रीढ़ संबंधी रोगों में लाभकारी आसन

रीढ़ संबंधी रोगों में लाभकारी आसन  

रीढ़ संबंधी रोगों में लाभकारी आसन याग अपने को जानने की एक ऐसी कला है, जिसके द्वारा शरीर, मन और आत्मा का शोधन होता है। इसका सरल अभ्यास हमें हर प्रकार से स्वस्थ और चिंतनशील बनाता है। इसे आठ वर्ष के बच्चे से लेकर 100 वर्ष के वृद्ध व्यक्ति तक कर सकते हैं। यहां हम जिन योगासनों की बात कर रहे हैं, उनसे हाथ पैरों के दर्द, रीढ़ संबंधी बीमारियांे एवं मानसिक तनाव में लाभ मिलता है। गरुड़ासन इस आसन को करने के लिए पहले सीधे खड़े हो जाएं। एक पांव पर दूसरा पांव ऐसे लपेटें जैसे वृक्ष पर बेल होती है। हाथ भी एक-दूसरे के साथ वैसे ही लपेटें। दोनों हाथों की हथेलियां एक-दूसरे को स्पर्श करने चाहिए। इस आसन में एक पांव सीधा होता है और दूसरा उस पर लिपटा हुआ होता है। इस लिपटे हुए पांव का अंगूठा जमीन से लगाने का यत्न करें। ऐसा करने से इस आसन का संपूर्ण लाभ प्राप्त होता है। प्रारंभ में यह आसन करना थोड़ा कठिन हो सकता है। प्रारंभ में आप किसी का सहारा ले सकते हैं, परंतु अभ्यास करते रहने से यह कुछ ही समय बाद सहज प्रतीत होने लगता है। दोनों पावों और हाथों के हेर-फेर से यह आसन करना चाहिए। गर्भवती स्त्रियां यह आसन न करें। गरुड़ासन से पांवों और हाथों के सब स्नायुओं पर अच्छी प्रकार खिंचाव आता है, इसलिए वे स्वस्थ होते हैं। घुटनों तथा पांवों के दर्द में भी यह आसन लाभकारी है। पादांगुष्ठासन एक पांव की एड़ी को गुदा के बीच में लगाकर उसी पर संपूर्ण शरीर का भार संभालकर बैठें और दूसरा पांव घुटने के ऊपर रखें, सहारे के लिए चाहें तो एक हाथ दीवार पर अथवा चैकी पर रख सकते हैं अथवा हाथों को जमीन पर लगाकर सहारा ले सकते हैं। वास्तव में यह आसान पैर के पंजे पर संतुलन बनाने की एक प्रक्रिया है। जैसा कि सभी जानते हैं, संतुलन एकाग्रता और आत्मविश्वास को बढ़ाने का एक महत्वपणर््ू ा कारक है। यदि आप पांच से दस सेकण्ड तक इस आसन में रहें तो आपको एक नई उपलब्धि का अनुभव होगा। संतुलन शरीर और मन की स्वाभाविक स्थिति है। यह स्वाभाविक स्थिति आपको दिन भर के तनाव एवं थकान से मुक्त रखने में सहायक सिद्ध होती है। आपके उठने-बैठने के ढंग से उत्पन्न विकार की क्षतिपूर्ति करने हेतु यह आसन उत्तम है। यह आसन कितना आरामदेह है इसका अनुभव आपको सही स्थिति में आते ही होना शुरू हो जाता है। संतुलित मुद्रा में आते ही आपको एक अद्भुत आनंद का अनुभव होगा। संतुलन बनाने के लिए आप किसी वस्तु पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं, इससे आपको सहयोग प्राप्त होगा। वास्तव में यह आसन पैर के अंगूठे पर अपने संपूर्ण शरीर का भार डालकर बैठने से पूर्ण होता है। अतः इसे गरुड़ासन पादांगुष्ठासन कहा गया है। दूसरे पैर का अंगूठा भी जमीन को स्पर्श करे, यह ध्यान रखना चाहिए। इस आसान का संपूण्र् ा लाभ प्राप्त करने के लिए इस मुद्रा में कम से कम पांच से दस सेकण्ड तक बने रहें। अर्द्धमत्स्येन्द्रासन आराम से किसी चटाई पर आगे की ओर पैर फैलाकर बैठ जाएं। अब दाहिने पैर को घुटने से मोड़कर बायें पैर के घुटने की बायीं तरफ सीधा रखें तथा बायां पैर मोड़कर अपने दाहिने नितम्ब के नीचे रख लें। इतना करने के बाद बायें हाथ को दाहिने पैर के घुटने और छाती के बीच से होते हुए अपने को कमर से दाहिने ओर मोड़ने का पूरा प्रयास करें। मोड़ते समय श्वास पूरी तरह बाहर कर दें। ठीक इसी प्रकार दूसरे पैर से भी करने पर अद्धर् - मत्स्येन्द्रासन का एक चक्र पूरा होगा। इस प्रकार आप इसे चार बार कर सकते हैं। ध्यान रखें कि यह आसन जितना जटिल है, उतना ही लाभकारी भी। यह आसन संपूर्ण शरीर का आसन है। इसके अभ्यास से प्राकृतिक रूप से शरीर में इंसुलिन का स्राव होता है, जो मधुमेह (डाइबिटीज) रोगियों के लिए लाभकारी है। इसके अभ्यास से स्पां. डलाइटिस व रीढ़ संबंधी बीमारियों में भी बहुत लाभ मिलता है। ऊपर वर्णित आसनों को करने के बाद दस मिनट के लिए शवासन का अभ्यास अवश्य करें क्योंकि आसनों के करने से शरीर में प्राण शक्ति का प्रवाह अत्यंत ही तीव्र हो जाता है और शरीर थकान का अनुभव करने लगता है। शवासन में लेट जाने से समस्त थकान दूर हो जाती है और मन में असीम शांति का बोध होता है। शवासन के लिए किसी भी चटाई पर पूरे शरीर को ढीला छोड़कर लेट जाएं और एक गहरी श्वास के साथ आंखें बंद कर लें। अब धीरे-धीरे अपने सभी अंगों का अनुभव करें और मन से चिंतन करें कि सभी अंग निरंतर ढीले हो रहे हैं। ऐसा करते हुए अंत में अपने मन को सहज रूप से श्वास के साथ जोड़ दें। थोड़ी ही देर में पूरे शरीर में आराम और मन में शांति का आभास होगा। अब धीरे-धीरे शरीर को जाग्रत करें, हल्का-हल्का तनाव दें और गहरी श्वास के साथ आराम से उठकर बैठें और आंखें खोलें।



काल सर्प योग विशेषांक   जून 2007

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