दीपदान व्रत

दीपदान व्रत  

व्यूस : 3908 | मई 2006
दीपदान व्रत पं. ब्रजकिशोर शर्मा ‘ब्रजवासी’ र त ी य स ं स् कृ ित म े ं दीपदान व्रत की विशेष महिमा बताई गई है। जिस प्रकार घर में दीपक जलाने पर घर का अंधकार दूर हो जाता है उसी प्रकार भगवान के मंदिर में दीपदान करने वाले को भी अनंत पुण्यफल प्राप्त होते हैं। दीपदान व्रत कभी भी किसी भी दिन से आरंभ किया जा सकता है। अग्निदेव ने एक बार दीपदान के संबंध में महर्षि वशिष्ठ जी से कहा कि दीपदान व्रत योग और मोक्ष प्रदान करने वाला है। जो मनुष्य देवमंदिर अथवा ब्राह्मण के घर में एक वर्ष तक दीपदान करता है, वह सब कुछ प्राप्त कर लेता है। चातुर्मास्य में दीपदान करने वाला विष्णुभगवान के धाम, कार्तिक मास में दीपदान करने वाला स्वर्गलोक तथा श्रावण मास में दीपदान करने वाला भगवान शिव के लोक को प्राप्त कर लेता है। चैत्र मास में मां भगवती के मंदिर में दीप जलाने से निश्चय ही मां जगदंबा के नित्य धाम को प्राप्त कर वहां अनंत भोगों को भोगता है। दीपदान से दीर्घ आयु और नेत्र ज्योति की प्राप्ति होती है। दीपदान से धन और पुत्रादि की भी प्राप्ति होती है। दीपदान करने वाला सौभाग्य युक्त होकर स्वर्ग लोक में देवताओं द्वारा पूजित होता है। दीपदान करते समय निम्न मंत्र का उच्चारण अवश्य करें। ‘‘¬ अग्निज्योतिज्र्र्याेितरग्निः स्वाहा सूर्यो ज्योतिज्र्याेतिः सूर्यः स्वाहा। अग्निर्वर्चो ज्योतिर्वर्चः स्वाहा सूर्यो वर्चो ज्योतिर्वर्चः स्वाहा।। ज्योतिः सूर्यः सूर्यो ज्योतिः स्वाहा।। ¬ चंद्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत। श्रोत्राद्वायुश्च प्राणश्च मुखादग्निरजायत।। साज्यं च वर्तिसंयुक्तं वह्निना योजितं मया। दीपं गृहाण देवेश त्रौलोक्यतिमिरापहम्।। भक्त्या दीपं प्रयच्छामि देवाय परमात्मने। त्राहि मां निरयाद् घोराद् दीप ज्योतिर्नमो{स्तुते।। ¬ भूर्भुवः स्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः । ¬ श्रीमन्नारायणाय नमः। दीपं दर्शयामि। या पिफर जिस देवता का मंदिर हो उस देवता का नाम उच्चारण करके ही दीप समर्पित करें। विदर्भ राजकुमारी ललिता दीपदान के ही पुण्य से राजा चारु धर्मा की पत्नी हुई और उसकी सौ रानियों में प्रमुख हुई। उस साध्वी ने एक बार विष्णु मंदिर में सहस्र दीपों का दान किया। इस पर उसकी सपत्नियों ने उससे दीपदान का माहात्म्य पूछा। उनके पूछने पर उसने इस प्रकार कहा- बहुत पहले की बात है, सौवीरराज के यहां मैलेय नामक पुरोहित थे। उन्हा.ेंने देविका नदी के तट पर भगवान श्रीविष्णु का मंदिर बनवाया। कार्तिक मास में उन्होंने दीपदान किया। बिलाव के डर से भागती हुई एक चुहिया ने अकस्मात अपने मुख के अग्रभाग से बत्ती के बढ़ने से वह बुझता हुआ दीपक प्रज्वलित हो उठा। मृत्यु के पश्चात वही चुहिया राजकुमारी हुई और राजा चारुधर्मा की सौ रानियों में पटरानी हुई। इस प्रकार मेरे द्वारा बिना सोचे-समझे जो विष्णु मंदिर के दीपक की बाती बढ़ा दी गई; उसी पुण्य का मैं फल भोग रही हूं। इसी से मुझे अपने पूर्व जन्म की स्मृति भी है। इसलिए मैं हमेशा दीपदान किया करती हूं। एकादशी को दीपदान करने वाला स्वर्गलोक में विमान पर आरूढ़ होकर प्रमुदित होता है। मंदिर का दीपक हरण करने वाला गूंगा अथवा मूर्ख हो जाता है। वह निश्चय ही ‘अंधतामिस्त्र’ नाम के नरक में गिरता है जिसे पार करना दुष्कर है। अग्निदेव कहते हैं- ‘ललिता की सौतें उसके द्वारा कहे हुए इस उपाख्यान को सुनकर दीपदान व्रत के प्रभाव से स्वर्ग को प्राप्त हो गईं। इसलिए दीपदान सभी व्रतों से विशेष फलदायक है। धनतेरस के दिन यमुनास्नान करके यमराज और धन्वन्तरि का पूजन-दर्शन कर दीपदान करने से मनुष्य की कभी अकाल मृत्यु नहीं होती और मनुष्य स्वस्थ जीवन को प्राप्त होता है। नरक चतुर्दशी के दिन प्रदोष काल में चार बत्तियों वाला दीपक जलाने से पापों की निवृत्ति होती है तथा नरक नहीं जाना पड़ता। दीपावली के दिन महालक्ष्मी के निमित्त किए गए दीपदान से महालक्ष्मी प्रसन्न होती हैं एवं घर में धन-धान्य की वृद्धि होती है, जो प्रत्येक पूर्णमासी

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रुद्राक्ष एवं सन्तान गोपाल विशेषांक  मई 2006

ऐसा माना जाता है कि रुद्राक्ष की उत्पत्ति भगवान शिव के अश्रु कणों से हुई है। ज्योतिष में प्रचलित अनेक उपायों में से रुद्राक्ष का उपयोग ग्रहों की नकारात्मकता एवं इनके दोषों को दूर करने के लिए किया जाता है ताकि पीड़ा को कमतर किया जा सके। अनेक प्रकार के रुद्राक्षों को या तो गले में या बांह में धारण किया जाता है। रुद्राक्ष अनेक प्रकार के होते हैं। इनमें से अधिकांश रुद्राक्षों का नामकरण उनके मुख के आधार पर किया गया है जैसे एक मुखी, दो मुखी, तीन मुखी इत्यादि। इस विशेषांक में रुद्राक्ष के अतिरिक्त सन्तान पर भी चर्चा की गई है। इस विशेषांक के विषय दोनों है। इसमें रुद्राक्ष एवं संतान दोनों के ऊपर अनेक महत्वपूर्ण आलेखों को सम्मिलित किया गया है जैसे: रुद्राक्ष की उत्पत्ति एवं महत्व, अनेक रोगों में कारगर है रुद्राक्ष, सन्तान प्राप्ति के योग, कैसे जानें कि सन्तान कितनी होंगी, लड़का होगा या लड़की जानिए स्वर साधना से, सन्तान बाधा निवारण के ज्योतिषीय उपाय, इच्छित सन्तान प्राप्ति के सुगम उपाय, सन्तान प्राप्ति के तान्त्रिक उपाय आदि। इन आलेखों के अतिरिक्त दूसरे भी अनेक महत्वपूर्ण आलेख अन्य विषयों से सम्बन्धित हैं। इसके अतिरिक्त पूर्व की भांति स्थायी स्तम्भ भी संलग्न हैं।

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