों से विदित होता है, उनका जन्म रोहिणी नक्षत्र में अर्धरात्रि में हुआ। अथ सर्वगुणोपेतः कालः परमशोभनः। यह्र्येवाजनजन्मक्र्षं शान्तक्र्षग्रहतारकम्।। (श्रीमद्भागवत, दशम स्कंध, तृतीय अ., श्लोक-1) अब समस्त शुभ गुणों से युक्त बहुत सुहावना समय आया। रोहिणी नक्षत्र था। आकाश के सभी नक्षत्र, ग्रह और तारे शान्त-सौम्य हो रहे थे। निशीथे तमउद्भूते जायमाने जनार्दने। देवक्यां देवरूपिण्यां विष्णुः सर्वगुहाशयः।। (श्रीमद्भागवत, दशम स्कंध, तृतीय अ., श्लोक-8) जन्म-मृत्यु के चक्र से छुड़ाने वाले जनार्दन के अवतार का समय था निशीथ। उसी समय सबके हृदय में विराजमान भगवान् विष्णु देवरूपिणी देवकी के गर्भ से प्रकट हुए। मन्दं जगर्जुर्जलदाः पुष्पवृष्टिमुचो द्विज। अर्द्धरात्रेऽखिलाधारे जायमाने जनार्दने।। (श्रीविष्णुपुराण, पंचम अंश, तीसरा अ., श्लोक-7) हे द्विज! अर्द्धरात्रि के समय सर्वाधार भगवान् जनार्दन के आविर्भूत होने पर पुष्पवर्षा करते हुए मेघगण मंद मंद गर्जना करने लगे। विक्रमादित्य संवत् 2061में श्री कृष्ण के जन्म से 5230 वर्ष बीत चुके हैं। ज्योतिष कंप्यूटर प्रोग्राम लियो गोल्ड एवं पाम कंप्यूटर प्रोग्राम लियो पाम द्वारा भाद्र कृष्ण अष्टमी की गणित करने पर श्री कृष्ण का जन्म काल 21 जुलाई, 3228 ईसा पूर्व प्राप्त होता है। उनकी जन्मकुंडली, नवांश कुंडली एवं ग्रह स्पष्ट निम्न आते हैं। जन्म के समय अयनांश -48017श्59ष् आता है एवं दशा का भोग्य काल चंद्रमा 3 वर्ष 9 माह 28 दिन आता है। बंगलूर के ज्योतिर्विद श्री बी.वी. रमन ने अपनी पुस्तक छवजंइसम भ्वतवेबवचमे में भी श्री कृष्ण का जन्मांग दिया है। उनके अनुसार श्री कृष्ण का जन्म 3228 ई.पू. में वृष लग्न में हुआ एवं चंद्र की भोग्य दशा 4 साल 2 माह 21 दिन थी। उनके द्वारा दिया गया जन्मांग कंप्यूटर द्वारा बनाये गये जन्मांग से पूर्णतः मिलता है। नवांश कुंडली भी अधिकांशतः मिलती है, लेकिन, श्री रमण के अनुसार, नवांश लग्न मिथुन आता है, जबकि कंप्यूटर द्वारा कर्क नवांश आता है। नवांश में शुक्र एवं शनि में भी थोड़ा सा अंतर आता है। यह अंतर गणना के मतभेद के कारण हो सकता है, लेकिन जन्म तिथि में भेद के कारण कदापि नहीं। ज्योतिष रत्नाकर पुस्तक में भी श्री कृष्ण का जन्मांग दिया हुआ है। लेकिन यह कंप्यूटर द्वारा निर्मित जन्मांग से काफी भिन्न है। इस जन्मांग में मंगल सप्तम में एवं शनि दशम स्थान में दर्शाये गये हैं। साथ ही गुरु पंचम में बुध के साथ एवं राहु षष्ठ स्थान में दिखाये गये हैं। कुछ अन्य ग्रंथों के अनुसार श्री कृष्ण के जन्मांग में गुरु उच्च का कर्क में एवं शनि उच्च का षष्ठ में दिखा कर, बुध और चंद्र सहित, 4 ग्रह उच्च के दर्शाये गये हैं। यह सब ग्रह स्थितियां शायद किसी गणित पर आधारित न हो कर काव्यानुसार पत्री को बलवान बनाने के लिए दी गयी हंै। अतः उनकी सत्यता पर भरोसा नहीं किया जा सकता। महाभारत युद्ध के समय श्री कृष्ण 90 वर्ष के थे। उस समय आकाश में भयावह स्थिति थी। राहु सूर्य के निकट जा रहा था, केतु, चित्रा नक्षत्र का अतिक्रमण कर के, स्वाति पर स्थित हो रहा था। धूमकेतु पुष्य नक्षत्र पर दोनों सेनाओं के लिए अमंगल की सूचना दे रहा था। मंगल, वक्र हो कर, मघा में, गुरु श्रवण में एवं सूर्य पुत्र शनि पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र में स्थित थे। शुक्र पूर्व भाद्रपद में आरूढ़ था एवं परिघ नामक उपग्रह उत्तराभाद्रपद नक्षत्र में विद्यमान था। केतु नामक उपग्रह, धूम नामक उपग्रह के साथ, ज्येष्ठा नक्षत्र पर स्थित था। एक तिथि का क्षय हो कर 14 वें दिन, तिथि क्षय न होने पर 15 वें दिन और एक तिथि की वृद्धि होने पर अमावस्या का होना तो देखा गया है, लेकिन 13 वें दिन अमावस्या का होना नहीं देखा जाता। पूर्णिमा के बाद अमावस्या, जो 15 दिन बाद आती है, वह, तिथियों के क्षय होने के कारण, 13 दिन बाद ही आ गयी थी एवं 13 दिनों के अंदर चंद्र ग्रहण और सूर्य ग्रहण दोनों लग गये। राहु ने चंद्र और सूर्य दोनों को ग्रस रखा था। ग्रहण की यह अवस्था राजा और प्रजा दोनों का संहार दर्शा रही थी। चारों ओर धूल की वर्षा हो रही थी। भूकंप होने के कारण चारों सागर, वृद्धि को प्राप्त हो कर, अपनी सीमा को लांघते हुए से जान पड़ते थे। कैलाश, मंदराचल तथा हिमालय से शिखर टूट-टूट कर गिर रहे थे। इस प्रकार संपूर्ण पृथ्वी, जल एवं आकाश संसार के विनाश को दर्शा रहे थे। अंततः मार्गशीर्ष अमावस्या के अगले दिन, मार्गशीर्ष शुक्ल प्रतिपदा को, मूल नक्षत्र में महाभारत युद्ध 21 अक्तूबर, 3138 ई. पू. को प्रारंभ हुआ। यह गणना इंटरनेट पर डाॅ. पटनायक द्वारा दी गई ूूूण्हमवबपजपमेण्बवउध्दंतमदचध्ीपेजवतलध्पदविध्ूीमदण्ीजउ साइट से भी मिलती है। कहा जाता है कि 10 वें दिन भीष्म पितामह को अर्जुन के बाणों ने वेध दिया और महाभारत, केवल 18 दिन में पूरी पृथ्वी को तहसनहस कर, समाप्त हो गया। भीष्म पितामह, जिनको इच्छा मृत्यु का वरदान था, सूर्य के उत्तरायण में आने की प्रतीक्षा करते रहे और 58 रातें उन्होंने उसी बाण शैय्या पर बितायीं। तत्पश्चात माघ शुक्ल अष्टमी को, मध्याह्न के समय, रोहिणी नक्षत्र में वह परमात्मा में विलीन हो गये। महाभारत के 35 वर्ष उपरांत 36वें वर्ष, चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन, 18 फरवरी 3102 ई. पू. को श्री कृष्ण ब्रह्मस्वरूप विष्णु भगवान में लीन हो गये। उस समय श्री कृष्ण 125 वर्ष पूर्ण कर 126 वें वर्ष में चल रहे थे। जिस दिन भगवान पृथ्वी को छोड़ स्वर्ग सिधारे, उसी दिन महाबली कलि युग आ गया। निम्न श्लोक से यह पता चलता है कि महाभारत के 35 वर्ष पश्चात 36 वें वर्ष श्रीकृष्ण का देहावसान हुआ था। षटत्रिंशे त्वथ सम्प्राप्ते वर्षे कौरवनन्दनः। दर्श विपरीतानि निमित्तानि युधिष्ठिरः।। (श्रीमहाभारतम्, प्रथम अध्याय, श्लोक -1) जनमेजय ! महाभारत के पश्चात जब छत्तीसवां वर्ष प्रारंभ हुआ तब कौरववंदन युधिष्ठिर को कई तरह के अपशकुन दिखाई देने लगे। ज्योतिष में लगभग 36 वर्ष पश्चात पूर्व ग्रह स्थिति पुनः आ जाती है। यह एक सत्य है। क्योंकि गुरु 3 बार चक्र लगाकर वहीं स्थित हो जाता है। एवं राहु केतु भी 2 बार चक्र लगाकर वहीं स्थित हो जाते हैं। मंगल लगभग 18 बार अपना चक्र पुरा करता है। और सूर्य, बुध और शुक्र 36 बार चक्र पूरा कर लेते हैं। केवल शनि 1 चक्र पूरा कर 2 राशि आगे रहता है। अतः शनि को छोड़कर बाकी सभी ग्रहों की स्थिति लगभग वही देखने में आती है। ऐसा ही महाभारत के 36 वर्ष बाद हुआ जो यदुर्यवंशियों का काल बना। ये निम्न श्लोकों से विदित है। एवं पश्यन् हृषीकेशः सम्प्राप्तं कालपर्ययम्। त्रयोदश्याममावास्यां तान् दृष्टवा प्राब्रवीदिदम्।। (श्रीमहाभारते, द्वितीय अध्याय, श्लोक -18) इस तरह काल का उलट-फेर प्राप्त हुआ देख और त्रयोदशी तिथि को अमावस्या का संयोग जान भगवान श्री कृष्ण ने सब लोगों से कहा। चतुर्दशी पंचदशी कृतेयं राहुणां पुनः। प्राप्ते वै भारते युद्धे प्राप्ता चाद्य क्षयायं नः।। (श्रीमहाभारते, द्वितीय अध्याय, श्लोक -19) ‘वीरो ! इस समय राहु ने फिर चतुर्दशी को ही अमावस्या दिया है। महाभारतयुद्ध के समय जैसा योग था वैसा ही अब भी है। यह सब हम लोगों के विनाश का सूचक है। सृशन्नेव कालं तु परिचिन्त्य जनार्दनः। ते प्राप्तं स षट्त्रिंशं वर्षे वै केशिसूदनः।। (श्रीमहाभारते, द्वितीय अध्याय, श्लोक -20) इस प्रकार समय का विचार करते हुए केशिहन्ता श्रीकृष्ण ने उसका विशेष चिंतन किया, तब उन्हें मालूम हुआ कि महाभारत युद्ध के बाद यह छत्तीसवां वर्ष आ पहुंचा।। षटत्रिंशेऽथ ततो वर्षे वृष्णीनामनयो महान्। अन्योन्यं मुसलैस्ते तु निजघ्नुः कालचोदिताः।। (श्रीमहाभारते, तृतीय अध्याय, श्लोक -13) वैशम्पायनजी ने कहा - राजन् ! महाभारत युद्ध के बाद छत्तीसवें वर्ष वृष्णिवंशियों में महान् अन्यायपूर्ण कलह आरंभ हो गया। उसमें काल से प्रेरित होकर उन्होंने एक दूसरे को मूसलों (अरों) से मार डाला। कृष्ण के देहावसान के समय उनकी आयु 100 वर्ष से अधिक थी यह निम्न पंक्तियों से पता चलता है। तदतीतं जगन्नाथ वर्षाणामधिकं शतम्। इदानीं गम्यतां स्वर्गो भवना यदि रोचते।। (श्रीविष्णुपुराण, अध्याय-37, श्लोक -20) हे जगन्नाथ ! आपको भूमंडल में पधारे हुए सौ वर्ष से अधिक हो गये, अब यदि आपको पसंद आवे तो स्वर्गलोक पधारिये।। भुवो नाद्यापि भरोऽयं यादवैरनिबर्हितैः। अवतार्य करोम्येतत्सपतरात्रेण सत्वरः ।। (श्रीविष्णुपुराण, अध्याय-37, श्लोक -23) इन यादवांें का संहार हुए बिना अभी तक पृथ्वी का भार हल्का नहीं हुआ है। अतः अब सात रात्रि के भीतर (इनका संहार करके पृथ्वीका भार उतारकर मै। शीघ्र ही (जैसा तुम कहते हो) वहीं करूंगा। यदुवंशेऽवतीर्णस्य भवतः पुरुषोत्तम। शरच्छतं व्यतीताय पंचविंशाधिकं प्रभो।। (श्रीमद्भागवत, अध्याय-6, स्कंध-11, श्लोक-25) पुरुषोत्तम सर्वशक्तिमान् प्रभो ! आपको यदुवंश में अवतार ग्रहण किये एक सौ पचीस वर्ष बीत गये हैं। यस्मिन्दिने हरिर्यातो दिवं सन्त्यज्य मेदिनीम्। तस्मिन्नेवावतीर्णोऽयं कालकायो बली कलिः।। (श्रीविष्णुपुराण, अध्याय-38, श्लोक-8) जिस दिन भगवान् पृथ्वी को छोड़कर स्वर्ग सिधारे थे उसी दिन से वह मलिनदेह महाबली कलियुग पृथ्वी पर आ गया। यदा मुकुन्दो भगवानिमां महीं जहौ स्वतन्वा श्रवणीयसत्कथः। तदाहरेवाप्रतिबुद्धचेतसामधर्महेतुः कलिरन्ववर्तत।। (श्रीमद्भागवत, अध्याय-15, स्कंध-1, श्लोक-36) जिनकी मधुर लीलाएँ श्रवण करने योग्य हैं, उन भगवान श्रीकृष्ण ने जब अपने मनुष्य के से शरीर से पृथ्वी का परित्याग कर दिया, उसी दिन विचारहीन लोगों को अधर्म में फँसाने वाला कलियुग आ धमका। श्री कृष्ण ने जन्म के पश्चात लगभग 125 वर्ष 7 माह पृथ्वी पर राज्य किया एवं चैत्र शुक्ल प्रतिपदा शुक्रवार को 3102 ई.पू. में अपना शरीर त्यागा। उसी दिन, द्वापर युग समाप्त हो कर, कलि युग का प्रारंभ हुआ और आज कलि युग के 5105 वर्ष पूर्ण हो कर 5106 वां वर्ष चल रहा है। ज्योतिष रत्नाकर पुस्तक के अनुसार चैत्र प्रतिपदा शुक्रवार, तदनुसार 18 फरवरी 3102 ई.पू. को कलि युग का प्रारंभ हुआ। कलियुग 3102ई.पू. में ही प्रारंभ हुआ इसकी पुष्टि निम्न प्रकार से होती है- - प्रत्येक राजा के वर्ष-माह-दिन का विस्तृत वर्णन उपलब्ध है। युधिष्ठिर से विक्रमादित्य तक के चार राजवंशों के वर्षों की संख्या को जोड़ने पर योग 3,178 वर्ष होता है जो कलियुग का 3141वां, अथवा ईस्वी सन् का 39 वां वर्ष है। यह उस तिथि का द्योतक है जब विक्रमादित्य ने संसार का त्याग किया था। - काशी विश्वविद्यालय से प्रकाशित विश्व पंचांग एवं सोलन, हिमाचल प्रदेश के ‘‘विश्व विजय पंचांगम’’ के अनुसार विक्रम संवत् 2061 के पूर्व अर्थात सन् 2004 ई.तक 5,105 बीत चुके हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि कलियुग सन् 2004 ई. में अपने 5,105 वर्ष पूरे कर चुका है। वर्तमानोवैवस्वतमनुस्तस्य प्रवृत्तस्य सप्तविशतिमितानि महायुगानि व्यातीतानि अष्टाविशतितमे युगे, त्रयो युगचरणा गताः चतुर्थे चरणे कलौ कलेरारम्भतो नवनवत्युत्तरप´चसस्रमितानि 5105 वर्षाणि व्यतीतानि - महानतम खगोलविद तथा गणितज्ञ आर्यभट्ट का जन्म सन् 476 ई. में हुआ था। खगोलशास्त्र को उनकी देन विद्वानों का संबल है। उन्होंने 31416 का शुद्ध आंकड़ा उपलब्ध कराया। उनकी प्रसिद्ध कृति ‘‘आर्यट्टीय’’ सन् 499 ई. में पूरी हुई, जिसमें उन्होंने कलियुग के आरंभ के सही वर्ष का उल्लेख किया है- ‘‘जबकि तीन युग (सतियुग नेत्रायुग और द्वापर युग) बीत चुके हैं, कलियुग 60ग60 (3,600) वर्ष पार कर चुका है, मेरी आयु 23 वर्ष की हो चुकी है।’’ तात्पर्य यह कि कलियुग के 3,601 वर्ष पूरे होने के समय वह 23 वर्ष के थे। आर्यभट्ट का जन्म सन् 476 ई. में हुआ था। इस प्रकार, कलियुग का आरंभ (476$23) =3102 ई. पू. हुआ। - युधिष्ठिर के शासन से लेकर विक्रमादित्य के शासन काल तक हस्तिनापुर पर शासन करने वाले हिंदू राजाओं के 4 वंशों की तिथियों का कालानुक्रम इस बात का ठोस प्रमाण है कि महाभारत का युद्ध 5,000 वर्ष पहले ई. पू. 3139 को हुआ। कंप्यूटर द्वारा कलि युग के प्रारंभ होने की गणना करने पर यह ज्ञात होता है कि इसका प्रारंभ 18 फरवरी 3102 ई.पू. शुक्रवार को ही हुआ। अन्य पुस्तकों में भी कलि युग का प्रारंभ इसी दिन दिया गया है। अतः कलि युग के प्रारंभ होने की गणना में कोई मतभेद नहीं है। यदि कृष्ण की आयु को कलियुग के प्रारंभ काल से घटा कर जन्म तारीख निकाली जाए, तो उससे भी जन्म वर्ष 3228 ई.पू. ही आता है। अतः श्री कृष्ण केे जन्म काल में कोई मतभेद की गुंजाइश नहीं है और उनकी जन्म तिथि अवश्य ही 21 जुलाई 3228 ई.पू. है। श्री कृष्ण का जन्म आज से 5230 वर्ष पूर्व ही हुआ एवं सन् 2004 की जन्माष्टमी के दिन 5231 वर्ष पूर्ण हो कर 5232वां वर्ष आरंभ हुआ है। श्री कृष्ण की पत्री का विवेचन करें, तो लग्न का चंद्र उनको आकर्षण प्रदान करता है। गुरु और बुध की पंचम में युति एवं बुध का उच्च होना उनको वाक चातुर्य एवं बौद्धिक विलक्षणता प्रदान करता है। शनि सप्तम में बहुभार्या योग देता है। तीसरे भाव में राहु, मंगल और शुक्र का योग जीवन को संघर्षमय एवं युद्ध में लिप्त रखता है। नवम भाव में मकर का केतु तेजस्वी, प्रसिद्ध एवं जन्म स्थान से दूर रहने वाला बनाता है। जन्मांग के फल श्री कृष्ण के जन्मफल से पूर्णतया मिलते नजर आते हैं। अतः निःसंदेह कंप्यूटर द्वारा दी गई कुंडली ही श्री कृष्ण की जन्म एवं देहावसान की कुंडली हैं।


स्वास्थ्य और उपाय विशेषांक  अकतूबर 2004

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