यदि मरण-वेला का पहले आभास हो जाए तो- आसन्नमृत्यु व्यक्ति को चाहिए कि वह समस्त बाह्य पदार्थों और कुटुंब मित्रादिकों से चित्त हटाकर परब्रह्म का ध्यान करे। गीता में कहा है- ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन् मामनुस्मरन्। यः प्रयाति त्यजन् देहं स याति परमां गतिम्।। अर्थात यदि व्यक्ति मरण समय भी भगवान के ध्यान में लीन हो सके तो भी वह श्रेष्ठ गति को प्राप्त करता है। कुटम्बिजन-कत्र्तव्य: इस समय कुटुम्बियों और साथियों का कत्र्तव्य है कि वे आसन्न-मृत्यु के चारों ओर आध्यात्मिक वातावरण बनावें। जो दान करना चाहें- अन्नदान, द्रव्यदान, गोदान, गायत्री जपादि यथाशक्ति यथाविधि उस व्यक्ति के हाथ से करावें अथवा उसकी ओर से स्वयं करें। गर्भाधानादि संस्कारों की विधि-कर्तृक होने पर भी संस्कार पुत्र का ही होता है। इसी प्रकार दाह-संस्कार की क्रिया पुत्र-कर्तृक होने पर भी संस्कार मृतक का ही होगा। पिंडदान आदि श्राद्धक्रिया मृतक को परलोक में शुभफल-दात्री है। अन्त्येष्टि संस्कार अन्य संस्कारों की भांति मृतक के आत्मा को शुद्ध करने वाला है। आसन्न-मृत्यु व्यक्ति को यथासंभव आचमन-मार्जन आदि करा संकल्प कराके ‘ऊँ तत्सद् ब्रह्मार्पणमस्तु’ उच्चारण करा, दान कराना चाहिये। मरण-समय का कृत्य: मरणबेला में आसन्न-मृत्यु पुरुष को पृथ्वी को गोबर से लीप कुशाएं बिछा, ऊन आदि का वस्त्र बिछाकर दक्षिण में सिर कर लिटा देना चाहिए। उस समय भी वह, यदि कर सके तो ईशावास्य पुरुष-सूक्त अथवा गीतासहस्त्रनाम आदि स्तोत्र का पाठ करें अथवा सुने। प्राण छोड़ते समय: पुत्रादि उत्तराधिकारी पुरुष गंगोदक छिड़कंे। प्राण निकल जाने पर वह अपनी गोद में मृतक को सिर रख उसके मुख, नथुने, दोनों आंखों और कानों में घी बूदें डाल, वस्त्र में ढंक, कुशाओं वाली भूमि पर तिलों को बिखेर कर उत्तर की ओर सिर करके लिटा दें। शव-स्नान: दाह-कर्म का अधिकारी पुत्र आदि दाढ़ी-मूंछ सहित सिर का मुंडन कराकर स्नान करे और शुद्ध वस्त्र (धोती-अंगोछा आदि) धारण कर मृतक के समीप जाये। इस समय वह सब तीर्थों का ध्यान करता हुआ, मृतक को शुद्ध जल से स्नान करावे। फिर उस पर चंदन-गंध आदि का लेपन कर मुख में स्नान करावे। फिर उस पर चंदन-गंध आदि का लेपन कर मुख में पंचरत्न, गंगाजल, और तुलसी धरे तथा शुद्ध वस्त्र (कफन) में लपेट कर अर्थी पर रख भली भांति बांध दे। पिंड दान: इसके पश्चात् शव के दक्षिण ओर बैठ अपसव्य होकर पिंड दान करें। ये छः हैं, प्रत्येक में संकल्प पढ़कर जमीन पर आसन-दान, फिर संकल्प पढ़कर पिंड पर अवनेजन डाल दें और फिर संकल्प पढ़कर उसको शव की छाती पर रख दें। इसी प्रकार 5 पिंड दें। तिल-सहित घी-शक्कर मिलाकर जौ के आटे का पिंड बनाया जाता है। पिंडदान का सामान्य संकल्प ः संकल्प- अद्य .......गोत्रस्य .........प्रेतस्य प्रेततानिवृत्यर्थ उक्तमलोक प्राप्त्यर्थंमौध्र्वदैहिकं कर्म करिष्ये। प्रथमशव-पिंड-संकल्प: अद्य-गोत्र-प्रेत पिंडस्थानेऽत्रावनेनित्त्व ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम्। अद्य-गोत्र-प्रेत मृत्युस्थाने शवो नामक एष पिंडस्ते मया दीयते तवोपतिष्ठातम्। अद्य..... गोत्र पितर..........प्रेत पिंडोपरि प्रत्यवनेजनजलं ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम्। इस प्रकार तीन संकल्प पढ़ पिंड को प्रेत के वस्त्र में छाती पर बांध दें और शव को घर के द्वार तक ले आयंे। द्वार पर दूसरा पान्थ पिंड अरथी ले जाना चैराहे पर तीसरा पिंड विश्राम स्थान पर चैथा पिंड चिताचयन। होम-विधान आदि क्रियाएं करनी चाहिए।


मंगल दोष विशेषांक  जुलाई 2015

फ्यूचर समाचार के इस विशेषांक में मंगल दोष की विस्तृत चर्चा की गई है। कुण्डली में यदि लग्न, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम भाव एवं द्वादश भाव में यदि मंगल हो तो ऐसे जातक को मंगलीक कहा जाता है। विवाह एक ऐसी पवित्र संस्था जिसके द्वारा पुरुष एवं स्त्री को एक साथ रहने की सामाजिक मान्यता प्राप्त होती है ताकि सृष्टि की निरन्तरता बनी रहे तथा दोनों मिलकर पारिवारिक एवं सामाजिक दायित्व का निर्वहन कर सकें। विवाह सुखी एवं सफल हो इसके लिए हमारे देश में वर एवं कन्या के कुण्डली मिलान की प्रथा रही है। कुण्डली मिलान में वर अथवा कन्या में से किसी एक को मंगल दोष नहीं होना चाहिए। यदि दोनों को दोष हैं तो अधिकांश परिस्थितियों में विवाह को मान्यता प्रदान की गई है। इस विशेषांक में मंगल दोष से जुड़ी हर सम्भव पहलू पर चर्चा की गई है। इसके अतिरिक्त स्थायी स्तम्भ में भी विभिन्न विषयों को समाविष्ट कर अच्छी सामग्री देने की कोशिश की गई है।

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