जन्म काल के योग का महत्त्व

जन्म काल के योग का महत्त्व  

जन्म काल के योग का महत्व शिव प्रसाद गुप्ता फलित ज्याेि तष म ंे समय विशष्े ा की जानकारी हेतु पंचांग का प्रयोग आवश्यक होता है। पंचांग के पांच अंग हैं- वार, तिथि, नक्षत्र, योग और करण। पृथ्वी से दूरी के घटते क्रम में शनि, गुरु, मंगल, सूर्य, शुक्र, बुध और चंद्र स्थित हैं अर्थात शनि सबसे दूर है और चंद्र सबसे नजदीक। चूंकि सृष्टि के आरंभ में सबसे पहले सूर्य (प्रकाश स्रोत) दृष्टिगोचर हुआ इसलिए सूर्य के पहली होरा के स्वामी होने के कारण पहला दिन रविवार होता है। एक होरा एक घंटे की होती है जो ऊपर वर्णित दूरी के क्रम के अनुसार होती है। जिस दिन की प्रथम होरा का जो ग्रह स्वामी होता है उस दिन उसी ग्रह के नाम का वार होता है। इस प्रकार दिनों में रविवार, सोमवार, मंगलवार, बुधवार, गुरुवार, शुक्रवार और शनिवार का क्रम होता है। ज्योतिषीय गणना में ग्रहों के फल विचार हेतु पृथ्वी को स्थिर मानकर सूर्य एवं अन्य ग्रहों की सापेक्ष गति के परिपे्रक्ष्य में उनकी स्थिति का निर्धारण किया जाता है। योग व नक्षत्र 27 होते हैं। तिथियां शुक्ल पक्ष की 15 एवं कृष्ण पक्ष की 15 इस प्रकार कुल 30 होती हैं। चूंकि परिभ्रमण पथ 3600 का होता है इसलिए इसका 27वां भाग 130 20‘ और 30 वां भाग 120 होता है। अस्त,ु वार के अतिरिक्त पंचांग के अन्य अंगों का निर्धारण निम्न लिखित सूत्रों से किया जा सकता है। करण = एक तिथि का आधा भाग (कुल 11 करण होते हैं) योग का आशय दो वस्तुओं के मेल से है। सूर्य एवं चंद्र के राश्यांश के जोड़ से जो बिंदु मिलता है वह पंचांग गणना मंे उस समय का योग कहलाता है। चूंकि योग 27 होते हैं इसलिए एक योग का भी दायरा 13020’ का रहता है। चूंकि नक्षत्र भी 27 होते हैं इसलिए एक नक्षत्र का भी दायरा 130 20’ का होता है। किंतु अंतर यह है कि नक्षत्र का निर्धारण केवल सूर्य के राश्यांश से होता है जबकि (कुल 11 करण होते हैं) योग का आशय दो वस्तुओं के मेल से है। सूर्य एवं चंद्र के राश्यांश के जोड़ से जो बिंदु मिलता है वह पंचांग गणना मंे उस समय का योग कहलाता है। चूंकि योग 27 होते हैं इसलिए एक योग का भी दायरा 13020’ का रहता है। चूंकि नक्षत्र भी 27 होते हैं इसलिए एक नक्षत्र का भी दायरा 130 20’ का होता है। किंतु अंतर यह है कि नक्षत्र का निर्धारण केवल सूर्य के राश्यांश से होता है जबकि योग का निर्धारण सूर्य एवं चंद्र दोनों के योग के संयुक्त राश्यांशों से किया जाता है। इसलिए वस्तुतः योग का समय (अवधि) नक्षत्र के समय (अवधि) से अपेक्षाकृत कम रहता है। चूंकि राशियों की संख्या 12 है इसलिए एक राशि का दायरा 300 का होता है। राश्यांश के आधार पर नक्षत्र एवं योग का क्रम निम्नानुसार होता है। जन्म कुंडली में इन योगों के विषय में सामान्यतः ध्यान नहीं दिया जाता है किंतु यह बात विशेष रूप से ध्यान में रखने योग्य है कि जीवन में घटित होने वाली घटनाओं के काल निर्धारण में जन्म समय में उपस्थित योग की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। प्रत्येक योग के लिए एक विशिष्ट ग्रह शुभ पभ््र ााव दने े वाला आरै एक विशिष्ट गह्र अशुभ प्रभाव देने वाला होता है। शुभ प्रभाव देने वाले योगकारक ग्रह को योगी ग्रह एवं अशुभ प्रभाव देने वाले ग्रह को अवयोगी ग्रह संक्षेप में कह सकते हैं। इनकी गणना निम्नानुसार की जा सकती है। योगी ग्रह: योगी ग्रह योग विशेष के अधिष्ठित नक्षत्र का अधिपति होता है। चूंकि प्रथम योग बिंदु पुष्य नक्षत्र के प्रारंभ बिंदु अर्थात 93020’ पर होता है इसलिए योग के राश्यांश में 93020’ जोड़ने पर जो बिंदु आता है, वह उस नक्षत्र विशेष का अधिष्ठित नक्षत्र होता है और उसका अधिपति योगी ग्रह। यह बिंदु जिस राशि में होता है उस राशि का अधिपति उसका सहयोगी ग्रह बन जाता है। अवयोगी ग्रह: योग विशेष के अधिष्ठित नक्षत्र से छठे नक्षत्र का अधिपति अवयोगी ग्रह होता है। अस्तु, सूर्य एवं चंद्र के राश्यांश अर्थात योग के राश्यांश में 93020’ के अतिरिक्त 66040’ अर्थात 1600 जोड़ने पर जो बिंदु आता है, वह उस योग विशेष के अधिष्ठित नक्षत्र से छठा नक्षत्र (अवयोगी नक्षत्र) हुआ जिसका अधिपति उस योग विशेष के लिए अवयोगी ग्रह होगा। जैसा कि नाम से स्पष्ट है, योगी एवं सहयोगी ग्रह जिस भाव में स्थित रहते हैं या जिस भाव को देखते हैं उस भाव के सकारात्मक प्रभाव में वृद्धि तथा नकारात्मक प्रभाव को कम करते हैं। ये जिस ग्रह के साथ स्थित होते हैं या जिस ग्रह को देखते हैं उसके शुभ प्रभाव को बढ़ाते हैं। इसके विपरीत अवयोगी ग्रह संबंधित भाव और ग्रह के शुभ सकारात्मक प्रभाव को कम करते हैं तथा अशुभ नकारात्मक प्रभाव को बढ़ाते हैं और सफलता में व्यवधान उत्पन्न करते हैं। वस्तुतः योगी एवं अवयोगी ग्रह उत्प्रेरक के रूप में कार्य करते हैं। इनकी भूमिका केवल जन्मस्थिति के अनुसार ही सीमित नहीं है अपितु गोचर में भी इनका प्रभाव स्पष्टतः परिलक्षित होता है। अब कुछ जन्मकुंडलियों की सहायता से योगी एवं अवयोगी ग्रहों की भूमिका देखते हैं। में चंद्र के राश्यांश (4-260-03’-02’’) जोड़ने पर 1-110-16’-21’’ प्राप्त होते हैं जिनके अनुसार जातक का जन्म सौभाग्य योग में हुआ। इन राश्यांशों में 930 20’ जोड़ने पर राश्यांश 4-140-36’ 21’’ प्राप्त होते हैं जो सिंह राशि व पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र में है। पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र का अधिपति शुक्र जातक के लिए योगी और सिंह राशि का अधिपति सूर्य सहयोगी ग्रह हुआ। सौभाग्य योग के राश्यांश (1-110-16’-21’’) में 1600 जोड़ने पर 6-210-16’ 21’’ राश्यांश प्राप्त होते हैं जो विशाखा नक्षत्र के अंतर्गत है जिसका अधिपति गुरु जातक के लिए अवयोगी ग्रह हुआ। योगी ग्रह कर्मेश व पराक्रमेश होकर पंचम भाव में लग्नेश सूर्य व धनेश लाभेश बुध के साथ है। इसके फलस्वरूप बुद्धि, भाग्य, कर्म के सुसंयोग से जातक ने आशातीत उन्नति की और ऐश्वर्य व धन अर्जित किया। गुरु के अवयोगी ग्रह होने तथा उसकी सप्तम भाव में राहु के साथ स्थिति के कारण जीवन साथी के साथ सामंजस्य अच्छा नहीं रहा। गुरु की लाभ भाव पर पंचम दृष्टि एवं प्रथम (तनु) भाव पर सप्तम दृष्टि ने उसे शारीरिक पीड़ा भी दी तथा उसके लाभ (आर्थिक स्रोत्र) में भी व्यवधान पहुंचाया। यद्यपि जातक की कुंडली में गुरु व चंद्र के केंद्रस्थ होने से गजकेसरी योग बन रहा है, फिर भी गुरु में चंद्र (अवयोगी ग्रह में व्ययेश) की दशा के दौरान उसे धन की हानि उठानी पड़ी तथा माता से भी वियोग हुआ। गुरु की महादशा में राहु की अंतर्दशा में जातक को घोर आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा तथा इस दौरान उसे अपने जीवन साथी के साथ भयंकर शारीरिक कष्ट भी झेलने पड़े। उस समय गोचर में भी गुरु तुला राशि में भ्रमण कर रहा था और सप्तम (पत्नी), नवम (भाग्य) व एकादश (लाभ) स्थान पर उसकी दृष्टि थी। गुरु के अवयोगी एवं अष्टमेश होने के कारण अशुभ फल मिले। कुंडली सं. 2 में सूर्य के राश्यांश 4-150 7’ एवं चंद्र के राश्यांश 4-150-22’ को जोड़ने पर 9-0’ 29’ प्राप्त होते हैं जिसके अनुसार जातक का जन्म सिद्ध योग में हुआ। इन राश्यांशों में 93020’ जोड़ने पर राश्यांश 0-30-49’ प्राप्त होते हैं जो मेष राशि व अश्विनी नक्षत्र में हैं। जन्म के समय शुक्र दशा शेष 15 दिन 11 माह 16 वर्ष था। इस तरह, अश्विनी नक्षत्र का अधिपति केतु योगी एवं मेष राशि का अधिपति मंगल सहयोगी ग्रह हुआ। सिद्ध योग के राश्यांश 9-0’29’ में 1600 जोड़ने पर 2-180-29’ राश्यांश प्राप्त होते हैं जो आद्र्रा नक्षत्र के अंतर्गत है जिसका अधिपति राहु जातक के लिये अवयोगी ग्रह हुआ। कर्म (दशम) स्थान का स्वामी मंगल नीच राशि का होकर षष्ठ स्थान (दशम से नवम) में है और नवम भाव पर उसकी चतुर्थ दृष्टि है दशम भाव पर द्वादशेश व लग्नेश शनि की तृतीय दृष्टि है और शनि के कारण शत्रु सूर्य के नक्षत्र उत्तराफाल्गुनी में होने के कारण पृथकवादी गुण का आधिक्य है जिसके फलस्वरूप जातक का कार्यक्षेत्र बदला। जातक, जो एक इंजीनियर है, ने अपनी नौकरी छोड़कर अपना व्यवसाय प्रारंभ किया। उस समय वर्ष 1985 में जातक पर मंगल की महादशा प्रभावी थी। मंगल के सहयोगी होने व कर्म भाग्य से संबंधित होने के कारण जातक के व्यवसाय में आशातीत प्रगति हुई। उस समय योगी ग्रह केतु के नवम भाव में भ्रमण ने भी जातक के भाग्य में वृद्धि की। मंगल के बाद वर्ष 1991 में राहु की महादशा प्रारंभ हुई। राहु जातक के लिए अवयोगी ग्रह है और नवम भाव को नवमी दृष्टि से देख रहा है जिसके फलस्वरूप भाग्य हीनता की स्थिति बनने लगी। साथ ही पंचम भाव (बुद्धि भाव) पर राहु की पंचम दृष्टि ने उसकी बुद्धि को भ्रमित किया। और उसने अपने व्यवसाय में कतिपय गलत निर्णय लिए जिसके फलस्वरूप उसे नुकसान हुआ। राहु में गुरु की अंतर्दशा तक स्थिति नियंत्रण में रही किंतु वर्ष 96 में शनि की अंतर्दशा प्रारंभ होते ही बिगड़ती चली गई। फलस्वरूप जातक का व्यवसाय बंद हो गया और उसे घोर आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा। कुंडली सं. 3 में सूर्य के राश्यांश 0-230 33’ और चंद्र के राश्यांश 4-140 41’ को जोड़ने पर 5-080-14’ प्राप्त होते हैं जिसके अनुसार जातका का जन्म ध्रुव योग में हुआ। इन राश्यांशों में 93020’ जोड़ने पर राश्यांश 8-110 34’ प्राप्त होते हैं जो धनु राशि और मूल नक्षत्र के अंतर्गत है। जन्म के समय शुक्र की महादशा 17 वर्ष 11 माह 17 दिन की शेष रही। मूल नक्षत्र का अधिपति केतु योगी ग्रह एवं धनु राशि का अधिपति गुरु सहयोगी ग्रह हुआ। ध्रुव योग के राश्यांश 5-08014’ में 160’ जोड़ने पर 10-180 14’ राश्यांश प्राप्त होते हैं जो शतभिषा नक्षत्र के अंतर्गत है जिसका अधिपति राहु जातका के लिए अवयोगी ग्रह हुआ। राहु सप्तम (पति भाव) में शनि (षष्ठेश) के साथ है। सप्तमेश गुरु द्वादश भाव में एकादशेश चंद्र के साथ है और उन पर अष्टमेश तृतीयेश मंगल की चतुर्थ दृष्टि है। शुक्र भाग्येश होकर अष्टम भाव में विराजमान है। चंद्र कुंडली में भी अष्टम भाव में शनि व राहु स्थित हैं। नवमांश में भी सप्तमेश गुरु अष्टम भाव में स्थित है। ये सभी स्थितियां यह इंगित करती हैं कि जातका को पति सुख पूर्ण रूपेण प्राप्त नहीं होगा। राहु के अवयोगी ग्रह होने और सप्तम में स्थित होने के कारण इस दुष्प्रभाव में और वृद्धि हुई। यद्यपि मनकारक चंद्र द्वादश भाव में गुरु के साथ गजकेसरी योग बना रहा है किंतु अष्टमेश मंगल की दृष्टि इस शुभ प्रभाव को निष्प्रभावी कर रही है।



काल सर्प योग विशेषांक   जून 2007

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