कामदा एकादशी व्रत

कामदा एकादशी व्रत  

व्यूस : 3994 | जून 2007
कामदा एकादशी व्रत पं. ब्रज किशोर ब्रजवासी काम द ा , ए क ा द श् ा ी व ्र त पुरुषोŸाम मास (अधिकमास या मलमास) में करने का विधान है। इसे पद्मिनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। एक समय धर्मावतार धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण को सानंद सिंहासनारूढ़ देखकर उनके चरणों में नतमस्तक हो पूछा- ‘हे देवकीनंदन! यशोदा मां के दुलारे! मैं पुरुषोŸाम मास के कृष्ण पक्ष की कामदा एकादशी का माहात्म्य सुनना चाहता हूं। इसका क्या विधान है? किस देवता की पूजा की जाती है? इसका फल क्या है? कृपया बताइए!’ भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- ‘नृपश्रेष्ठ धर्मराज! बंधन से मुक्त करने वाली, विजय दिलाने वाली तथा पापों को ध्वस्त कर देने वाली मलमास के कृष्ण पक्ष की कामदा एकादशी व्रत में दशमी को शुद्ध चिŸा हो सूर्य के अस्त होने से पूर्व दिन में एक बार भोजन करें। रात्रि में भोजन का त्याग करें। दशमी को कांस्य के बर्तन में भोजन, उड़द, मसूर, चना, कोंदो, सब्जी, शहद, दूसरे घर का भोजन और मैथुन का त्याग करें। मन को और इंद्रियों को वश में रखते हुए प्रभु स्मरण करते हुए रात्रि में विश्राम करें। प्रातःकाल ब्राह्ममुहूर्त में जागकर नित्य नैमिŸिाक कार्यों से निवृŸा होकर एकादशी व्रत का संकल्प करें- ‘हे भगवान! आज मैं निराहार रहकर दूसरे दिन भोजन करूंगा, मेरे आप ही सहायक हैं यह प्रार्थना कर राधा-कृष्ण तथा शिव पार्वती का गणेश और नवग्रहादि देवताओं की प्रतिष्ठा सहित षोडशोपचार पूजन करें। भगवान की दिव्य लीला चरित्रों का श्रवण एवं मंत्रों का जप करें। रात्रि में जागरण व संकीर्तन करें। द्वादशी में पुनः विधिपूर्वक पूजनादि कृत्यों के बाद पंच महायज्ञों का अनुष्ठान करते हुए ब्राह्मणों को सुस्वादिष्ट पकवानों व मिष्टान्नों से तृप्तकर द्रव्य दक्षिणादि देकर विदा करें। फिर स्वयं बंधु-बांधवों के साथ भगवत प्रसाद ग्रहण करें। जिसने कामदा एकादशी का व्रत कर लिया मानो उसने सब व्रत कर लिए। अब इस पद्मिनी एकादशी की मनोरम कथा आपको सुनाता हूं। एक समय कार्तवीर्य राजा ने रावण को परास्त कर बंदीगृह में बंद कर रखा था। उसे पुलस्त्य ऋषि ने कार्तवीर्य से विनय करके छुड़ाया। इस घटना को सुनकर देवर्षि नारद जी ने पुलस्त्य जी से पूछा- ‘भगवन! जिस पराक्रमी रावण ने सभी देवताओं सहित देवराज इंद्र को जीत लिया था उसे कार्तवीर्य ने किस प्रकार जीतकर बंदी बनाया, सो आप मुझे विस्तारपूर्वक बताया।’ तब पुलस्त्य जी ने कहा- ‘देवर्षि! पूर्व काल में त्रेतायुग में हैहय राजा के वंश में कृतवीर्य नाम का राजा महिष्मती पुरी में राज्य करता था। उस राजा की एक हजार परमप्रिय, रूपवती एवं गुणशालिनी स्त्रियां थीं, परंतु उनमें से किसी के कोई पुत्र नहीं था, जो राज्य भार को संभाल सके। देवता, पितर, सिद्ध तथा अनेक चिकित्सकों आदि से राजा ने पुत्र प्राप्त हेतु प्रयत्न किए परंतु भाग्यवश राजा के कोई पुत्र नहीं हुआ। पुत्र के बिना राजा को राज्य दुखमय प्रतीत होता था। अत्यंत दुखी राजा को यह ज्ञान उत्पन्न हुआ कि तप से सब अभीष्ट फलों की सिद्धि हो सकती है। यथा- तपबल तें जगसृजइ बिधाता। तपबल विष्नु भए परित्राता।। तपबल संभु करहिं संघारा। तप तें अगम न कछु संसारा।। जनि आचरजु करहु मन माहीं। सुत तपतें दुर्लभ कछु नाहीं।। (रा.च.मा.बा.का. दोहा-162) तप का विचार आते ही राजा तपस्या हेतु वन को चल दिया। राजा को अकेले वन जाते हुए देखकर उसकी एक परमप्रिय रानी इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न हुए राजा हरिश्चंद्र की पद्मिनी नामक कन्या उसके साथ जाने को तैयार हो गई और दोनों ने अपने अंग के सभी सुंदर वस्त्राभूषणों को त्यागकर वल्कलवस्त्र धारण कर गंधमादन पर्वत पर जाकर दस हजार वर्षों तक कठोर तप किया। परंतु फिर भी पुत्र का सुख प्राप्त नहीं हुआ। तब उस पतिव्रता रानी पद्मिनी ने अपने पति के शरीर में केवल चमड़ा और अस्थिमात्र शेष देखकर महासाध्वी अनुसूयाजी से नम्रतापूर्वक पूछा- ‘हे साध्वी! मेरे स्वामी को तपस्या करते हुए दस हजार वर्ष बीत गए परंतु भगवान फिर भी किसी तरह से प्रसन्न न हुए। सो आप कृपा करके कोई ऐसा उपाय बताएं जिससे भगवान मुझ पर प्रसन्न हों और मेरे चक्रवर्ती पुत्र उत्पन्न हो।’ उस कमलनयनी पद्मिनी से अनुसूयाजी बोलीं- ‘हे सुंदरी! अधिक मास में शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष की दो एकादशी होती हैं, उनमें कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम कामदा एकादशी है। तुम जागरण सहित पूर्ण विधि से उसका व्रत करो। इस व्रत के कारण पुत्र प्रदाता श्रीहरि तुम पर प्रसन्न होकर शीघ्र ही पुत्र देंगे।’ अनुसूयाजी से व्रत की संपूर्ण विधि को जानकर पुत्र की कामना वाली रानी ने भाव सहित व्रत किया। तब भगवान विष्णु प्रसन्न होकर गरुड़ पर सवार होकर उसके पास आए और वर मांगने के लिए कहा। श्रीहरि विष्णु भगवान की दिव्य वाणी सुनकर उस पतिव्रता ने स्तुति करते हुए प्रार्थना की- ‘भगवन! आप मेरे पति को वरदान दीजिए।’ तब भगवान बोले- ‘हे सुंदरी! मलमास के समान मुझे दूसरा कोई मास प्रिय नहीं। उसमें प्रीति को बढ़ाने वाली कामदा एकादशी का व्रत तुमने अनुसूयाजी के वचनानुसार किया है तथा जागरण भी किया है। इस एकादशी से अधिक प्रिय मुझे कुछ भी नहीं है। मैं तुम पर अत्यधिक प्रसन्न हूं।’ ऐसा कहकर संसार के प्राणियों को आनंद प्रदान करने वाले भगवान श्री विष्णु ने राजा से कहा- ‘हे राजन! जिससे आपका मनोरथ सिद्ध हो वह वर मांग लें, मैं अत्यंत प्रसन्न हूं।’ तब राजा ने श्री हरि भगवान की स्तुति व प्रार्थना करते हुए विशाल हृदय व अतुलित बल संपन्न भुजाओं वाले पुत्र का वर मांगा और कहा- ‘प्रभो! यह पुत्र ऐसा हो कि आपके अतिरिक्त देवता, मनुष्य, नाग, दैत्य, राक्षस आदि किसी से भी मृत्यु को प्राप्त न हो।’ राजा की यह बात सुनकर भगवान वर देकर अंतर्धान हो गए। इसी वर के प्रभाव से पद्मिनी के कार्तवीर्य पुत्र पैदा हुआ। तीनों लोकों में भगवान के अतिरिक्त उसे जीतने में कोई समर्थ नहीं था। तब यदि लंकाधिपति दशकंधर रावण कार्तवीर्य से पराजित हो गया तो आश्चर्य की क्या बात है क्योंकि कार्तवीर्य का जन्म देवताओं के आराध्य श्री विष्ण् ाु भगवान के वरदान का फल है। इतना कहकर महात्मा पुलस्त्य अपने आश्रम को चले गए।’ श्रीकृष्ण कहने लगे- ‘हे पांडुनंदन युधिष्ठिर! जो अधिक मास की एकादशी का माहात्म्य तुमने पूछा था सो सब मैंने तुमसे कहा। जो मलमास के कृष्णपक्ष की एकादशी का व्रत करते हैं एवं संपूर्ण कथा पढ़ते या सुनते हैं, वे भी यश के भागी होकर भगवान विष्णु के वैकुंठ लोक को प्राप्त हो जाते हैं। श्रीहरि उन भक्तों के हृदय मंदिर में आकर विराजमान हो जाते हैं।

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