शरीर के लिए उपयोगी है मालिश

शरीर के लिए उपयोगी है मालिश  

युर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा का मूल आधार है ‘मालिश’! मालिश को अंग्रेजी में मसाज कहते हैं। मसाज शब्द अरबी भाषा के मास्स शब्द से बना है जिसका अर्थ होता है ‘मांसपेशियों को दबा कर अथवा उनसे खेल करने की कला। विभिन्न प्राणियों में मालिश अभिन्न रूप से जुड़ी हुई है। बच्चे के जन्म लेते ही मां उसे सहलाती, थपथपाती है ताकि बच्चे का शीघ्र विकास हो और वह सुडौल, स्वस्थ व सुदृढ़ हो। बच्चों को धूप में बैठाकर मालिश करने की परंपरा लगभग सभी धर्माें, देशों के परिवारों में देखी जा सकती है। पशु-पक्षी भी अपने बच्चों को जन्म के बाद जीभ, चोंच या पंखों से सहलाते हैं। मालिश का तेल: मालिश के लिए नारियल, सरसों, तिल, जैतून के तेल अच्छे रहते हंै। जाड़ों में सरसों या तिल के तेल की मालिश करना अच्छा रहता है। गर्मियों में अथवा अति-अम्लता व चर्म रोग के रोगियों के लिए नारियल व जैतून तेल की मालिश उत्तम है। जैतून, बादाम का तेल व मक्खन बच्चों, दुर्बल व्यक्तियों व तपेदिक के रोगियों के लिए उत्तम हैं। कद्दू का तेल सिर को तरावट देता है व मस्तिष्क को मजबूत करता है। विधि: दुर्बल व्यक्ति व रोगी को आधा घंटा व स्वस्थ तथा मोटे व्यक्ति को 45 मिनट से एक घंटा मालिश दी जा सकती है। मालिश आरंभ करते समय पहले पैरों व हाथों की मालिश करें, उसके बाद छाती, फिर पेट, यकृत व पीठ की मालिश करें। इसके बाद नितंब और अंत में सिर की मालिश करनी चाहिए। साधारणतः पेट पर कभी भी जोर से मालिश करना उचित नहीं है। पतले दस्त, आंव, अल्सर, उच्च रक्तचाप, आंत्र पुच्छ की सूजन, पेट में गांठ, हर्निया, स्त्रियों के मासिक धर्म व गर्भावस्था के दौरान मालिश करना वर्जित है। मालिश से लाभ: मालिश एक प्रकार का निष्क्रिय व्यायाम है, अतः जो लोग व्यायाम नहीं कर सकते उन्हें मालिश द्वारा व्यायाम का लाभ दिया जा सकता है। मालिश से रक्त संचार बढ़ने से त्वचा लचीली, कोमल, सुंदर व झुर्रियों रहित हो जाती है, बुढ़ापा व थकान दूर होते हंै, शरीर में ताजगी व उत्साह भर जाते हैं। शरीर सुंदर, बलवान, प्रियदर्शी होता है तथा बुढ़ापे के लक्षण दूर होते हंै। - मालिश द्वारा नाड़ी संस्थान पर शामक प्रभाव पड़ता है। चूंकि शरीर में विभिन्न अंग स्नायुओं द्वारा ही नियंत्रित होते हैं अतः शरीर हल्का होकर मस्तिष्क में तरावट, नींद आ जाती है। - मालिश से रक्तसंचार तीव्र हो जाता है जिससे शरीर से दूषित पदार्थ और मल निष्कासक अंगों को बल मिलने पर तेजी से बाहर निकल जाते हैं। - मालिश द्वारा पाचन तंत्र, बड़ी और छोटी आंत, यकृत, अग्नाशय आदि को शक्ति मिलती है। - मालिश से मांसपेशियों के कार्य करने की शक्ति बढ़ती है, उनमें लचक आती है तथा विकास होता है, उनका आकार बना रहता है, उनका ढीलापन, लटकना व झुर्रियां समाप्त हो जाती हैं। - मालिश से लसिका ग्रंथि नलिकाओं की कार्यक्षमता बढ़ जाती है जिससे शरीर के पोषक तत्व ग्रहण करने की क्रिया में वृद्धि होती है। हड्डियों को भी पोषक तत्व अधिक मिलने से अस्थियों का विकास होता है, बच्चों को सूखा रोग नहीं होता। - मालिश से दोनों फेफड़े मजबूत होते है। पीठ की मालिश से गुर्दों की कार्य क्षमता बढ़ती है, रक्त साफ होता है एवं अवांछनीय यूरिया अम्ल बाहर निकल जाता है। - मालिश से त्वचा द्वारा खूराक सीधे शरीर को मिलती है। अतः जब रोगी आहार ग्रहण नहीं करता तब मालिश द्वारा पोषण प्रदान किया जा सकता है। - आजकल जब रोग आसाध्य व जटिल होते जा रहे हैं तब मालिश द्वारा रोगों को ठीक करने में अत्यंत सहायता मिलती है। शरीर के अनेक रोग अनिद्रा, टांसिलाइटिस, अजीर्ण, कब्ज, गठिया, बच्चों का पोलियो, तपेदिक, सिरदर्द, मोच, मोटापा, मधुमेह, साइटिका, कमरदर्द, स्नायुशूल, गठिया आदि में मालिश से लाभ होता है। - सौदर्य उपचारों का प्रधान अंग है फेशियल जिसमें मुख व गले की मालिश ही प्रमुख भाग हंै। मालिश द्वारा चेहरे व गले को अत्यंत आराम मिलता है। चेहरे की सुंदरता, चमक व आंखों की रोशनी बढ़ती है। मुहांसे नहीं होते। सिर की मालिश से बाल मजबूत और काले, स्मरण शक्ति की वृद्धि व ज्ञानेन्द्रियों के केंद्र पुष्ट होते हैं। बालों की सुबह-शाम पांच मिनट मालिश करनी चाहिए। इसी प्रकार पूरे बदन की मालिश नहाने से पूर्व स्वयं ही दस मिनट दिनचर्या का हिस्सा मानकर उपयुक्त तेल से अवश्य करनी चाहिए। यह हमेशा हर उम्र में युवा बनाए रखेगी।


रत्न विशेषांक  फ़रवरी 2006

हमारे ऋषि महर्षियों ने मुख्यतया तीन प्रकार के उपायों की अनुशंसा की है यथा तन्त्र, मन्त्र एवं यन्त्र। इन तीनों में से तीसरा उपाय सर्वाधिक उल्लेखनीय एवं करने में सहज है। इसी में से एक उपाय है रत्न धारण करना। ऐसा माना जाता है कि कोई न कोई रत्न हर ग्रह से सम्बन्धित है तथा यदि कोई व्यक्ति वह रत्न धारण करता है तो उस ग्रह के द्वारा सृजित अशुभत्व में काफी कमी आती है। फ्यूचर समाचार के इस विशेषांक में अनेक महत्वपूर्ण आलेखों को समाविष्ट किया गया है जिसमें से प्रमुख हैं- चैरासी रत्न एवं उनका प्रभाव, विभिन्न लग्नों में रत्न चयन, ज्योतिष के छः महादोष एवं रत्न चयन, रोग भगाएं रत्न, रत्नों का शुद्धिकरण एवं प्राण-प्रतिष्ठा, कितने दिन में असर दिखाते हैं रत्न, लाजवर्त मणि-एक नाम अनेक काम इत्यादि। इसके अतिरिक्त स्थायी स्तम्भों के भी महत्वपूर्ण आलेख विद्यमान हैं।

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